Monthly Magzine
Sunday 15 Dec 2019

गीत

कैसे बुने चदरिया साधो!

उलझ गए हैं ताने-बाने।

 

'काले' धागों का संयोजन

'उजलों' की फीकी है, रंगत;

चित्र उभरता जो, 'विरुप' हैं,

सब कुछ है अनमेल, असंगत।

 

मन में उठे सवाल सभी के,

इस 'बुनकारी' के क्या माने?

 

चादर बुनना छोड़ इन दिनों,

'कलावन्त' हैं जाल बुन रहे;

हम सारे 'कबीर' चुप होकर,

हैं उनकी युक्तियां सुन रहे।

 

व्यर्थ हो रहे 'जतन', हारकर,

दरकिनार हो रहे सयाने।

 

लोकलाज निर्वसन हो रही,

और ढीठ हो रहा अनय है;

रोज नये फरमान नि•ाामी,

जारी करता हुआ समय है।

 

यह उघरा परिवेश ढंकेगा-

कल को कौन? राम जी जाने।

----

चमकदार चीजों से,

भरा पड़ा ग्लोबल बा•ाार,

कबीरा, क्या लेगा?

 

इधर देख, सोने की लंका,

जहां सभी हैं सात हाथ के;

सबके अपने मोलभाव,

पर सभी 'बिसाती' एक साथ के।

सौदे सभी नकद करते हैं,

चलता नहीं उधार

कबीरा, क्या लेगा?

 

बिकती है •ारूरतें भी,

अचरज है ऐसी भी दुकानें;

इस दर तेरी 'सुरति-निरति' के,

नहीं रह गए कोई माने।

खरीदार खुद बिक जाएगा,

ऐसे हैं आसार

कबीरा, क्या लेगा?

 

सांसों की कीमत पर भी,

'कैरियर' खरीद रहे हैं बच्चे;

खेल-खिलौने सब झूठे पड़ गए,

रह गए सपने सच्चे।

 

भाग यहां से

'चादर' तेरी लेंगे लोग उतार,

कबीरा, क्या लेगा।