Monthly Magzine
Sunday 19 May 2019

रोक नहीं सकता आँसू जो

रोक नहीं सकता आँसू जो

फूट पड़े क्रन्दन से

बाँध नहीं सकता शब्दों को

शब्दों के बन्धन से

हैं झर रहे पत्ते

विचारों की टहनियों से

सूखकर,

कुछ हवाओं की हलकी

थपेड़ों से

कुछ ओस की बूँदों से

रोक नहीं पा रही हैं

शाख से

दीख रही हैं

गैर, फिज़़ूल, ख़ाक से

 

वक्त था -

जो उसकी अहमियत जानता था

वक्त है

जो उसकी अहमियत जानता है

 

ख़ामोश थी

शाख

तब

कल के अन्धेरे का पता था

 

फि़तरत है उसकी

सबकी

मुझे भी पता था

पर क्या पता ?

 

मैं पत्ता था

जिसे सूखना था, गिरना था

 

सब पता था

 

अकेला है वह

अकेली राह पर

और भी हैं

पर सब अकेले हैं ।

वह शाख भी

मैं भी

पर उस शाख ने

कितनों को अकेला बनाया होगा

 

सब मेरी आँखों के सामने

गिर पड़े

मुझसे कटे

खुद से कटे

 

जि़न्दगी उनकी भी है

जि़न्दगी मेरी भी है

जि़न्दगी उसकी भी है।

 

सब यूँ ही जी रहे हैं।

ताश के पत्तों की तरह

बिखरे हुए

अपने भी अपने नहीं हैं

जिनका जब दांव आता है...

वह चला जाता है

 

कभी खुशी

कभी ग़म के साये में

लिपटी है जिन्दगी

सबकी

ख़ामोश !!!!