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Thursday 12 Dec 2019

बचपन

बारिश के मौसम में पथरीले छत पर जमी काई और मिट्टी के थोड़े-थोड़े कणों का आसरा पाकर कुछ घास-फूस, वनस्पतियां उग आईं हैं। इन पत्थरों पर उगे नरम-नरम पत्तों वाली वनस्पतियों को देखकर मन को अनायास अपने बचपन की याद आ जाती है। हम जैसे-जैसे बड़े होते गए, हमारा जीवन उसी पथरीले छत की तरह होता जा रहा है, जहां न कोई नमी है न ही कोई खूबसूरत जीवन की संभावना। बचपन इन्हीं नरम-नरम पत्तों वाली वनस्पति की तरह द्रवित मन में अचानक उग आता है...कुछ क्षण के लिए बचपन की शरारतों और बेफिक्री का स्मरण होने पर जी चाहता है कि अगर उन दिनों में प्रवेश का कोई द्वार होता तो सारी उपलब्धि, जिंदगी के सारे सपने, सारे बंधन तोड़कर प्रवेश कर जाते...उन दिनों में पहुंचते ही उन सारे छोटे-छोटे नि:स्वार्थ, निष्कपट और निष्कलुष दोस्तों के घर-घर जाकर पुकारता, दिन-दोपहर-शाम तक जी भरकर खेलते...नए-नए खेलों को आजमाने में बड़ी उत्सुकता होती थी। उन नए-नए खेलों को आजमाते-आजमाते हम ऐसे खेलों की तरफ बढ़ आये हैं जिनमें कोई उत्सुकता नहीं रह गई है...पहले खेल मर्जी से खेलते थे पर आज जीवन के खेल हमें मजबूर कर रहे उन्हें खेलने के लिए जबकि हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है उनमें। बचपन के वो खेल उबाऊ नहीं थे...उनमें तो दिन छोटा महसूस होता था...दिन की कमी का खामियाजा शाम को भुगतना पड़ता था...हम शाम के हिस्से से भी कुछ समय चुरा लेते थे। बात अगर उसी छत पर उग आई वनस्पति की करें, तो, मैं जानता हूँ मौसम जब तक नम है तब तक ही उसका हरा-भरा रहना सम्भव है अन्यथा धूप के थपेड़े उन्हें मुरझा देंगे...मुझे ये भी पता है कि किताबों के अध्ययन और रोजगार की चिंता के हिस्से का समय चुराकर, ये जो बचपन को याद कर रहा हूँ, वो याद बहुत देर तक न टिक पायेगी...जीवन की कटुता और यथार्थ उस मासूम बचपन को ज्यादा देर तक न टिकने देंगे...वो मुरझा जाएगा...फिर लौट जाएगा अतीत में...स्मृति बन जायेगा....जिस जीवन को भींग कर जिया है वो उम्र के बढ़ते कदम के साथ मात्र एक छाया भर बन कर रह जाती है।

आप समझेंगे कि लिखने वाला अतीतजीवी है लेकिन शहर में बैठकर मैं आपको उस हरी-हरी घास की याद दिलाऊं, जिसमें प्रात: की ओस की बूंदे लिपटी थीं, जिस पर कदम रखते ही ऐसा लगता था मानो किसी अज्ञात नदी की धारा घास की तहों के नीचे बह रही हो...कदम रखते ही घास ऐसे दबी जैसे किसी सोते हुए इंसान की पीठ पर पैर पड़ गया हो...हमने तमाम बड़े फूलों को खिलते हुए देखा है पर बचपन में हमने ऐसे-ऐसे फूल देखे हैं, जिनका आकार गेहूँ और सरसों के दानों जितना छोटा होता हैं...ये बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि कभी-कभी ऐसे फूलों की खोज कोई वनस्पति विज्ञानी करता हुआ मिलेगा। इससे आप समझ सकते हैं कि बचपन की दृष्टि, किसी सूक्ष्म दृष्टि वाले वैज्ञानिक से कम नहीं होती।  शायद बचपन की ये स्मृति आपको भी तड़पा दे, जब आप अपने घर से, माँ के प्यार भरे स्पर्श से, नीम के पेड़ की छांव से दूर हैं...स्मरण कीजिये कि आपको आकाश की तरफ देखे कितने दिन, कितने सप्ताह, कितने महीने....ऐसे कितने समयांतराल हो चुके...शहर की बिजली की रोशनी में धुंधले होते तारों की रोशनी को कब आपने ढूंढने की कोशिश की होगी...मुझे लगता है इस सवाल पर हम सभी थोड़े निराश जरूर होंगे, फिर बचपन की याद जरूर आएगी, जब गर्मियों की रातों में घर के आँगन में खटिया बिछाकर दादी की कहानियां सुनते हुए आसमान के तारे उंगलियों से गिनने की नाकाम कोशिश कर रहे थे....शहर में पले-बढ़े बच्चे तो बचपन के इस अनुभव से अछूते रह गए। उनके लिए चांद, तारे,ओस की बूंदे सभी कुछ गुजरे युग की बातें लगेंगी। इस मामले में हम गांव के बच्चे समृद्ध हैं...हमारा बचपन दीवारों के साये में नहीं, बल्कि खुले आसमान की छत के साये में गुजरा है...हमारे पास सुकून के लिए वो सम्पन्न स्मृतियां बरकरार हैं...

इतनी सारी बातें...ये तो कुछ भी नहीं। अभी तमाम शैतानियां, तमाम सारे अनुभव, खोज, खेल बचे हैं जिनका जिक्र आपको पसन्द आएगा पर फिर कभी मिलकर सोचेंगे...फिर याद करेंगे...फिर बारिश होगी..मौसम सुहाना होगा...नरम-नरम पत्तों वाली वनस्पतियाँ फिर उगेंगी....फिर मिट्टी, पानी और मौसम के अभाव में वो सूख जाएंगी....फिर बचपन की स्मृतियां याद आकर जीवन की आवश्यकताओं के आगे अप्रासंगिक सी हो जाएंगी....पर हम फिर भी अवसर मिलते ही चट्टानों का सीना फाड़कर उगने वाले कुटज वृक्ष की तरह बचपन की यादों को हरा-भरा करेंगे....उन्हें सहलाएँगे...!