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Wednesday 21 Aug 2019

रमेश उपाध्याय की पुस्तक 'अपनी बात अपनों के साथ’ पर परिचर्चा

प्रगतिशील लेखक संघ, अजमेर द्वारा कथाकार रमेश उपाध्याय के 77वें जन्मदिन 1 मार्च, 2019 को उनकी नयी पुस्तक 'अपनी बात अपनों के साथ पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। अपने ढंग की अनोखी इस पुस्तक में संज्ञा उपाध्याय, प्रज्ञा रोहिणी और राकेश कुमार ने रमेश उपाध्याय से दस बैठकों में की गयी आत्मीय बातचीत के जरिये उनके लेखन को उनके जीवन से जोड़कर समझने का एक अभिनव प्रयास किया है। विगत पचपन वर्षों से कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना, संस्मरण, साक्षात्कार और साहित्येतिहास की विभिन्न विधाओं में निरंतर उत्कृष्ट लेखन करने वाले एक लेखक का साहित्यिक सफरनामा है यह पुस्तक।

इस अवसर पर दिल्ली से रमेश उपाध्याय, उनकी पत्नी सुधा उपाध्याय, पुत्री संज्ञा उपाध्याय तथा पुत्र अंकित उपाध्याय के साथ-साथ जयपुर से कवि-कथाकार नंद भारद्वाज, साहित्यिक पत्रिका 'क्यों' के पूर्व संपादक मोहन श्रोत्रिय और कवि-कथाकार एवं 'अक्सर' पत्रिका के संपादक हेतु भारद्वाज भी आमंत्रित थे। प्रगतिशील लेखक संघ की अजमेर शाखा के महासचिव अनंत भटनागर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि अजमेर शहर से रमेश उपाध्याय का बहुत ही आत्मीय और घनिष्ठ संबंध रहा है, जहाँ के गवर्नमेंट कॉलेज से उन्होंने एम.ए. किया, जहाँ की साहित्यिक पत्रिका 'लहर' से लेखन आरंभ किया और जहाँ रहते हुए ही सुधा जी से उनका विवाह हुआ। अनंत भटनागर ने पुस्तक का परिचय देते हुए कहा कि रमेश उपाध्याय साहित्य में निरंतर नये प्रयोग करने वाले लेखक हैं और 'अपनी बात अपनों के साथ' भी साहित्य में एक अभिनव प्रयोग है। यह अपने ढंग की पहली पुस्तक है, जिसमें लेखक के तीन आत्मीय जनों ने उनसे बातचीत की है। दस बैठकों में की गयी इस विस्तृत बातचीत से जहाँ रमेश उपाध्याय के व्यक्तित्व और कृतित्व का आत्मीयतापूर्ण परिचय प्राप्त होता है, वहीं विगत साठ वर्षों के हिंदी साहित्य में आये परिवर्तनों का तथा उसमें चले विभिन्न आंदोलनों का प्रामाणिक इतिहास भी मिलता है।

कार्यक्रम के आरंभ में अजमेर की दो चर्चित लेखिकाओं ने 'अपनी बात अपनों के साथ' पर अपने आलेख प्रस्तुत किये। पूनम पांडे ने पुस्तक के आधार पर रमेश उपाध्याय की जीवन-यात्रा और साहित्यिक यात्रा को एक साथ रखकर देखते हुए कहा कि जीवन और लेखन दोनों में यथार्थवादी होने के कारण ही रमेश उपाध्याय प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा का विकास करते हुए भूमंडलीय यथार्थवाद तक पहुँचे हैं। शमा खान ने प्रज्ञा रोहिणी, संज्ञा उपाध्याय और राकेश कुमार की प्रशंसा करते हुए कहा कि इन तीनों ने रमेश उपाध्याय के व्यक्तित्व और कृतित्व को गहराई से समझकर जो प्रश्न उनसे किये हैं, उनके उत्तरों से ही यह पुस्तक इतनी पठनीय और विचारणीय बनी है। इस पुस्तक को पढ़कर हम लेखक को तो जानते ही हैं, उसके समय और समाज को और उसके समय के साहित्यिक वातावरण को भी जानते-समझते हैं।

कलिंद नंदिनी शर्मा ने रमेश उपाध्याय के संस्मरण 'अजमेर में पहली बार' के कुछ अंश पढ़कर सुनाये और अनंत भटनागर ने उनके अजमेर में बिताये गये वर्षों में घटित घटनाओं को उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के निर्माण और विकास से जोड़ते हुए बताया कि स्थानीय यथार्थ से गहरी आत्मीयता से जुड़ा लेखक ही स्वयं को संपूर्ण मानवता से जोड़कर भूमंडलीय यथार्थवाद जैसी नयी अवधारणा हिंदी साहित्य को दे सकता है। उन्होंने रमेश उपाध्याय को सृजनशील साहित्यकार के साथ-साथ समर्थ आलोचक और चिंतक बताते हुए कहा कि अपने ऐसे व्यक्तित्व के कारण ही वे अपनी एक अलग ही पहचान बनाने वाले विशिष्ट साहित्यकार हैं।

विशिष्ट अतिथि नंद भारद्वाज ने रमेश उपाध्याय को अपना पुराना मित्र और साहित्यिक सहचर बताते हुए उन्हें जन्मदिन की बधाई दी और कहा कि उनका 75वाँ जन्मदिन जयपुर में उनकी पुस्तक 'मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा' पर आयोजित विचार-गोष्ठी के रूप में मनाया गया था और 77वाँ जन्मदिन उनकी कार्यस्थली अजमेर में उनकी नयी पुस्तक 'अपनी बात अपनों के साथ' पर आयोजित परिचर्चा के रूप में मनाया जा रहा है और हम सबकी शुभकामनाएँ कि उनका 100वाँ जन्मदिन भी उनकी किसी नयी पुस्तक के संदर्भ में राजस्थान में ही मनाया जाये।

पुस्तक पर बोलते हुए नंद भारद्वाज ने कहा कि यह रमेश जी का साहित्यिक सफरनामा होने के साथ-साथ उनके समय का साहित्यिक इतिहास भी है, जो एक अत्यंत रोचक और पठनीय संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यों तो किसी भी प्रकार के रचना-कर्म का बुनियादी रूप संवाद ही है, जिसमें रचनाकार स्वयं से, अपने समकालीनों से और अपने समय से संवाद करता है; लेकिन एक साहित्यिक विधा के रूप में संवाद को साक्षात्कार के जिस प्रचलित रूप में हम देखते हैं, वह अधिकतर औपचारिक होता है, जबकि संवाद को जीवंत और आत्मीय होना चाहिए। इस दृष्टि से 'अपनी बात अपनों के साथ' एक आदर्श संवाद है, जिसमें जीवंतता है, आत्मीयता है और साथ ही एक ऐसी जिज्ञासा भी कि जिससे रमेश जी के साहित्यिक व्यक्तित्व के विकास को पूरी तरह समझा जा सकता है। साहित्यकारों के बच्चों में ऐसी जीवंत और आत्मीय जिज्ञासा कम ही दिखायी देती है। इस दृष्टि से संज्ञा उपाध्याय, प्रज्ञा रोहिणी और राकेश कुमार की जितनी प्रशंसा की जाये, कम है, जिन्होंने रमेश जी से यह संवाद किया है और लंबी-लंबी दस बैठकों में किया है। उन्होंने रमेश जी से जो प्रश्न किये हैं, उनसे रमेश जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के सभी पक्ष सामने आ गये हैं। लेकिन मेरे विचार से यदि इस आत्मीय संवाद में रमेश जी की सहधर्मिणी सुधा जी भी शामिल होतीं, तो यह पुस्तक उनके जीवन और लेखन के उन प्रसंगों को भी सामने ला सकती, जो बच्चों के अनुभव या स्मृति का हिस्सा नहीं रहे हैं, पर सुधा जी की आत्मकथा 'साथ उस कारवाँ के हम भी हैं' में बड़ी बेबाकी से उजागर हुए हैं। लेकिन इसके बावजूद इन तीनों युवा साहित्यकारों की सूझबूझ और धैर्यपूर्वक की गयी मेहनत से संभव हुई यह पुस्तक एक सर्जनात्मक संवाद है, जो अपने-आप में एक साक्षात्कार भी है, समीक्षा भी है, साहित्यिक इतिहास भी है और पुस्तक इतनी रोचक भी है कि इसे एक उपन्यास की तरह पढ़ा जा सकता है।

दूसरे विशिष्ट अतिथि मोहन श्रोत्रिय ने भी रमेश उपाध्याय के साथ अपनी पुरानी मित्रता को याद करते हुए कहा कि 'अपनी बात अपनों के साथÓ के दस अध्यायों में से पहले सात अध्यायों तक मैं भी रमेश उपाध्याय के साहित्यिक सफर का साथी और साक्षी रहा हूँ। मैंने उनके जीवन को निकट से देखा है और उनके लेखन को रुचिपूर्वक पढ़ा है। बाद के तीन अध्यायों से मैंने उनके आगे के विकास को जाना, लेकिन आत्मीय संवादों के रूप में उसे इस तरह से जाना, जैसे इस बाकी के सफर में भी मैं उनके साथ चला हूँ। पुस्तक की इस रोचकता और पठनीयता के लिए मैं तीनों संवादकर्ताओं-संज्ञा उपाध्याय, प्रज्ञा रोहिणी और राकेश कुमार-को बधाई देता हूँ।

आगे उन्होंने कहा कि जो बात मैं बहुत जोर देकर और बहुत जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूँ, वह यह है कि हिंदी में ऐसे कम ही लेखक हैं, जिनके लेखन में ऐसी निरंतरता, विविधता और वैचारिक सुसंगति रही है। रमेश उपाध्याय ऐसे लेखक हैं, जो पचास-पचपन साल से कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, आलोचना आदि सभी विधाओं में निरंतर लिख रहे हैं। वे जीवन के अनुभवों से स्वयं समृद्ध होते और अपने लेखन का विकास करते रहे हैं। वे साहित्यिक आंदोलन और लेखक संगठन जैसे कामों में शामिल रहे हैं और 'कथन' जैसी साहित्यिक पत्रिका निकालते रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि उनके जीवन और लेखन में कभी कोई विचलन दिखायी नहीं पड़ा है। कहीं कोई समझौतापरस्ती दिखायी नहीं पड़ी है। ऐसी वैचारिक दृढ़ता और अविचल निष्ठा कम ही लेखकों में पायी जाती है। मैं कामना करता हूँ कि उनके जीवन और लेखन की यह विशेषता सदा बनी रहे और जैसा कि नंद भारद्वाज ने कहा, उनका 100वाँ जन्मदिन इसी प्रकार मनाया जाये।

अनंत भटनागर ने अध्यक्षीय भाषण से पहले रमेश उपाध्याय को बोलने के लिए आमंत्रित किया, तो उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ, अनंत भटनागर, जयपुर से आये मित्रों और अजमेर के साहित्यकारों तथा साहित्य प्रेमियों को हार्दिक धन्यवाद देते हुए कहा कि अजमेर ने मुझे जन्म ही नहीं दिया, बाकी वह सब दिया है, जिससे मैं वह बना हूँ, जो आज आपके सामने हूँ। अजमेर छोड़े मुझे पचास साल हो गये, पर आज भी मैं अजमेर को अपना शहर मानता हूँ और मुझे खुशी है कि अजमेर भी मुझे अपना मानता है। उसी अपनेपन का प्रमाण है आज का यह आत्मीय और अविस्मरणीय आयोजन, जिसके लिए मैं हृदय से आप सबका आभारी हूँ।

हेतु भारद्वाज ने अपने अध्यक्षीय भाषण में रमेश उपाध्याय को उनके जन्मदिन की बधाई देते हुए और इस अवसर पर ऐसे भव्य आयोजन की प्रशंसा करते हुए पूर्व वक्ताओं द्वारा कही गयी मुख्य-मुख्य बातों की चर्चा की और पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक अन्य बातों के अलावा अपनी पठनीयता के कारण बेजोड़ है। मैंने इसे पढऩा शुरू किया, तो पूरी पढ़कर ही दम लिया। लेकिन उपन्यास की तरह पढ़ी जा सकने वाली यह रोचक पुस्तक अपनी अंतर्वस्तु में इतनी गंभीर है कि इससे एक लेखक के जीवन और लेखन के विभिन्न आयाम तो सामने आते ही हैं, 1960 के बाद से आज तक के हिंदी साहित्य का पूरा परिदृश्य भी सामने आता है। इस प्रकार यह पुस्तक साहित्य के अध्येताओं के लिए, विशेष रूप से युवा अध्येताओं के लिए, एक आवश्यक पुस्तक बन जाती है।

हेतु भारद्वाज ने रमेश उपाध्याय के बारे में कहा कि वे ऐसे विरले साहित्यकार हैं, जिन्होंने स्वयं एक सृजनशील जीवन जीते हुए अपने पूरे परिवार को भी सृजनशील बनाया है। उनकी पत्नी लेखिका हैं, जिनकी आत्मकथा की चर्चा यहाँ हुई है। उनकी दोनों बेटियाँ प्रज्ञा और संज्ञा नयी पीढ़ी की सशक्त लेखिकाएँ हैं। उनका बेटा अंकित एक अच्छा चित्रकार और साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशक है। उनके दामाद राकेश कुमार भी एक महत्त्वपूर्ण युवा आलोचक हैं। उनके घर से 'कथन' जैसी महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका निकलती है। ऐसे सृजनशील परिवार को देखकर मुझे ईष्र्या होती है, लेकिन प्रेरणा भी मिलती है। इस दृष्टि से मैं रमेश जी के साथ-साथ इनके परिवार का भी अभिनंदन करता हूँ।

परिचर्चा के अंत में रमेश उपाध्याय का सार्वजनिक अभिनंदन भी किया गया। उमेश चौरसिया ने अभिनंदन पत्र पढ़कर सुनाया और चंद्रप्रकाश देवल तथा बद्रीप्रसाद पंचोली ने उसे उन्हें भेंट किया। रासबिहारी गौड़ और ज्योति ककवानी ने शॉल ओढ़ाकर उनका अभिनंदन किया।