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Monday 20 May 2019

पश्चाताप

देश के पश्चिमी प्रान्त राजस्थान के पश्चिमी भू-भाग यानी मरुप्रदेश का एक गाँव। आबादी ठीक-ठीक। लोगों की आजीविका के साधन कृषि, पशुपालन, मजदूरी या छोटी-मोटी दुकान। जमाना यानी सुकाल हो तो वाह-वाह, अन्यथा आह-आह-सी आह ही निकल पाती है। हर दूसरे-तीसरे साल अकाल यहाँ बिन बुलाए ही आ धमकता है। प्रकृति यहाँ के निवासियों से स्थाई रूप से रुठी रहती है। ठण्ड भी इतनी पड़ती है कि हेमन्त में पाला पड़ता है और गर्मियों में तपन इतनी कि पारा पचास को छूकर ही दम लेता है। इससे यहाँ के रहवासी फौलादी बन जाते हैं। तन से भी और मन से भी। मिनख यहाँ का खुद्दार। रोजी-रोटी की खोज में जननी और जन्मभूमि को छोड़कर प्रदेशों में कमाने निकल जाता है, पर चेहरे पर शिकन तक नहीं लाता। इस धरा के लोगों ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति की मार खाता, अकाल की चोट झेलता, रोजगार से वंचित रहता, विकास में पिछड़ा हुआ, सिंचाई के लिए जल की व्यवस्था को छोड़ो पीने के पानी को भी तरसते हुए भी देश के कानून-कायदों को मानता हुआ, शान्ति व्यवस्था में सहयोग देता हुआ देश की मुख्यधारा में बहता रहता है। कानून-व्यवस्था को चुनौती नहीं देता। लूटपाट नहीं करता। दूसरे की रोटी नहीं छीनता। माओवाद या नक्सलवाद नहीं अपनाता, वह तो केवल एक ही वाद का अनुगामी है और वह है मानवतावाद। क्योंकि वह समझता है कि ये नाना प्रकार के वाद इन समस्याओं के हल नहीं, हल तो आपसी सहयोग, सुख-शान्ति एवं मेहनत की रोटी कमाकर खाने में है।

इसी गाँव के उत्तरी हिस्से में दो भाइयों के घर हैं। जिनमें बड़े का नाम परबतसिंह तथा छोटे का पहाड़सिंह है। दोनों के पास सौ-सौ बीघा खेत की जमीन। परबतसिंह के एक ही बेटा है, जो गाँव की ही स्कूल में कक्षा दस में पढ़ता है। नाम है हीरासिंह। पढऩे में होशियार और व्यवहार में शिष्ट-विनम्र, जबकि छोटे भाई पहाड़सिंह के सात बेटे हैं। अधिकतर अनपढ़। कोई-कोई निरा साक्षर तो कोई चौथी-पाँचवीं पास। अनपढ़ तो भेड़, बकरी, गाय, भैंस ही चराएँगे। दो इनमें व्यस्त और मस्त। तीन खेती सम्भाल रहे हैं। दो आवारागर्दी करने में मशगूल। बड़े भाई के सन्तान देर से हुई। अत: हीरासिंह अपने चचेरे भाइयों से उम्र में काफी छोटा है। इकलौता है। माँ  बचपन में गुजर जाने से उसके कोई छोटा भाई-बहन भी नहीं। परबतसिंह उम्मीद तो यह लगाए बैठा था कि पहाड़ के बेटे मेरे इकलौते बेटे हीरा से यानी अपने ताऊ के बेटे, छोटे भाई से स्नेह एवं भाईचारा रखेंगे। अपनापन जताएँगे, मगर हो उलटा ही रहा है। वे उससे ईष्र्या पाले बैठे हैं। मन ही मन उसके प्रति जलन और डाह। विराग इस बात का कि वह तो पढ़ रहा है, वह भी दसवीं कक्षा में। हर बार स्कूल में प्रथम आता है। दूसरा कारण यह है कि उसको उसके पिता से पूरी सौ बीघा जमीन मिलेगी, परन्तु हमें बँटवारे में मात्र चौदह-चौदह बीघा ही। वह सुख-चैन की जिन्दगी जिएगा और हम हमारा सिर धूल में ही देते जाएँगे।

उस जमाने में लोग बच्चों की शादियाँ जल्दी ही कर दिया करते थे। बारहवीं पास होते ही हीरासिंह का ब्याव हो गया। औरत भी ऐसी आई रूपसुन्दरी। गाँव के लोग कहते कि यह तो पूूंगळगढ़ की पद्मिनी ही है। ऐसी रूपवान स्त्री उन्होंने पहले कभी नहीं देखी। हीरासिंह से जलन, ईष्र्या एवं डाह पालने का यह एक कारण और पैदा हो गया, मगर इंसान अपना पड़ोसी नहीं बदल सकता न। यहाँ तो दोनों परिवार रिश्ते में भाई हैं। खून का सम्बन्ध जो है।

उधर पहाड़सिंह के तीनों बेटे तो पच्चीस की उम्र पार कर चुके हैं। जैसे-तैसे करके, नोटों के बदले तीन बहुएँ लेकर आए हैं। यानी एकदम गरीब घर की। बारातियों के भोजन की भी व्यवस्था मजबूरीवश पहाड़सिंह को ही करनी पड़ी।

हीरासिंह की पत्नी उसके ब्याह के दो वर्ष पश्चात् एकाएक घर से गायब हो गई। हुआ यह था कि परबतसिंह बीमार चल रहा था। हीरासिंह उसको दवाखाना में दिखाने के लिए शहर गया हुआ था। सायं वापस गाँव-घर लौटे तो घर का दरवाजा बन्द। मनमुटाव के चलते वह पहाड़सिंह के घर तो जाती न थी। आस-पास ढूँढ़ा। कहीं कोई सुराग नहीं। खोज नहीं। खबर नहीं। गाँव वालों के साथ इस परिवार का अच्छा व्यवहार था। अत: सबने उसे ढूंढने में परिश्रम की पराकाष्ठा कर दी, मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात। थक-हार कर पुलिसथाने में रपट लिखवाने हीरासिंह एवं उसके साथ गाँव के कुछ मौजीज यानी समझदार आदमी गए। परबतसिंह तो पहले से ही चारपाई पकड़े बैठा था, उसके तो घुटने ही टूट गए। हीरासिंह बेचारा किशोर ही तो था। हाथ जोड़कर काँपते हुए गुहार लगाई- ''थानेदार साहब, मेरी लुगाई यानी धर्मपत्नी कल से लापता है। यह उसका फोटो है। साहब, उसे ढंूढ दोगे तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी।‘’

थानेदार मूँछों पर ताव देते हुए- ''तो अब औरतों की रखवाली भी हमें ही करनी पड़ेगी। शादी की उम्र हुई नहीं और लगा शौक चरमराने ब्याह का तो यही हाल होना है। अब तुम भी भोगो और हमें भी दौड़ाओ। खैर, कल कब से ? कितनी बजे से ? और हाँ, उसका नाम क्या है ?’’

''जनाब, उसका नाम तो प्यारी है।‘’

''लगता है वह अब किसी अन्य की प्यारी हो गई।‘’थानेदार ने व्यंग्य कसा।

मौजीज लोग- ''मालिक, इसका नाम हीरा है। बाप का नाम परबतसिंह है। हम जगतपुरा गाँव के रहने वाले हैं। बाप बीमार है। शहर इलाज हेतु बाप-बेटा कल सुबह दस बजे गए थे। घर पर बीनणी अकेली ही थी। बड़ी नेक बहू है, सरकार।''

थानेदार ने गले से खंखारा किया। सबके लिए चाय लाने का आदेश देते हुए कहा- ''जनाब, हमने भी हमारी कनपटियों के बाल सफेद कोई धूप में नहीं किए हैं। हमें मत बावळा यानी मूर्ख बनाओ। बहू नेक होती तो आज आपको थाने नहीं आना पड़ता।‘’

फिर अपनी नजऱें उस फोटो पर गाड़ दी, जो वहाँ से हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं। सभी को लगा कि थानेदार साहब को कुछ सूत्र हाथ लग गया होगा। तब तक चाय भी आ गई थी, जिसके पैसे भी हीरे से दिलवाए। फिर अपना मौन तोड़ते हुए बोले- ''भाई लोगों, यह औरत तो पूरी की पूरी हिरोइन लगती है। यह इस छोटे-से गाँव में रहेगी-टिकेगी! यह आपने कैसे समझ लिया ?’’

हीरासिंह- ''सरजी, वह बड़ी सीधी एवं सरल थी। हाथ भर का घूँघट काढ़े रहती थी। घर से बाहर जाती भी नहीं थी। कुएँ से पानी भी पहले बापू लाते थे। उनके अस्वस्थ होने पर अब मैं लाता हूँ।‘’ कहते-कहते वह रुआँसा हो गया था।

तब थानेदार साहब ने अपनी चुप्पी तोड़ी- ''कहीं आस-पड़ोस में किसी से चक्कर तो नहीं था ?’’

''नहीं साहब।‘’ सबने समवेत स्वर में कहा।

''शादी के पहले अपने मायके में गुल खिलाए होंगे? उन लोगों के साथ भी षड्यन्त्र करके भाग सकती है? हमने ऐसे सैकड़ों केस देखे हैं। घर-परिवार के दबाव में ऐसी लड़कियां शादी तो कर लेती हैं, मगर मौका पाकर उडऩ-छू हो जाती हंै।‘’

''पर साहब, इसकी शादी को तो पूरे दो साल हो चुके हैं।‘’

''अरे भाई, लगता है तुम लोग बहुत सीधे हो। अभी हमने पिछले महीने ही एक औरत के भाग जाने या भगा ले जाने का केस दर्ज किया है। जहाँ औरत अपने तीन मासूम बच्चों को घर में ताले में बन्द करके अपने यार के साथ भाग गई थी।‘’

''साहब, होने को तो दुनिया में कुछ भी हो सकता है, मगर हम इतना कह सकते हैं कि हमारे हीरे की बहू ऐसी नहीं थी। कृपा करके आप उसको ढूँढऩे में हमारी मदद करें।‘’ लोगों ने बड़ी ही आत्मीयता एवं विनीत होकर उनसे गुजारिश की।

तब थानेदार साहब ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा- ''हम पहले मौका-ए-मुआयना करेंगे। फिर तलाश प्रारम्भ करेंगे। आपकी रपट लिख ली गई है। अब आप जा सकते हैं।‘’

सभी अपना मुँह लटकाकर गाँव-घर लौट आए, पर आफत कभी अकेले नहीं आती। वह अपने चेले-चपाटे साथ ही रखती है। जैसा कि पहले बताया गया था कि परबतसिंह एक खुद्दार और स्वाभिमानी आदमी है। इज्जत-आबरू पर मर-मिटने वाला सगस यानी शख्स। किसी के घर की बहू हो या बेटी भगने-भगाने या लापता होने की ख़बर आती है तो यह चोट बदन पर नहीं, बल्कि कलेजे में लगती है, जो तन की चोट से हजार गुना ज्यादा मार करती है। वही हुआ। परबतसिंह ने इसे मन पर ले लिया और दिल का कमजोर आदमी अपना प्राण गँवा बैठा। देखते ही देखते हीरासिंह की बगिया उजड़ चुकी थी। जोड़ायत का पता नहीं और सिर पर से बाप का साया भी उठ गया।

हरिद्वार से लौटकर थाने जाकर आया। वहाँ तो वही सूखा आश्वासन कि ढूँढ रहे हैं। तुम्हारा शक और सन्देह किस पर है? इत्यादि प्रश्न सुन-सुन कर एक माह बीत गया। घर में सन्नाटा। घर की दीवारें काट खाने के लिए साम्ही दौड़ी आती है। घर में बिलकुल अकेला। तनहा। विरह-वियोग की चोटों से घायल।

पत्नी की खोज में जहाँ-जहाँ जाना था, वह गया। जहाँ-जहाँ पूछताछ करनी थी, की। रिश्तेदारी में, ससुराल में, मगर सब जगह असफलता ही हाथ लगी। इस भागमभाग में एक माह और बीत गया। हिरणों के पीछे भाग-भाग कर जब वह थक गया तो सब्र और सबूरी लेकर बैठने के सिवाय उसके पास और चारा ही क्या था ?

अकस्मात ही हीरासिंह घर के ताला लगाकर स्वयं ही लापता हो गया। अब उसकी खोज-ख़बर लेने वाला कोई नहीं। न घर में और न भाइयों में। गाँव में एक सुखी एवं अपने हाल में मस्त परिवार का इस तरह अस्त एवं अन्त हो गया। वाह रे वक्त! तेरा खेल निराला है।

पहले हीरासिंह की पत्नी गायब हुई। फिर सदमे की मार से परबतसिंह ने अन्तिम साँस ली। उसके बाद हीरासिंह जैसा गबरु जवान गाँव से लापता हुआ। गाँववाले इन सदमों से अभी उबर ही नहीं पाए थे कि रात को एक भीषण घटना घटी। पहाड़सिंह का बड़ा बेटा घर की छत पर सो रहा था। सोते समय किसी ने तीखे हथियार से उसके चेहरे पर वार किया, जिससे उसकी एक आँख चली गई।

दूसरा बेटा गरमी होने से घर की बाखल में चारपाई पर सो रहा था। किसी ने हथियार से उसका एक हाथ काट दिया। तीसरा बेटा रेवड़ की रखवाली हेतु खेत में सो रहा था। उसकी भी एक टाँग काट डाली गई। परिवार के साथ-साथ पूरे गाँव में ही क्यों, आस-पास के गाँवों तक में खलबली मच गई। भय और डर का माहौल सर्वत्र था। तुरन्त थाने पर रपट लिखवाई गई। वहाँ तो वही बात। रंजिश का मामला लगता है या फिर आपका शक, सन्देह किस पर है। मौका-ए-मुआयना, तफ्तीश-जाँच इत्यादि करके अपराधी को पकड़ा जाएगा।

तफ्तीश प्रारम्भ हुई। परिवार में सभी भाइयों के बयान लिए गए। सम्पत्ति के बँटवारे का मामला हो सकता है। पड़ोसी हीरासिंह पर भी शक की सुई गई, मगर वह तो खुद ही दो माह से घर छोड़कर जा चुका है। परसों एक बाड़े पर अनाधिकृत कब्जा करने पर ब्राह्मण परिवार से उनकी तू-तू, मैं-मैं हुई थी, पर वह परिवार ऐसा नहीं है। मारपीट, खून-खराबा करने वाला। पन्द्रह दिन पहले इन्हीं भाइयों ने एक औरत को छेड़ा था, जाँच की आँच वहाँ तक पहुँची, मगर तार जुड़ नहीं पाए। गाँव में एक महाजन की दुकान है। जहाँ से यह परिवार सामान भी उधारी पर लाता है तथा जो सूद पर रकम उधार भी देता है। उससे भी दस दिन पहले वसूली हेतु तू-तड़ाक हुई थी, मगर मार-पीट करने वाला वह परिवार भी है नहीं। यह बात पूरे गाँव वाले कहते हैं।

सौ बात की एक बात यह है कि पहाड़सिंह एवं उसके बेटों का व्यवहार गाँव में उचित नहीं होने से कोई भी ग्रामीण सहयोग हेतु आगे नहीं आया और पुलिस जाँच की टांय-टांय फिस हो गई। एक ही घर के तीन लोग अपाहिज हो गए और अपराधी पकड़ में आ नहीं पाए।

उन बातों को आज बीस वर्ष बीत गए। इस दरमियान गाँव का तालाब बीस बार भरा और बीस बार खाली हुआ। गाँव के कुंओं से न जाने कितना ही पानी उलीचा गया, हिसाब नहीं। लेकिन जो लाचार होकर गाँव छोड़कर गया उसको सब हिसाब याद है। जिन्होंने आँख, हाथ और टाँग गँवाई उन्हें यह हिसाब मालूम है। वे भुक्तभोगी ये हादसे कैसे भूल सकते हैं? गाँव में आज एक अरसे बाद अच्छी ख़बर आई। हीरासिंह लौट आया है। आकर सीधे अपने घर गया। अपने बैग से घर की चाबी निकाली और बीस साल बाद अपने घर का दरवाजा खोला। गाँव का हुजूम घर के आगे जमा हो गया। हीरासिंह ने सबसे राम-राम की। सबकी कुशलक्षेम पूछी और बताया- ''भाइयों पूरे बीस बरस पहले की बात है। मेरे साथ क्या गुजरी ? आप सबको पता है। उन हालातों में जब मैंने सोचा कि परिवार के लिए अब कुछ करना शेष बचा नहीं है तो देश भी अपना परिवार ही है। इसके लिए ही कुछ कर लिया जाए। यह सोचकर घर-गाँव त्यागकर बीकानेर चला गया। वहाँ सेना की भर्ती चल रही थी। पढ़ाई-लिखाई के सारे सर्टिफिकेट मेरे पास  थे ही। धोरों की धरती के मोठ-बाजरा खाया हुआ डील अर्थात् शरीर फौलादी तो था ही, तुरन्त चयनित हो गया। 1962 में चीन, 1965 में पाकिस्तान और पुन: 1971 में बंगलादेश में पाकिस्तान के साथ लड़ाइयाँ लड़ीं। देश के लिए कुछ करने का अवसर मिला। अब पुन: आपके साथ जीवन जीने का मौका मिला है। शेष जितनी साँसें हैं, आपके साथ बिताएँगे। गाँव में कुछ अच्छा करेंगे। बस यही चाहत है।‘’

लोगों ने जब काका के लड़कों के साथ हुई वारदात का जिक्र किया तो तुरन्त उनसे मिलने उनके घर गया। इस दरमियान चाचा पहाड़सिंह स्वर्ग सिधार चुके थे और थोड़े दिनों पश्चात् काकी भी। एक मंझला भाई भी दुर्घटना का शिकार हो, स्वर्गवासी हो गया था। सभी सातों चचेरे भाइयों के परिवार अलग होकर रह रहे थे। सबके घर जाकर आत्मीयता से मिला और कहा- ''अब मैं वापस आ गया हूँ। समझो मंझला भाई मैं ही हूँ। अब हम फिर से सात भाई हो चुके हैं। मुझे अपना ही समझना। वैसे भी हम एक ही तो हैं।  हमारी नासमझी से हम खिंचे-खिंचे रहते थे। अब समरस होकर शेष जीवन बिताना है। प्रेम ही जगत और जीवन का सार है, जिसने इसको समझ लिया मानो सब ग्रंथों को समझ लिया। प्रेम ही रामायण है, प्रेम ही कुरान है। प्रेम ही बाइबिल है और प्रेम ही गुरुग्रंथ साहब है। अढ़ाई अक्षर का प्रेम ही अढ़ाई अक्षर के कष्ट को मिटाता है। बस, इस अढ़ाई अक्षर के शब्द को समझना जरूरी है।‘’

इन बीस वर्षों की कमाई उसके पास है। यहाँ भेजता तो किसे? यहाँ कौन था उसका? सेवानिवृत्ति के पश्चात् भविष्यनिधि और ग्रेच्यूटी की रकम और मिल गई। भविष्य के लिए पेंशन तो है ही। भाइयों से कितना ही मेलजोल बढ़ाया जाए, अपना घर तो अपना ही होता है। सोचकर एक बिन माँ-बाप की निर्धन बड़ी उम्र की लड़की से शादी कर घर पुन: बसा लिया, ताकि जीने का कोई बहाना तो हो। बिन बहाने जीना भी एक सज़ा लगता है। शादी के तीन-चार वर्षों तक भी हीरासिंह के कोई बाल-बच्चा नहीं हुआ और न ही होता हुआ दीखा तो पति-पत्नी ने कुछ अच्छे निर्णय लिए- जो चचेरा भाई चल बसा था, उसकी कन्या को विधिवत् गोद ले लिया। जिसे अच्छी पढ़ाई-लिखाई करवाकर योग्य बनाकर शादी भी वक्त पर कर सके। एक भाई जो अत्यन्त निर्धन था तथा तीन बेटे थे। उनमें से एक लड़के को भी गोद ले लिया ताकि उसके भविष्य को सँंवारा जा सके। जिस भाई की एक आँख फूट गई थी, एक का हाथ कट गया था तथा एक की टाँग कट गई थी उन सब प्रत्येक को अपनी जमीन में से दस-दस बीघा जमीन दे दी, ताकि वे आराम से खेती कर अपनी आजीविका कुशलता से चला सकें।

जब यह ख़बर पूरे गाँव में फैली तो सबने उसके निर्णय को सराहा। यही तो प्रशंसा की बात है। फूल चाहे कहीं भी हो, खिलेगा तो महक से अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा ही। चन्दन के पेड़ को ढूँढऩा नहीं पड़ता। वह अपना पता-ठिकाना खुद बताता है। अच्छे विचारों का इंसान चाहे घर-परिवार में हो या गाँव में। प्रदेश में हो या देश में, पहचान ही लिया जाता है। पूर्वजों ने ठीक ही कहा है कि जो वस्तु जिसके पास है और वह घर, परिवार और समाज के काम नहीं आए या उसका उपयोग वह स्वयं भी नहीं करता है तो वह केवल भारवाहक या टट्टू ही कहलाएगा। जिसे वह अकारण ढोता फिर रहा होता है। जीवन के ये व्यवहारिक पक्ष हैं। जिसकी उपेक्षा करके एक इंसान सफल जीवन नहीं जी सकता। इसीलिए हीरासिंह व्यवहारिक पक्ष को ही आगे बढ़ा रहा है।

 जीवन सुगम, सहज एवं सरल ढंग से चल रहा है। हीरासिंह केवल अपने परिवार को ही नहीं, बल्कि वृहत् परिवार को साथ लेकर चल रहा है। अपने खेत में नलकूप (बोरवेल) खुदवाया और उसमें मीठा पानी निकला तो अपने खेत को पूर्ण सिंचित किया ही अपने चाचा के बेटों के खेतों को पानी देकर उनको भी अपने स्तर पर ला खड़ा किया। भाई वह नहीं होता जो केवल रक्त का सम्बन्ध बताकर रिश्ते की दुहाई देता है, अपितु भाई वह होता है जो अपने भाई के भूखा होने पर या तो खुद भी खा नहीं पाता या एक रोटी हो तो पहले आधी अपने भाई को खिलाकर फिर स्वयं खाता है। अर्जन-उपार्जन में अपने समकक्ष ला खड़ा करता है। फिर उसके आगे तो उनको उनकी चेष्टा, मेहनत और काबिलियत ही बढ़ा पाती है। मां-बाप और काबिल भाई उसके आगे और कुछ कर नहीं पाते। इंसान को आगे का रास्ता तो उसे स्वयं चलकर ही पार करना पड़ता है। कोई अन्य उसकी उँगली पकड़कर जीवन का मार्ग पार नहीं करवा सकता, वह तो केवल बता सकता है।

हीरासिंह की नई औरत का नाम शारदा है। एक दिन खेत में गेहूँ की फसल को पानी दे रहे थे। खेत में पानी कल-कल, छल-छल करता हुआ जीवन राग सुना रहा था। पेड़ों पर पक्षी कलरव कर अपने सुरीले गीत गा कानों में रस घोल रहे थे। पास में सरसों की क्यारियाँ में उनके पीले फूल धरा को शृंगारित कर रहे थे। दूर कहीं खेतों में मेहनतकश औरतें लोकगीतों की राग अलापकर वातावरण को और अधिक जीवन्त बना रही थीं। एक खेत छोड़कर दूसरे खेतों से गुजरते हुए गाँव की ओर जा रहे मार्ग में पशुओं को ले जा रहे चरवाहे अलगोजों की तान छेड़कर पूरे माहौलको ही संगीतमय बना दे रहे थे। यह धरती माता अपना पसीना पीकर बदले में सुगन्ध बिखेरती है और पसीने से लाखों गुना अधिक धन-धान्य हमें लौटाती है। इंसान जो इस धरा का पुत्र है, उसे इससे अधिक और चाहिए ही क्या ?

ऐसे प्रकृति के अतुलनीय संगीतमय वातावरण को हीरासिंह के इन शब्दों ने भंग किया- ''सुनो शारदा।‘’

''हाँ, कहोजी।‘’

''बहुत समय से कुछ बातें जो मन में दबी पड़ी है। अब ज्वालामुखी बनकर फटी जा रही है। उन्हें तुम्हें बताना चाहता हूँ। तुम्हें नहीं तो और किसे बताऊँ, पर एक शर्त है कि उस बात और रहस्य को तुझ तक ही रखना होगा।‘’

''यदि आप मुझे अपनी समझते हो तो अवश्य बताएँ। मैं वादा करती हूँ कि ये कही हुई बातें मेरे साथ ही इस दुनिया से विदा होगी। समझना कि आपने ये बातें कुएँ में ही डाल दी है।‘’

''नहीं शारदा, कुएँ से भी बातें वक्त के साथ बाहर आ सकती है। तुम्हें इन बातों को खूब चबा-चबा कर निगलना होगा और अपने ही पेट में पचाना होगा। वचन देती हो तो बात करो।‘’

''वचन है पतिदेव, वचन। आप कहें तो सही।‘’

''शारदा, मैं दु:खी मन से यह मन की बात तुम्हें बता रहा हूँ। बताते हुए मेरा कलेजा फटा जा रहा है। जबान मेरा साथ नहीं दे रही है। मेरी मनोदशा आकुल-व्याकुल है, पर सत्य तो ठहरा सत्य। उसे कौन नकार सकता है ? बात यह है कि मेरे चचेरे भाई की आँख फोडऩे वाला और एक का हाथ तथा दूसरे की टाँग काटने वाला मैं ही वह अपराधी हूँ।‘’

''क्या कहते हो मेरे धणी (पति)? मेरे कान इस बात पर विश्वास नहीं कर रहे हैं। क्या, जो पारस खुद लोहे को सोना बनाता है, खुद लोहा बन सकता है? मैं भरोसा नहीं कर पा रही मेरे साजन।‘’

''भरोसा करना पड़ेगा शारदा भरोसा, क्योंकि सत्य यही है। वह अपराध करने वाला मैं ही हूँ। जिसे चश्मदीद गवाह की जरूरत नहीं पड़ती।‘’

''पर क्यों? मेरे घर धणी (घर मालिक) क्यों? आप तो इनको इतना चाहते हो?’’

''शारदा, बात यह है कि मैं तो उनको आज भी चाहता हूँ और तब भी चाहता था, मगर वे मुझे नहीं चाहते थे न, ताली तो दोनों हाथों से बजती है न। मूल में बात यही थी। जैसा कि तुम जानती ही हो कि मेरी माँ मेरे बचपन में ही गुजर गई थी। पिता ही मेरी माँ थे और वही मेरे बाप। दोनों वक्त की रोटी वे ही बनाते थे। जब मैं नौ-दस बरस का हो गया तब मैं भी उनको दाल, रोटी, कढ़ी, खीचड़ा बनाने में मदद करने लगा। हमें दो वक्त की रोटी ढंग सर मिला करे, इसीलिए पिताजी ने मेरा ब्याव जल्दी कर दिया था। मैं और प्यारी बड़े ही प्यार से रहते थे, जैसे अभी मैं और तुम रहते हैं। मुझे लगा मेरे घर-परिवार में अब सुख आ गया है। टेमो-टेम दूध, चाय, छाछ, राबड़ी, दही, साग, रोटी मिलने लगे। तभी हमें किसी की नजऱ लगी शारदा, किसी की नजऱ। बस, एक ही दिन में मेरे सारे सुखों की बलि चढ़ गई। बलि किसी और ने नहीं चढ़ाई थी। वे कोई पराए नहीं थे, बल्कि वे अपने ही थे।‘’ कहते-कहते हीरासिंह अपनी पलकें भीगो बैठा था।

''कौन थे वे अपने? बताओ तो सही।‘’ शारदा ने धीरे से अपनी जिज्ञासा प्रकट की।

''शारदा, वे हमसे जलते थे। हमसे घृणा करते थे। राग-द्वेष से ओतप्रोत। जिसका कारण एक मात्र यही था कि हम हमारी सुख की रोटी खा रहे थे। जिन्हें वे देख व सहन नहीं कर पा रहे थे। इसी ईष्र्या की आग में जलते हुए उन्होंने मेरे हिवड़े (हृदय) की राणी का छल से अपहरण कर राजस्थान से बाहर ले जाकर पंजाब में बेच दिया। ताकि द्वेष से जलते हुए उनके कलेजे में ठंडक पड़ सके। हमें वे दु:खी एवं पीडि़त ही देखना चाहते थे।‘’

''पर उनका नाम तो बताओ तथा साथ ही बेचने के सबूत भी।‘’

''शारदा, नाम तो तुम्हें मालूम ही है, उन्हें तुम रोज देखती हो। मैं तुम्हें उनके निशान बता देता हूँ। वे हमारे अपने हैं। अपने सगे हैं। अपना खून है। जिसकी एक आँख फूटी हुई है, जो काना है। एक का हाथ कटा हुआ है, जो टुंटा है। एक की टांग कटी हुई है, जो लँगड़ा है। जहाँ तक सबूत की बात है। वे मुझे बहुत बाद में मिले, तब तक वह बहुत दूर जा चुकी थी। हम भरोसा करके न्याय की गुहार लिए पुलिस के पीछे-पीछे घूमते रहे। पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। उलटे मुझसे ही अपमानित होने जैसे प्रश्न-प्रतिप्रश्न करती जा रही थी। यदि पुलिस एक्शन में आती तो प्यारी वहीं मिल जाती। उसे चाचाजी के खेत के झोंपड़े में तीन दिन तक छुपाए रखा था। उसके बाद बीकानेर ले जाकर दलालों के सुपुर्द कर दी गई।‘’

कहते-कहते हीरा का गला भर आया तथा वह अतीत में खो गया। शारदा भी उसके दु:ख में शरीक थी। उसने भी अपनी आंखों से झरती बूँदों को अपनी ओढऩी के पल्लू से पोंछा। फिर साहस बटोरकर धीरे से पूछा- ''जी, आपके साथ जो हुआ वह निन्दनीय था, परन्तु आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था। वे पशु हैं, पर आपको मानवता का पल्लू नहीं छोडऩा था। कुत्ता हमें काटता है, पर हम वापस कुत्ते को थोड़े ही काटते हैं। आखिर वे आपके भाई थे। चचेरे ही सही। भाई तो आखिर अपने भाई ही होते हैं।‘’

''मेरी घर धिराणी (मालकिन), सिद्धान्त रूप से तेरी बातें बहुत अच्छी है। कहने-सुनने में शानदार लगती है। मुझे यह भी पता था कि कानून हाथ में लेना ठीक नहीं, परन्तु मेरे मन ने मुझे मजबूर कर दिया। मेरी जीवन संगिनी को मुझसे छीन लिया गया। मुझे उसे ढूँढऩे के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी। उस दो कौड़ी के थानेदार के पाँव पकडऩे पड़े, जिसने मुझे जलील करने में कोई कसर शेष नहीं रखी। उसकी तलाश में गाँव-गाँव, ढ़ाणी-ढ़ाणी तथा शहर-शहर में खाक छानते वक्त जब भी लाल-कसूम्बल ओढऩी ओढ़े दूर से कोई स्त्री दिखाई देती तो मुझे धोखे से लगता कि वह मेरी प्यारी ही होगी। मैं उत्सुकतावश उसके पास जाकर देखता तो निराशा ही हाथ लगती। जब हवा से भी अपने घर का दरवाजा बजता तो मुझे लगता कि वह आ गई है। लोगों ने मुझसे व्यंग्य, तंज एवं उलाहना दे-दे कर कैसे-कैसे सवाल नहीं किए। एक तरफ  दु:खी-पीडि़त मैं दर-दर की खाक छानता फिर रहा था, घर में ईश्वर स्वरूप पिताजी को देखने वाला कोई नहीं। जबकि उन दिनों उनको सम्भालना बहुत जरूरी था। वे भी अकेले में आँसू बहाते रहे, मगर उनके आंसुओं को पोछने वाला कोई नहीं। आखिर सदमे ने उनके प्राण हर ही लिए। मैं बिन माँ का तो था ही, अब पिता का साया भी सर से उठ गया। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो इधर-उधर भटकता रहा। जिन्होंने ऐसा कुकृत्य मेरे साथ किया उनके प्रति नफरत मेरे सीने में भरने लगी। बदला लेने की भावना घर करने लगी। प्रतिशोध की आग में बदन जलने लगा। वह जलन इतनी होती थी कि मुझे रात-रात भर नींद नहीं आती थी। मैं खाट पर पड़े-पड़े करवटें बदलता रहता था, मगर नींद मेरी आँखों से कोसों दूर होती थी।

''मन को बार-बार समझाता, मगर मन मुझे समझा देता था। मैं करता भी तो क्या ? घर-परिवार में मुझे सम्भालने वाला कोई नहीं। मेरे साथ जो घटा वह अन्याय और अनर्थ नहीं तो और क्या था ? यह एक क्रूरता थी, जो एक निर्दोष के साथ की गई। कभी मन कहता था कि तुम मर्द हो, बदला लो। कभी कहता था कि कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं। मैं जवाब देता कि कानून ने मेरी क्या मदद की? फिर मन कहता कि प्रतिशोध लो। जैसे को तैसा मिलना ही चाहिए। मैं संवेदनाहीन हो गया। दिमाग गरम हो गया। मेरा सारा खून खौल उठा। घर को ताला लगाया। दो माह लापता रहा। छुपता-छुपाता रहा और एक दिन काली अमावस्या की रात में मैंने यह कृत्य कर दिया।‘’ सारा वृतान्त सुन शारदा रो पड़ी।

फिर हीरा ने ही उसे शान्त किया और बोला- ''बावळी, यह तो बीती बातें हैं। तुझे आज सत्य से अवगत कराया है। फिर बीकानेर जाकर मैं फौज में भर्ती हो गया। उसके आगे की कहानी तुझे मालूम ही है।‘’

''पर उसके बाद आप में इतना बदलाव! हृदय का परिवर्तन!’’

''हाँ शारदा, मनुष्य जिसमें सामान्यत: शान्त भाव ही अधिक भरा रहता है। घृणा, बदला, प्रतिशोध तथा क्रोध ये इंसान के अस्थाई भाव है। क्षणिक आवेग उसे पाप और अपराध की ओर धकेलते हैं, मगर पुन: वह अपने स्थाई भावों में लौट आता है। पाप तथा अपराध कर्म करने के बाद मुझे पश्चाताप के ताप ने उससे भी ज्यादा जलाया। फिर मुझे लगा कि काश; मैं उस दिन वह कृत्य नहीं करता, पर अब पछताए होत क्या, जब चिडिय़ा चुग गई खेत। उसी पश्चाताप व पछतावे के कारण मैंने एक बच्ची तथा एक बच्चे को गोद लिया, जिनकी तुम अनब्याही माता हो। तीनों अंग-भंग भाइयों को कुल तीस बीघा जमीन दी। नि:शुल्क पानी दे रहे हैं। उन्हें अपना समझकर अपना रहे हैं। बस, कोशिश यही रखनी है कि इस सच्चाई पर से पर्दा न उठने पाएँ अन्यथा सब सत्यानाश हो जाएगा। पता चलने पर वे मुझे अपराधी समझेंगे। फिर से अपने प्रति प्रतिशोध उत्पन्न होगा। प्रतिशोध कभी समाप्त नहीं होता। प्रतिशोध शुरू होना जानता है, समाप्त होना नहीं। शारदा, यह सच्चाई है। इतिहास इस बात का गवाह है।