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Tuesday 24 Sep 2019

अलबत्ता

   अलबत्ता

उसे जगा दो

सोया है

उसे जगा दो

कुसमय सोया है

 

लेकिन उसे क्यों जगाओ

उसे नींद नहीं आती

और जब आती है

समय

कुसमय नहीं देखती

 

अलबत्ता

उसे खाट दे दो

जो टूटी न हो

 

अलबत्ता

उसे चादर दे दो

जो उसके पांव ढंक दे

 

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मेरी छाया

 

धूप खड़ी

और कड़ी है

छोटी-सी

निरीह-सी

मेरी छाया

सिर पर रखे

भारी बोझ

मेरे आगे-आगे

चली जा रही है

 

हाय री उसकी मशक्क़त

मुझे

छूट रहे हैं पसीने

 

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खरवारी का समय

 

एक औरत

खैनी बना रही है

फुर्ती से

एक औरत

बीड़ी पी रही है

तेज़ी से

 

खरवारी का समय

समाप्त

 

वे उठकर जा रही हैं

जहां से

वहां पेड़ों से उतरकर

चिडिय़ां आ रही हैं

 

 

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आखिऱकार

 

जिन्हें हाशिए पर होना चाहिए

वे हाशिए पर होंगे

जिन्हें केन्द्र में होना चाहिए

वे केन्द्र में आयेंगे

 

हक़दार कहां जायेंगे

आखिरकार ?

कहां जायेगा

समय का न्याय ?

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जिसके बाद

मठ और गढ़

तोडऩे होंगे

 

कुछ ने यह नारा

उठा लिया

और गूंजा दिया

आसमान में

 

जिसके बाद

गये बढ़

कुछ नये मठ

और गढ़

 

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प्रार्थना के बीच

 

ईश्वर

उन्हें क्षमा करो

वे नहीं जानते

उन्होंने क्या किया है

एक गऱीब का बढिय़ा कुर्ता

जो उसे भेंट में मिला था

फाड़ दिया है

 

प्रार्थना बुदबुदाते हुए

वह बैठा

सिलने को

फिर जाने क्या हुआ

कि उठा अचानक

और तार-तार कर दिया

अपना कुर्ता

और चलता बना

 

क्या उसने

रहस्यवाद की गली पकड़ी होगी

या क्रांति की सड़क ?

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भारत का नक्शा

कितनी जल्दी चीज़ें मिट जाती हैं

या दूसरा रूप ले लेती हैं

जैसे भारत का नक्शा

रिक्शे वाले के मटमैले कुरते पर

पसीने से बना

 

अव्वल तो ध्यान ही नहीं जाना था उधर

तेज़ धूप के बावजूद

बनारस कैंटोनमेंट के सुहाने मंजऱ से हटकर

मगर गया भी तो

समय नहीं मिला

कैमरे की दृष्टि से

उसे चिरस्थाई कर देने का

 

आश्चर्यजनक रूप से

अचानक इतना बढ़ा जलस्तर

 कि प्रायद्वीप डूब गया

 पल में

 समुन्दरों के तल में

 

सड़क की चढ़ान थी

कि ग्लोबल गर्मी

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रात का किस्सा

 

रोते-रोते

मैं सो गया था

जब मुझे जगाया गया झिंझोड़कर

यमदूत मुझसे क्षमा मांग रहे थे

हाथ जोड़कर

 

लेकिन मैं क्षमा करने को तैयार नहीं था

कि ऐसी भी कोई भूल करता है

मैं बिफर रहा था उन पर

बहुत बुरी तरह से

 

इतना ही याद है

रात का कि़स्सा

तुम्हें याद करते हुए  1

 

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