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Wednesday 22 Nov 2017

अन्य की रचनायें

  • अक्षरपर्व के जनवरी अंक में प्रेमशंकर रघुवंशी और श्यामसुंदर दुबे की कविताएं अच्छी लगीं।
  • April  2015   ( अंक187 )
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  • बेकारी के दिनों में
  • May  2015   ( अंक188 )
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  • ठाकुर बावजी
  • May  2015   ( अंक188 )
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  • सलाम
  • May  2015   ( अंक188 )
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  • बी.आर. यादव स्मृति व्याख्यान
  • May  2015   ( अंक188 )
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  • अक्षरपर्व की प्रस्तावना में संपादक महोदय द्वारा किसी महत्वपूर्ण पुस्तक से परिचय कराने की बहुत अच्छी शुरुआत है।
  • May  2015   ( अंक188 )
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  • अक्षरपर्व के विगत कुछ अंकों को पढऩे से ऐसा लगता है कि अक्षरपर्व के रूप में सारिका ही पुनर्जीवित हो उठी है।
  • May  2015   ( अंक188 )
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  • जनवरी 15 के अंक में दोनों शोध आलेख बहुत अच्छे लगे। इस अंक की सर्वाधिक यर्थाथवादी कहानी थोपना आज की सच्चाई को बयान करती है।
  • May  2015   ( अंक188 )
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  • मार्च का अंक मिला। पत्रिका में निरंतर प्रगति हो रही है। जर्मन कहानी खुश चेहरा आज भी असंगत नहीं है। हमारे देश में भी यह हो सकता है।
  • May  2015   ( अंक188 )
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  • अक्षरपर्व दिसम्बर अंक में प्रकाशित चेखव की कहानी नींद पढ़ी। अब तक वार्का ज़ेहन में छाई है।
  • May  2015   ( अंक188 )
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