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Sunday 15 Dec 2019

पत्र

जून अंक में ललितजी की प्रस्तावना पढ़ी, जो नेसार नाज़ के कहानी संग्रह पर इस बार केन्द्रित थी। उसकी प्रशंसा पढऩे के बाद हांफता हुआ शोर पढऩे की लालसा जाग उठी। यद्यपि आपने संग्रह की सभी कहानियों का खाका खींच दिया है, किंतु प्यास अब भी बाकी है। कृपया बताएंगे,कि यह संग्रह कहां से और कैसे उपलब्ध होगा।  अब अंक के बारे में, विविध भारती के विषय में बहुत सी नई जानकारी यहां मिली। लीलाधर मंडलोई, जो अब नया ज्ञानोदय के संपादक हैं, उनका लेख बहुत सी नई बातें बताता है। पं.नरेन्द्र शर्मा से मैं भी कई बार मिलता रहा हूं, किंतु मंडलोईजी ने उनके बारे में जो लिखा, उससे मैं अनजान था।  इस लेख के अलावा ममता सिंह का लेख भी कई नई बातें बताता है। यद्यपि यह उनके संस्मरण के रूप में है, फिर भी उन्हें बधाई देने का मन होता है। वास्तव में विविध भारती देश की सुरीली धड़कन है। यह सर्वमित्राजी ने सही लिखा है। उनका अपना लेख भी संस्मरण जैसा ही है। किंतु आकाशवाणी के अलावा उनका संबंध वायस आफ अमेरिका, रेडियो मास्को आदि से भी रहा है। उनके बचपन की यादें, मन को गुदगुदाती हैं, खासकर संजय पांडेय और राजीव शुक्ल से जुड़ी यादें। लेखिका को बधाई।  कुल मिलाकर यह अंक संग्रहणीय बन गया है। बिनाका गीतमाला के अमीन सयानी से भी अक्सर मुलाकात होती रही है। उनके तथा गीतमाला पर शशांक दुबे का लेख भी पठनीय है। पं.नरेन्द्र जी पर भी एक स्वतंत्र लेख इस अंक में है। रमेश उपाध्याय का भी अच्छा संस्मरण है।

समूचे अंक के लिए आपको बहुत बधाई।

मनमोहन सरल, 76, पत्रकार, मधुसूदन कालेलकर मार्ग, बांद्रा (ई.) मुंबई- 400051