Monthly Magzine
Thursday 19 Apr 2018

प्रस्तावना

  • वर्तमान समय पर चर्चा करना हो तो पहला प्रश्न यही उठता है कि इसका आरंभ कहां से माना जाए और उसका आधार क्या हो। इसके लिए उन परिवर्तनों को चिन्हित करने की आवश्यकता होगी जो वर्तमान और पूर्ववर्ती समय के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींचते हैं।
  • March  2016   ( अंक193 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • इस साल \'उसने कहा थाÓ का प्रकाशन हुए पूरे सौ साल बीत चुके हैं। यह वर्ष भीष्म साहनी की जन्मशती का भी है।
  • November  2015   ( अंक194 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • इस साल \'उसने कहा थाÓ का प्रकाशन हुए पूरे सौ साल बीत चुके हैं। यह वर्ष भीष्म साहनी की जन्मशती का भी है।
  • November  2015   ( अंक194 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • November  2015   ( अंक194 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • November  2015   ( अंक194 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • इस्लामिक स्टेट या आईएस ने गत 13 नवंबर को पेरिस पर आतंकी हमला कर एक बार फिर अपनेे नृशंस, विचारहीन और अमानवीय चरित्र का परिचय दिया है। आईएस के इस दुष्कृत्य की जितनी भी भत्र्सना की जाए कम है।
  • December  2015   ( अंक195 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • मेरी उम्र के पाठकों को शायद याद हो कि एक दौर में हम आकाशवाणी से समाचार सुना करते थे। समाचार बुलेटिन का आरंभ इस तरह से होता था- \'\'अब आप देवकीनंदन पांडेय
  • January  2016   ( अंक196 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा अपने स्थापना काल से लगातार गलत कारणों से अखबारों में सुर्खियां बटोरता रहा है।
  • February  2016   ( अंक197 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • दूसरे दिन जब चन्दर डॉ. शुक्ला के यहां निबंध की प्रतिलिपि लेकर पहुंचा तो आठ बज चुके थे। सात बजे तो चंदर की नींद ही खुली थी और जल्दी से वह नहा-धोकर साइकिल दौड़ता हुआ भागा था कि कहीं भाषण की प्रतिलिपि पहुंचने में देर न हो जाये।....
  • March  2016   ( अंक198 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • मेरा सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखना लगभग बंद हो गया है। छठे-छमाहे किसी ने तारीफ कर दी तो उस फिल्म को देखने का मन बन जाता है वरना टीवी पर आधी अधूरी फिल्में देखकर संतोष कर लेता हूं।
  • April  2016   ( अंक199 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format