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Monday 20 Nov 2017

पत्र

  • अक्षर पर्व का दिसम्बर 14 का अंक पढ़ा। गज़़लों के तहत अशोक अंजुम की गज़़लें पढ़कर सुकून मिला।
  • April  2015   ( अंक187 )
    By : अन्य     View in Text Format    |     PDF Format
  • अक्षर पर्व का जनवरी अंक काफी अच्छा निकला है। ललितजी की प्रस्तावना पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ कि उन्होंने मलयजी की कविताओं और उनके कवि-व्यक्तित्व पर अच्छा लिखा है।
  • April  2015   ( अंक187 )
    By : अन्य     View in Text Format    |     PDF Format
  • अक्षर पर्व का नियमित पाठक हंू। अच्छी निकल रही है पत्रिका।
  • April  2015   ( अंक187 )
    By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • अक्षरपर्व के जनवरी अंक में प्रेमशंकर रघुवंशी और श्यामसुंदर दुबे की कविताएं अच्छी लगीं।
  • April  2015   ( अंक187 )
    By : अन्य     View in Text Format    |     PDF Format
  • नागार्जुन का कविकर्म
  • May  2015   ( अंक188 )
    By : विजय बहादुर सिंह     View in Text Format    |     PDF Format
  • अक्षरपर्व की प्रस्तावना में संपादक महोदय द्वारा किसी महत्वपूर्ण पुस्तक से परिचय कराने की बहुत अच्छी शुरुआत है।
  • May  2015   ( अंक188 )
    By : अन्य     View in Text Format    |     PDF Format
  • अक्षरपर्व के विगत कुछ अंकों को पढऩे से ऐसा लगता है कि अक्षरपर्व के रूप में सारिका ही पुनर्जीवित हो उठी है।
  • May  2015   ( अंक188 )
    By : अन्य     View in Text Format    |     PDF Format
  • जनवरी 15 के अंक में दोनों शोध आलेख बहुत अच्छे लगे। इस अंक की सर्वाधिक यर्थाथवादी कहानी थोपना आज की सच्चाई को बयान करती है।
  • May  2015   ( अंक188 )
    By : अन्य     View in Text Format    |     PDF Format
  • मार्च का अंक मिला। पत्रिका में निरंतर प्रगति हो रही है। जर्मन कहानी खुश चेहरा आज भी असंगत नहीं है। हमारे देश में भी यह हो सकता है।
  • May  2015   ( अंक188 )
    By : अन्य     View in Text Format    |     PDF Format
  • अक्षरपर्व दिसम्बर अंक में प्रकाशित चेखव की कहानी नींद पढ़ी। अब तक वार्का ज़ेहन में छाई है।
  • May  2015   ( अंक188 )
    By : अन्य     View in Text Format    |     PDF Format