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Thursday 14 Nov 2019

हिंदी दलित कहानियों में आर्थिक चेतना

भारत में दलितों के शोषण में साहूकारी और जमींदारी प्रथाओं का बढ़-चढ़कर सहभाग दिखाई देता है। यह प्रथा खासकर गाँव-देहात में प्रचलित रही है। आँखों में आँसुओं के साथ-साथ भूखी-प्यासी यथार्थ दुनिया के ये लोग जन्म से लेकर मृत्यु तक अभावों में जीने-मरने के लिए अभिशप्त दिखाई देते है। इस यथार्थ दुनिया से ब्राह्मणवाद का कोई संबंध है भी तो वह सिर्फ मालिक और गुलाम का है। यह संबंध सिर्फ  यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि शोषक और शोषित की श्रेणी को भी दर्शाता है। इन दलितों के दु:खों और तकलीफों की कोई सीमा नहीं है, क्योंकि ये तमाम दु:ख और तकलीफें वर्ण-व्यवस्था के आचार-संहिता की देन है। दलितों के विकास के सारे रास्ते वर्ण-व्यवस्था की इस आचार-संहिता ने बंद कर दिए है। वर्ण-व्यवस्था में जो प्रतिष्ठित और तथाकथित सवर्ण जाति का व्यक्ति है वही इस प्रथा का संचालक और नियंत्रक दिखाई देता है। क्योंकि वर्ण-व्यवस्था ने दलितों से आर्थिक अधिकार छीनकर उन्हें निर्धन बनाए रखा है। इसलिए वर्ण-व्यवस्था में जो अछूत की श्रेणी में रखा गया है वह इस प्रथा का शिकार रहा है। साहूकारी और जमींदारी प्रथा में दलितों का केवल शारीरिक शोषण ही नहीं किया जाता है, बल्कि उनके मानसिक उत्पीडऩ को भी बढ़ावा दिया जाता है। दलित संसाधनों के अभाव में जिंदा रहने के लिए, अपना और अपने घर-परिवार का उदरनिर्वाह करने के लिए गाँव के साहूकारों व जमींदारों द्वारा कर्ज ले लेता है। लेकिन यह लिया गया कर्ज मजबूरी में समय पर न देने के कारण शोषण का शिकार बनता नजर आता है। इस में बूढ़ों-बच्चों के साथ-साथ घर की स्त्रियों का भी जम कर उत्पीडऩ किया जाता है। इस उत्पीडऩ के खिलाफ आवाज उठाने वालों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है।

साहूकारी और जमींदारी प्रथा ने समाज में जिस गंभीर समस्या को जन्म दिया है वह आर्थिक और शारीरिक शोषण है। इस समस्या की जड़ में कौन हैं? साहूकारी और जमींदारी प्रथा के कारण समाज के किस वर्ग का शोषण होता आ रहा है? वर्ण-व्यवस्था ने जिस वर्ग को संपत्ति संचय का अधिकार दिया है, वह वर्ग निर्धन तथा अधिकार-विहीन वर्ग का आर्थिक शोषण करना अपना अधिकार समझता आ रहा है। इस आर्थिक शोषण के अधिकार का समर्थन ब्राह्मणवादी सिद्धांत ने खुलकर किया है। इस ब्राह्मणवादी सिद्धांत को संरक्षण देना सामंतवाद ने अपनी जिम्मेदारी समझ रखा है। ब्राह्मणवाद और सामंतवाद इन दोनों के खिलाफ  दलितों ने विद्रोह करना शुरू किया है। दलितों के इस विद्रोह के संकेत दलित कहानियों में दिखाई देते हैं।

 दलितों के दु:खों का कारण आर्थिक उत्पीडऩ है। इस उत्पीडऩ से मुक्ति हासिल करने के लिए दलितों को सामाजिक व आर्थिक स्तर पर मजबूत करने की आवश्यकता है। साथ ही दलितों के दु:खों का सवाल सुलझाने के लिए क्या करना आवश्यक है? इसका तर्कसंगत विश्लेषण बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के शब्दों में- ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अस्पृश्यों की दयनीय स्थिति से दुखी हो यह चिल्लाकर अपना जी हल्का करते फिरते हैं कि 'हमें अस्पृश्यों के लिए कुछ करना चाहिए।' लेकिन इस समस्या को जो लोग हल करना चाहते हैं, उनमें से शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह कहता हो कि 'हमें स्पृश्य हिंदुओं को बदलने के लिए भी कुछ करना चाहिए।' यह धारणा बनी हुई है कि अगर किसी का सुधार होना है तो वह अस्पृश्यों का ही होना है। अगर कुछ किया जाना है तो वह अस्पृश्यों के प्रति किया जाना है और अगर अस्पृश्यों को सुधार दिया जाए, तब अस्पृश्यता की भावना मिट जाएगी। सवर्णों के बारे में कुछ भी नहीं किया जाना है। उनकी भावनाएँ, आचार-विचार और आदर्श उच्च हैं। वे पूर्ण हैं, उनमें कहीं भी कोई खोट नहीं है। क्या यह धारणा उचित है? यह धारणा उचित हो या अनुचित, लेकिन हिंदू इसमें कोई परिवर्तन नहीं चाहते? उन्हें इस धारणा का सब से बड़ा लाभ यह है कि वे इस बात से आश्वस्त हैं कि वे अस्पृश्यों की समस्या के लिए बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं हैं। बाबा साहेब हिंदुओं की अछूतोद्धार की दिखावटी सहानुभूति को तथा उनके सामाजिक विवेक के अभाव को बेनकाब करते हुए उनकी अमानवीय व असंवेदनशील सोच पर सवाल उठाते हैं। साथ ही ब्राह्मणों व तथाकथित सवर्णों को यह बात बेबाकी से समझाते है कि दलितों को अब और सहानुभूति की आवश्यकता नहीं हैं बल्कि उन्हें उनके अधिकार चाहिए।

 हिंदी दलित कहानियों की सब से बड़ी सामाजिक प्रतिबद्धता और सरोकार दलितों के सामाजिक व आर्थिक अधिकार दिलाने के पक्ष में सक्षमता से खड़ा होना है। रमणिका गुप्ता के शब्दों में- दलित कहानियाँ सामाजिक बदलाव लाने का आह्वान करती हैं। इन कहानियों में आक्रोश है, आग है, लावा है, गुस्सा है तो साथ-साथ संवेदना, मानवीयता और सब्र भी है। न्याय की उत्कट लालसा है तो समानता की तीव्र ललक भी है। भाईचारे की भावना है तो उसके साथ आदर पाने की इच्छा भी बलवती है। भले ही इक्का-दुक्का कहानियों में बदले की भावना होती है। सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष मनुष्य की आशा-आकांक्षाओं को दलित कहानियों में देखा जा सकता है। शोषण से समाज को परिचित कराना तथा उन्हें उनकी गुलामी का अहसास दिलाना दलित कहानियों का मुख्य उद्देश्य व दृढ़ संकल्प है। इसे पूरा करने के लिए हिंदी दलित कहानी प्रतिबद्ध दिखाई देती है।

साहूकारी और जमींदारी प्रथा से पीडि़त दलित-शोषित समाज को लेकर डॉ. धर्मवीर की 'शोषण की अमर बेल' नामक एक कविता है। यह कविता साहूकारों और जमींदारों ने दलितों की जो दुर्दशा की है, उसे स्पष्ट करने में सक्षम दिखाई देती है-शोषण की अमर बेल,/दमन की महागाथा,/यातना के पिरामिड/उत्पीडऩ की गंगोत्री/ऋणों के पहाड़/ब्याज के सागर,/निरक्षरों के मस्तिष्क,/महाजनों की बही/ रुक्कों पर अंगूठों की छाप/ऊटपटांग/जोड़ घटा, गुणा भाग, देना/सब एक। डॉ. धर्मवीर के अनुसार हजारों सालों से इस देश के मेहनतकश दलित सामाजिक गैर-बराबरी तथा आर्थिक अभाव के कारण साहूकारों और जमींदारों की दहशत में जीने के लिए व उनके जुल्मों को सहने के लिए अभिशप्त रहे हंै। हिंदी की दलित कहानियों द्वारा साहूकारी व जमींदारी प्रथाओं के सच को बेनकाब करने की कोशिशें इस प्रकार की है- ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'पच्चीस चौका डेढ़ सौ' कहानी में गाँव के परिवेश में साहूकारों के चरित्र को  चित्रित किया है। साहूकारों द्वारा गाँव-देहात में निरक्षर व निर्धन दलितों की मजबूरियों का खूब फायदा उठाया जाता है। गाँव-देहात के परिवेश में घर तथा खेतों में दलितों का आर्थिक व सामाजिक शोषण कैसे होते आ रहा है? इस सच को कहानी में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रभावी ढंग से पेश किया है। सुदीप एक दलित मजदूर का इकलौता बेटा है। दिन और रात, सुख और दु:ख उस के जिंदगी के सफर में उस के लिए कोई भी अहमियत नहीं रखते थे। सुदीप ने असंख्य कंटीले झाड़-झखोड़ों के बीच से राह बनायी थी। तमाम सामाजिक दबावों, भेदभावों और अभावों ने कदम-कदम पर उसे छला था। इस के बावजूद पढऩे-लिखने में सुदीप तेज था। गणित में उसकी कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी थी। दलित बस्ती में पढ़ाई-लिखाई के प्रति किसी का ध्यान नहीं था जबकि सुदीप को उस के बाप ने स्कूल में भर्ती कराया था। पिताजी ने फूल सिंह मास्टर जी को देखते ही दयनीय स्वर में हाथ जोड़कर और गिड़गिड़ाकर विनती की थी। स्कूल में मास्टर शिवनारायण मिश्रा ने सुदीप को पच्चीस का पहाड़ा याद करने के लिए कहा है। स्कूल से घर लौटते ही सुदीप ने पच्चीस का पहाड़ा याद करना शुरू किया। पच्चीस का पहाड़ा सुदीप के पिताजी के जिंदगी का अहम् पड़ाव था। सुदीप के पिताजी के लिए 'काला अच्छर भैंस बराबर है।' अपने बेटे द्वारा की गई गिनती को गलत साबित करते हैं और 'पच्चीस चौका सौ नहीं...पच्चीस चौका डेढ़ सौ...' पूरे आत्मविश्वास के साथ उसे बताते हंै। जब बेटा उन्हें किताब दिखाता है तब वे कहते हैं, तेरी किताब में गलत भी तो हो सके...नहीं तो क्या चौधरी झूठ बोल्लेंगे?' सुदीप के पिताजी के नजरों में शिक्षक से बड़ा गाँव का चौधरी है। क्योंकि दस साल पहले सुदीप की माँ बीमार पड़ गयी थी। उसकी दवाओं के लिए गाँव के चौधरी ने सौ रुपये दिये थे। इन सौ रुपये पर हर महीने पच्चीस रुपये ब्याज लिया था। चौधरी जी सुदीप के पिताजी ने कहा- मैन्ने तेरे बूरे बखत में मदद करी तो ईब तू ईमानदारी ते सारा पैसा चुका देना। सौ रुपये पर हर महीने पच्चीस रुपये ब्याज के बनते हैं। चार महीने हो गए हैं। ब्याज-ब्याज के हो गए है पच्चीस चौका डेढ़ सौ। तू अपणा आदमी है तेरे से ज्यादा क्या लेणा। डेढ़ सौ में से बीस रुपये कम कर दे। बीस रुपये तुझे छोड़ दिये। बचे एक सो तीस। चार महिने का ब्याज एक सौ तीस अभी दे दें। बाकी रहा मूल जिब होगा दे देणा, महिने-के-महीने ब्याज देते रहणा।...सुदीप के पिता जी कहते है, ईब बता बेट्टे पच्चीस चौका डेढ़ सौ होते हैं या नहीं। चौधरी भले और इज्जतदार आदमी हैं, जो उन्होंने बीस रुपये छोड़ दिये। नहीं तो भला इस जमाने में कोई छोड्डे है? अपणे शिवनारायण मास्टर के बाप बड़े मिसिर जी कू ही देख लो। एक धेला भी ना छोड्डे। ऊपर ते बिगार अलग ते करावे है। जैसे बिगार उनका हक है। दिन भर में गोड्डे टूट जाँ। मजूरी के नाम पे खाल्ली हाथ। ऊपर ते गाली अलग। गाली तो ऐसे दे है जैसे बेद मन्तर पढ़ रहे हों।

पिताजी की बात मान कर स्कूल में सुदीप ने जैसे ही पच्चीस चौका डेढ़ सौ कहा वैसे ही मास्टर शिवनारायण ने एक थप्पड़ मारा और गालियों की बौछार शुरू की। अब सुदीप, अपने पिताजी और स्कूल के शिक्षक शिवनारायण मिश्रा इन दोनों के द्वारा बताये गए पच्चीस के पहाड़े के बीच उलझ जाता है। यही उलझन उसके पिताजी को चौधरी द्वारा विश्वास में छलने और ठगने की गुत्थी सुलझाने में मदद करती है। सुदीप अपने पिताजी को यह बात समझाने में कामयाब हो जाता है। तीस-पैंतीस सालों से चौधरी के गुणगान करने वाले, उस पर विश्वास करने वाले पिताजी के- अंतस में एक टीस उठी, जैसे कह रहे हों, 'कीड़े पड़ेंगे चौधरी...कोई पानी देने वाला भी नहीं बचेगा। गाँव के साहूकार ने निरक्षर व निर्धन दलितों को मूर्ख बनाया है। इनके पास दलितों को लुटने की एक कला है, जो कर्ज देकर दुगुना ब्याज और मुफ्त में बेगार लेते है। ऊपर से उन्हीं पर अलग से एहसान जताते है।

मोहनदास नैमिशराय की 'रीत' कहानी में किसनपुरा गाँव में मेहतर जाति पर जमींदार द्वारा किए गए अन्याय के प्रतिशोध को अभिव्यक्त किया है। बुलाकी से फूलो की शादी होती है। शादी की पहली रात जमींदार का बुलावा है- हमारे साथ चल। दूसरा पुरुष उसे घसीट ले जाने की नीयत से आगे बढ़ा था। जैसे वह इंसान न होकर कोई जानवर हो। उसकी हाँ या ना से उन्हें कोई सरोकार न था। जमींदार का सारे गाँव पर दबदबा जो था। उसे धीरे-धीरे सब कुछ समझ में आने लगा था। उसने कई बार सुना भी था। गाँव में जमींदार की हवेली में पहली रात को...। वह अकेली, मजबूर, पूर्ण रूप से विवश, कर भी क्या सकती थी। घर में कोई भी उसके पास न था। शायद जान-बूझकर ऐसा किया गया हो। उसे अलग रखा हो। पर बुलाकी...उस का घरवाला, जिस के साथ उस ने सात फेरे लिए थे, क्या वह भी...? इस के आगे वह कुछ भी न सोच सकी थी। बाहर खड़ी हुई दो और छायाएँ अंदर आ गई थीं। बस्ती में सभी गंूगे-बहरे बन गए थे। जमींदार की दबंगता के आगे दलित स्त्री को विवश होना पड़ता है और विरोध करने का मतलब मौत को गले लगाने जैसा ही होता है। फूलो की सास कहती हैं- मेरी ओर देखो, मुझे भी ब्याह की पहली रात में जमींदार के साथ हवेली में जाना पड़ा था।...दादा के बाप, बाप से बेटा और बेटे से पोते तक, न जाने कब से चली आ रही है बलात्कार की परंपरा। जैसे किसी ने जमीन के पट्टे के समान वह सब भी लिखकर दे दिया हो कि इस जमीन पर जब तक तुम्हारा वंश जीवित है तब तक दलित जाति के लोगों पर जुल्म और अत्याचार करते रहो, उनकी बहन-बेटियों के साथ रंगरेलियाँ मनाते रहो। लेकिन जब बुलाकी गाँव वापस आता है तब सब से पहले अपने हिस्से में आयी अपमानजनक जिंदगी से उबरने की कोशिश में गाँव के जमींदार की हवेली को आग के हवाले कर देता है। वह अपनी पत्नी फूलो से कहता है फूलो, अब कोई जमींदार गाँव की किसी औरत की इज्जत खराब नहीं करेगा। मैंने उनका वंश सदा-सदा के लिए खत्म कर दिया है। गाँव की सदियों से चली आ रही परंपराओं के खिलाफ आवाज उठाकर जमींदार और उनके शोषण को हमेशा के लिए खत्म करने की चेतना इस कहानी का प्रमुख विषय है। लेकिन इस चेतना का समर्थन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अन्याय को खत्म करने के लिए कानून को हाथ में लेना उचित नहीं है।

राम निहोर विमल की 'थावरे की सोच' कहानी में साहूकारों और जमींदारों द्वारा दलित आदिवासी समाज का कैसे और क्यों शोषण किया जाता है? इस सवाल को उठाया है। थावरा...यानि सांवरलाल भील गुजरात के सांप्रदायिक दंगों में भील आदिवासियों द्वारा मुसलमान साहूकारों के यहाँ लूट-पाट करने की घटना का समर्थन क्यों करता है? क्योंकि भीलों ने अपने आक्रमणों में आम मुसलमानों को नुकसान नहीं पहुँचाया था। उन साहूकारों, सूदखोरों और आदिवासियों का निर्मम शोषण करने वालों को लूटा था। आदिवासी समाज हिंदू व मुस्लिम इन दोनों संप्रदाय के शोषक लुटेरे साहूकारों-महाजनों से समान रूप से घृणा करता है। थावरा अपने साथियों और ढाणी के लोगों से कहता है-जब कोई मुफ्त में या कम कीमत में, हमारी चीजें हम से छीन लेता है, तो वह हमें लूटता है।...जब हमारी गिरवी रखी हुई किसी अमानत को, कोई गायब कर देता है, तो वह हमें लूटता है...जब लिए गए कर्जों पर, हम से कोई नियम से अधिक ब्याज लेता है और अदा की गई रकम के बावजूद हमारे कर्ज को समाप्त नहीं करता है तो वह हमें लूटता है, नियम के मुताबिक लिए गए कर्जो पर एक सौ रुपये का एक साल में बिना किसी अमानत या गिरवी के बारह रुपये और अमानत या गिरवी के साथ नौ रुपये ब्याज होते हैं। अर्थात सौ रुपये के एक महिने का ब्याज एक रुपया अथवा बारह आने ही कानून के मुताबिक बनते है, किंतु उस एक रुपये या बारह आने की जगह पर हम से पाँच से लेकर दस रुपये महीने तक ब्याज वसूलते हैं और गिरवी में रखे हमारे गहने भी गायब कर देते है...। यह लूट नहीं, तो क्या है? हमारी बहन-बेटियों को 'काली संगमरमरÓ कहकर बुरी नीयत से देखते हैं और मौका देखते ही उनकी इज्जत लूट लेते हैं।...और...हम भील आदिवासियों के साथ इस तरह की लूट...हिंदू और मुसलमान दोनों ही धर्मों के लुटेरे सूदखोर, महाजन, साहूकार...करते है। इसलिए हम भील आदिवासियों को भी चाहिए कि हम दोनों धर्मों के ही सूदखोरों, महाजनों और लुटेरों को लूटें और जरूर लूटें...क्योंकि लुटेरों को लूटने में कोई बुराई नहीं हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक अलग-अलग दिनों और मौकों पर अपनी संपत्ति और बहू-बेटियों की लूट का बदला लेने की भावना दलितों में पनपती हैं। यह लूट केवल दंगों के समय में ही नहीं बल्कि बिना दंगों के भी जारी रखने की सलाह थावारा अपने साथियों को देता है क्योंकि लुटेरों को लूटने में उसे कोई भी गलत नहीं लगता है।

राम निहोर विमल की 'एक-एक पर' कहानी में साहूकारों व जमींदारों द्वारा दलित समाज के हो रहे शोषण को और उसके खिलाफ  दलितों की ओर से किए जा रहे विरोध व विद्रोह को चित्रित किया है। सोनारी गाँव के आम जनों से लेकर चमारों, दुसाधों, कोलों और बियारों आदि दलितों, गरीबों-मजदूरों को जमींदार, जमींदार का परिवार और पहलवान वक्त-बेवक्त डरा-धमका कर परेशान करते हैं। इस जमींदार के अन्याय-अत्याचार के खिलाफ बाबा गयादीन और उनके आश्रम से हमले किए जाते हंै। जमींदार पर किए गए यह हमले हिंसक होते हंै। जमींदार के लड़के को लापता कर देते हंै। जमींदार के एक पहलवान को मार के पेड़ पर टांग देते है। दूसरे पहलवान को मार के उसकी लाश को एक सूखे कुँए में फेंक देते है। पुलिस प्रशासन व्यवस्था भले ही जमींदार की सेवा और सुरक्षा में क्यों न हो लेकिन दलितों का यह विद्रोह निरंतर जारी रहता है। भरत राम, कॉलेज में पढऩे जाने के बाद तमाम नई बातों एवं नये शब्दों की चर्चा करने लगा है। लोगों को इनके अर्थ भी समझाता है। शोषण, माक्र्स, गुलामी, आंबेडकर, दुनिया के मजदूरों एक हो, शिक्षित हो, संगठित हो आदि के बारे में भी लोगों को समझाते रहता है।

इस कहानी में जमींदारों के खिलाफ लडऩे का नया मंत्र क्या है- यह सीधी कार्यवाही का मंत्र है। इसके लिए किसी गोला बारूद की जरूरत नहीं। मजबूत या शक्तिशाली होने के किसी प्रमाण पत्र की भी जरूरत नहीं। हाँ एक-एक करके आठ लोग एक साथ जरूर होने चाहिए। जब एक-एक करके आठ लोग एक साथ हो जाएँ तो समाज के किसी भी ताप और श्राप अर्थात शोषक, अत्याचारी, बलात्कारी को एक ही बार में मिटाकर समाज को उसके ताप और श्राप अर्थात शोषण, अत्याचार, बलात्कार से मुक्त कर सकते हैं। साधनहीन गरीबों-मजूरों-शूद्रों-अछूतों जिनके पास कोई साधन नहीं की मुक्ति का यह एक निश्चित एवं सिद्ध किया हुआ रास्ता है। जब एक-एक कर अत्याचारी मरेंगे, तो शेष अत्याचारी भी डरेंगे। जब अत्याचारी डरेंगे तो अत्याचार अपने आप ही कम हो जाएगा और धीरे-धीरे समाप्त भी हो जाएगा।

जमींदारों के शोषण से मुक्ति पाने का यह रास्ता दलितों को अपनाने के लिए मजबूर किया है। लेकिन इसका समर्थन करना उचित नहीं है। दलित चिंतन की एक परंपरा रही है। वह परंपरा प्रतिरोध की रही है न कि प्रतिक्रिया की। इसी परंपरा का निर्वाह शोषण और उत्पीडऩ के खिलाफ प्रतिरोध, विरोध और विद्रोह का जो तेवर है, वह इस कहानी में दलित बच्चे के जुबान पर दिखाई देता है। साथ ही जाति और वर्ग संघर्ष को एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढऩे का संदेश भी दिया है। गाँव में जमींदार की दहशत, मार-पीट और लूट के व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों को इस कहानी में प्रमुखता से चित्रित किया है। भारत में वर्ण-व्यवस्था से संचालित समाज में संपत्ति और जमीन पर कब्जे के अधिकार विशिष्ट वर्ण के लोगों को मिले हुए है। यह अधिकार जन्म के आधार पर निर्धारित हंै। निरक्षरता और निर्धनता के अभाव में दलित साहूकारों और जमींदारों की गुलामी और बेगारी करने में अपनी जिंदगी बीता देता है। यह निरक्षरता और निर्धनता वर्ण-व्यवस्था की देन है। क्योंकि वर्ण-व्यवस्था ने संपत्ति के अधिकार विशेष वर्ग तक सीमित रखे हैं। संपत्ति के इस विशेष अधिकार के कारण जमींदारी और साहूकारी प्रथा को बढ़ावा मिला है। इस प्रथा से दलितों को भूमिहीन स्थिति में जीने के लिए और निरंतर शोषण को सहने के लिए मजबूर किया है।

 संक्षेप में, ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'पच्चीस चौका डेढ़ सौ', मोहनदास नैमिशराय की 'रीत', राम निहोर विमल की 'थावरे की सोच', 'एक-एक पर', आदि हिंदी दलित कहानियों में जमींदारी व साहूकारी प्रथा के कारण शोषत-उत्पीडि़त समाज की वेदना और विद्रोह के प्रसंगों, स्वरुपों तथा संदर्भों को व्यापक रूप में चित्रित किया है। आर्थिक शोषण से मुक्त समाज का सपना साकार करने के लिए हिंदी की दलित कहानी प्रतिबद्ध दिखाई देती है। दलितों के सामाजिक व आर्थिक शोषण को बढ़ावा देने में ब्राह्मणवाद तथा सामंतवाद की सोच व नीति को कहानियों में बेनकाब किया है। अत: दलितों की नयी पीढ़ी इस शोषण की जड़ को समझ गई है और वह इस के खिलाफ  संघर्ष करते हुए दिखाई दे रही है।

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