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Monday 09 Dec 2019

आजकल नहीं लिख रही मैं

    आजकल नहीं लिख रही मैं

प्रेम की कविताएं

रात भर जागती आंखों के आगे नाचती हैं

लहू में सनी अखबार की सुर्खियाँ

कानों में गूंजती है

गालियों गोलियों और पत्थरों की बौछारें

मुझे कंपाते हैं हर रात

तिरंगे में लिपटे शहीदों के ठंडे जिस्म

मेरी स्याही जम गई है

कलम की नोक पर

तुर्की के तट पर जमी

ऐलन कुर्दी की लाश की तरह

 

इसलिए

आजकल नहीं लिख रही मैं

प्रेम की कविताएं

 

खुली आँखों में घूमता है

मंजर

लहू के चकत्तों और

जले हुए जिस्मों का

पठानकोट से पेशावर तक।

मंजर

दहशत और खौफ का

मैनचेस्टर ब्रसेल्स स्टॉकहोम से

पेरिस लन्दन स्पेन तक।

नहीं पढ़ी जाती

इंसानियत की बदली हुई तहरीर।

थर्राती है

खस्ताहाल कुदरत।

दहलाती है

ओस की खुश्क होतीं मासूम बूंदें

बंधकों की जान लेते

चार साल के जेहादी बच्चे की तरह

 

इसीलिए

आजकल नहीं लिख रही मैं

प्रेम की कविताएं

 

फूलों झूलों परिंदों की जगह

बिल्कुल अलहदा तस्वीरें

उभरती हैं अब तसव्वुर में

तस्वीर

मोसुल में मलबे में दबे

कच्चा मांस खाते

उस तीन साल के बच्चे की

और नन्ही अमीना की।

तस्वीर

छोटे बच्चे को ढाल बनाती

उस आत्मघाती औरत की

जिसने हिजाब के नीचे

ट्रिगर दबाकर उड़ा दिया

दर्जनों मासूमों को

अपने बच्चे के साथ

 

इसीलिए

आजकल नहीं लिख रही मैं

प्रेम की कविताएं

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रात भर दम घुटता है

कमरे में भर गए

फिक्र के धुएँ से

देखो ना,

उधड़ रहा है मुस्तकबिल

जिसे बुना था अरमानों से

अपनी नस्लों के लिए

मेरा शहर, मेरा देश, मेरा संविधान

झिंझोड़ता है मुझे

सत्य और न्याय

निचोड़ता है मुझे

पलँग के साथ हिल रही हैं

मेरी आत्मा की चूलें

मेरे भीतर कवि मर रहा है

बस याद आ रहा वो अ?ी?

सुखिया सब संसार है

खावै और सोवै

दुखिया दास कबीर है

जागे अरु रोवै

 

आओ हम कबीर हो जाएँ

तमाम रातें रो रोकर बिताएं

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हे मनु !

 

हे मनु !

जब आए थे तुम बहकर

विकराल प्रलय की धारों से बचकर

ताक रहे थे अथाह जल प्लावन को

अपार ज्वार को

पहाड़ की ऊँची चोटी से

वितृष्ण नेत्रों से

विरक्त निर्वेद निर्मोही मन से

 

छुआ तब एक स्त्री ने

तुम्हारे कपोल को

जिजीविषा दौड़ पड़ी थी

धमनियों में

जल उठी थी शिराओं में

कामनाओं की समिधा

तुमने भोगा तब काल का खण्ड खण्ड

उसकी बीहड़ अलकों की छांव में

फिर भाग गए

 

दूसरी बार भी रौंदा तुमने

एक स्त्री को

जिसने फूंकी थी कर्म की आंच

तुम्हारी ठिठुरती आत्मा में

 

छलते रहे बार बार, हर बार

जननी को प्रेयसी को

ब्याहता को दुहिता को

 

कभी छीनी कोख कभी अधिकार

कभी नोचे गहने कभी श्रृंगार

नगरवधू या गृहवधू

उपादान सी सजी वो

गणिका या देवदासी

घुंघरू सी बजी वो

 

हे पुरुष!

तू भूल गया श्रद्धा को

भूल गया ईड़ा को

कभी तो समझ

स्त्री की पीड़ा को

 

अन्त:पुर से लेकर चौराहों तक

मंदिरों मदरसों से बाप की बाहों तक

हजार फण वाला तक्षक घूम रहा है

जीभ लपलपाता शिकार ढूंढ रहा है

 

धरती फट पड़ी है, हिमालय डोल रहा

तेरे अट्टहास से आकाश रो रहा

 

अरे ठहर, निर्मम कृतघ्न व्यापारी !

बहुत खेला तू, रुक, अब मेरी बारी !!

सुन मेरा उद्घोष

सदियों का रोष

 

मैं धरती हूँ नदी हूँ स्त्री हूँ

फलना छोड़ दूँ ?

बहना छोड़ दूँ ?

सहना छोड़ दूँ ?

क्षुधित तृषित विक्षिप्त होकर

भटकेगा तू अश्वत्थामा सा

पृथ्वी पर प्रेत होकर

 

तीसरी बार नहीं आऊँगी

तुझे सम्भालने सँवारने

देख, बढ़ा आ रहा

प्रलय ज्वार

तुझे लीलने तुझे निगलने

चेत, मानव चेत !