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Tuesday 10 Dec 2019

विस्मय

अनुवादक- क्रांति

विस्मय

यह तो बीज में से फूटी है डाल

कि पत्ते-पत्ते में प्रकटा पाताल!

 

पूरा आकाश मेरी आँखों में जागता

लिए पंखी के सुर का सुवास

तिनके-तिनके में है पंखों का स्पर्श, यहाँ

ओस का है भीना उजियार।

एक-एक बूंद में है समंदर की मौज

या कि एक-एक पत्ते में प्रकटा पाताल !

 

झूमती कलियों में राधा की वेदना

और खिले फूलों में रहता है श्याम

शाखों से झाँकती धूप में देख ली

कहीं मैंने अपनी भावना ललाम।

पल-पल की पलकों में मुस्काए त्रिकाल

या कि एक-एक पत्ते में प्रकटा पाताल।

 

2 मेट्रिक के छात्रों को बिदाई

समुद्र की एक-एक लहर

किनारे की थोड़ी-थोड़ी रेत को

घसीटती जाती है 

धुली हुई रेत का हरेक कण

सूरज की किरणों में चमकता भी है

और

पाँव को जलाता भी है। तुम्हारा आना और जाना

ऋणानुबंध!

फिर भी

तुम्हारे जाने से

कोई पुराना जख्म रह-रहकर

रिसने लगता है

पर कौन जाने क्यों

चीख नहीं निकलती।

 

3 कोई तो कहो !

 

जब ग्रहों को खेल खिलाने का

मन हुआ तब मैंने 

एक प्लेनेटोरियम बना लिया ! 

स्कायस्क्रेपर की छत पर

बासी वसंत को

मौरने दिया !

भूतकाल को मैंने तस्वीर में मढ़ लिया है

और इस तस्वीर का प्रदर्शन कर

लाँघ ली हैं मैंने काल की सीमाएँ।

एक स्विच ऑन

.और तपती गर्मी में

उतर आती है अनुकूल शीतलता।

पतले तार में कैद हैं शब्द

और उन्हें मुक्त करने की चाबी

मैंने अपने हाथ में रखी है!

दवा की शीशी में

तंदरुस्ती भर

मैंने मौत से भी चाल चली है !

अपने बेचैन आकाश में मैंने

सूर्य-चंद्र को एक साथ प्रकटाया

पर

कोई तो बताए

मैं जम रहा हूँ

या कि भभक रहा हूँ

 

4 शेषशायी

चलो  

अब मैं सो जाता हूँ।

रोज़ अस्त होते

सूरज को तकिया बनाकर

चलो, अब मैं सो जाता हूँ।

बहुत चाही हुई हवा के 

 

नरम प्रवाह से मुझे अब कोई वास्ता नहीं।

मेरी साँसों में उसका

शिल्प छिपाकर

चलो. अब मैं सो जाता हूँ।

कभी उगे उस चंद्रमा से

इक_े किए मधु  को

सपनों की पलकों में आँजकर

चलो, अब मैं सो जाता हूँ।

कजलाते दियों के

मेरी खिड़की से झाँकते

उजाले को ओढ़कर

चलो, मैं सो जाता हूँ।

उस समुद्र से कह दो कि

वह अपना गर्जन बंद करे

उसके सारे के सारे खारेपन को उलीचकर

मैंने उसके तल में बिछा दिया है।

उसे कहो कि वह मुझे तंग ना करे ।

चलो, अब मैं सो जाता हूँ।

मेरे आसपास बसी दिशाएँ शायद

कुछ देर को बेचैन हो जाएँगी ।

5 उध्र्वगमन

ये मकान न हिले सूतभर

फिर भी 

देखते-देखते गलियाँ

कैसे हो गई संकरी !

 

समुद्र में पाँव  फैलाकर

यह धरा बढ़ती चली गई

और ऐश्वर्य पाने को

ऊँचे और ऊँचे और ऊँचे

मकानों की मंजि़लें

आदमी बनाता चला गया

और तब भी कहो क्यों रहा ईश्वर इतनी दूर!

 

ये मकान न हिले सूतभर

फिर भी

6 बुदबुदाहट

गर्व से रुँधे मौन की

मैंने कभी न की उपासना

घर गरीब होने के भ्रम में भी

गीत तो गाए हैं मैंने।

 

धरती में समाते समय

सीता की आँखों में यूँ ही

खाली झूलते झूले की डोरी जैसे

सगरपुत्रों की राख पखारने

वेगवती हो चली तो आई

पर

शंकर की जटाओं में अटकने पर

बलखाती भागीरथी की तरह

गीत तो गाए हैं मैंने।

 

गीत तो गाए हैं मैंने

पर

तुम्हारे समुद्र के खारे उदर में

मेरा कंठ खुले, तब भी

तुम्हारी सतह पर तो है बस बुदबुदाहट !

 

7 मुद्रा

रात की काली रेत में

मुझे सुनाई देती है

समुद्र की इंद्रधनु.मुद्रा।

 

अंधकार का दृढ़ आलिंगन

मुझे तुमसे दूर-दूर ले जाता है।

और मैं अपने ही साथ

एकदम अकेला हो जाता हूँ।

 

दूज के चाँद की नाव में सवार

मैं निकल पड़ता हूँ

किसी अनजानी दिशा की ओर।

 

केले के पत्ते सी मखमली हवा को चीरने

एक पेड़

सुख से अधीर हो उठा है।

 

सृष्टि का यह शयनकक्ष

ओस के दर्पण

निर्वसन पवन और पेड़

और रात

 

और समुद्र की इंद्रधनु.मुद्रा।

                        

8 देखेँ तो सही

 

प्रथम मेघ को देखकर

यक्ष को जो हुई थी अकुलाहट

आज

तुम्हारे सान्निध्य में मुझे क्यों हो रही है?

 

ओंठ में छटपटा  रहे हैं शब्द।

 

पेड़ के झरोखे में खड़े-खड़े

हवा

प्रतीक्षा कर रही है।

 

बादल घिर आए हैं

अब हम बिछड़ जाएँ तो अच्छा।

 

हिमगिरि से अलका की राह पर

देखेँ तो सही कि

हमारे पदचिन्ह हैं कि नहीं?

 

9 नदी

स्मृतियों और सपनों के बीच

एक नदी।

 

नदी में मछलियों के प्रतिबिंब उड़ रहे हैं

कीचड़ में धँसे सूरज में दरारें पड़ गई हैं

नदी किनारे पेड़ पर

पक्षी की परछाई घोंसला बना रही है

घोंसले को सेती है शिकारी की आँख।

 

नदी सर्दियों में जम जाती है

और गर्मियों में सूख जाती है

सदियों से जैसे बारिश नहीं हुई और

पानी में इंद्रधनुष नहीं खिले।

 

स्मृतियों और सपनों के बीच

एक नदी

 

10 आदत हो गई है

 

काले-काले दिनों की

मुझे तो आदत हो गई है।

 

समुद्र पर पड़े झाग की तरह

एक के बाद एक

ये आसानी से फूट नहीं जाते।

 

परंतु

कभी-कभार आते खुले दिनों की

यह पीतांबरी चमक

आषाढ़ की बौछार बन

आँख से झर जाती है

तब

मैं लिपट जाता हूँ

तुम्हारी याद के रेतीले खंबे से

 

और एकदम एकाकी

हो उठता हूँ ।

 

11 तुम्हारे चेहरे के

नक्शे को

अपने नख से चितर दूँ मैं?

 

तुम्हारी तितिक्षा के आभास को

अमावस के अंधेरे से

भयावह बना दूँ?

 

तुम्हारे स्वजनों के

मटियाले खेतों में उगी विषैली कोंपलों को

जड़ से उखाड़ दूँ?

 

तुम्हारे सभ्य समाज में

विचरते वन पशुओं को

दावानल बन जला दूँ,

भस्म कर दूँ?

 

12 खुला आकाश

अपनी तो बात नहीं

पानी का पर्दा

अपनी तो बात है

खुला आकाश।

 

कहने का उत्साह हो

सुनने का अवकाश

पल-पल का हो यूँ

साजन, अपना मिलाप!

 

अपनी तो बात जैसे

माटी की सोंधी सुगंध

और सुगंध भरी साँस

शब्दों के मोरपंख

हैं कैसे कोमल!

 

अपनी तो बात में

खिलते हैं मेघधनुष

और चमके है बिजली

है यह कैसा उजास

कि अंधकार से जा मिले

अचानक  अंत्यानुप्रास !

 

13 उधार का सुख

अब भी तो देर हुई इतनी कहाँ

मुझे उधार का सुख दे दो थोड़ा।

 

ऐसी तो दी हमें बबूल की शाख

कि फूल कभी खिले नहीं !

और फिर रिश्ते भी दिए ऐसे रेतीले

कि पानी कभी ठहरा नहीं!

 

मैं तो हिरण की प्यास लिए दौड़ूं

मुझे उधार का सुख दे दो थोड़ा।

 

कुहुक दी है और दिए हैं पंख भी

और सामने है ये पत्थर की दीवार

उड़ते धूलभरे बादल और आसपास

शिकारी ने फैलाया जाल।

आँख बंदकर मैंने रतजगा ओढ़ा

मुझे उधार का सुख दे दो थोड़ा।

         

14 एक थी सार्वकालिक कथा

माना कि एक शाम हम-तुम मिले

और हिल-मिल गए

पर पूरे इस जीवन का क्या?

आँख तो है ये खुली और किताब है कोरी

उसे क्योंकर मैं पड़ूँ बार-बार?

मानो कि होंठ कुछ मुस्काए और

मन में मेघधनुष खिल भी गए

पर जलती इस रेखा का क्या?

आसमान कहीं थोड़ा सा झुका और

फूलों से कैसे हो पूछ भी लिया

पर मूक इस वेदना का क्या?

माना कि राज! हमने खाया-पिया

और थोड़ा-सा राज भी किया

पर प्यासी इस अभिलाषा का क्या?

माना कि रानी! तुम जीत भी गई

और माना कि हवा यह बीत भी गई

पर जो छेड़ी उस कहानी का क्या?

15 मनचाही शाम एक दे दो !

 

अनचाहा जीवन ये ले लो रे नाथ !

और मुझे मनचाही शाम एक दे दो

कि कब से मृगजल में तरसे है नाव।

 

झरे हुए पत्ते को हाथ में लिए

मैंने आँखों में रोपा एक झाड़

पंछी का लाड़ कभी देखा नहीं

और नभ में झरोखा कभी सुना नहीं

जमे हुए पानी में सोई इस मछली को

अर्जुन का मत्स्यवेध दे दो।

 

मुझे दे दो एक शाम, मुझे दे दो एक रात

मुझे दे दो एक ऐसा आश्लेष

कि बिखर-बिखर जाएँ, सात-सात जन्मों से

कसकर बाँधे ये केश !

मुझे मुझसे पूरा अलगकर नाथ

आजीवन कैद एक दे दो।

 

11111

 

जगदीश जोशी (1932) गुजराती की अग्रिम पंक्ति के कवि, एक हती सर्वकालीन वार्ता तथा मने मनगमती सांज एक आपो, गुजराती की सर्वाधिक लोकप्रिय कविताओं में सम्मिलित काव्यसंग्रह आकाश, वमळना वन पर 1979 में मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार, मराठी कवि ग्रेस की कविताओं के गुजराती