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Sunday 13 Oct 2019

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रोक नहीं सकता आँसू जो

फूट पड़े क्रन्दन से

बाँध नहीं सकता शब्दों को

शब्दों के बन्धन से

हैं झर रहे पत्ते

विचारों की टहनियों से

सूखकर,

कुछ हवाओं की हलकी

थपेड़ों से

कुछ ओस की बूँदों से

रोक नहीं पा रही हैं

शाख से

दीख रही हैं

गैर,

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