Monthly Magzine
Sunday 22 Sep 2019

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान

बात उस समय की है जब मैं पंचमढ़ी में पदस्थ था बोरी और नीमघान के जंगल जिन्हें आज हम सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के नाम से जानते हैं घूमने का अवसर दो तीन बार हाथ लगा और हर बार कुछ न कुछ नया देखने को मिला। देखना क्या एक अजीब सम्मोहन ही हर बार जाने की लालसा पैदा कर देता था।

यूँ तो आज जो रास्ता राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश का है वही बोरी आम के सामने से ही प्रवेश का रास्ता पहले भी रहा है पर उस वक्त केवल नीमघान तक ही पर्यटकों को जाने की अनुमति हुआ करती थी। विशेष दर्जा प्राप्त लोग ही फ़ारेस्ट महकमे से अनुमति लेकर आगे जा सकते थे।

और यही रास्ता लगभग दो सौ कि.मी. घूमकर धूपगढ़ की तलहटी के बाजू में जाकर समाप्त होता था।

पहली बार हम इसी रास्ते से गये थे हमारे साथ गणेश शुक्ल, टी.व्ही.सिंह, अजय नेमा, ओ.पी. रल्हन एवं फ़ारेस्ट अधिकारी श्री यादव जी और महादेव साथ थे पूरा रास्ता दो रात और एक दिन में तय होता है अत: भरपूर खाने पीने का सामान लेकर हम रवाना हुए थे।

हमारी यात्रा शाम चार पाँच बजे से शुरु हुई प्रवेश करते ही वनाच्छादित राह का सौन्दर्य हमें अपने सम्मोहन में बाँधने लगा था। धुँधलाते ऊबड़ खाबड़ रास्ते से जीप का गुजऱना बेहद रोमांचक लग रहा था। छै बजे के आसपास हम बतकछार(बटकछार) पहुँच गये, एक ही बटवृक्ष की लंबी क़तार का दृश्य बहुत ही अद्भुत था शायद इसी के चलते इसका नाम बटकछारपड़ा होगा जो कालांतर में बतकछार हो गया। यहाँ के जनजातीय लोग हमें देखकर अधिक उत्सुक नहीं लगे शायद रोज ही वे ऐसे मंजऱों से दो चार होते होंगे। कुछ शहरपना ओढ़े यह पाँच दस झोपडिय़ों वाला गाँव नई सभ्यता में ढलने में प्रयासरत लगा। हाँ बच्चे ज़रूर कुछ दूरी तक जीप के पीछे दौड़ते रहे फिर गहराते अँधेरे में अदृश्य हो गये और हम आगे बढ़ आये।

हम नीमघान तक जल्दी ही पहुँच गये थे और बायसन तथा गौर आदि को देखने के लिए ज्यादा इंतज़ार भी नहीं करना पड़ा। मानो वे हमारी ही राह देख रहे थे। सर्चलाइट पड़ते ही वे ठिठके से फ़ोटो खिंचाने की मुद्रा में सहजभाव से खडे दिखे। ग़ौर और बायसन लगभग एक जैसे ही दिखते हैं पर ग़ौर के पैर खुर से लेकर घुटनों तक सफ़ेद से होते हैं ऐसा रेंजर यादव जी ने हमें बताया था। नीम घान उन दिनों विकसित क्षेत्र था, कारण वहाँ तक सबकी पहुँच थी । रेस्टहाउस में भी ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था थी ताकि सुबह के समय जल्दी उठकर शेर आदि अन्य जानवरों को देखने का अवसर मिल सके। वहाँ से लगभग दो घंटे के फ़ासले पर एक और आदिवासी गाँव आया चूरना ऐसा ही कुछ नाम था रात्रि आठ नौ के लगभग हम वहाँ पहुँचे थे वह गाँव भी उन दिनों ठीक ठाक सा लगा, कारण वहाँ पर सौर लालटेन का प्रकाश था कोई आयोजन सा चल रहा था। पता लगा कि गाँव के लड़के लड़की के विवाह के संबंध में कुछ मेहमान आये थे। मन में उत्सुकता जगी कि इनके रीति रिवाजों से परिचित हुआ जाय पर विशेष कुछ जानने को नहीं मिला। रात्रि में और बात आदि सब हो चुकी थी भोजन आदि चल रहा था और औरतें कुछ गा रहीं थीं पर बच्चों के शोर में स्पष्ट नहीं हुआ। यादव जी ने खाने की व्यवस्था पहले से ही कर रखी थी अत: कोई सोच विचार में समय न गँवाते हुए हम भोजन के लिए तैयार हो गये। आलू बेंगन की सब्ज़ी, केंथे की चटनी और बाजरे की रोटी ने तन और मन असीम तृप्ति से भर दिया, फिर यहाँ वहाँ की बातें सरपंच से आदिवासी जन जीवन के प्रसंग जिनमें शादी विवाह तीज पर्व आदि पर होने वाले आनंद और मस्ती में झूमते हुए सुख की कला कोई इनसे सीखे। दुख में भी अपार आनंद को तलाश लेना इनका ही हुनर हो सकता है। यादव जी के निर्देशानुसार हमें सुबह जल्दी उठकर चलना था। सुबह हम सभी जल्दी जाग गये। सुबह का वह समय बड़ा ही उपयुक्त था। धुँधलापन अभी पूरी तरह छँटा नहीं था यादव जी के अनुसार यह समय जानवरों विशेष कर शेर के मिलने का सही समय था हम जल्दी ही जीप में सवार होकर निकल गये थे, रास्ते में जंगली खऱगोश, गिलहरी, मुर्ग़े, नीलगाय आदि यहाँ वहाँ भागते से ज़रूर दिखे पर शेर के दर्शन नहीं हुए। दूसरी बार जब हम धूपगढ़ की ओर से आये थे तब एक बाघिन अपने दो बच्चों के साथ यहीं चूरना के आसपास नजऱ आई थी।

सुबह से लेकर दस बजे तक हम उन तमाम स्थानों झरने, पोखर, पहाड़ीनालों आदि के चक्कर काटते रहे पर टाइगर को देखने का सौभाग्य नहीं मिला। इसी तरह हम नदी किनारे जा पहुँचे जिसे नागद्वारी नदी कहते हैं यादव जी ने बताया। स्वच्छ निर्मल जल देखकर सबके मन में नहा लेने की इच्छा जागी और सब नहाने के लिये उतर पड़े जिन्हें तैरना नहीं आता था उन्होंने किनारे बैठकर नहाया। ज़्यादा दूर जाने पर यादवजी ने हमें टोका और बताया कि यदाकदा इसमें मगरमच्छ के चलते कोई अनहोनी हो सकती है। बहरहाल नदी में नहाने का भरपूर आनंद ले चलने को हुए तो यादव जी ने बताया कि यही नदी आगे चलकर देनवा नदी में मिल गई है।

बारह बजे के आसपास हम मढ़ई आ पहुँचे उस समय मढ़ई वन विभाग का एक छोटासा विश्राम स्थल हुआ करता था, पर आज वह एक पर्यटकों का आकर्षण का केन्द्र बन गया है जहाँ सुविधा सम्पन्न रिसार्ट आदि की पर्याप्त व्यवस्था है।लगभग डेढ़ से दो घंटे में भोजन तैयार हो गया सबने छक कर खाया वैसे भी सभी को भूख सता ही रही थी। एकाध घंटे के विश्राम के पश्चात हमारी यात्रा पुन: प्रारंभ हुई। टेढ़े मेढ़े दुरूह रास्तों पर हम दृष्टि गड़ाये आगे बढ़ते रहे। जल्दी ही एक और फारेस्ट चौकी के नज़दीक हम पहुँचे चारों तरफ घना जंगल और उस चौकी पर बस एक फ़ारेस्ट गार्ड एक अजीब से सन्नाटे के बीच उसे देख अचरज हुआ। यादव जी ने बताया यह सुअरिया नामक गाँव की चौकी है। पास ही में छै: सात घरों का गाँव है। कुछ दिनों से यहाँ नील गायों ने आतंक मचाया है अत: फि़लहाल एक गार्ड रख दिया है। कुछ और आगे बढऩे पर हमें नजऱ आने लगीं थी नागद्वारी की पहाडिय़ाँ। नागद्वारी की विशालकाय गुफ़ाओं के पास पहुँचते ही एक अलग तरह के आकर्षण में हम बँधते चले गये।

     आदमयुग की याद दिलाती इन दो गुफाओं में नागपंचमी में विदर्भ से आने वाले श्रद्धालु आकर रात्रि विश्राम करते पत्थरों पर उत्कीर्ण नाग की मूर्तियों पर अपनी आस्था के फूल चढ़ाकर वापस लौट जाया करते हैं । यह सिलसिला अनवरत जारी है। वहीं गुफा की भीतरी दीवारों पर भित्तिचित्रों की श्रृंखला भीमबैठका के चित्रों की भाँति पुरातात्विक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इन गुफाओं के आसपास का सौन्दर्य भी आत्मसात करने के लिए हम लालायित से लगे पर समय का ध्यान आते ही वहाँ से जल्दी ही रवाना हो गये। शाम होते होते हम सब बोरी के घने सागोन के जंगल के बीच खड़े थे। गगनचुंबी सीधे तने हुए वृक्षों को देख हम सब अचरज में डूबते कि यादव जी ने बताया आगे यही रास्ता घूमकर इटारसी की ओर चला गया है। वहीं एक दो ट्रक दिखे जिन पर सागोन के लठ्ठे लादे जा रहे थे। थोड़ा सा आगे बढऩे पर रास्ते के दोनों ओर दो विशालकाय पेड़ दिखे जिन्हें बस देखते ही रह गये तब यादव जी ने बताया ये राम और लक्ष्मण हैं इनका नामकरण तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल जी ने किया था। थोड़ी दूर चल जैसे ही हम तिराहे पर पहुँचे इटारसी की झिलमिलाती रोशनी हमें दिखाई दीं। बायीं तरफ़ आगे बढ़ते हुए हम बोरी के फ़ारेस्ट रेस्ट हाऊस की तरफ बढ़ चले।

कुछ ही देर में हम रेस्टहाउस में पहुँच गये देखा तो रात्रि के आठ बज रहे थे बाहर बिलकुल भी इस बात का एहसास नहीं हुआ था कुछ लोगों का विचार था कि रात यहीं रुका जाये तो कुछ का विचार था चलकर घर ही विश्राम किया जाये। पंचमढ़ी से अब भी हम पंद्रह बीस कि.मी. दूर थे। अंत में जल्दी सिर्फ़ चाय आदि पीकर हम आगे बढ़ आये, धूपगढ़ की तलहटी से गुजरते हम उसके बग़ल से होते लगभग दस बजे पंचमढ़ी पहुँच गये घरों तक जाते जाते ग्यारह बज चुके थे इस तरह एक रोमांचकारी यात्रा संपन्न हुई।

यही यात्रा हमने तीन बार की हर बार लगा कि कुछ नया देख रहे हैं। अब भी ऐसी यात्राओं पर जाने का मन होता है प्रकृति से जुडऩे की ललक साँसों को तरोताज़ा कर देती है, पर अब स्मृतियाँ ही शेष हैं।