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Friday 18 Aug 2017

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इस बार भी मैं हाल में पढ़ी एक नई पुस्तक की चर्चा करना चाहता हूं। उसके पहले मन हो रहा है कि देश के प्रकाशन व्यवसाय पर एक टिप्पणी करूं। ऐसा करने से मूल विषय से थोड़ा भटक जाने का खतरा तो है तथापि एक लेखक के अथक परिश्रम और प्रकाशक की व्यापारी दृष्टि दोनों के बीच जो संबंध है वह कुछ स्पष्ट हो पाएगा। मेरा मानना है कि हमारे हिन्दी प्रकाशकों में अमूमन उद्यमशीलता तथा कल्पनाशीलता का अभाव है। गो कि बीच-बीच में कुछ अपवाद सामने आते हैं। उद्यमशीलता से मेरा तात्पर्य जोखिम उठाने की क्षमता, दीर्घकालीन दृष्टिकोण और धीरज जैसे गुणों से है। सच्चे अर्थों में जो उद्यमी होगा उसकी निगाह अपने

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