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Wednesday 20 Nov 2019

भीकू की बीवी

कई रोज से मूसलाधार बारिश हो रही थी। मैं सुबह से दालान में बैठा आँगन में बरसते हुऐ उस पानी को देख रहा था। जो अमरूद के पेड़, नींबू के झाड टीन के शेड और आँगन में जगह जगह जमा हो गये पानी पर बरस कर एक संगीत पैदा कर रहा था। और उससे निकलने वाली धुन कानों को भली लग रही थी। मुझे अच्छा लग रहा था। मजा आ रहा था। जिससे मेरी खााली, बेकार बैठे रहने की बोरियत काफी हद तक कम हो गई थी। कुछ लम्हों के लिए मैं दीन दुनिया सब कुछ भूल गया था, और खो गया था उस झमा झम बरसते पानी में ...

ध्यान ही तो है। जिधर लगा दो, लग जाता है। फिर कोई फिकर परेशान नहीं करती। सारी दुनिया से नाता टूट सा जाता है. मगर एक आम आदमी के लिए यह सब कुछ वक्ती होता है। वह बहुत जल्द वापसी कर लेता है। मैंने भी की और लौट आया . ..फिकरों ने आ घेरा और शैतान बच्चों की तरह मुझे सताना शुरू कर दिया। आज कई दिन हो गये थे। मैं अपने किरायेदारों के पास किराया वसूलने नहीं जा पा रहा था। अगर बाहर निकल पाता तो एक काम ओर हो जाता। मेरा इन्वरटर खराब हो गया था। नया खरीदने के हालात नहीं थे। मेरे एक दोस्त ने बताया था कि किराये पर मिल जायेगा। उसने दुकान का पता भी बताया था। बस जा कर मिलना था। मसला हल होता नजर आ रहा था।

 आज कल यह एक बहुत कमाल की बात है कि हर चीज़ किराये पर मिल जाती है। कुछ भी हो, कोई भी चीज हो। बात करो, किराया तै करो। घर ले आओ। किराया वक्त से अदा करते रहो और जब तक चाहो अपने पास रखे रहो। मुझे, अब इन्तिजार था कि किसी तरह यह बारिश रूके तो मैं घर से बाहर निकलूँ लेकिन तांता था कि टूटने का नाम ही नहीं ले रहा था। और अब मेरी उम्र भी ऐसी नहीं थी कि बारिश में भीगते हुए उसका मजा लेता रहूँ और काम भी पूरा करता रहूँ। वे दिन और थे, जब बरसते हुए पानी को देख कर सब कुछ भूल जाता था और सारी बारिश जिस्म पर से ही गुजर जाती थी। अब तो दूर से ही देख कर खुश हो लेते हैं।

बारिश होती रही। ख्यालात की लडिय़ाँ पानी की तरह बरसती रहीं। टूटीं तब, जब बाहर से कुन्डी खटकने की आवाज सुनाई दी। कोई था जो दरवाजे पर था और बहुत जल्दी में था। खटखटाये ही जा रहा था। रूक ही नहीं रहा था। आया भी है इस तेज बारिश में। दरवाजा़ तो खुला है, बन्द नहीं है। ड्योढ़ी में भी काफी जगह है। एक बार, दो बार खटखटा कर, आराम से ड्योढ़ी में खड़े होकर इन्तिजार कर सकता है। मगर वह है कि रूकी नहीं रहा है। मुझे कुछ झुन्झलाहट सी होने लगी। गु़स्सा आ गया। जो आवाज़ लगाने पर जरूर झलका होगा. .. कौन है?

भीकू..मालिक

भीकू? यह कहाँ आ गया इतनी बारिश में? मैंने सोचा। फिर उसे आवाज दी- आ जा, अन्दर, भीगा हुआ तो होगा ही तू।

वह भीगे हुए चूहे की तरह भीगा ,अन्दर दाखिल हुआ। आंगन पार करता हुआ, दालान के बाहर, छज्जे के नीचे आ कर खड़ा हो गया। मैंने सर से पैर तक उसे देखा। वह तरबतर था। मैं उठा, कमरे में गया, अलमारी खोली। एक जोड़ा कपड़े का निकाला। एक तौलिया ला कर उसे देते हुए कहा.. बदन पोंछ कर कपड़े बदल लो।

दालान के खम्बे की आड़ लेकर उसने कपड़े बदल किये और झिझकता हुआ मेरी कुर्सी के पास आ कर मेरे पैर छूने के लिए झुक गया। मैंने पैर खींच लिए।

ठीक है, ठीक है..मैंने हाथ के इशारे से उसे रोकते हुए कहा। यह पैर छूने की रस्म मुझे कभी अच्छी नहीं लगी। किसी इन्सान का, किसी इन्सान के कदमों मेंझुक जाना मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं। जबकि मैं जानता हूँ कि यह किसी बड़े को आदर देने का एक तरीका है। इसके बावजूद मैं हमेशा लोगों को इससे रोकता रहा हूँ। मगर गाँव के लोग मना करने के बाद भी मानते नहीं हैं। मालिक कह कर कदमों में झुक जाते हैं। वैसे अब यह प्रथा गाँव के उन्हीं लोगों में रह गई है, जो पुराने हंै। नई नस्ल तो सलाम तक नहीं करती अगर उनकी कोई गरज न हो तो, तनी खड़ी रहती है, आंखों में आंखे डाले..

       गाँव की जमीन तो अब रह नहीं गई। उसका क्रियाक्रम हुए एक जमाना हो गया। मुझे गाँव छोड़े 35-40 साल तो हो ही गये होगें। बीच में भी मैंने कभी उधर का रुख नहीं किया। सुना है कि अब बहुत बदल गया है। पहले जैसा नहीं रहा। बदलना भी चाहिए। अच्छी बात है। शहर तरक्की कर रहे हैं तो गाँव पीछे क्यों रहें? गाँव के लोग अब भी आते रहते हैं। पुराने रिश्ते निभा रहे हैं। उन से राब्ता कायम है। भीकू अक्सर आता है। अक्सर क्या? हर महीने आता है। इस बार कुछ जल्दी आ गया है। वह भी इतनी तेज़ बारिश में !

          भीकू की बीवी, मेरे चचाजाद भाई आलोक के घर काम करती है। आलोक अकेला रहता है। उसके कोई और भाई बहन है नहीं। चाचा चाची का काफी समय पहले देहान्त हो चुका है। वह बिल्कुल तन्हा है। भीकू की बीवी के आ जाने से उसे काफी सहारा हो गया है। वक्त से दोनों वक्त की रोटी मिलने लगी है। जिससे वह आदमी के जामे में आ गया है। वर्ना पहले तो हैवानों जैसी जिन्दगी जी रहा था। गन्दा घर, मैले कपड़े, खाना मिला तो खाया, नहीं तो जो भी उल्टा सीधा मिला खा कर, पानी पी लिया।

मैंने कई बार उसे टोका। समझाया कि ऊपर वाले का दिया हुआ सब कुछ है। जमीन है, जायदाद है, पैसा है, किस चीज की कमी है? सब कुछ तो है तुम्हारे पास। इतना बड़ा घर भायें भायें करता है। अकेले पड़े रहते हो। दुनिया जहाँ की परेशानियां हैं। सिर्फ एक औरत के न होने से, इसलिए अब शादी कर लो। घर बसा लो। यह वीराना स्वर्ग बन जायेगा और तुम आदमी।

वह एक कान सुनता, दूसरे से निकाल देता। ज्यादा जोर देने पर हंस कर कहता।

अच्छा भाई, कोई मिले तो कर लूंगा।

ढून्ढू?

वह फौरन कहता, जरा ठहरो, इतनी जल्दी भी क्या है? कुछ दिन और आजाद घूम लेने दो।

बात जहाँ से शुरू होती वहीं खत्म हो जाती। मैंने नजर उठा कर भीकू की तरफ देखा। वह सर झुकाये बैठा हुआ था। मैंने उससे पूछा, इतनी बारिश में कैसे आना हुआ? गाँव का रास्ता तो बहुत खराब हो गया होगा?

हाँ, मालिक रास्ता तो बहुत खराब होय गवा है। मुला (मगर) हम निकल आये न।

कोई खास बात?

हाँ, मालिक, मेहरारू का ले आये रेहन ..

ठीक है, मगर ऐसी क्या आफत आ गई कि इस तुफानी बारिश में लेने निकल पड़े?

वह मेरी बात सुन कर झेंप सा गया। सर झुका कर शर्माता हुआ बोला, याद आवत रही।

मुझे हंसी आ गई, अच्छा अच्छा, तो फिर आलोक से मिले?

मिल कर आईत हन, मुला भैय्या नाही जाये देत हैं।

क्यों?

अब हम का बताई, मालिक, आप उनसे कहा जाये, हमार मेहरारू का हमरे साथ भेज दें। वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए बोला, यही वासते आप के पास आये रेहन..

मुझे उस पर तरस आने लगा। वाकई, कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं। जिनमें बहुत दिनों तक की दूरी तकलीफ दे हो जाती है। मैंने उसे समझाते हुए कहा, घबराओ नहीं, मैं उससे बात करता हूँ..

यह कह कर मैंने आलोक को फोन मिलाया। मगर उसके मोबाइल का स्विच आफ आया। रूक रूक कर मैंने कई बार मिलाया। मगर बेकार। थक कर मैंने मोबाइल रख दिया और भीकू की तरफ देखता हुआ बोला, उसका फोन बन्द है, जरा ठहरो, बारिश कुछ कम हो जाये, तब चलता हूँ।

वह कुछ न बोला। सर झुकाये बैठा रहा। लेकिन उस की बेचैनी, उसके चेहरे और बदन से जाहिर हो रही थी। मुझे हंसी आने लगी। लेकिन मैंने अपने को रोका और उससे गाँव, खेती, फसल के बारे में बातें करने लगा। मगर वह उतना ही जवाब देता। जितना मैं पूछता। फिर अपनी सोच में गुम हो जाता। आखिर, मैं ही चुप हो गया।

        काफी देर के बाद बारिश का दौर जब टूटा तो मैं भीकू को लेकर आलोक के घर पहुंच गया। वह लेटा हुआ था। मुझे आता देख कर उठ कर बैठ गया। उसने एक नजर भीकू पर डाली और फिर मुझ से मुखातिब हो गया।

कैसे हो भाई? इस बारिश में कहाँ निकल पड़े? अपने आप को भीगने से बचाओ वर्ना तबीयत खराब हो जायेगी।

ठीक कह रहे हो, वैसे कोई खास बात नहीं है। यह भीकू आया था। तो इस के साथ चला आया, मैं पल भर रूका। फिर बात आगे बढ़ाई, इससे भी मैंने यही पूछा था कि इतनी बारिश में कहाँ निकल आया? तो कहने लगा कि बीवी को लेने आया है।

मेरी बात सुनकर वह भीकू को घूरने लगा। मैंने आगे बात से बात जोड़ी.,शायद, तुम ने भेजने से मना कर दिया है।

फिर हंसते हुए मैंने कहा, यह अपनी पत्नी के बिना तड़प रहा है..भेज दो कुछ दिनों के लिए, परेशानी तो तुम्हें होगी..लेकिन क्या किया जाये?....उस गरीब की भी मजबूरी है, तुम ऐसा करना, जब तक वह वापस काम पर नहीं आती है, तुम मेरे साथ खाना खा लिया करना।

     वह खामोशी से मेरी बात सुनता रहा। कोई जवाब न दिया। और मैं इन्तिजार करता रहा कि वह कुछ बोले। लेकिन चुप लम्बी होती चली गई। लग ही नहीं रहा था कि जैसे उसने मेरी बात सुनी है। मुझे कुछ अजीब सा लगा। मैंने टोका, तुमने जवाब नहीं दिया, तुम ऐसा क्यों नहीं करते कि भीकू को भी यहीं जगह दे दो। वह कुछ दिन यहीं रूक जायेगा। तुम्हारा काम भी कर दिया करेगा और अपनी बीवी के साथ भी रह लेगा।

   अचानक वह हुआ जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। बस पलक झपकते ही सब कुछ हो गया। एक मन्जर था, जो बहुत तेजी से निगाह के सामने से गुजर रहा था। आलोक के लात घूंसे भीकू पर बरस रहे थे। वह मार रहा था और मारे जा रहा था। चन्द लम्हों में ही भीकू अधमरा हो गया। मेरी फुर्ती भी कुछ काम न आई। फिर भी मैंने उसे पकड़ा और डांटते हुए पलँग पर ढकेल दिया, यह क्या हरकत है? क्या समझूं इसे? मेरी बातों का क्या यही जवाब है?

मुझे भी गुस्सा आ गया। मैं उसे घूरने लगा। वह चुप बैठा। अपनी फूलती सांसों पर काबू पाने की कोशिश करता रहा। फिर उठा और अल्मारी की तरफ चला गया। उसे खोल कर उसमें से कोई कागज़ बाहर निकाला और लाकर मेरे हाथ में थमा दिया। यह क्या है? मैंने नागवारी से कहा।

देख लो

मैंने खोल कर देखा। वह दस रूपये के स्टाम पेपर पर लिखा कोई एग्रीमेंट था। मैंने पढऩा शुरू किया और मेरी आंखें हैरत से फैलती चली गईं। दिमाग में आंधियां चलने लगीं। जो कुछ लिखा था। ऐसा मैंने सुना था कि होता है। मगर यकीन नहींथा। क्या फर्क पड़ता है?...यकीन हो या न हो, सुना हो या न सुना हो, सोचा हो या न सोचा हो। यहाँ ऐसा हुआ था। आलोक की आवाज़ मेरे कानों के परदे फाड़ रही थी।

भीकू ने अपनी बीवी को एक साल तक के लिए मुझे किराये पर दिया है। मैं इसे पांच हजार रूपया महीना देता हूँ। अब इसकी औरत एक साल तक के लिए मेरी बीवी है। इसकी नहीं..साल पूरा होने में अभी कुछ दिन बाकी हैं। साल पूरा हो जाये, ले जाये, उससे पहले कैसे? पूछो, कैसे लेने आ गया?

मैं क्यों पूछता .. क्या पूछता? क्या कहता? अब कहने सुनने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था। हाँ, सोचने के लिए बहुत कुछ था।

वह एक नई प्रथा, जिसका जिक्र अक्सर गाँव से आने वाले लोग किया करते थे। अब वह मेरे खानदान तक भी पहुंच गई थी।