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Tuesday 24 Sep 2019

गिरिजा कुमार माथुर औैर तार सप्तक

कवि-समय ऐसा समय होता है जब कविता स्वप्न की तरह अनेक ऑंखों में तैरने लगती है। स्वप्न का भाषा में कायान्तरण और वह भी कल्पना, संवेदना और सौन्दर्य के साथ एक स्वप्नदर्शी कवि के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती होती है और यह चुनौती उस समय बहुत विकट हो जाती है जब निराला, पंत, महादेवी जैसे कवि उसके समकाल में हों और जयशंकर प्रसाद कालजयी होकर इतनी बड़ी लकीर खींच गए हों कि उनसे बड़ी लकीर खींची जाना संभव हो पाना कठिन लगता है। गिरिजा कुमार माथुर ऐसे ही समय में कवि-रूप में प्रकट हुए। निराला के प्रिय बने यहॉं तक कि अपने एक संग्रह की भूमिका निराला से लिखवा कर यह भविष्यवाणी भी करवा ली कि तत्कालीन कवि-समय में उनकी दस्तक सुनी जानी चाहिए। छायावादी कविता का रोमांच और रोमान्स (जिसे माथुर जी ने रोमान कहा है) उस समय इतना प्रबल-प्रगाढ़ था कि उसकी छाया-भित्ति को लांघना बहुत बड़ी चुनौती थी। लेकिन माथुर जी ने सर्वप्रथम अपने को छायावादी छंद और रोमान से मुक्त किया।

जब वे कवि के रूप में मान्य हुए और तार सप्तक की योजना का श्रीगणेश हुआ तो उनको उस समय के दो दिग्गज कवि मुक्तिबोध और अज्ञेय के सामने खड़ा होना था। चूॅंकि 'तार सप्तक’ छायावादी रोमान से आगे की कविता लेकर आ रहा था और उत्तर-छायावाद की लौ भी मंद हो चुकी थी, ऐसे में माथुर का नई कविता के साथ आना, संभवतया अज्ञेय को भी भाया होगा और वे नई कविता के उद्गम की तीव्र बौद्धिक धारा में बहे तो अवश्य लेकिन गीत की लय बिना छोड़े और नई कविता में लय बिना तोड़े। गिरिजाकुमार माथुर के उद्भव का यह ऐसा अवसर बना जब उन्होंने अपने को तीन छवियों में प्रस्तुत किया - एक भाषा-चेतस कवि, दूसरा विचार-चेतस कवि और तीसरा विज्ञान-चेतस कवि।

 'तार सप्तक’ का आना एक अचिन्त्य आश्चर्यमयी काव्य-घटना थी। 'तार सप्तक’ ऐसे समय में आया था जब प्रगतिशीलता का जनवादी जोश लहरा रहा था और मुक्तिबोध, नेमिचंद एवं रामविलास शर्मा उस काव्य-आन्दोलन के ध्वज-धारी हो गए थे। गिरिजा कुमार माथुर की प्रारंभिक, लेकिन कुछ हद तक क्षीण आस्था तो अवश्य उस आन्दोलन से थी लेकिन उनकी यह आस्था शीघ्र ही यथार्थ के मनोविज्ञान से मुक्त होकर, शिल्प, संवेदना, सौन्दर्य और बौद्धिक-उन्मेष की ओर मुड़ गई जिसका एक परिणाम यह हुआ कि उन्होंने गीत में न छंद छोड़ा, न नई कविता में लय की आंतरिक ध्वनि छोड़ी और न भाषा का वह प्रचलित स्वरूप अपनाया जो नई विचारधारा से आच्छन्न एवं आकर्षित था। उन्होंने अपनी ही काव्य-भाषा रची, वह भी हिन्दी के मानक सर्जनात्मक स्वरूप में। ऐसा स्वयं गिरिजा कुमार माथुर और उनके अनेक पाठकों एवं लेखकों का कहना है कि वे भाषा में देशजता के कवि थे, ग्राम्य-चेतना के कवि थे, प्रकृति के कवि थे, मानवीय-संवेदना के कवि के साथ लोक-बोध, लोक पर्व आदि के कवि थे। यह एक प्रकार का वेल्यू जजमेण्ट होगा कि उन्हें देशजता और ग्राम्य-चेतना का कवि मान लिया जाए क्योंकि उनसे अधिक देशजता तो नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल में है और जहॉं तक प्रकृति-चेतना का प्रश्न है वह उनके पूर्वज कवि पंत में बड़े पैमाने पर है और केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन जैसे कवि तो प्रकृति से संलग्न कवि ही माने जाते हैं। हॉं इतना अवश्य है कि चूंकि गिरिजा कुमार माथुर का जन्म मध्यप्रदेश के तत्कालीन कस्बे (अब जिला) अशोकनगर में हुआ था और उन्होंने अपने युवा होने तक के जीवन में गॉंव, खेत, किसान, मजदूर, प्रकृति और कस्बाई जि़न्दगी को खुली ऑंखों से देखा था, इसलिए देशज शब्दावली एक प्रकार का नास्टेलजिया अर्थार स्मृति मोह कहा तो जा सकता है, वर्ना वे हिन्दी की नागरिक संवेदना के ही कवि अधिक थे और भाषा में जिस प्रकार का सर्जनात्मक तेज है वह उनके शिल्प की बुनावट से बना है।

जैसा कि ऊपर कहा गया है - 'तार सप्तक’ का बीसवीं सदी के पॉंचवे दशक के प्रारंभ में प्रकाशित होना हिन्दी साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। छायावाद के प्रभाव से आच्छन्न तत्कालीन कवि-मानस को नई कविता की प्रखर बौद्धिक एवं वैचारिक चेतना से जोडऩा एक प्रकार की चुनौती थी। इस चुनौती को मुक्तिबोध ने अपनी गीत-रचनाओं से विचलन कर नई कविता के मुक्त फार्मेट में ऐसे रचा कि 'अंधेरे में’ और ब्रहमराक्षस’ जैसी कविताएं आल टाइम ग्रेट या क्लासिक हो गईं। अज्ञेय ने तो कविता की नई भाषा ही रच दी और नई कविता को जितना शब्द-समृद्ध और प्रयोगशील बनाया उससे हिन्दी भाषा की सर्जनात्मक शक्ति और अभिव्यक्ति-क्षमता का एक नया स्तर या कीर्तिमान बना। गिरिजा कुमार माथुर मुक्तिबोध या अज्ञेय के प्रभाव से आकृष्ट हुए बिना अपनी नई काव्य-भूमि रचते रहे, नए बिम्बों के साथ, नई विचार-चेतना के साथ और हिन्दी भाषा की सौ फीसदी गरिमा के साथ। न अंग्रेजी का अधिक घालमेल, न लोकभाषाओं का अति हस्तक्षेप, जबकि उनके पास ब्रजभाषा और बुन्देली का संस्कार था और प्रारंभ में उन्होंने ब्रजभाषा में भी कविताएॅं छंदबद्ध लिखीं। इसलिए यह कहना अनुचित न होगा कि गिरिजा कुमार माथुर की कविता का रूप-विधान, संयोजन, संगठन और समकालीन के प्रति संवेदन उनका अपना प्रयोग था, मौलिक, कल्पनाशील और किसी भी प्रकार की स्थानिक या विचारधारागत भावुकता से मुक्त।

माथुर जी के पास अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन और साहित्यिक संस्कार था तो अवश्य लेकिन कविता में कहीं ऐसा नहीं लगता कि वे किसी एलियट, येट्स, ऑडेन या वाल्ट विटमेन के फालोअर रहे हों या उनके बिम्ब और प्रतीकों को लेकर किसी मलार्मे या पॉल वेलेरी की प्रतीकात्मक बौद्धिकता से अपनी काव्य-धारा रचते रहे हों। माथुर जी ने गीत लिखे, कुछ छंदबद्ध कविताएॅं भी रचीं, लेकिन जब 'तार सप्तक’ के कवि के रूप में उनके काव्य से साक्षात्कार होता है तो इतना अवश्य लगता है कि उन्होंने स्वयं अपने समकालीन काव्य-रूपों से पृथक होकर अपना मौलिक बिम्ब-विधान रचा, अपनी काव्य-भाषा रची और जहॉं तक तत्कालीन विचार या विचारधारा का प्रश्न है, उससे भी वे निर्लिप्त होकर अपनी कविता अपने ढंग से करते रहे। 'तार सप्तक’ - में गिरिजा कुमार माथुर की कविताओं के अन्तरलोक में प्रवेश करने के पूर्व उनके वे दो वक्तव्य पढऩा आवश्यक है जिनमें उन्होंने अपनी काव्य-संवेदना को स्पष्ट किया। 'तार सप्तक’ के प्रथम संस्करण के उनके वक्तव्य के कुछ अंश देखना आवश्यक है क्योंकि इन अंशों से कवि की एक छवि का निर्धारण यह होता है कि उनके पास कविता में प्रकृति भी है, संस्कृति भी है और परम्परा में प्रचलित पर्व एवं लोकाचार भी हैं। इस वक्तव्य से पूरी तरह संतुष्ट न होकर 'तार सप्तक’ के दूसरे संस्करण में उन्होंने जो पुनश्च के द्वारा वक्तव्य दिया, वह उनकी काव्य-प्रकृति, प्रवृत्ति और प्रक्रिया का भी आत्म-साक्ष्य है। अपने प्रथम वक्तव्य में वे कहते हैं -

 (1) कविता में विषय से अधिक टेक्नीक पर ध्यान दिया है। विषय की मौलिकता का पक्षपाती होते हुए भी मेरा विश्वास है कि टेक्नीक के अभाव में कविता अधूरी रह जाती है। - मैं चित्रकला की तीन दूरियॉं, चित्र के पूर्णत्व (राउडिंग-अप) के लिए यत्र-तत्र लाया हू। (2) रोमानी कविताओं में मैंने छोटी और मीठी ध्वनि वाले बोलचाल के शब्द प्रयुक्त किये हैं। रोमानी कविता मैं हिन्दुस्तानी भाषा में ही लिखना पसंद करता हू। (3) कविता में मुक्त छंद ही पसंद करता हू। मुक्त छंद में अधिकतर मैंने विरामान्त (एण्ड स्टाप) पंक्तियॉं नहीं रखीं। धारावाहिक (रन-ऑन) ही रखी हैं। .... मुक्तछंद का मैंने सम्पूर्ण विधान रचा है। (4) ध्वनि विधान में मेरे प्रयोग मुख्यत: स्वरध्वनियों के हैं। व्यंजन-ध्वनियों से उत्पादित संगीत को मैं कविता में संगीत नहीं मानता। (उसे) प्रत्युत रीतिकालीन रूढि़ समझता हू। छायावादी कवियों में इसी कारण मैं कोई संगीत नहीं देखता क्योंकि उनका संगीत व्यंजन-ध्वनियों से निर्मित है। 'आ’ ध्वनि का रूप है विस्तार, 'ई’ ध्वनि का रूप है आनत एवं ऊॅंचाई, 'ऊ’ ध्वनि में दूरी, 'ए’ ध्वनि में ऊध्र्वगति, 'ओ’ ध्वनि में वस्तु का 'व्योम’ तथा भीम-प्रवाह, और 'अं’ में गहराई और गांभीर्य है। इस मूल्यांकन के बल पर मैंने विभिन्न वातावरण निर्माण किये हैं। इन अंशों से माथुर जी की कविता के प्रति विषयगत, टेक्नीक या शिल्पगत, छंदगत और ध्वनिगत अनेक प्रकार की उन गतियों का पता चलता है जो उन्हें शिल्प का कवि बनाती हैं। ध्वनियों का फोनेमिक्स या फोनेटिक्स देकर भी उन्होंने अपने संगीत-संस्कार को प्रकट किया है। स्वर तो विश्व की प्रत्येक भाषा में संगीत का निर्माण करते हैं। आलाप से अंत तक एक गायक स्वरों के माध्यम से ही आरोह-अवरोह रचता है। छायावादी कवियों की व्यंजन-ध्वनियों को संगीत के अनुकूल न मानना एक प्रकार का पूर्वग्रह अवश्य है लेकिन छायावादी काव्य पर्याप्त रूप से संगीतमय भी है, मधुर भी है और छायावादी कवियों में पंत ने भले ही व्यंजन-संगीत रचा हो लेकिन अन्य कवियों ने स्वर-व्यंजन को टेक्नीक या शिल्प बनाकर रचना की हो, ऐसा लगता नहीं। माथुर जी रोमानी कविता की चित्रात्मकता और छोटी और मीठी ध्वनियों के प्रयोग की चर्चा करते हैं लेकिन जैसा कि आस्ट्रियन दार्शनिक विटगेंस्टाइन मानता था, कविता में जो आंतरिक लय है और लय से जिस ध्वनि की रचना होती है वही तो काव्य में संगीत बनती है। पॉल वेलेरी भी ध्वनि के प्रति चैतन्य था लेकिन कविता यदि विषय है, टेक्नीक है, भाषा में सर्जना है तो वह एकांगी न होकर सर्वांगा ही होगी और इसलिए माथुर जी की थीसिस या अवधारणा से इतना तो अवश्य है कि कविता में संगीत चाहे स्वर-ध्वनियों का हो या व्यंजन-ध्वनियों का, संगीत होना कविता का गुण भी है, शिल्प भी है और काव्य में रस की अनुभूति भी, फिर चाहे विषय गौण भी हो जाए तो फर्क नहीं पड़ता। शायद इसलिए माथुर जी विषय को महत्व नहीं देते। जब कोई कवि इस अवधारणा के साथ कविता करता है कि वह टेक्नीक का कवि है तो उसकी ररचना के मूल्यांकन की सीमा तय हो जाती है। गिरिजाकुमार माथुर ने स्वयं को टेक्नीक का कवि स्वीकार कर उनकी कविता के मूल्यांकन का आधार तो शिल्प बता दिया लेकिन कविता केवल शिल्प ही नहीं होती। शिल्प में अनेक बार रूप या फार्म तक सीमित हो जाने की संभावना रहती है। इसी प्रकार गिरिजा कुमार माथुर ने रोमान को विशेष रूप से अपने गीतों में स्वीकारा है। नई कविता में रोमान उस प्रकार नहीं स्वीकारा गया है जिस प्रकार छायावाद में स्वीकारा गया था। रोमान यद्यपि स्वतंत्र, स्वच्छंद और नए प्रयोगों को मान्यता देता है, अनेक प्रकार की जड़ताओं से मुक्ति के अवसर भी देता है, काव्य में एक प्रकार के मानवीय साहस और प्रकृति के प्रति उदात्त एवं कलापूर्ण चित्रण को भी स्वीकारता है लेकिन जब वह अपने राग-तत्व में भावुकता के उद्वेग रचता है तो कविता की आंतरिक वस्तु-शक्ति विचलित होकर कविता को उसकी मूल संवेदना और सौन्दर्य भूमि से भटका कर मात्र भावुक उत्तेजना में सीमित हो जाती है।

माथुर जी की कविता का फलक आधुनिक समय-बोध से जुड़ा है। मुक्त छंद में उन्होंने काव्य-लय का भी निर्वाह किया है और प्रकृति के प्रति भी वे निर्भावुक दृष्टि से काफी हद तक भावुक उत्तेजना से बचे हैं, इसलिए यह तो कहा ही जा सकता है कि वे अपनी मान्यताओं के प्रति सजग रहे हैं। शिल्प में भी जब स्वरों की संगीतात्मकता की बात करते हैं तो यह तो निर्विवाद है कि स्वर संगीत की मूल-भूमि हैं लेकिन व्यंजन की काया में भी तो स्वर निहित है। वह व्यंजन है ही इसलिए कि उसमें स्वर मौजूद है। व्यंजन की स्वर की तरह कोई स्वतंत्र ध्वनि तो होती ही नहीं। इसलिए माथुर जी की कविताए स्वर-व्यंजन को समाहित करती कविताए हैं, भले ही स्वर उनकी रचनाओं का मूल संगीत-पाठ ही क्यों न हो। भाषा को एक कवि जिस प्रकार अपनाता है, वह केवल भाषा का भौतिक रूप नहीं होता बल्कि उसमें उसका अदृश्य अर्थ-रूप, उसका सौन्दर्य रूप, उसकी संवेदना और उसका वस्तु-शिल्प भी निहित होता है। माथुर जी के पास भाषा का भाव-शिल्प और वस्तु-शिल्प दोनों है। यही कारण है कि वे यथार्थवादी या प्रगतिशील कविता की तरह अपना रचना-आचरण नहीं करते बल्कि भाषा को विषय (जिसे वे अधिक महत्व नहीं देते) बंधन से मुक्त कर शिल्प से जोड़ कर रचना करते हैं।

प्रथम संस्करण की कुछ रचनाओं के उद्धरण माथुरजी की काव्य-सृष्टि से परिचित कराते हैं जहॉं कवि के शिल्प की मुख्य विशेषता उनके नए बिम्बों में प्रकट हुई है। कुछ उदाहरण: (1) -केसर के वसनों में छिपा तन/सोने की छॉंह-सा/---फूल की रेशमी-रेशमी छॉंहें/ आज हैं केसर रंग रंगे वन/-

(2) श्वेत धुए से पतले नभ में/दूर झॉंवरे पड़े हुए सोने-से तारे/ ---अंतिम छॉंहों भरा प्रहर है। ... दूरी के रेखा-छॉंहों से पेड़ों ऊपर/ ठण्डा-ठण्डा चॉंद ठिठक कर मंदा होता/ इन कविता पंक्तियों में रोमानी भाव तो है लेकिन छॉंह के बिम्ब का कुछ अधिक प्रयोगकर प्रकृति-सौन्दर्य से छॉंह का सौन्दर्य भी रचा गया है। यही माथुर जी के बिम्बों की विशेषता भी है या अति मोह भी। अन्य कुछ बिम्ब उनके यथार्थ से भी उपजे हैं जैसे -(1) कुचले हुए मरे मन-सा है मौन नगर भी... दोपहरी-सा सूनापन गहरा होता है।

(2) वायु की सॉंसों-भरी, एकान्त खिड़की .... थकी राहें ठहर कर विश्राम करतीं/ घरों में सुनसान आलस ऊँधता है।

(3) पथ की म्लान लालटेनों पर/ पानी की लम्बी लकीर बन चू चलती हैं।

(4) मैं शुरू हुआ मिटने की सीमा-रेखा पर। रोने में था आरंभ किन्तु गीतों में मेरा अन्त हुआ/ .... सृष्टा तक मिटता कलाकार के मिटने से/ पर गीतों के इन पिरामिडों पर मिट जाती स्वयं मृत्यु आकर। इन कविताओं में जहॉं कुछ अनुभूतिगत यथार्थ हैं वहीं खिड़की, थकी राहें, म्लान लालटेन, पानी की लम्बी लकीर, गीतों के पिरामिड जैसे प्रयोग सर्वथा नए हैं जो नई कविता की शिल्पगत विशेषता प्रकट करते हैं। बुद्ध नामक कविता में भी कुछ कलात्मक बारीक बिम्ब रचे गए हैं - जैसे - श्वेत हिमालय की लकीर-सा प्रतिमाओं से धुधले बीते वर्ष आ रहे - वैभव की वे शिलालेख-सी यादें आतीं/ .... फैल गईं थीं मिटटी के अन्तर की बाहें/ .... जीति-स्तम्भ धर्म के बोल रहे हैं। इन उद्धरणों से यह तो स्पष्ट है कि माथुर जी के पास कविता की अपनी ठसक रही है। वे भाषा को सोफिस्टिकेटेड यानी अत्यंत संभ्रान्त या अभिजात ढंग से काम में लाते हैं। संभवतया जिस प्रकार का सुरूचिपूर्ण जीवन जीकर ये अपने व्यक्तित्व को प्रभावी बनाते हैं, उसी प्रकार कविता को बिम्बों की वेशभूषा में इस प्रकार सजाते हैं जैसे कविता उनके शिल्प से अपना इंटीरियर डेकोरेशन कर रही है। इस तरह वे देशजता के मोह से भी मुक्ति पा लेते हैं। कहीं कहीं मजदूरों और प्रगतिशीलता के कुछ अंश तत्कालीन प्रभाव को प्रकट करते हैं लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि वे माक्र्सवाद या किसी प्रतिबद्ध अवधारणा के प्रति सचेष्ट हों। हिन्दी के चाहे माक्र्सवादी रचनाकार हों या उत्कृष्टता के अहंकार से ग्रस्त तथाकथित दक्षिणपंथी, उन सबके बीच माथुर जी जैसे कवि की अपनी स्वतंत्र-स्वच्छंद और स्वाभिमानी उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि साहित्य किसी वाद का पिछलग्गू न होकर अपनी ही अस्मिता और चेतना में सृजन बनता है। अनेक तथाकथित विचारधारा-बद्ध या यथार्थवादी या कलावादी अधिकांश रचनाकारों पर मिडियाक्रिटी या मिडियाकर होने का फतवा देकर मज़ाक उड़ाते हैं (जिनमें मुझ जैसे निर्बल लोग भी शामिल हैं) मगर क्या यह सच नहीं कि तथाकथित मीडियाकरों की वजह से ही तो बुद्धि-रोग से ग्रस्त लोग उत्कृष्ट कहलाते हैं। माथुर जी अपने प्रथम वक्तव्य से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे, इसलिए उन्होंने दूसरे वक्तव्य के साथ अपनी अन्य रचनाएं 'तार सप्तक’ में देकर संभवतया यह बताने का प्रयत्न किया कि समय स्वयं सृजन को किस प्रकार गतिशील बनाता है। 'पुनश्च’ के वक्तव्य के कुछ उद्धरण ध्यातव्य हैं। माथुर जी नई कविता को लेकर जो महत्वपूर्ण बात कहते हैं वह भी उल्लेखनीय है। उनका कहना है -पुरानी मध्ययुगीन मूल्य-दृष्टि, भावुकत्तापूर्ण रोमान, कल्पना-प्रधान सांस्कृतिक-बोध तथा धरातलीय उदारवाद (जिसे हिन्दी में 'मानवतावाद’ अथवा तथाकथित 'भारतीय परंपरा’ की संज्ञा दी जाती है) के धुंध को नयी संवेदनशीलता और वस्तुपरक, सूक्ष्म सौन्दर्य-दृष्टि ने सदा के लिए मिटा दिया है। सामाजिक दायित्व के महत की ओर में नकली मांगलिकता और निरीह शुभाशंसा का जो आडम्बर रचा जा रहा था और अब भी सुख-सिद्धियों के लिए कभी-कभी रचा जाता है, उस पाखण्ड की कलई भी नव-काव्य की खरी तथा निष्ठापूर्ण क्रिया विधि पिघला कर बहा चुकी है। माध्यम और उपकरणों की संकीर्ण रूढियॉं तोड़ कर उन्हें सहज अनुभूति के साथ सम्बद्ध किया गया है। यह उद्धरण एक प्रकार से माथुर जी के सम्पूर्ण नव-चिन्तन का प्रतिनिधित्व करते हुए तथाकथित मानवतावाद और तथाकथित सांस्कृतिक बोध पर भी प्रहार करता है तथा नई कविता की काव्यगत निष्ठा को प्रस्तुत करता है। यहॉं माथुर जी किसी भी प्रकार के विचारधारा-गत आग्रह से न तो प्रभावित हैं न कंफ्यूजड़ हैं। उन्होंने अपना पक्ष नई कविता की गतिशील सौन्दर्य-दृष्टि और संवेदनशील उदारता से प्रस्तुत कर यह संदेश भी दे दिया है कि कविता तमाम भौतिक माध्यमों और उपकरणों से पृथक एक सूक्ष्म आंतरिक अन्वेषण की तरह है। वे यह भी मानते हैं कि नयी कविता में ''सौन्दर्य की शास्त्र-सम्मत व्याख्याओं के स्थान पर सौन्दर्य-बोध की स्थिति-सापेक्ष्य अनुभूति के साथ जोड़ा गया और बहिर्मुखी रम्यता एवं कोमलता के बदले मार्मिकता, तन्मय स्पन्दनशीलता तथा आंतरिक गुणवत्ता को अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।‘’ (तार सप्तक पुनश्च) माथुर जी ने कुछ नए शब्दिक-उपकरणों से अनेक प्रकार की जड़ताओं पर प्रहार करते हुए कहा है - सामंती दृष्टि के लेखकों की कुछ गिने चुने 'महत्-व्यक्ति’, 'महत्-घटना’, और 'महत् आत्मानंद’ की खोज थी साधारण जन की छोटी प्रतिक्रियाओं एवं प्रतीति-व्यंजनाओं का उनके क्षेत्र में प्रवेश भी नहीं हो सकता था।‘’ यहॉं माथुर जी के स्वर राजनीतिक एवं जनवादी अवश्य हैं लेकिन वे मानवतावाद के विचार से आगे चल कर असहमत भी हैं। माथुर जी स्वयं को एक क्रांति-बिन्दु पर खड़े कवि होने का गर्व महसूस करते हैं और आधुनिकता के नए आलोक में अपने 'होने''और 'पात्र' रूप में अपने भीतर उस दृश्य को घटते देखते हैं। वे यह भी मानते हैं कि ''आधुनिक संवेदना के अनुरूप नई रचनाओं का आरंभ ऐतिहासिक अनिवार्यता के कारण हुआ।‘’ यही कारण है कि ''तार सप्तक में नूतन सांस्कृतिक-स्वर प्रबल है।'' वे 'प्रयोगवाद' नाम को भी अनुचित नाम मानते हैं जिसके लिए 'प्रगतिवादी साम्प्रदायिक’ आलोचक को दोषी मानते हैं। यहॉं 'प्रगतिवादी-साम्प्रदायिक' आलोचक कह कर माथुर जी ने प्रगतिवादी कटटरता पर प्रहार किया है। वे आधुनिक स्वयं को मानते हैं इसलिए कि आधुनिकता उनके लिए वैज्ञानिक प्रक्रिया से उद्भूत 'मूल्य' सृष्टि है। अंत में वे यह भी कहते हैं कि कवि कर्म की सार्थकता इसी में है कि उसकी रचना में मौलिकता, अनुभूति का ताप और अभिव्यक्ति की सूक्ष्मता हो। इन विचारों के साथ माथुर जी की कविताओं को पढऩा और परखना होगा। वे गीत के कवि हैं, नाट्य-काव्य के भी कवि हैं और नितांत आधुनिकता के नये कवि भी स्वयं को मानते हैं। वे अपनी 'नया कवि' शीर्षक कविता में कहते हैं - (1) मैं निरन्तर पास आता अग्नि-ध्वज हूॅं। (2) हो चुके सभी प्रश्नों के सभी उत्तर पुराने/ खोखले हैं/ हूॅं प्रताडि़त/ क्योंकि प्रश्नों के नए उत्तर दिए हैं। (3) नन्हें हो गए पेड/ नन्हीं-सी सड़कों पर/ .... हर देवतापन हमको नपुंसक बनाता है। इन पंक्तियों में एक ओर 'नव-गीत' की प्रारंभिक आहट है साथ ही अपने नए पन का बयान भी। 'पृथ्वी-कल्प' उनकी लम्बी नाट्य-कविता है जिसे पृथ्वी के अपने आत्म-संवाद से रचा गया है। जो पृथ्वी-गीत रचा है वह भी वैदिक पृथ्वी-सूक्त की स्मृति ताजा कर देता है। ''ज्योति-वदनी, अमर यौवन/ खिलीं, तुम पर अरूणिमाएॅं/ मानव-केसर कथाएॅं। मृत्यु के फंगस-वनों पर। उठीं हर युग में ऋचाए''। इन पंक्तियों में 'फंगस'का मृत्यु-बिम्ब क्या एलियट के ईथर या क्लोरोफार्म वाले प्रयोगों के समान नहीं लगता? (पृथ्वी गीत) 'इतिहास' शीर्षक कविता में वे कहते हैं - ''खोलो, यह ग्रंथ है चिरन्तन समय का/ आदि पृष्ठ धुॅंधले हैं/ अक्षर मिटे हैं कुछ/ उड़ गया है मुख्य पृष्ठ/ भूमिका न मिलती है। पहले अध्यायों के/ खो गए हैं पृष्ठ कई/'' इतिहास को स्वयं उसके ही होने न होने का पेरेडॉक्स या विलोम रच कर क्या माथुर जी ने इतिहास के अवसान की उत्तर-आधुनिक आहट की सूक्ष्म ध्वनि पहले ही नहीं सुन ली थी? 'तार-सप्तक' में माथुर जी को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि उन्होंने न केवल अपना काव्य-विमर्श रचा है बल्कि शास्त्रीयता और आधुनिकता के कथित विचारधारा-बद्ध कट्टरपन को काव्य के उदात्त और कल्पनाशील, अनुभूति-परक स्पन्दनों से जोड़ा है। इसलिए एक प्रकार का उदास मनोभाव भी उनकी 'गीतिका' कविता में प्रकट हुआ है। ''देखो गाथाकार, क्षितिज पर/ सूर्य-ग्रहण पड़ रहा मनुज पर/ अर्ध-आतुर मुख खोल रहे हैं/ युद्ध-राक्षस डोल रहे हैं। यहॉं माथुर जी का एक प्रकार से मानवतावाद के कथित विचार के प्रति न केवल क्रोध है बल्कि संवेदनाओं की डोर से बॅंधे तथाकथित ऐसे सृजनकर्मियों पर विडम्बना मुक्त प्रहार भी है जिनमें एक प्रकार का हिंसक दैत्य मौजूद है और उसी हिंसा से तो युद्ध-राक्षसों का जन्म होता है। क्या समाजवाद के कथित लोक-वादी विचार के पाखण्ड ने ही दो दो विश्वयुद्ध नहीं रचे थे? हिटलर, मुसोलिनी का समाजवाद आखिर था क्या सिवाय नरभक्षी हिंसा के?

गिरिजा कुमार माथुर का हिन्दी आलोचना में जो वाद-निरपेक्ष काव्य-मूल्यांकन होना चाहिए था, वह अभी तक हुआ नहीं है। तार-सप्तक के कवियों में से मुक्तिबोध और अज्ञेय इतनी स्पेस हड़प गए कि आलोचना का पक्ष-प्रतिपक्ष, विचारधारा का पथ-अपथ सब कुछ इन दो कवियों पर ही निछावर हो गया जो भले ही ग़लत न हो मगर इस कारण गिरिजा कुमार माथुर जैसा कवि बहुत हद तक अलक्ष्य, और श्रेष्ठ आलोचना से वंचित हो गया। अब ज़रूरी है कि जिस नई कविता को गिरिजा कुमार माथुर ने 'तार सप्तक' के माध्यम से नए पन का प्रस्थान-बिन्दु माना है, उसे केन्द्र में रखकर माथुर जी के रचना कर्म की गंभीर सूक्ष्म और प्रगाढ़ परख हो ताकि नए और समकालीन कवियों को लगे कि उनके पूर्वज कवि मात्र कवि ही नहीं थे बल्कि तेजस्वी प्रतिभा के साथ गहन-अध्ययन और अनुभूति के ताप से तपे साधक भी थे, सर्जक भी थे।