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Monday 09 Dec 2019

कॉफी

अनुवादक  डॉ. आफताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क

 

मैंने सवाल किया, आप कॉफी क्यों पीते हैं?

उन्होंने जवाब दिया, आप क्यों नहीं पीते?

मुझे उसमें सिगार जैसी बू आती है।

अगर आपका संकेत इसकी सोंधी-सोंधी सुगंध की तरफ है तो यह आपकी सूँघन-शक्तिका दोष है।

हालाँकि उनका संकेत साफ तौर पर मेरी नाक की तरफ था, फिर भी झगड़ा-फसाद से बचने की खातिर मैंने कहा, थोड़ी देर के लिए यह मान लेता हूँ कि कॉफी में से वाक़ई भीनी-भीनी महक आती है। मगर यह कहाँ की दलील है कि जो चीज़ नाक को पसंद हो वह हलक़ में उंडेल ली जाये। अगर ऐसा ही है तो कॉफी का इत्र क्यों न निकाला जाए ताकि साहित्यिक गोष्ठियों में एक-दूसरे के लगाया करें। तड़पकर बोले, साहब! मैं खाने की चीजों में दलीलों की दखल-अन्दाजी मुनासिब नहीं समझता, जब तक कि इस घपले का असल कारण उच्चारण की मजबूरी न हो कॉफी की महक से आनंदित होने के लिए एक प्रशिक्षित व परिष्कृत रसिकता की आवश्यकता है। यही सोंधापन लगी हुई खीर और धुंगारे हुए रायता में होता है।

मैंने क्षमा याचना की, खुरचन और धुंगार दोनों से मुझे मतली होती है।

फरमाया, ताज्जुब है! यूपी में तो शोरबा (भद्रजन)बड़ी चाव से खाते हैं।

मैंने इसी वजह से भारत छोड़ा।

चिरांदे होकर कहने लगे, आप कायल हो जाते हैं तो कट-बहसी करने लगते हैं।

जवाब में अर्ज़ किया, गर्म मुल्कों में बहस का शुभारम्भ सही मायनों में कायल होने के बाद ही होता है। जानबूझकर दिल-दुखाना हमारी अवधारणा के अनुसार पाप है। इसलिए हम अपनी असल राय की अभिव्यक्ति सिर्फ नशे और ग़ुस्से की हालत में करते हैं। खैर, यह तो विषयान्तर था, लेकिन अगर यह सच है कि कॉफी स्वादिष्ट होती है तो किसी बच्चे को पिलाकर उसकी सूरत देख लीजिए।

झल्लाकर बोले, आप बहस में मासूम बच्चों को क्यों घसीटते हैं?

मैं भी उलझ गया, आप हमेशा बच्चों से पहले 'मासूमÓ शब्द क्यों लगाते हैं, क्या इसका यह मतलब है कि कुछ बच्चे पापी भी होते हैं? खैर, आपको बच्चों पर आपत्ति है तो बिल्ली को लीजिए।

बिल्ली ही क्यों बकरी क्यों नहीं?, वे सच-मुच मचलने लगे।

मैंने समझाया बिल्ली इसलिए कि जहाँ तक पीने की चीज़ों का ताल्लुक है, बच्चे और बिल्लियाँ बुरे-भले की कहीं बेहतर तमीज़ रखते हैं।

फरमाया, कल को आप यह कहेंगे कि चूँकि बच्चों और बिल्लियों को पक्के गाने पसंद नहीं आ सकते इसलिए वो भी अनर्गल हैं।

मैंने उन्हें यक़ीन दिलाया, मैं हर्गिज यह नहीं कह सकता। पक्के राग उन्हीं की ईजाद हैं। आपने बच्चों का रोना और बिल्लियों का लडऩा...

बात काटकर बोले,  बहरहाल सांस्कृतिक समस्याओं के हल का नतीजा हम बच्चों और बिल्लियों पर नहीं छोड़ सकते।

आपको यक़ीन आए या न आए, मगर यह सच है कि जब भी मैंने कॉफी के बारे में जनमत-संग्रह किया उसका अंजाम इसी किस्म का हुआ। कॉफी के शौकीन मेरे सवाल का जवाब देने की बजाय उल्टी जिरह करने लगते हैं। अब मैं इसी नतीजे पर पहुँचा हूँ कि कॉफी और क्लासिकी संगीत के बारे में जनमत-संग्रह करना बड़ी मूर्खता है। यह बिल्कुल ऐसी ही अरसिकता है जैसे किसी भले मर्द की आमदनी या सुन्दर स्त्री की उम्र पूछना (उसका मतलब यह नहीं कि भले मर्द की उम्र और सुन्दर स्त्री की आमदनी पूछना ख़तर ेसे खाली है)। जिंदगी में सिर्फ एक आदमी मिला जो वाक़ई कॉफी से विमुख था। लेकिन उसकी राय इस लिहाज से ज़्यादा ध्यान के लायक नहीं कि वह एक मशहूर कॉफी हाऊस का मालिक निकला।

एक साहब तो अपनी पसंद के समर्थन  में सिर्फ यह कहकर चुप हो गए कि छूटती नहीं  है मुँह से यह कॉफी लगी हुई। मैंने स्पष्टीकरण चाहा तो कहने लगे, दरअसल यह आदत की बात है। यह कमबख्त कॉफी भी कहावती चने और डोमनी की तरह एक दफ़ा मुँह से लगने के बाद छुड़ाए नहीं छूटती। है ना।

इस मुकाम पर मुझे अपनी अक्षमता को स्वीकार करना पड़ा कि बचपन ही से मेरी सेहत खराब और संगत अच्छी रही। इसलिए इन दोनों सुन्दर बलाओं से सुरक्षित रहा। कुछ मित्र तो इस सवाल से सुलग कर गालियों पर उतर आते हैं। मैं यह नहीं कहता कि वे झूठे इल्ज़ाम लगाते हैं। ईमान की बात है कि झूठे इल्ज़ाम को समझदार आदमी बेहद आत्मविश्वास से हँसकर टाल देता है मगर सच्चे इल्ज़ाम से तन-बदन में आग लग जाती है। इस सिलसिले में जो विरोधाभासी बातें सुननी पड़ती हैं, उनकी दो मिसालें पेश करता हूँ।

एक शुभचिंतक ने मेरी बेकारी को महरूमी मानते हुए फरमाया-

हाय कमबख्त तूने पी ही नहीं

उनकी खिदमत में हलफिय़ा अर्ज किया कि दरअसल बीसियों गैलन पीने के बाद ही यह सवाल क रने की जरूरत पेश आई। दूसरे साहब नेे जरा खुल कर पूछा कि कॉफी से चिढ़ की असल वजह पेट के वो दाग ़तो नहीं जिनको मैं दो साल से लिए फिर रहा हूँ और जो कॉफी की तेजाबियत से जल उठे हैं। और इसके बाद वे मुझे निहायत निदानात्मक दृष्टि से घूरने लगे।

जनमत-संग्रह का परिणाम तो आप देख चुके। अब मुझे अपनी राय पेश करने की अनुमति दीजिए। मेरा ईमान है कि कुदरत के कारख़ाने में कोई चीज बेकार नहीं। इंसान सोच-विचार की आदत डाले (या सिर्फ आदत ही डाल ले) तो हर बुरी चीज़ में कोई  न कोई खूबी जरू र निकल आती है। मिसाल के तौर पर हुक्का ही को लीजिए। विश्वसनीय सज्जनों से सुना है कि हुक्का पीने से चिन्ताएँ पास नहीं फटकतीं। बल्कि मैं तो यह निवेदन करूँगा कि अगर तंबाकू खराब हो तो चिन्ताओं ही की क्या बात है, कोई भी पास नहीं फटकता। अब देश के दूसरे खाद्य व पेय पदार्थों पर नजर डालिए। मिर्चें खाने का एक आसानी से समझ में आने वाला लाभ यह है कि उनसे हमारे प्राच्यखानों का मूलरंग और स्वाद दब जाता है। गाऊ-जबान का खमीरा इसलिए खाते हैं कि बिना राशन कार्ड के शक्कर हासिल करने का यही एक जाइज ़तरीक़ा है। जोशांदा इसलिए गवारा है कि इससे न सिर्फ एक राष्ट्रीय उद्योग को बढ़ावा मिलता है बल्कि वासना-मूलक प्रवृत्तियों को मारने में भी मदद मिलती है। शलजम इसलिए जहर मार करते हैं कि उनमें विटामिन होता है। लेकिन आधुनिक चिकित्सा रिसर्च ने साबित कर दिया है कि कॉफी में सिवाए कॉफी के कुछ नहीं होता। गुणग्राहकों के नजदीक यही उसकी खूबी है।

मालूम नहीं कि कॉफी की खोज क्यों, कब और किस मानव-उत्पीड़क ने की। लेकिन यह बात पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि यूनानियों को इसका ज्ञान नहीं था। अगर उन्हें जरा भी ज्ञान होता तो चिरायता की तरह यह भी यूनानी चिकित्सा पद्धति का मौलिक घटक होती। इस कयास को इस बात से और भी शक्ति मिलती है कि कस्बों में कॉफी की बढ़ती हुई खपत की शायद एक वजह यह भी है कि नीम-हकीमों ने अल्लाह शाफी अल्लाह काफी, कहकर उत्तरोल्लिखित का चूर्ण अपने नुस्खों में लिखना शुरू कर दिया है। प्राचीनकाल में इस प्रकार की जड़ी-बूटियों का प्रयोग दुश्मनी और दूसरी शादी के लिए रिजर्व था। चूँकि आजकल इन दोनों बातों को बुरा माना जाता है, इसलिए सिर्फ आपसी प्रेम जताने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

सुना है कि चाय के बाग बड़े सुन्दर होते हैं। यह बात यूँ भी सच मालूम होती है कि चाय अगर खेतों में पैदा होती तो एशियाई देशों में इतनी अधिकता से नहीं मिलती, बल्कि अनाज की तरह विदेशों से आयात की जाती। मेरा सामान्य-ज्ञान सीमित है मगर अनुमान यही कहता है कि कॉफी भी जमीन ही से उगती होगी क्योंकि इसकी गिनती उनने मतों में नहीं जो अल्लाह-ताला अपने नेकबंदों पर आसमान से सीधे उतारता है। फिर भी मेरी कल्पना-दृष्टि को किसी तौर यह विश्वास नहीं आता कि कॉफी बाग़ों की पैदावार हो सकती है और अगर किसी देश के बाग़ों में यह चीज पैदा होती है तो अल्लाह जाने वहाँ के जंगलों  में क्या उगता होगा। ऐसे रसिकजनों की कमी नहीं जिन्हें कॉफी इस वजह से प्रिय है कि यह हमारे देश में पैदा नहीं होती। मुझसे पूछिए तो मुझे अपना देश इसीलिए और भी प्रिय है कि यहाँ कॉफी पैदा नहीं होती।

मैं पेय-पदार्थों का पारखी नहीं हूँ। इसलिए पेय-पदार्थ के अच्छे या बुरे होने का अंदाजा उन प्रभाओं से लगाता हूँ जो इसे पीने के बाद प्रकट होते हैंैं। इस लिहाज से मैंने कॉफी को शराब से कई दर्जा बदतर पाया। मैंने देखा है कि शराब पीकर गंभीर पुरुष बेहद अगंभीर गुफ़्तगु करने लगते हैं जो बेहद जानदार होती है। इसके विपरीत कॉफी पीकर अगंभीर लोग अत्यंत गंभीर गुफ़्तगु करने की कोशिश करते हैं। मुझे गंभीरता से चिढ़ नहीं बल्कि प्रेम है। इसीलिए मैं गंभीर आदमी का मसखरापन बर्दाश्त कर लेता हूँ, मगर मसखरे की गंभीरता का रवादार नहीं। शराब के नशे में लोग बिलावजह झूठ नहीं बोलते। कॉफी पीकर लोग बिलावजह सच नहीं बोलते। शराब पीकर आदमी अपना गम औरों को दे देता है, मगर कॉफी पीनेवाले औरों के फर्जी ग़म अपना लेते हैं। कॉफी पीकर समर्थक भी विरोधी बन जाते हैं।

यहाँ मेरा मक़सद कॉफी से अपनी बेकारी जताना है। लेकिन अगर किसी सज्जन को ये सतरें शराब का विज्ञापन मालूम हों तो इसे मेरी भाषा अभिव्यक्ति अक्षमता का प्रमाण समझें। कॉफी के पक्षधर अक्सर यह कहते हैं कि यह बेनशे की प्याली है। अगर मुश्किल से मान भी लें कि यही वस्तुस्थिति है और यह दावा सही है तो मुझे उनसे हार्दिक हमदर्दी है। मगर इतने कम दामों में भला वे और क्या चाहते हैं।

कॉफी हाऊस की शाम का क्या कहना! वातावरण में हर तरह मानसिक कोहरा छाया हुआ है। जिसको पूंजीपति वर्ग और छात्र सुर्ख़-सवेरा समझकर डरते और डराते हैं। हल्लेगुल्ले का यह हाल कि अपनी आवाज तक नहीं सुनाई देती और बार-बार दूसरों से पूछना पड़ता है कि मैंने क्या कहा। हर मेज़ पर ज्ञान-पिपासु कॉफी पी रहे हैं। और सूर्योदय से लहंगा-चोली तक, या आमआदमियों और आमों की विशेषताओं पर बुगराती लहजे में बहस कर रहे हैं। देखते ही देखते कॉफी अपना रंग लाती है और तमाम मानव जाति को एक बिरादरी समझने वाले थोड़ी देर बाद एक दूसरे की वलदियत के बारे में अपना संदेह सरल उर्दू में व्यक्तकरने लगते हैं, जिससे बैरे मुकम्मल तौर पर सहमत होते हैं। लोग रूठकर उठ खड़े होते हैं। लेकिन यह सोचकर बैठ जाते हैं कि अब तो घबरा के यह कहते हैं कि घर जाएंगे घर में भी चैन न पाया तो किधर जाएंग

कॉफी पी-पी कर समाज को कोसने वाले एक इंटेलेक्चुअल ने मुझे बताया कि कॉफी से दिल का कमल खिल जाता है और आदमी चहकने लगता है। मैं भी इस राय से सहमत हूँ। कोई माकूल आदमी यह तरल पदार्थ पीकर अपना मुँह नहीं बंद रख सकता। उनका यह दावा भी गलत नहीं मालूम होता कि कॉफी पीने से बदन में चुस्ती आती है। जभी तो लोग दौड़-दौड़कर कॉफीहाऊस जाते हैं और घंटों वहीं बैठे रहते हैं।

बहुत देर तक वे यह समझाने की कोशिश करते रहे कि कॉफी अत्यंत आनंददायक पेय है और दिमाग को रोशन करती है। इसके सबूत में उन्होंने यह मिसाल दी कि अभी कल ही का वाकया है। मैं दफ़्तर से घर बेहद निढाल पहुँचा। बेगम मनोदशा की बड़ी पारखी हैं। फौरन कॉफी का पॉट लाकर सामने रख दिया।

मैं जरा चकराया, फिर क्या हुआ, मैंने बड़ी जिज्ञासा से पूछा।

मैंने दूध-दान से क्रीम निकाली, उन्होंने जवाबदिया।

मैंने पूछा, शक्करदान में से क्या निकला?

फरमाया, शक्कर निकली, और क्या हाथी घोड़े निकलते।

मुझे ग़ुस्सा तो बहुत आया मगर कॉफी का सा घूँट पीकर रह गया।

उम्दा कॉफी बनाना भी कीमियागरी से कम नहीं। यह इसलिए कह रहा हूँ कि दोनों के बारे म ेंयही सुनने में आया है कि बस एक आँच की कसर रह गई। हर एक कॉफी हाऊस और खानदान का एक खास नुस्ख़ा होता है जो सीना-ब-सीना, हलक़-ब-हलक़ स्थानांतरित होता रहता है। पूर्वी अफ्रीका के उस अंग्रेज़ अफसर का नुस्ख़ात तो सभी को मालूम है जिसकी कॉफी की सारे जिले में धूम थी। एक दिन उसने एक बेहद औपचारिक दावत की जिसमें उसके हब्शी खानसामाँ ने बहुत ही स्वादिष्ट कॉफी बनाई। अंग्रेज़ ने हौसला-अफज़़ाई के वास्ते उसको प्रतिष्ठित मेहमानों के सामने तलब किया और कॉफी बनाने की तरकीब पूछी।

हब्शी ने जवाब दिया, बहुत ही सरल तरीक़ा है। मैं बहुत सा खौलता हुआ पानी और दूध लेता हूँ। फिर उसमें कॉफी मिलाकर दम करता हूँ।

लेकिन उसे मिलाते कैसे हो। बहुत महीन छनी होती है।

हुजूर के मोजे में छानता हूँ।

क्या मतलब क्या तुम मेरे क ीमती रेशमी मोजे इस्तेमाल करते हो? मालिक ने गुस्से सेपूछा।

खानसामाँ सहम गया, नहीं सरकार! मैं आपके साफ मोजे कभी इस्तेमाल नहीं करता।

सच कहता हूँ कि मैं कॉफी की तेजी और तल्ख़ी से जरा नहीं घबराता। बचपन ही से यूनानी दवाओं का आदी रहा हूँ और बर्दाश्त की क्षमता इतनी बढ़ गई है कि कड़वी से कड़वी गोलियाँ खाके बे-मज़ा न हुआ !

लेकिन कड़वाहट और मिठास के मिश्रण से जो संतुलित ?िवाम  बनता है वह मेरी बर्दाश्त से बाहर है। मेरी अत्यंत असंतुलित तबीयत इस मीठे विष की ताब नहीं ला सकती। लेकिन दिक्कत यह आन पड़ती है कि मैं मेजबान के आग्रह को दुश्मनी और वे मेरे इनकार को तकल्लुफ़ समझते हैं।

लिहाज़ा जब वे मेरे कप में शक्कर डालते समय शिष्टाचार के तौर पर पूछते हैं-

एक चमचा या दो?

तो मजबूरन यही अर्ज करता हूँ कि मेरे लिए शक्करदान में कॉफी के दो चम्मच डाल दीजिए।

साफ ही क्यों न कह दूँ कि जहाँ तक खाद्य व पेय पदार्थों का सम्बन्ध है, मैं इन्द्रियों पर संयम का कायल नहीं। मैं यह फौरी फैसला जेहन की बजाय जबान पर छोडऩा पसंद करता हूँ। पहली नजर में जो प्रेम हो जाता है, उसमें आम तौर पर नीयत का फितूर होता है। लेकिन खाने-पीने के मामले में मेरा यह नजरिया है कि पहला ही लुकमा या घूंट निर्णायक होता है। बेस्वाद खाने की आदत को स्वाद में तब्दील करने के लिए बड़ा पित्ता मारना पड़ता है। मगर मैं इस सिलसिले में बरसों मुँह और जबान की कड़वाहट गवारा करने का समर्थक नहीं, जब तक कि इसमें बीवी का आग्रह या गृहस्थी की मजबूरियाँ शामिल न हों। इसी आधार पर मैं हर कॉफी पीने वाले को जन्नती समझता हूँ। मेरा ईमान है कि जो लोग उम्र भर हँसी-ख़ुशी यह अज़ाब झेलते रहे, उन पर दोजख और हमीम हराम हैं।

कॉफी अमरीका का राष्ट्रीय पेय पदार्थ है। मैं अब बहस में नहीं उलझना चाहता कि अमरीकी कल्चर कॉफी के जोर से फैला, या कॉफी कल्चर के जोर से प्रचलित हुई। यह बिल्कुल ऐसा सवाल है जैसे कोई बेअदब यह पूछ बैठे कि गुबार-ए-खातिर- चाय की वजह से लोकप्रिय हुई या चाय, गुबार-ए-खातिर, के कारण। एक साहब ने मुझे लाजवाब करने की खातिर यह दलील पेश की कि अमरीका में तो कॉफी इस कदर आम है कि जेल में भी पिलाई जाती है। अर्ज़ किया कि जब ख़ुद कैदी इस पर आपत्ति नहीं जताते तो हमें क्या पड़ी है कि वकालत करें। पाकिस्तानी जेलों में भी कैदियों के साथ यह सलूक किया जाये तो अपराध की रोक-थाम में काफी मदद मिलेगी। फिर उन्होंने बताया कि वहाँ ला-इलाज मरीज़ों को खुश और स्वस्थ रखने की गरज से कॉफी पिलाई जाती है। कॉफी के शीघ्र-प्रभावकारी होने में क्या शक है। मेरा विचार है कि मौत की घड़ी में हलक़ में पानी चुआने की बजाय कॉफी के दो-चार क़तरे टपका दिए जाएँ तो मरीज का दम आसानी से निकल जाये। बखुदा, मुझे तो इस प्रस्ताव पर भी कोई आपत्ति न होगी कि गुनाहगारों की फातिहा, कॉफी पर दिलाई जाये।

सुना है कि कुछ सहिष्णु अफ्रीक़ी कबीले खाने के मामले में जानवर और इंसान के गोश्त को बराबर का दर्जा देते थे। लेकिन जहाँ तक पीने की चीज़ों का ताल्लुक है, हमने उनके बारे में कोई बुरी बात नहीं सुनी। मगर हम तो चीनियों की रची हुई, घ्राण-इन्द्रिय की दाद देते हैं कि न मंगोल शासकों का अत्याचार और हिंसा उन्हें पनीर खाने पर मजबूर कर सकी और न अमरीका उन्हें कॉफी पीने पर आमादा कर सका। इतिहास गवाह है कि उनकी नफ़ासत ने सख़्त भुखमरी के जमाने में भी फ़ाक़े (उपवास) और अपने फलसफे को पनीर और कॉफी पर तरजीह दी।

हमारी मंशा अमरीकी या चीनी आदतों पर नुक्ताचीनी नहीं। हर आजाद देश का यह मौलिक अधिकार है कि वह अपने मुँह और पेट के साथ जैसा सलूक चाहे, बेरोक-टोक करे। इसके अलावा जब दूसरे देश हमारे रसावल, निहारी और फालूदे का मजाक नहीं उड़ाते तो हम उनके मामलात में टाँगें अड़ाने वाले कौन? बात दरअसल यह है कि विकसित देशों में प्यास बुझाने के लिए पानी के अलावा हर तरल वस्तु इस्तेमाल होती है । सुना है कि जर्मनी (जहाँ राष्ट्रीय पेय पदार्थ बियर है) डॉक्टर मजबूरी की स्थिति में बहुत ही हट्टे-कट्टे लोगों को शुद्ध पानी पीने की अनुमति देते हैं, लेकिन जिनको आबनोशी (जल-सेवन) का चस्का लग जाता है, वे रातों को छुप-छुपकर पानी पीते हैं। एक जमाना था कि पैरिस के कैफों में रंगीन मिजाज कलाकार बूर्ज्वा वर्ग को चिढ़ाने के उद्देश्य से खुल्लम-खुल्ला पानी पिया करते थे।

पूर्वी और पश्चिमी पेय-पदार्थों की तुलना करने से पहले यह बुनियादी सिद्धांत जेहन में रख लेना बेहद जरूरी है कि हमारे यहाँ पीने की चीज़ों में खाने की विशेषताएँ होती हैं। अपने प्राचीन पेय-पदार्थ मसलन यखनी, सत्तू और फालूदे पर नजर डालिए तो यह अंतर स्पष्ट हो जाता है। सत्तू और फालूदे को शुद्धशाब्दिक अर्थों में आप न खा सकते हैं और न पी सकते हैं। बल्कि अगर दुनिया में कोई ऐसी वस्तु है जिसे आप मुहावरेदार उर्दू में एक ही वक्त में खा और पी सकते हैं तो यही सत्तू और फालूदा है जो ठोस भोजन और ठंडे शर्बत के बीच अनिर्वचनीय समझौता है, लेकिन आजकल इन पेय पदार्थों का प्रयोग खास-खास समारोहों में ही किया जाता है। इसका सबब यह है कि अब हमने दुश्मनी निकालने का एक और सभ्य तरीक़ा अपनाया है।

आपके मन में ख़ुदा-न-ख़ास्ता यह संदेह न पैदा हो गया हो कि प्रस्तुत लेखक कॉफी के मुकाबले में चाय का तरफ़दार है, तो निबंध ख़त्म करने से पहले यह गलतफहमी दूर करना बेहद जरूरी समझता हूँ। मैं क ॉफी से इसलिए विमुख नहीं हूँ कि मुझे चाय प्रिय है बल्कि हकीकत यह है कि कॉफी का जला चाय भी फूँक-फूँक कर पीता है

एक हम हैं कि हुए ऐसे पशेमान कि बस

एक वो हैं कि जिन्हें चाय के अरमाँ होंगे।