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Tuesday 27 Jun 2017

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बीसवीं सदी सभ्यता के इतिहास का ऐसा कालखंड है जिसकी तुलना किसी और समय से नहीं की जा सकती। उन सौ सालों में विश्व में जो युगांतरकारी परिवर्तन हुए, जो उलटफेर हुए, जिस तेजी के साथ बदलाव आए, वैसे पहले कभी नहीं देखे गए। आज इक्कीसवीं सदी में जब यातायात, संचार और सूचना के क्षेत्र में नए-नए आविष्कारों की बदौलत विश्वग्राम की अवधारणा पर बार-बार चर्चाएं हो रही हैं तब यह ध्यान देना दिलचस्प होगा कि बीसवीं सदी में प्रौद्योगिकी के ये उपकरण हासिल न होने के बावजूद जापान से लेकर अमेरिका तक विश्व के तमाम समाजों में एकता, समता और बंधुत्व के सूत्र तलाशे जा रहे थे, परिभाषित किए जा रहे थे और

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  • मुक्तिबोध की कविताओं के महासागर
  • By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • मुक्तिबोध के पत्रों में जीवन और साहित्य
  • By : पीयूष कुमार     View in Text Format    |     PDF Format
  • अंधेरे से उजाले की ओर
  • By : प्रभाकर चौबे     View in Text Format    |     PDF Format
  • कंधे पर पानी की कांवड़ का भार उठाए कवि
  • By : रजत कृष्ण     View in Text Format    |     PDF Format
  • मुक्तिबोध के स्मरण का अर्थ
  • By : डॉ. परशुराम विरही     View in Text Format    |     PDF Format
  • 'आत्म' और 'बाह्य' के संघर्ष का स्वप्नदर्शी कवि
  • By : नीरज खरे     View in Text Format    |     PDF Format
  • सामाजिक संत्रास का कवि
  • By : डॉ. मीनाक्षी जोशी     View in Text Format    |     PDF Format
  • मुक्तिबोध जितना समझदार और ईमानदार लेखक सदियों में कोई कोई ही होता है
  • By : महेश चंद्र पुनेठा     View in Text Format    |     PDF Format
  • मुक्तिबोध: पत्रकारिता के प्रगतिशील प्रगतिमान
  • By : जीवेश प्रभाकर     View in Text Format    |     PDF Format
  • वे कहीं गए हैं, बस आते ही होंगे
  • By : दिवाकर मुक्तिबोध     View in Text Format    |     PDF Format
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