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Tuesday 24 Sep 2019

1) अधपके शब्दों के नीचे

1) अधपके शब्दों के नीचे

 

अब कह दो

गीले पुआल सरीखे दिनों में ठहर जाए

धुआं होता चाँद

रिक्त होने को आयी है देह

कहीं झाडिय़ों में उलझी छाया छोड़ कर

तुम क्या उलट कर देख नहीं सकते

अधपके शब्दों के नीचे

जिह्वा ऐसी है जैसी हो रही है चांदनी

विकल इस शहर में डोलते।

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2) अन्धकार का आलाप

 

जब कहती हूँ 

मैले पड़े दिन में जरुरत है सूर्य की

सिर्फ ताप की बात नहीं कहती

यह भी कहती हूँ -

शीघ्र आने को सबसे पहली किरण पकड़ो

भेद दो मेरे अन्धकार को

गहरा है तालु में

सबसे गहरा है अनधुली आत्मा में मेरी।

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3) मेघ के दूत होने का चलन होगा किसी जमाने में

 

अत्यधिक दूरी है कलकत्ते से उसके शहर की

इसलिए वह भेजता है मेघ , काले और घने

जैसे उसके रोम है वक्षों पर। मैं यह बात साफ कहती हूँ

उसके दूत से, दुनिया को छलने में निपुण हुए हैं कवि

कैसे होगा वह , जो लिखना नहीं जानता एक शब्द भी।

निर्गुण का राग ऐसा होता है जिसे वही सुनता है

जो उबर आया हो प्रेम के जल से। मुझे भय करना चाहिए फिर

कुछ दिवस से रात्रि भर बोलते हैं स्वप्न के शुष्क फल और कबीर सुनती है देह।

बेर भेजता है जो उसे पता है कलकत्ते में कुचल जाते हैं

रस से भरे दोने, गीले हो जाते हैं उर जरा सी बृष्टि होते ही

जैसे बेर में दांतों के पड़ते हैं वैसे ही चिन्ह पड़ेे हैं मणिबंध पर,

दिन बीतते गाढ़े होते हैं।

चाहे तो खींचता रहे छवि, चाहे तो मर जाए किसी पुरातन हवेली के गिरने से

मुझे क्या परवाह है! इतनी दूरी से कहाँ खबर होती है उसे

जब सुई धंस जाती है पोरों में, एक बूटे पर उसका नाम टांकते हुए!

मेघ के दूत होने का चलन होगा किसी जमाने में।

चूल्हे की आंच में गिरता है अदहन अगर उसकी सुनूँ

आखिर कल्पों बाद कौन सिखाता है चुम्बन की विधा

फाल्गुन की शीतल बिरखा के बहाने से !

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4) फरवरी की रात

 

फरवरी की रात

ठंडी हवा में गर्म फूल चाहते हैं

और देर तक बनी रहे पृथ्वी

किसी सुंदर वक्ष पर ऐसे ही पड़े हुए

अरण्य होने भर से

देखना संभव होता है

गंध के सुघड़ भार से 

भर गयी है छाया मेरी

मूक हरे पत्तों के बीच सफेद तारे

रोयों के बीच स्वेद के छींट

पिघल कर बंसी बनने को उतावले बांस

होंठ उलझा लेते हैं

फरवरी की रात

तुम चुनते रहते हो वे सब

बह कर आती हूँ मैं भी तो वहीँ ।

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5) काल बैसाखी में नग्न हुआ ह्रदय

 

दो बार जन्म लेती देह को देखा है !

राह किनारे बैठा

जैसे एक चित्र की नुमाइश से निराश हुआ कोई चित्रकार

जिसमें पत्ते है अंगों पर और खुली आँखें हैं

तुम उसके चित्र खरीदो इससे पहले उसे याद आता कोई दृश्य

फिर बिखरे हुए रंग किसी कुर्सी पर

फिर गीली हुई माटी पर तलवों के चिन्ह

मानों कस्बों से मिटी हुई चाय दुकानों की जगह पर

छूट जाती है अंगीठी

अधबुझी, हल्की गर्म

देखा है !

काल बैसाखी में नग्न हुआ ह्रदय

और कुम्हलाया फूल संभाले

लाँघ लाँघ कर मृत्यु के पार जाती मेरी कामना

देखा है क्या !

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6) कवि होने के प्रमाण

 

अभी बहुत दूर निकल आयी हूँ

बहुत करीब रेल की पटरियों पर देखती हूं

जंगली फूलों की कंपन

देर तक नहीं गुजरती है कोई रेल

पसर पसर कर उड़ती धूल लिपटती है मुख से

कौन नहीं जानता

ऐसे ही बिछोह लिखे हैं यूनानी कवियों ने

जैसे माछ की बहंगियों से ताम्बई धूप चिलकती है

किन्तु कहीं अस्पताल में है कोई खांसता कंठ

कवि होने के प्रमाण दे रहा है

देखा है जात्रा में

भिन्न चित्रों में भिन्न दिखने की विधा

यहाँ कलकत्ते में

दूरी पर हैं देवी के दो मंदिर

दूरी कहती हूँ तो कल्पना ज्यादा जगह लेती है

पहली खेप में

चार पीले फूलों की माला और एक कविता बेचने निकली

आवाज़ का आतुर आग्रह

तैरने की कोशिश में डूब रहा है

उमडऩे की सीमा है रंग में

दूर गिरते तिमिर में आकुल गंध है

सीमाहीन ..

मैं शायद दूसरी खेप का आमंत्रण हूँ

हो भी सकती हूँ

इस सिहरती ऋतु में जीवित

नहीं भी हो सकती हूँ।

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7) एक पाट के सब दृश्य

 

पीली रोशनी में मेरी छाया देखते हो

और कैसे

दूर से भी तड़प कर छिटकने लगता है दर्पण

उंगलियां कस नहीं पाती अपने अंधेरे को

मैं मूक देखती हूँ वह नाव

जो छोड़ जाती है

एक पाट के सब दृश्य

और कैसे

अगले स्पर्श की प्रतीक्षा ऐसी गलती है

भाप भी जल नहीं बनता

जब बेहद लम्बी नदी हो बीच में

सच जानो

ऐसा आलाप जिसमें प्यास के अतिरिक्त कुछ नहीं

बेहद गलत है।

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8) इस बार नए तरीके से आना है तुम्हें

 

इस बार नए तरीके से आना है तुम्हें

कि कोई भी स्थान पहचान न सके

सिगरेट मांगो तो दूकानदार पूछे -

किस सराय में रुके हो

क्या देख लिया है संग्रहालय जिसमें भग्न मूर्तियों के दर्शक

प्रेम पर और भी अधिक शोध करते हैं

क्या गुप्त पोथियाँ पढ़ी पुस्तकालय में

जो बताती हैं वेदों से ज्यादा देह संकेतों के अनुगमन में रहस्य है

लगातार बरसों से जी रही देह क्लांत हो रही है

ऐसा कहने वाले बहुत मिलेंगे यहाँ

बगल में बैठा राहगीर ही बताएगा मछलियों के तीक्ष्ण स्वाद का कलेवर

सस्ते इत्र की खुशबू छोड़ जाएगा कुर्ते पर तुम्हारे

जो खिचड़ी सने हाथ लिए बैठी हो रसोई के भीतर

सोचना, कितना कष्ट होगा उसे

इस बार नए ढब की कविताएं लिखना है तुम्हें

उसके दाह को विषय मत बनाना

उसके कोप को भी नहीं

लिखना , कलकत्ते में एक साहित्यकार से टकरा कर

खील बताशे किस तरह गिरे हाथों से

कुम्हार के संग बैठे टीन के पटरे पर

रुग्ण हुए सूर्य के कैसे कठोर वलय पड़ते थे

बंधी हुई चाभियों के गुच्छे छुए थे

खींचतान में किस दिशा गए हैं

धवल दिनों की अपेक्षा काले दिनों में आना

यह कहेगा रिक्शा चालक अगर रास्ता पूछोगे उससे

मान लेना वह सच कह रहा है

पहले वह प्रेमी था

आज भी गुनगुनाता है रविंद्र संगीत कालीघाट के गाढ़े कोलाहल में।