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Wednesday 20 Nov 2019

सीता का वनगमन: विभिन्न रामायणों के संदर्भ से

रामकथा में राम के साथ सीता का वनगमन भी एक महत्वपूर्ण घटना है। कैकेयी ने वनवास केवल राम के लिये मांगा था किंतु जैसे राम ने राज्याभिषेक के स्थान पर वनवास को बिना क्षणभर भी सोचे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया था वैसे ही जनकनंदिनी ने पति के पीछे राजसुख को त्यागकर जाने का निर्णय लेने में क्षणभर भी देरी नहीं की। यह बात और है कि राम वन की कठिनाइयों को देखकर उन्हें अपने साथ वन नहीं ले जाना चाहते थे । तब सीता को राम को मनाने में बहुत मेहनत करनी पड़ी थी। यह सारा प्रसंग वाल्मीकि एवं अन्य रामायणकारों की लेखनी से अत्यंत हृदयस्पर्शी रूप में प्रस्तुत हुआ है।

वाल्मीकि रामायण में विवाह के बाद सीता को हम रामायण में वनगमन के अवसर पर देखते हैं जो अंासू भरी अंाखों से, किंतु बड़ी दृढ़ता के साथ ,राम से उनके साथ वन जाने की विनती करती हैं। यहां हम सीता का जो रूप देखते हैं वह रामचरितमानस की सीता से एकदम अलग है। 

वनवास की कठिनाई का विचार कर राम उन्हें समझाते हैं कि वे अयोध्या में ही रहें ...सास-ससुर की सेवा करें तथा राजा भरत की अनुगामिनी होकर रहें क्योंकि राजा को किसी प्रकार भी रूष्ट नहीं करना चाहिये। इस पर सीता कुपित होकर उनसे कह उठती हैं-

अनुशिष्टास्मि मात्रा च पित्रा च विविधाश्रयम् ।

नास्मि सम्प्रति वक्तव्या वर्तितव्यं यथा मया।। (वा.रा.अयो.कां.27.10)

किसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इस विषय में मेरे माता-पिता ने मुझे विविध प्रकार से शिक्षित किया है। इस समय इस विषय में मुझे कोई उपदेश की आवश्यकता नहीं है। आगे सीता अपने वनगमन का अटल निश्चय सुनाती हैं- मैं आपके साथ आज वन को चलूंगी, इसमें कोई संशय नहीं है। मैं हर तरह से चलने को तैयार हूं। इसमें कोई मुझे रोक नहीं सकता।

 सीता यह भी कहती हैं कि पिता के घर में ब्राह्मणों के मुख से वह सुन चुकी हैं कि उन्हें अवश्य ही वन में रहना पड़ेगा , इसलिये सदा ही वन में रहने के लिये उत्साहित रही हैं ।...फिर मैं आपकी भक्त हूं, पातिव्रत्य धर्म का पालन करती हूं, आपके विछोह में दीन हो रही हूं तथा आपके दुख में समान रूप से हाथ बंटाने वाली हूं। मुझे सुख मिले या दु:ख ,मैं दोनों ही अवस्था में साथ रहूंगी, हर्ष या शोक के वशीभूत नहीं होऊंगी। अत: आप अवश्य ही साथ ले चलने की कृपा करें। सीता आगे यह भी कहती हैं-यदि आप मुझे साथ नहीं ले जाएंगे तो मैं विषमग्निं जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात् अर्थात् मैं मृत्यु के लिये विष खा लंूगी, आग में कूद पडूंगी, अथवा जल में डूब जाऊंगी। किंतु इस पर भी जब राम उन्हें वनवास से निवृत करने के लिये पुन: समझाने लगे तब स्वाभिमान के कारण राम पर आक्षेप करती हुई जनकनंदिनी कई चुभती हुई बातें कह उठती हैं-

किं त्वामन्यत वैदेह: पिता मे मिथिलाधिप:।

राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरूषविग्रहम।।(वही,30. 3)

 राम! क्या मेरे पिता मिथिलाधिपति जनक ने आपको जामाता के रूप में पाकर कभी यह भी सोचा था कि आप केवल शरीर से ही पुरूष हैं, कार्यकलाप से तो स्त्री हंै!

अनृतं वल लोकोऽयमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति।

तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे।।(वही, 30.4)

 नाथ! आपके मुझे छोड़कर चले जाने पर यदि संसार के लोग अज्ञानवश यह कहने लगें कि सूर्य के समान तपने वाले श्रीरामचन्द्र में तेज और पराक्रम का अभाव है, तो उनकी यह असत्य धारणा मेरे लिये कितनी दुखकर होगी?

स्वयं तु भार्यां कौमारीं चिरमध्युशितां सतीम् ।

शैलूश इव मां राम परेभ्यो दातुमिच्छसि।। ( वही, 30.4)

 राम! जिसका कुमारावस्था में ही आपके साथ विवाह हो चुका है और जो चिरकाल तक आपके साथ रह चुकी है, उसी मुझ सती-साध्वी को आप औरत की कमाई खाने वाले नट की भांति दूसरे के हाथ में सौंपना चाहते हैं?       

आगे सीता विनम्रतापूर्वक यह भी कहती हैं...जैसे उपवन के विहार एवं पर्यंक-शयन में मुझे कोई कष्ट नहीं होता, वैसे ही आपके पीछे-पीछे कंटकों से भरपूर वन में चलने में मुझे कोई कष्ट नहीं होगा...बल्कि वन के ये मार्ग मुझे रूई और मृग-चर्म के समान कोमल लगेंगे। वन की प्रचंड अंाधी से उड़कर मेरे शरीर पर जो धूल लगेगी, उसे मैं उत्तम चंदन के समान समझूंगी...वन के भीतर जब मैं घास-फूस पर शयन करूंगी तो उससे अधिक सुख क्या रंग-बिरंगे मुलायम बिछौने पर सोने से मिलेगा? आपके हाथ के फल-मूल या पत्ते मुझे अमृत के रस के समान लगेंगे ...मैं कभी भी माता-पिता या महल की याद नहीं करूंगी। आपके सानिध्य का स्थान मेरे लिये स्वर्ग और आपके बिना स्थान मेरे लिये नर्क है। आपका विरह मैं दो घड़ी भी नहीं सह सकती हूं फिर मुझ से यह चौदह वर्षों तक कैसे सहा जायेगा?

       इति सा शोकसंतप्ता विलप्य करूणं बहु ।

      चुक्रोश पतिमायस्ता भृशमालिंग्य सस्वरम।। (वही, 30.4)

 इस प्रकार बहुत देर तक करूणाजनक विलाप करके शोक से संतप्त सीता शिथिल हो अपने पति का गाढ़ा आलिंगन कर फूट-फूट कर रो पड़ी।

 तब दोनों हाथों से उन्हें संभाल कर हृदय से लगाते हुए रामभद्र कह उठते हैं ,'देवि! तुम्हें दु:ख देकर मुझे स्वर्ग में भी सुख मिल सकता हो तो मैं नहीं लेना चाहूंगा। स्वयं विरंचि की भंाति मुझे किसी का भय नहीं है ,मैं तुम्हारी रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हूं। किंतु तुम्हारी हार्दिक अभिलाषा जाने बिना तुम्हें वनवासिनी बनाना मैं किसी तरह उचित नहीं समझता था। प्रिये! तुम मेरी अनुगामिनी बनो, और मेरे साथ धर्म का आचरण करो। अब मैं तुम्हें वन चलने की आज्ञा देता हूं।Ó

निश्चय ही दाम्पत्यप्रेम ,स्नेह और सौहार्द का वाल्मीकि ने यहां अत्यंत सुंदर चित्रण किया है।

कंबर रचित तमिल कंब रामायण में सीता के महल में वल्कलधारी राम वनगमन के लिये तैयार हो पहुंचते हैं। सीता को अभी तक इसकी सूचना नहीं थी। माताएं तथा गुरूजन और प्रजाजनों को राम-लक्ष्मण के पीछे-पीछे आते देख वह चकित थीं। उन्होंने आशंकित हो राम से पूछा कि राजा कुशल से तो हैं? इस पर राम ने जब कहा कि वे पिता की आज्ञा से वन जा रहे हैं, बस वन देखकर लौट आएंगे...तुम दुखी मत होना, तब सीता रोने लगी। इसलिये नहीं कि पति का राजतिलक नहीं हुआ, उन्हें वनवास मिला है, उनके कानों को तो पति का यह निर्मम वाक्य जलाने लगा कि मैं वन जा रहा हूं...तुम दुखी मत होना। वह कहती हैं...आपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करने का निश्चय किया, यह पवित्र आचरण है, किंतु आप मुझे अयोध्या में ठहरने कह रहे हैं, इससे तो मेरे प्राण निकल रहे हैं!

तब राम ने वन की कठिनाइयां समझाई। किंतु सीता के लिये यह कुछ भी नहीं थी। यहां सीता राम से अधिक बहस नहीं करती है। मौनभाव से अंत:पुर में जाती हंै और जब क्षणभर बाद वहां से आती हंै तब सब देखते हैं कि पति के अनुकूल वल्कल वस्त्र पहने पति के साथ जाने वह भी तैयार हैं! इतना ही नहीं वह पति के हाथ को अपने हाथ में पकड़ एकदम चलने के लिये प्रस्तुत हो जाती हैं। (अयो.कां.मंत्रणा पटल, 514-522)

नरहरि कृत कन्नड़ तोरवे रामायण में सीता को बिना बताये राम वनगमन के लिये प्रस्तुत हो कैकेयी के महल में जाते हैं जहां लक्ष्मण भी आ जाते हैं और राम के साथ किसी तरह वन जाने की आज्ञा उनसे प्राप्त कर लेते हैं। जब सीता यह सब सुनती है तो दौड़ती हुई कैकेयी के महल में पहुंचती हैं और राम के चरणों में गिर कर वन साथ जाने की विनती करती हैं। वह पूछती हैं, सुगंध सुमन से, चांदनी चन्द्रमा से, कीर्ति सद्धर्म से क्या अलग रह सकती है जो मैं रह पाऊंगी ?...और इस तरह राम के बहुत समझाने पर भी सिया किसी तरह उनके साथ जाने की आज्ञा पा लेती हैं। यहां कौशल्या सीता को भी वनगमन करते देख रोते हुए चिल्लाती हैं, 'गुरूजन कैकेयी को क्यों नहीं समझा रहे हैं?' वह दशरथ की अन्य रानियों को संबोधित करते हुए भी कहती हैं,'माताओं! क्या तुम लोग बंधक में आई हो? क्या पांच सौ रानियों में से एक को भी करूणा नहीं छू गई है? निरपराधिन सीता के लिये वनवास क्या ठीक है?' (तो.रा.अयो.कां.3.33-39)

संस्कृत अध्यात्मरामायण में सीता अपना दृढ़ निश्चय तत्काल राम को सुना देती है। यहां राम स्वयं उनके पास पहुंच कर उन्हें पिता द्वारा पहले राज्याभिषेक का, फिर कैकेयी के कहने पर वनवास का आदेश सुनाते हैं। वैदेही किसी पर कोई आक्षेप नहीं करती। किंतु जब राम कहते हैं कि शीघ्रं गमिष्यामि मा विघ्नं कुरू भामिनी...मैं शीघ्र वन जाऊंगा, तुम कोई विघ्न खड़ा मत करना, सीता प्रीतिपूर्वक कहती हैं-अहमग्रे गमिष्यामि वनं पश्चत्त्वमेष्यसि, वन तो पहले मैं जाऊंगी पीछे आप आना। राम उन्हें तरह-तरह से वन की कठिनाइयां समझाते हैं तो सीता कहती हैं,' आपके रहते मुझे वन में कोई कष्ट कैसे हो सकता है? मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूंगी बल्कि आपकी सहायक हूंगी। बाल्यावस्था में ही मुझे ज्योतिष ने कहा था कि तू अपने पति के साथ वन में रहेगी। उन ब्राह्मण का वचन सत्य हो ,आप मुझे वन ले चलिये।' एक और बात यहां सीता कहती हैं - आपने बहुत से ब्राह्मणों के मुख से रामायणें सुनी होंगी। कहिये तो क्या इनमें से किसी में सीता के बिना राम वन गये हैं? अंत में सीता धमकी देती हैं, यदि आप मुझे छोड़कर जाएंगे तो मैं अभी आपके सामने प्राण दे दूंगी...और तब राम उन्हें भी साथ चलने की अनुमति प्रदान करते हैं(अ.रा.अयो.कां.4.77)।

संस्कृत आनंद रामायण में भी सीता अध्यात्मरामायण की सीता के समान कहती हैं कि - मेरी हाथ की रेखाएं देखकर बचपन में ब्राह्मण ने वनवास की बात कही थी तथा रामायण महाग्रंथ में मैंने सुना है कि सीता के बिना राम अकेले कभी वन नहीं गये। इसके साथ ही वह यह भी कहती हंै कि स्वयंवर के समय मैंने देवताओं से प्रार्थना की थी कि यदि राम धनुष चढ़ा ले तो मैं चौदह वर्ष तक मुनिवृति धारण कर वन में विचरण करूंगी।(आनंद रामा. सारकांड 6.10-12)

मैथिली रामायण में राम जब सीता को वन जाने से रोकते हैं तो वह उनसे कहती हैं,' मेरी माता धरती है जो सर्वसहा है ,पिता जनक है जिनके लिये सुख और दु:ख दोनों ऐसे ही है जैसे मणिमाला हो या संाप हो। आपकी इस एक आज्ञा को नहीं मानूंगी चाहे इससे पाप मिले या पुण्य। चांद से चांदनी, बादल से बिजली ,कहीं अलग रह सकती है? '...और सीता राम की आज्ञा की प्रतीक्षा के बिना ही वनगमन हेतु प्रस्तुत हो जाती है। (मै.रा.बा.कां. 4.113-117)

असमिया रामायण माधवकंदली की सीता राम से तेज तो नहीं, हां दृढ़ शब्दों में अवश्य अपने साथ वन ले जाने की प्रार्थना करती है। वह कहती हैं,' मैं जन्म के समय मृतिका के भीतर प्रविष्ट थी फिर भी नहीं मरी। यदि मुझे अपने साथ वन नहीं ले जाओगे तो कटार ही मेरा सहारा होगा या मैं विष खा लूंगी। ' ...तब राम अनुमति देते हैं। (मा.कं.रा.1863)

 इस प्रसंग को कश्मीरी रामायणकार श्रीप्रकाश ने कश्मीर की ख्ूाबसूरत वादियों के सुंदर गुलों की उपमा देते हुए इस तरह प्रस्तुत किया है-

  राम ने कहा-तू यहींबैठ। तू सफर की दुश्वारियों को नहीं सह सकेगी।

  सीता बोली- आपके बिना तो मेरे लिये दिन भी रात हो जायेगा।

  उन्होंने कहा -तेरे चलने से भूमि कंाप उठेगी।

  वह बोली -यही तो मेरे कर्म-लेख में बदा था।

 उन्होंने कहा-तू यहीं रहकर मोतियों की माला से खेल।

 वह बोली-यदि आप गये तो मैं क्षणभर में अपना अंत कर लूंगी।

 उन्होंने कहा-तू तो नाजुक गुल की तरह है ।

 वह बोली-आपकी दूरी उसे जला देगी।

 उन्होंने कहा-तू तो चौदहवीं का लुभावना चांद है।

 वह बोली-आपकी दूरी मेरे जख्मों पर नमक का काम करेगी।

 उन्होंने कहा-तू यहीं बैठ। तू तो बाग की नरगिस है।

 वह बोली- तभी तो यह भौंरा मुझसे छल कर रहा है।

 उन्होंने कहा- तू यहीं बैठ। तू तो एक ताजा गुलजार है।

 वह बोली-जिस गुल की कोई कीमत न हो उस गुल का जल जाना ही उचित है।

 उन्होंने कहा-तू यहीं बैठ और बाग में बबर (कली विशेष) के समान खिल।

 वह बोली-हाय! आपकी ऐसी बातों ने ही मेरे दिल पर दाग लगाया है।

 अंत में राम कहते हैं-सुन! अब तू इतना मत रो। तू बहुत रो चुकी। अब खुश हो जा । तू मत रो। रोते -रोते तेरे प्राण सूख गये । रोने से तेरे नयनों की ज्योति रीति हो गई। रोने से तू बेरंग हो गई है। तू रोती है तो मेरे दिल के शीशे पर पत्थर गिरते हैं।

 और इस तरह अंतत: भोजपत्र पहन कर सीता भी राम के साथ जाती है। (अयो.कां. वनवासगमन 6-29)

 मानस की सीता यहां अन्य रामायणों की सीता से काफी भिन्न चित्रित हुई हैं। तुलसी की सीता कुछ भीरू हैं, मितभाषी हैं। वह बिना कुछ अधिक कहे ही राम तक अपना दृढ मन्तव्य पहुंचा देती हैं। राम के वनवास का समाचार उन्हें अपने महल में मिलता है और तत्काल वह अपनी सासु कौशल्या मां के महल में उपस्थित हो जाती हैं। राम उस समय कौशल्या को वनवास का समाचार दे चुके थे। सीता मौन भाव से सास को प्रणाम कर उनके समक्ष जा बैठती हैं। बस एक ही बात रह-रह कर उनके मन में घुमड़ रही है -

      चलन चहत बन जीवन नाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।।

       की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।। ( मानस, बाल कां. 58.2)

  जनकनंदिनी को इस बात का मलाल नहीं है, न ही कोई जिज्ञासा है कि राम को राज्याभिषेक की जगह यह वनवास की आज्ञा कैसे और क्यों हुई ! उन्हें तो बस यही जानना है कि देखे आज कौन पुण्यवान होगा? तन और प्राण दोनों वन में साथ जाएंगे या केवल प्राण जाएंगे!

   सास के समक्ष कुछ कहना मर्यादा-हीनता होगी। पर हृदय की बात उनकी हर चेष्टा से प्रगट हो रही है। नखों से धरती को कुरेदना, आंखों से आंसुओं की धार का बहना आदि यही तो प्रगट कर रहे थे कि सीता राम के बिना नहीं रह सकती। कौशल्या भी सब समझती हैं किंतु जिसे कभी पलंग के नीचे पैर न रखने दिया हो, जिसे उन्होंने सदा गोद और हिंडोले में झुलाया हो, जिसे दीप बाती नहिं टारन कहउ ...दीप की बाती भी खिसकाने नहीं कहा है सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रधुनाथा।।..ऐसी सीता अब तुम्हारे साथ वन जाना चाहती है। कौशल्या इसके लिये राम की आज्ञा पूछती हैं ...पर कौशल्या यह भी कहती हैं, यह तो चित्रलिखित कपि देखि डेराती ...चित्र के बंदर को देखकर डर जाती है ...यह भला वन में कैसे रहेगी? यदि यह महल में रहे तो उन्हें सहारा भी होगा।

        राम माता के समक्ष सीता से कुछ कहते सकुचाते हैं। पर समय ही ऐसा है, अत: सीता को समझाते हैं-

       आपन मोर नीक जौं चहहू। वचनु हमार मानि गृह रहहू।।

       आयसु मोर सासु सेवकाई। सब विधि भामिनी भवन भलाई।। (वही., 61.1)

आगे राम वन के कष्ट भी बताते हैं-

       कुस कंटक मग कांकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।।

       चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।। (वही , 62.3)

         कमल के समान मृदु चरणों से भला तुम वन की कंटीले राहों पर कैसे चलोगी? फिर, वहां तरह-तरह के जंगली जानवर हैं, मानवभक्षी राक्षस वनों में विचरण करते रहते हैं...वन में कंदमूल का भोजन करना पड़ता है, वह भी हमेशा मिले यह आवश्यक नहीं, विपिन विपति नहिं जाइ बखानी। ...और तुम तो भीरू स्वभाव की हो। फिर, तुम्हें वन ले जाने पर लोग क्या कहेंगे-

       हंसगवनि तुम्ह नहिं वन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू।।

        मानस सलिल सुधा प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।। (वही, 63.3)

          हे हंसगामिनी! तुम वन के योग्य नहीं हो। तुम्हें वन ले जाऊं तो लोग मुझे अपयश देंगे। मानसरोवर के अमृत के समान जल में पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्र में रह सकती है?

         राम के ये वचन सीता के आंसुओं की धार को और तेज कर देते हैं। वह जानती हैं कि स्वामी ने उनके भले के लिये सीख दी है किंतु उनके लिये- पिय वियोग सम दुखु जग नाहीं। उनके लिये सुरपुर भी प्रिय के बिना नरक के समान है। वह कहती हैं-

    जहं लगि नाथ नेह अरू नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।।

    तनु धनु धाम धरनि पुर राजू।पति बिहीन सबु सोक समाजू।। (वही ,65.2)

        सारे नेह नाते, धन, घर, नगर, राज्य और सारी पृथ्वी, पति के बिना स्त्री के लिये शोक का समाज है। जहां तक वन के कष्ट हैं, वह भी मेरे लिये आपके साथ स्वर्ग तुल्य होगें। कंद मूल अमृत के समान होंगे। वन पहाड़ आपके साथ अयोध्या के महल के समान होंगे...मुझे वन में चलने पर कोई थकावट नहीं होगी। सबहिं भांति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।। आपकी कोमल मूर्ति देखकर मुझे वन की गरम हवा भी नहीं लगेगी। और फिर आपके साथ रहने पर मेरी ओर अंाख उठाकर भी देखने की हिम्मत किसे होगी। अंत में सीता दुखी हो कहती हैं मैं सुकुमारी नाथ वन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहूं भोगू।।... मैं सुकुमारी हूं और आप वन के योग्य हैं, आपके लिये तप ठीक है और मेरे लिये भोग! ठीक है जब ऐसे कठोर वचन सुनकर भी मेरा हृदय नहीं फटा तो मालूम होता है यह प्राण आपके वियोग का दुख भी सह लेंगे।

 राम समझ गये कि सचमुच सीता के प्राण उनके वियोग में नहीं रहेंगे, हठि राखें नहिं राखे प्राना अत: उन्होंने सीता को भी वन चलने की आज्ञा दे दी ।

 अस्तु ,अंतत: बिदाई की घड़ी आती है। राम ने साथ चलने की अनुमति दे दी थी अत: सिया की खुशी का ठिकाना नहीं था। किंतु अभी भी सीता के लिये बहुत कठिन था वन जाना...इसलिये नहीं कि वन उन्हें भयभीत कर रहा था...वन तो अपनी सारी सुषमा सहित उन्हें आमंत्रित कर रहा था किंतु अपने लोगों को यूं आंखों में अश्रुओं के साथ बिदाई देना उनके लिये बड़ा कठिन था।

वाल्मीकि सीता के वनगमन का  मानों चित्र सा खींचते हैं...वल्कल वस्त्र उन्होंने कभी पहने नहीं थे, अत: कैकेयी के लाये वल्कल को जब वे उल्टा-सीधा पहनने लगीं तब राम ने स्वयं आगे बढ़कर अपने हाथों से उनकी रेशमी साड़ी के ऊपर ही उन्हें पहनाया...सीता को अत्यंत लज्जित करने वाला था यह कृत्य, पर उपस्थित लोग तो जैसे करूणा और क्रोध से पागल से हो उठे। अब तक अत्यंत गंभीर मुद्रा बनाये वशिष्ठ के लिये यह अत्यंत असह्य हो उठा तो वे बोल पड़े...दुर्बुद्धि कैकेयी! राजा को धोखा देने के बाद भी तू सीमा के भीतर नहीं रहना चाहती? और वे घोषणा करते हैं -शील का परित्याग करने वाली दुष्टे! देवी सीता वन में नहीं जायेगी! राम के लिये प्रस्तुत राजसिंहासन पर ये ही बैठेंगी।(वा.रा.,अयो कां.,37.23)आगे वे कहते हैं-

 आत्मा ही दारा: सर्वेशा दारसंग्रहवर्तिनाम् ।

 आत्मेयमिति रामस्य पालयिष्यति मेदिनीम।।(वही, 37.24)

संपूर्ण गृहस्थों की पत्नियां उनका आधा अंग होती हैं। इस तरह देवी सीता भी राम की आत्मा हैं, अत: उनकी जगह ये ही इस राज्य का पालन करेंगी। (वशिष्ठ का यह कथन संभवत: अन्य किसी रामायण में नहीं है। यह सीता के चरित्र को बहुत ऊंचा उठाता है तथा प्राचीन भारत में ऐसा हो सकता था, इसका भी साक्ष्य प्रस्तुत करता है।)

अस्तु, मुनि वशिष्ठ के प्रति तमाम श्रद्धा और निष्ठा के बावजूद सीता के लिये उनके ये शब्द कोई मायने नहीं रखते थे। आगे कहे गये वशिष्ठ के इस कथन को भी कि सीता को वनवास नहीं हुआ है ,वे अपने पूरे राजसी वैभव के साथ वन जाएंगी, सीता ने अनसुना किया और पति के समान वेशभूषा धारण करने की इच्छा ही मन में रखकर चीर-धारण से विरत नहीं हुईं। किंतु ससुर दशरथ की बात टालना वैदेही के लिये कठिन था... जिन्होंने तरह-तरह के आभूषण उनके लिये मंगवा लिये थे, वे उन्हें पहनना ही पड़े। साथ ही चोैदह वर्षों के लिये ससुर द्वारा गिनवाकर रखवाये गये वस्त्रों को लेने से भी वे मना नहीं कर सकीं।

तोरवे रामायण में भी वनगमन के समय सीता को लेकर वशिष्ठ अपना क्रोध दिखाते हैं। यहां सीता बिना राम की सहमति की प्रतीक्षा किये राम के हाथ में कैकेयी द्वारा दिये गये वल्कल को छीनकर ले लेती है तथा पहने हुए अपने वस्त्रों पर उसे स्वयं ही लपेटने लगती है। यह देख जब कौशल्या रोते हुए कहती है कि गुरूजन क्यों मौन है तब वशिष्ठ क्रोध से आगबबूला हो सीता के पास पहुंचते हैं ,उनके वल्कल खींच कर फाड़ डालते हैं कि यह वन नहीं जायेगी ...और कैकेयी को भी बहुत खरी-खोटी सुनाते हैं। (तो.रा.अयो.कां. 3.43) किंतु फिर सीता को वनगमन हेतु दृढ़ देख वे देवलोक से दिव्य वस्त्रादि मंगवाकर सीता को अंलकृत करवाते हैं। (वही 3.44) ...और इस तरह यह राजरानी जनकतनया सुकुमारी सीता पति और देवर के साथ सबके हृदयों को मानो चीरते हुए ,पति को अपना सर्वस्व मानते हुए उनके पीछे-पीछे 14 वर्ष की दुर्गम वनयात्रा पर चल पड़ती है।

अस्तु, सीता का यह वनगमन सबको रूलाता तो है पर गर्व से भी भरता है क्योंकि यह एक ऐसी आदर्श नारी की सृष्टि करता है जो पति की केवल सुख की साथिन नहीं होती वे दु:ख में भी पति की छाया बनी चलती है। सीता के वनगमन पर जयदेव प्रसन्नराघव में लिखते हैं -गहनवन में निवास करने की अभिलाषा से प्रयाण कर चुके हुए प्रियतम का तत्काल अनुगमन करती हुई राजपुत्री ने अपने चरणकमलों के शब्दायमान मनोहर नुपूरों के शब्दों से बांधवों को सदाचरण (पतिव्रताधर्म ) की सुस्पष्ट शिक्षा दी।( 5.13)

        यह जनकदुलारी कितनी कोमलांगी थी तुलसी ने गीतावली में इसका सुंदर चित्र ख्ींाचा है। वनवास के लिये जाते हुए अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि सीता थक कर कहती हैं- कहौ सो विपिन हैं धौं केतिक दूरि। जहां गवन किये कुंअर कोसलपति बूझति सिय पिय-पतिहि बिसूरी।। हे कोसलपति कुंअर ! मुझे बताइये कि जिस वन के लिये हमने प्रस्थान किया है वह कितनी दूर है? यह सुन राम की आंखें अश्रुपूरित हो जाती है वे प्रेम से जानकी की ओर देखते हुए कहते हैं -कानन कहां अबहिं सुनु सुंदरि रघुपति फिरि चितये हित भूरी।।(गीतावली अयो.कां.13) अर्थात् हे सुंदरी ! अभी कानन कहां?

एक अन्य स्थान पर तुलसी ने जानकी की कोमलता को इसी प्रकार सुंदरता से उकेरा है, देखिये- पुर ते निकसी रघुबीर वधू धर धीर दिये मग में पग द्वै। फिर पूछति है चलनो अब केतुक पर्णकुटी करिहौ कित ह्वै।

हनुमन्नाटक में (तथा बालरामायण में भी ) कवि के यही भाव है -अयोध्या से वनवास के लिये निकली कोमलंागी सीता ने जमीन से उतरते ही तीन चार कदम रखने के बाद जब पूछा कि कितनी दूर और जाना है तब राम की आंखों में पहली बार आंसू आएं। (हनुमन्नाटक 3.13) राम यहां कहते हैं ,'कमलिनी के पत्र की तरह चिकने चरण वाली सीता कड़ी जमीन के कारण पग-पग पर लडख़ड़ाती हुई चल रही  है। इसलिये हे पृथ्वी तू अपनी पुत्री के पैर रखने के स्थल पर कठोरता दूर कर दे क्योंकि यह जानकी जंगल जा रही है।Ó( 3.15) राजशेखर बालरामायण में लिखते हैं -लक्ष्मण सीता के चरणकमलों में, जिनसे रक्त चू रहा था, किसलय बिछाते हुए चलते हैं। सीता को थकी देख लक्ष्मण राम की इच्छा के विपरीत मध्यमार्ग में ही विश्राम हेतु बैठते हैं। आगे कवि कहते हैं-सीता के वनगमन के बाद अयोध्या में रानियंा जहंा कहती हैं कि मणिनिर्मित चबूतरे पर चलने वाली लाड़ली तुम निम्न स्त्रियों के उपयुक्त स्थान में कैसे जा रही हो, वहीं मार्ग में पथिक वधुएं सीता को इस तरह चलते देख अश्रुपूर्ण आंखों से शिक्षा देती हंै कि धीरे-धीरे कोमल पैर रखो क्योंकि यह भूमि कुश-कंटकों वाली है । सिर पर वस्त्रों की छांह भी कर लो क्योंकि घाम कड़ा है। (6.36)

- लेखिका सेवानिवृत प्राचार्य हैं। यह लेख उनके भारत सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा प्रदत्त सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत रामायण पर किये गये शोधकार्य का अंश है।