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Wednesday 11 Dec 2019

शायर डॉ. शाहिद मीर की महत्ता

69 वर्ष की आयु में इस संसार को अलविदा कहने वाले डॉ. शाहिद मीर मूलत: उर्दू के जदीद (नव्यता-परक) शायर थे। विज्ञान के विद्यार्थी एवं व्याख्याता होने के नाते, बौद्धिक स्तर पर शाहिद ने अपनी शायरी में किसी एक दृष्टिकोण अथवा किसी एक 'वाद' को अपनाना उचित नहीं समझा। उनका मानना था कि आज की सच्चाई आने वाले कल में शायर के दृष्टिकोण के नए-नए आयाम खोलते हुए साहित्यिक रचना-अवदान करती रहती है। इसलिए शायर के नज़दीक चारों ओर फैले समाज से ले कर अंतरराष्ट्रीय अभियानों तक विचारचेता कवि बदलता हुआ दृष्टिकोण पाठक या श्रोता तक पहुँचना ज़रूरी है।

बीती सदी के अस्सी के दशक में डॉ. शाहिद मीर को अपनी उस गज़ल के मतले और एक शेर की वजह से भी बहुत लोकप्रियता मिली, जिसे विख्यात $गज़ल-गायक जगजीत सिंह ने गाया था। $गज़ल का मतला और शेर कुछ इस प्रकार था- 'ए $खुदा, रेत के सहरा को समंदर कर दे/या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे।Ó शेर- 'और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है, लेकिन/मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे।'

संयोग की बात है कि सत्तर के दशक में मैं और शाहिद सै$िफया कॉलेज, भोपाल में बी.एस.सी. के अंतिम दो वर्षों में सहपाठी रहे। उस काल-खण्ड में हम दोनों शायरी करने लगे थे। लेकिन, हम दोनों की शायरी की दिशाएं अलग थीं। उस समय भी, मेरे शेरों का हिन्दी-रुझान जग-ज़ाहिर था, जबकि शाहिद मीर उर्दू के युवा शायरों की ज़मात में शामिल थे।

संभवत: वर्ष 1991 में डॉ. शाहिद मीर ने बाँसवाड़ा (राजस्थान) से मेरे ग्वालियर वाले पते पर देवनागरी में प्रकाशित एक कविता-संग्रह भेजा- 'कल्पवृक्षÓ। जिसमें शाहिद की 50 हिन्दी रुझान की गज़लें सम्मिलित थीं। बाद में, शाहिद मीर का फोन भी आया- 'यार, मेरी इन हिन्दी $गज़लों पर कुछ लिख देना। मैं तुम्हारे जैसी हिन्दी $गज़लें तो नहीं कह पाता!'

आज अपने उसी दोस्त की उन 50 हिन्दी रुझान की $गज़लों में से 10 बेहतरीन गज़लों का चयन कर मैं 'अक्षर पर्व' के अपने सुधी पाठकों से मु$खातिब हो रहा हूँ। मुझे लगता है- जो अच्छा होता है, वो चाहे उर्दू में कहे या हिन्दी में या किसी अन्य भाषा में, उसकी चमक निर्विवाद होती है। डॉ. शाहिद मीर की लगभग 30 वर्ष पहले की ये हिन्दी $गज़लें भी लगभग उतना ही आकर्षित करती हैं, जितनी उनकी उर्दू गज़लें।

शाहिद मीर जब कहते हैं-

व$क्त इक ठहरा हुआ-सा ताल है,

जि़न्दगी  उसमें  उगी शैवाल है।

तो आँखों के सामने एक ऐसा दृश्य उभरता है, जो देर तक सोचते रहने पर मजबूर करता है। ऐसा ही उनका एक शेर और है-

इक क्षण मुस्काने के लिए,

हम भी  पहरों रहे उदास।

किसी भी संवेदनशील मनुष्य की मन:स्थिति को इतने कम शब्दों में.... इतनी सुन्दर युक्ति के साथ 'क्लिकÓ नहीं किया जा सकता।

इस तरह की मंजऱ-निगारी (दृश्यात्मकता) शाहिद को स्वत: ही एक ऐसा शायर बनाती है- जिसके अर्थ की सीमा उसके शब्दों से बहुत अधिक होती है। जैसे उनका यह शेर-

आँधियों  से कहो, ठहर  जायें  जऱा,

एक पत्ता ही, बस, डाल पर शेष है।

यानी जि़न्दगी का जो अंतिम चिन्ह पेड़ पर बाकी बचा है, आँधी उस पर तो रहम कर!

दृश्यात्मकता के इस शेर में भी इकलौती बूँद अपनी अस्मिता बचाने के संघर्ष में उलझी दिखाई देती है। शेर-

तपती हुई धरती  है जिधर जाती हैं नजऱें,

इक बूँद परेशान है बादल से निकल कर!

डॉ. शाहिद मीर मनोविज्ञान के अद्भुत चितेरे शायर थे। वे जानते थे कि 'सैडिस्ट मानसिकता का इन्सान ही अपनी चरम मानसिकता के अंतर्गत आगजऩी, लूट-पाट, रेप या हत्या जैसे कर्म में प्रवृत्त हो सकता है। इसी भावभूमि का मनोवैज्ञानिक शेर-

पहले तो हम बुझाते रहे अपने घर की आग,

फिर बस्तियों  में आग  लगाने निकल गए।

शाहिद मीर आमरण जि़न्दगी की जद्दो-जहद के शायर रहे। निराश हो कर बैठ जाना उनके शायराना शब्द-कोष में नहीं मिलता। वे जि़न्दगी से जूझ कर अपने होने का इत्मीनान करने वाले शायर थे। उनका एक ऐसा ही ब$गावती शेर-

तोड़ दें बढ़ कर, चलो, अब इस दमन के चक्र को,

जि़न्दगी  की $फौज  आ$िखर कब तलक हारी रहे!

तिश्नगी (अतृप्ति) शाहिद की संपूर्ण शायरी का एक बहुत मुखर विषय रहा। वे भी अपनी जि़न्दगी से बहुत अधिक संतुष्ट नहीं दीखे। विरोधाभास पद्धति से निकाला गया डॉ. शाहिद मीर का यह शेर उस समय बहुत लोकप्रिय हुआ-

कभी-कभी  $कतरे-$कतरे  को  तरसे हैं पीने वाले,

कभी-कभी पीने वालों को दरिया-दरिया तरसा है।

अपने सहपाठी, अपने दोस्त और अपने समकालीन शायर डॉ. शाहिद मीर के विषय में मैं जब भी तटस्थ हो कर सोचता हूँ, तो मुझे लगता है कि अदब की दुनिया में शाहिद को वैसा महत्व नहीं मिला, जिसके वे ह$कदार थे! 

 

 

 

गज़लें

डॉ. शाहिद मीर

जन्म : 10 फरवरी, 1947 (सिरोंज, म.प्र.)

शिक्षा : एम.एस.सी., पी.एच डी.

प्रकाशन : देवनागरी में दो और उर्दू में चार $गज़ल-संग्रह

सम्मान : राजस्थान और बिहार उर्दू अकादमियों तथा गालिब अकादमी,  बैंगलूर द्वारा सम्मानित।

म.प्र. उर्दू अकादमी का सम्मान भी मिला।

विशेष : एच.एम.वी. से अनुबंधित शायर, जगजीत सिंह-चित्रा सिंह ने अनेक $गज़लें गाईं।

मृत्यु  : 22 फरवरी, 2018

(एक)

 

पेड़ की सूखी डाली पर जो इक पत्ता पीला-सा है,

शायद उसका मेरे सूने जीवन से कुछ रिश्ता है।

कोई न उतरा राही जिस पर सदियां गुजरी हैं तन्हा,

सुर्ख समन्दर के पानी में इक सुनसान जज़ीरा है।

कभी कभी $कतरे-$कतरे को तरसे हैं पीने वाले,

कभी-कभी पीने वालों को दरिया-दरिया तरसा है।

बीच घनी पलकों में उसकी हीरे जैसी आँखें हैं,

यानी दो अनमोल खज़ानों पर फौजों का पहरा है।

का$गज़ पर ये नक्श लहू से किसके लिए उभारे हैं,

सच्चाई पहचानने वाली आंखों पर तो  पर्दा है!

इन्सानों की भीड़ में 'शाहिद' कल जो फूल अकेला था,

सुनते हैं- अब कोठे-कोठे उसके हुस्न का चर्चा है।

 

(दो)

 

देह पर चलती हुई हालात की आरी रहे,

है, मगर, आदेश जीवन का सफर जारी रहे।

हर कदम पर भूख, रिश्वत, अधखुले जिस्मों की भीड़,

ऐसे आलम में कोई कब तक सदाचारी रहे?

दूर रह कर भी सिखा दी प्यार की भाषा हमें,

हम सदा उन बोलती आंखों के आभारी रहे।

बेचकर खुद को, $खरीदा प्यार झूठी दोस्ती,

हम सदा इन बे चमक हीरों के व्यापारी रहे।

तोड़ दें बढ़कर, चलो, अब इस दमन के चक्र को,

जि़न्दगी की फौज आखर कब तलक हारी रहे!

(तीन)

उजला है बहुत आज का दिन कल से निकल कर,

ये शा$ख हरी हो गई कोंपल से निकल कर।

तपती हुई धरती है जिधर जाती हैं नजऱें,

इक बूँद परेशान है बादल से निकल कर।

बन जाते हैं शादाबो-जवाँ फूल कमल के,

ये शेर मेरे ज़हन की दल-दल से निकल कर।

बेबाक अदाओं ने पुकारा तो बहुत था,

आया न गया रूह की हलचल से निकल कर।

उस राज़ को सीने में छुपाओगे कहां तक,

$खुशबू तो बिखर जाती है सन्दल से निकल कर।

'शाहिद' है अभी दूर बहुत सुब्ह की वादी,

जाओगे कहां रात के जंगल से निकल कर!

(चार)

मौसम ने जब भी स्वप्न बुने सर्वनाश के,

बेखौफ  मुस्कराने  लगे  वन  पलाश  के।

इतना भी अब खुशी के दिनों पर न फूलिए,

पल में बदल न जाएं ये पत्ते हैं ताश के!

मरना भी रास आ न सका इस जहान में,

वारिस कहीं मिले न हमें अपनी लाश के।

आकाश और ज़मीन की सीमाएं देख लीं,

आयाम तय न हो सके अपनी तलाश के।

अब सि$र्फ चन्द $खून के $कतरे क्षितिज पे हैं,

मिलते नहीं निशां कोई सूरज की लाश के।

 

(पाँच)

 

पढ़-लिख गए तो हम भी कमाने निकल गए,

घर लौटने में फिर तो ज़माने निकल गए!

घिर आई शाम, हम भी चलें अपने घर की ओर,

पंछी भी अपने-अपने ठिकाने निकल गए।

बरसात गुजऱी, सरसों के मुरझा गए हैं फूल,

उन से मिलन के सारे बहाने निकल गए!

पहले तो हम बुझाते रहे अपने घर की आग,

फिर बस्तियों में आग लगाने निकल गए।

खुद मछलियाँ पुकार रही हैं कहाँ है जाल,

तीरों की आरज़ू में निशाने निकल गए।

किन साहिलों पे नींद की परियां उतर गई,

किन जंगलों में $ख्वाब सुहाने निकल गए?

'शाहिद' हमारी आँखों का आया उसे 'खयाल,

जब सारे मोतियों के $खजाने निकल गए।

 

(छह)

 

कब किसी का यकीन होते हैं,

फलसफे अर्थहीन होते हैं।

एक आंसू की बूंद में आकर,

गम के दरिया विलीन होते हैं।

पेट उनका भी भरना मुश्किल है,

घर में बच्चे जो तीन होते हैं।

आदमी आज कल ज़माने में,

चलती-फिरती मशीन होते हैं।

ठेस लगने से टूट जाएंगे,

प्रेम धागे महीन होते हैं।

आसमानों पे कल तलक थे मगर,

शेर अब तो ज़मीन होते हैं।

 

(सात)

 

वक्त इक ठहरा हुआ सा ताल है,

जि़न्दगी उसमें उगी शैवाल है।

सु$र्ख फूलों से लदी जो डाल है,

आंधियों के खौफ से बेहाल है।

घिर गया है हर तरफ से आदमी,

हर तरफ फैला गमों का जाल है।

रुक नहीं सकता हवा का आक्रमण,

जब तलक पेड़ों के तन पर छाल है।

जब से खेतों में मशीनें आ जमीं,

उजड़ा-उजड़ा गांव का चौपाल है।

बर्फ जम सकती नहीं उस देह पर,

धूप की ओढ़े हुए जो शाल है।

 

(आठ)

 

दिल में नहीं अब कोई आस,

बिछड़ गई है फूल से बास।

इक क्षण मुस्काने के लिए,

हम भी पहरों रहे उदास।

चंचल यादों का इक स्पर्श,

पैर तले हो जैसे घास।

उसके जंगल हरे भरे,

सूखा पत्ता अपने पास।

तुझ पे भरोसा कैसे करूँ,

मुझको नहीं खुद पर विश्वास।

उसके नाम से होंठों पर,

देर तलक ठहरी है मिठास।

कैसा अनोखा ये अहसास,

जि़स्म है जल-थल रूह में प्यास।

 

(नौ)

 

आंख हुई वो काजल वाली,

रुत लहराई बादल वाली।

मुद्दत बाद खुली हैं जुल्$फें,

$खुशबू महकी संदल वाली।

आरज़ुओं से दूर ही रहना,

यह धरती है दल दल वाली।

उस की चुप चुप-सी आंखों में,

$खामोशी है जंगल वाली।

बूंद-बूंद में छुपी हुई है,

नरमी पहली कोंपल वाली।

रात गए छन छन करती है,

सूनी हवेली पीपल वाली।

$गज़ल जहां से क्यूँ कर हारे,

यह लडक़ी है चम्बल वाली!

 

(दस)

सूनी सूनी सी इक रहगुजऱ शेष है,

मेरे हिस्से का अब भी स$फर शेष है।

धूप ढल भी गई मेरे घर में, मगर,

दोपहर शेष थी, दोपहर शेष है।

दिल के अन्दर छुपी है तेरी आरजू,

ठहरे पानी में कोई भँवर शेष है।

आंधियों से कहो ठहर जाएं जऱा,

एक पत्ता ही, बस, डाल पर शेष है।

देवता पत्थरों के पिघल जाएंगे,

मेरी आवाज़ में गर असर शेष है।

ऊँचे-ऊँचे मकानों के साए तले,

टूटा-फूटा हुआ एक घर शेष है।

मेरे दिल की गु$फाओं में 'शाहिद' कहीं,

झिलमिलाता हुआ इक नगर शेष है। 

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निसर्ग भट्ट

अहमदाबाद, गुजरात

( 1)

 

फटी चद्दर की सिलवटों सी हो गयी है जिन्दगी

बेखवाबी की करवटों सी हो गयी है जिन्दगी

 

शहर की आपाधापी में सूखा पड़ा है वक्त का

उजड़े गाँव के पनघट सी हो गयी है जिन्दगी

 

बेहतरी के बहाव को रोका गया अहम के बांध से

मैली यमुना के तलछट सी हो गयी है जिन्दगी

 

साँसों की मंडी लगी है लाशों के इस जंगल में

अंतिम प्रहर के मरघट सी हो गयी है जिन्दगी

( 2)

 

मौहब्बत जब मौजूदगी की मौहताज हो जाती है

रिश्तों की दीवार में तब दरारें पड़ जाती हैं

 

हमारे मासूम डर को भी शक के तराजू में तौला गया

ज्यादा जिक्र भी यहाँ नाराजगी की वजह बन जाती है

 

गुस्ताखी बस इतनी हुई कि आंसू को अल्फाज़ में ढाला

हंसी अक्सर यहाँ खुशी की परछाई समझी जाती है

 

निगाहों को पढऩे का हुनर हर किसी को आता है यहाँ

जब दिल की बारी आयी तो ये दुनिया लाचार बन जाती है

 

किसी कमज़ोर के हालात को उसकी औकात मत समझना

कुछ कागज़ी कश्तियां भी समंदर को पार कर जाती है