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Wednesday 20 Nov 2019

प्रस्तावना

लेखक-पत्रकार-विचारक राजमोहन गांधी ने जब युगपुरुष अपने पितामह की जीवनी लिखी तो उसका एक अत्यन्त सीधा-सरल शीर्षक दिया- मोहनदास। इस प्रथम नाम में ही जैसे उनका विराट व्यक्तित्व समाहित और प्रकट हो गया। उनके एक अन्य पौत्र पत्रकार- सामाजिक कार्यकर्ता अरुण गांधी ने उनसे मिली शिक्षा पर निजी संस्करणों को समेटते हुए पुस्तक लिखी तो उसे ''द गिफ्ट ऑफ एंगर’’  अर्थात क्रोध का उपहार जैसा कुछ-कुछ अनबूझ सा शीर्षक दिया। इस पुस्तक में अरुण गांधी ने ''बापूजी’’ से मिली दस प्रमुख सीखों का वर्णन किया है, जिनका सार यही है कि विपरीत परिस्थितियों एवं नकारात्मक भावावेगों को वे कैसे जीवन का परिष्कार करने वाली स्थितियों में रूपान्तरित कर देते थे। हम जानते हैं कि कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें महात्मा की उपाधि से अभिहित किया था; जबकि नेताजी सुषाषचंद्र बोस ने उन्हें राष्ट्रपिता का संबोधन दिया था। बापू की हत्या के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि हमारे जीवन का प्रकाश अस्त हो गया है-''द लाइट है•ा गॉन आउट ऑफ अवर लाइव्•ा।‘’ इन तमाम विरुदों के बरक़्स आम हिंदुस्तानी के लिए वे सिर्फ बापू थे और हैं- हमारे पिता, पितामह या प्रपितामह।

बीसवीं सदी के महानतम विश्व नागरिकों में से एक, महान वैज्ञानिक व चिंतक अल्बर्ट आइंस्टीन ने उनकी सत्तरवीं जयंती पर इन शब्दों में अपने उद्गार व्यक्त किए थे-

''Generations to come, it may well be, will scares believe that such a man as this one ever in flash and blood walked up on this earth "

इस काव्यात्मक पद का अनेक बार शब्दानुवाद हुआ है, लेकिन मैं नहीं जानता कि आइंस्टीन के जो गहरे मनोभाव थे, क्या उन्हें कभी सक्षमतापूर्वक व्यक्त किया जा सका है! मैं भी उनके शब्दों का ही अनुवाद करने का एक और प्रयत्न संभवत: निष्फल यहां कर रहा हूं-

''आने वाली पीढिय़ां, शायद ही, मुश्किल से विश्वास कर पाएंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा व्यक्ति कभी इस धरा पर हुआ था।‘’

गांधीजी के जीवन और दर्शन के विविध पहलुओं पर अनगिनत पन्ने लिखे गए हैं, लेकिन उनको समग्रता में समझने में कुछ गिने-चुने जन ही अब तक कामयाब हो सके हैं। इनमें मैं रवींद्रनाथ ठाकुर, जवाहरलाल नेहरू, रोम्यां रोलां, अल्बर्ट आइंस्टीन और शहीद-ए- आज़म  भगतसिंह के नाम लेना चाहूंगा। गांधीजी के विराट व्यक्तित्व, उनकी सागर की गहराई, उनकी आकाश की ऊंचाई का अध्ययन करने के और जितने भी विद्वतापूर्ण प्रयास हुए हों, वे या तो किसी एक पहलू के विवेचन से आगे नहीं बढ़े हैं या फिर एक सीमा पर जाकर ठिठक गए हैं।

यह एक दिलचस्प विरोधाभास है कि एक ओर महात्मा गांधी का बहुआयामी व्यक्तित्व है जिसकी जटिलताओं के सूत्र कभी पूरी तरह से नहीं सुलझते; तो दूसरी ओर बापू का नाम है जो हर हिंदुस्तानी को, और विश्व के नागरिकों के एक अति वृहत्त अंश को बिलकुल अपना प्रतीत होता है। 1954-55 की फिल्म जागृति में पं. प्रदीप रचित गीत याद कीजिए- ''दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग, बिना ढाल;  साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।'' मध्यप्रदेश की प्राथमिक शालाओं में कभी पढ़ाई जाने वाली एक कविता तो इस विराट छवि को और भी सरल रूप में प्रस्तुत करती है- ''मां! खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं।'' यह सरलता उनके चित्रांकन में भी दिखाई देती है, जिसमें मह•ा चश्मे की कमानी और छड़ी का रेखाचित्र बना देने से गांधी हमारे सामने प्रकट हो जाते हैं। आज हमारे सामने यह प्रश्न उपस्थित है कि गांधी को हम किस रूप में परिभाषित करें ! क्या ''एक चवन्नी चांदी की, जय बोलो महात्मा गांधी की'' का उच्चारण करने से हमारा काम चल जाएगा? क्या ''मजबूरी का नाम महात्मा गांधी'' के चलताऊ मुहावरे को  ''मजबूती का नाम महात्मा गांधी'' से प्रतिस्थापित कर देना पर्याप्त होगा? क्या स्वच्छता में ईश्वर का वास है, कहकर हम अपने मन की दुर्बलता को अनंतकाल तक छुपा सकते हैं? क्या गांधी टोपी लगाने से, और चरखा कातने जैसे उपक्रमों को अपनाकर हम गांधी के वारिस कहलाने के योग्य हो जाते हैं?

मेरे तईं ये सब सीधे-सादे सवाल नहीं बल्कि यक्ष प्रश्न हैं। अगर आने वाली पीढिय़ों को सफलतापूर्वक विश्वास दिलाना है कि सचमुच गांधी जैसा युगपुरुष इस धरा पर अवतरित हुआ था तो उसके लिए हल्के-फुल्के नारों से, शिशु मन को लुभाने वाली कविताओं से, खादी धारण करने मात्र से काम नहीं चलेगा। गांधीजी के जीवन का अध्ययन, उनके विचारों का अध्ययन व विश्लेषण का प्रयत्न करना बेहद लाजिमी होगा। मेरी अल्प बुद्धि में ऐसे कुछ बिंदु उभरते हैं जो गांधी को समझने में एक सीमा तक सहायता कर सकते हैं।

मैं सबसे पहले यह तथ्य रेखांकित करना चाहूंगा कि गांधी ने अपने जीवनकाल में जितना लेखन किया, उतना विश्व इतिहास में किसी अन्य राष्ट्रनेता या विश्वनेता ने नहीं किया। गांधी वांग्मय के सौ खंड इसका प्रमाण हैं। इसी के साथ यह भी गौरतलब है कि गांधीजी पर जितना साहित्य रचा गया है, वह भी अपने आप में एक कीर्तिमान है। उन पर अब तक शायद एक हजार से भी अधिक पुस्तकें अंग्रेज और हिंदी में लिखी गईं हैं। अन्य भाषाओं की जानकारी मुझे नहीं है। लेखनी का यह पारावार उनकी व्यक्तित्व को ही तो द्योतित करता है।

मेरी अगली स्थापना है कि गांधीजी हमारी जानिब में विश्व के सबसे समर्थ संवादी और सबसे महान पत्रकार थे। आज जब चैनलों पर टीआरपी और अखबारों में प्रसार संख्या बढ़ा-चढ़ाकर बताने की होड़ लगी है, तब यह याद रखना मुनासिब होगा कि गांधीजी ने अपने अखबारों-इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया, हरिजन के लिए नीति बनाई थी कि उनमें विज्ञापन नहीं छापे जाएंगे। वे कहते थे कि जो उनके विचार जानना चाहते हैं, वे कीमत देकर अखबार खरीदें। विज्ञापनदाता के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दबाव झेलना उनके सिद्धांतों के अनुकूल नहीं था।

अहिंसा को लेकर बहुत चर्चाएं होती हैं। आज तो हालत ऐसी है कि गोपालन करने वालों को भी अहिंसा दूत मानकर पुरस्कृत कर दिया जाता है। गांधी की अहिंसा कायरों के लिए नहीं, सच्चे मायनों में वीरों के लिए थी। उनकी अहिंसा एक राजनैतिक अस्त्र था, जो पूरी तरह से व्यावहारिक था। इस अस्त्र में दमनकारी शक्तियों को शर्मिंदा कर देने की, उन्हें झुका देने की, रौंदने के लिए उठे उनके पैरों को वापस ले लेने की ताकत अंतर्निहित थी। अहिंसा के इस मंत्र ने ही लाखों-करोड़ों भारतवासियों को निर्भयता का वरदान दिया। उपनिवेशवादी दमनकारी सत्ता का मुकाबला करने की हिम्मत दी।

सत्याग्रह उनका दूसरा अस्त्र था। यह उनके मन की निर्मलता और पारदर्शिता थी, जिसके कारण जनता ने उन पर विश्वास किया, अपने तन-मन-धन को उन पर न्यौछावर करने प्रेरित किया। सत्य के प्रति ऐसी अकंपित निष्ठा दिखाने में तो धर्मराज युधिष्ठर तक चूक गए थे। और क्या यही कारण नहीं था कि रूढि़वादी, परंपराग्रस्त भारत की करोड़ों स्त्रियां गांधीजी के आह्वान पर चूल्हा-चक्की छोड़कर घूंघट और पर्दा हटाकर स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने सड़कों पर उतर आई थीं!

महात्मा गांधी संत होकर भी एक व्यवहारकुशल व्यक्ति थे। उन्होंने जहां एक ओर स्वाधीनता की लड़ाई में अपने अनुयायियों को लाठी-गोली खाने, या जेल जाने की हिम्मत प्रदान की, वहीं उन्होंने कम साहसी अनुयायियों को रचनात्मक कार्यक्रम में लगा दिया, ताकि वे खाली घर जाकर न बैठ जाएं। खादी को प्रोत्साहित करना एक रचनात्मक कार्यक्रम होने के साथ-साथ एक सुचिंतित आर्थिक कार्यक्रम भी था, जिससे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हुए। वही आवश्यकता आज भी महसूस की जा रही है।

भाषा के प्रश्न पर गांधीजी क्या सोचते थे, यह भी देखना वांछित होगा। उन्होंने संस्कृतनिष्ठ हिंदी के बजाय आमफहम हिंदुस्तानी की वकालत की जो देश में सर्वत्र समझी जा सके और सरलता से प्रयोग में लाई जा सके। उनकी अपनी भाषा भावपूर्ण एवं बोधगम्य थी। वे हर तरह से एक मितव्ययी व्यक्ति थे और भाषा में भी शब्द-स्फीति से परहेज करते थे। फर्श पर गिरी आलपिन को उठाना, काग•ा के छोटे से टुकड़े का भी लिखने में उपयोग करना, एक पोस्टकार्ड पर गागर में सागर भर देना, ये सब उनके दैनंदिन व्यवहार का अंग थे।

अपने आपको गांधीवादी घोषित करने वाले अनेक विद्वान ''हिंद स्वराज'' को उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति या ''मैग्नम ओपस'' मानते हैं और उसका अनुसरण करने का परामर्श देते हैं। मेरा कहना है कि हिंद स्वराज 1909 में प्रकाशित हुई थी, जब गांधी भारत लौटे भी नहीं थे। वे जड़़वादी नहीं थे और जानते थे कि विचारों का विकास और विस्तार एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसीलिए हिंद स्वराज में रेल को बुराइयों की जड़ बताने वाले गांधी आने वाले समय में बार-बार रेल से ही यात्राएं करते हैं। यहां भी उनकी व्यवहारिक बुद्धि और परिपक्वता के दर्शन होते हैं।

अंत में, मेरी गुजारिश है कि गांधीजी को जानने के लिए हर व्यक्ति को उनकी आत्मकथा ''सत्य के प्रयोग'' अवश्य पढऩा चाहिए। उनकी एक सौ पचासवीं जयंती पर किसी भी अवसर पर और किसी भी व्यक्ति को भेंट देने के लिए इससे बेहतर और कोई वस्तु नहीं हो सकती।

(यह लेख महात्मा गांधी की सार्धशती के अवसर पर पब्लिक रिलेशन सोसायटी भोपाल द्वारा प्रकाशित स्मारिका के लिए लिखा गया है।)