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Wednesday 20 Nov 2019

पुनरावृत्ति

यूँ तो छुट्टी के दिन संजीव देर से उठते थे । लेकिन इधर तीन-चार दिन से उसकी आँख चार बजे ही खुल जाती है। तब उन्हें लगता कि शरीर में जान ही नहीं है। पूरा शरीर बुरी तरह दुख रहा होता। वह जानते हैं बदन दर्द का कारण । लगातार तनाव के कारण उनका शुगर लेवल बढ़ गया है। वह हमेशा तनावों से दूर रहना चाहते हैं। लेकिन क्या यह उनके वश में है। बगल में लेटी पत्नी के खर्राटे भी इस समय सिर पर हथौड़े की चोट जैसा लग रहा है। वह बिस्तर छोड़कर दूसरे कमरे में आ जाते हैं। बत्ती जलते ही कमरे में टहलते ढेर सारे कॉकरोच चौंक जाते और कुछ पल में ही वह अपनी जगहों पर वापस चले जाते हैं। अक्टूबर का आखिरी सप्ताह है। सुबह-शाम अब ठंड रहने लगी है। संजीव ने कई बार सोचा कि संदीप से बात किया जाय। आखिर कब तक ऐसे चलेगा। अचानक संवाद का यूँ बंद हो जाना, पारिवारिक दृष्टि से बिलकुल अच्छा नहीं था। संदीप नाराज चल रहा था। उसकी यह नाराजगी का कोई मतलब नहीं था। उसके बावजूद संजीव स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे थे।

संजीव बड़े थे। इसलिए बाबूजी उन्हें हमेशा यही हिदायत देते रहे थे, तुम बड़े हो। तुम्हारी जिम्मेदारी बनती है कि तुम अपने भाई-बहनों का ख्याल रखो। उनकी मदद करो। यही बड़ों का बड़प्पन है।

संजीव बाबूजी की हिदायतों का हमेशा निर्वाह करने का प्रयास करते थे। इस सलाह का भी अपनी क्षमता के अनुरूप ख्याल रखा।

बाबूजी भी यही सब करते रहे। जबकि वह घर के छोटे थे। ताऊ जी की निष्क्रियता ने उन्हें जिम्मेदार बना दिया था। बहुत छोटी उम्र से वह नौकरी कर रहे थे। शादी के बाद अम्मा ने एक बार जरूर टोका था, मैं यह नहीं कहती कि आप भाई साहब की मदद ना करें। अब आप बाल-बच्चे वाले हो गए हैं। अपने घर-परिवार के बारे में भी कुछ सोचिएगा। अभी बच्चे छोटे हैं। कल बड़े होंगे। खर्चा तो बढ़ते ही जाना है। जरूरी थोड़े ही है कि आमदनी भी उसी प्रकार बढ़े। भविष्य के लिए अभी कुछो नहीं करियेगा, तो आगे चलकर का कर पायेंगे।

 बाबूजी को अम्मा की बात पसंद नहीं आयी थी। कर दी न घर तोडऩे वाली बात। अरे वह मेरे बड़े भाई हैं। हम और वह कोई बांटे हुए थोड़े हैं। लेकिन यह बाबूजी की सोच थी, जो बाद में गलत साबित हुई। नरेन्द्र भाई जैसे ही नौकरी में आए, ताऊजी का रंग बदलने लगा। बाबूजी अब उन्हें आर्थिक रूप से कुछ दे भी नहीं पाते थे। बच्चे बड़े हो रहे थे। अब उनका ही खर्चा संभालना मुश्किल होता जा रहा था। फिर भी ताऊजी को आशा थी। जब कभी दबे स्वर में बाबूजी ने नरेंद्र भाई का जिक्र भी किया, ताऊ जी हँस देते-अभी बच्चा है भाई। जब बाप-चाचा जिंदा हैं तो काहे उसे गृहस्थी की चक्की में जोता जाय। खेलने खाने दो। जब बहुत जरूरी होगा तो उससे भी कहा जायेगा। अभी तो तुम हो ही।

बाबूजी, बड़े भाई से कुछ बोल तो नहीं पाए। हाँ! मन के किसी कोने में टीस जरूर महसूस किए । छोटे भाई की तो ठीक से मस्से भी नहीं उभरे थे कि कमाने पर लगा दिया। जो कमाए बड़े भाई को समर्पित करते रहे। आज अपना बेटा है तो। तब भी बाबूजी कहाँ जागे। उन्हें तो यही लगा था कि जरूरत के समय भाई साहब जरूर सामने खड़े होंगे ।

 लेकिन बाबूजी का वह विश्वास भी ज्यादा दिन नहीं टिक सका। अम्मा लंबे समय से बीमार चल रही थी। काफी पैसा खर्च हो गया था। डॉक्टर ने हाथ खड़ा कर दिया। अब ऑपरेशन ही आखिरी विकल्प था। ऑपरेशन के लिए एक मोटी रकम की जरूरत थी। बाबूजी ने ताऊजी के सामने पहली बार हाथ फैलाया था। और ताऊ जी ने हाथ खड़े कर दिए, यार यहाँ तो अपना ही खर्च पूरा नहीं होता है। तुम्हारे लिए कहाँ से करूँगा? मैं कोई नौकरी तो करता नहीं हूँ।

बाबूजी को बड़े भाई की बात सुनकर काफी धक्का लगा था। वह सालों गाँव नहीं गए। फिर उन्होंने पैसा भी नहीं भेजा। ताऊजी को भला क्या फर्क पडऩा था। पुश्तैनी सम्पति का उपभोग तो कर ही रहे थे। अम्मा कहती, जब हम बोलते थे तो आप कुछ बुझबे नहीं करते थे। देख रहे हैं न। आप यहाँ मजूरी कर रहे हैं और पूरा जायजाद का उपभोग उ लोग कर रहे हैं। आप पइसा भेजना बंद कर दिए तो कइसे तुनुक गए हैं। दू बरिस हो गया। इहो नहीं जानने की कोशिश किए कि भाई किस हालत में है। उ लोग तो चहबे करते हैं कि हम इसी शहर में मर.भिला जाए।

जिस ताऊजी के खिलाफ  बाबूजी एक शब्द सुनना पसंद नहीं करते थे। अम्मा की बात को गम्भीरता से सुनते रहे थे। चुपा जाओ। काहे अपना खून जला रही हो। अभी हम खेत संभालेंगे कि बच्चों का भविष्य देखेंगे। बाप-दादा की जायजाद कोई ऐसे ही थोड़े हजम कर लेगा। जब बच्चे किसी लायक बन बन जाए, फिर देखा जाएगा। तब तक उन्हें ही उपभोग करने दो। आखिर मेरे बड़े भाई ही तो हैं।

अम्मा, बाबूजी को बहुत कुछ कहना चाहती थी। लेकिन भुनभुना कर रह गयी।

लेकिन बाबूजी ज्यादा दिन अपनी बात पर नहीं टिक पाए । वह गए थे दूसरे काम के लिए। रिश्तेदारी में कोई विवाह था। घर भी चले गए। तीन-चार वर्ष बाद पहुँचे थे गाँव। ताऊ जी तो उन्हें देखते ही चौंक गए, का हो घनश्याम अचानक। सब ठीक तो है न।

बहुत दिन बाद दोनों भाई मिले थे। बाबूजी थोड़ा भावुक भी हो गए थे। आखिर उनकी जन्मभूमि थी। पुश्तैनी घर तो काफी पहले जर्जर हो गया था। उसकी जगह ताऊजी नया मकान बनाने की तैयारी में लगे थे। ईंट और मोरंग दरवाजे पर गिरा था। पुराना मकान खपरैल का था। उसमें आठ कमरे थे। वह काफी बड़ा घर था। सिर्फ  सही समय पर मरम्मत न  होने की वजह आज पूरी तरह खंडहर हो चुका था। पुराने घर के तीन चौथाई हिस्से का मलबा साफ  हो चुका था। उस पर ताऊजी नया घर बना रहे थे। इतना सब हो रहा था और बाबूजी को कुछ पता ही नहीं था। बाबूजी को दूसरा झटका, तब लगा जब उन्होंने देखा कि शीशम के सारे पेड़ खेतों से गायब हो चुके थे। और आम का बगीचा भी लगभग कटवाया जा चुका था। बाबूजी ने ताऊजी से कुछ सवाल किए। जिसका जवाब ही दोनों भाइयों के बीच बंटवारे का कारण बना।

भाई साहब मकान कुछ ज्यादा छोटा नहीं हो गया।

ताऊजी बोले, तुम तो शहर में बस गए हो। गाँव-घर से अब तुम्हारा कोई मतलब नहीं रहा। इसलिए अपने भर का बनवा रहा हूँ।

आम का बगीचा...? बाबूजी के इस प्रश्न पर तो ताऊजी के माथे पर बल पडऩे लगा ।

पेड़ सब सूख रहे थे। देशी आम थे। फल भी छोटे और खट्टे। कौन था जो इसकी देखभाल करता? इसलिए निकाल दिया।

फिर गाँव के ही किसी आदमी ने बताया था, कहाँ भिला गए हो भाई। काफी दिन बाद दिखे हो। अरे साल में एक-दू बार आना चाहिए। खेत-खलिहान घूमना चाहिए। आपके भाई साहब तो बहुत तेजी से बाग-बगीचा बेच दिए। नरेंद्र बाबू लखनऊ में घर खरीदे हैं। उन्हीं को पइसा देना था।

बाबूजी, जब बड़े भाई साहब से यह बात पूछे तो वह बोले कुछ नहीं। लेकिन सिर हिलाकर बात की पुष्टि कर दिया। बाबूजी को लगा कि इतना कुछ हो रहा है और उन्हें कुछ मालूम ही नहीं है। अगर नरेंद्र घर खरीदा है, तो यह खुशी की बात है। वह उसे पैसा देने के लिए कभी मना नहीं करते, लेकिन उन्हें तो पराया समझ लिया गया। बाबूजी को लगा कि वह धोबी के कुत्ते जैसे होते जा रहे हैं न घर के, ना ही घाट के। शहर में तो कुछ बनवा ही नहीं पाए और गाँव की संपत्ति में भी सेंध लगना शुरू हो गया। अब ताऊजी की छवि में उन्हें धूर्तता झलकने लगी थी। संजीव उस समय छठवीं में पढ़ रहे थे। बाबूजी गाँव से लौटकर आए तो काफी चिंतित दिख रहे थे। अम्मा की बात को वो कभी गंभीरता से नहीं लिए। उस समय ले लिए होते, तो आज यह नौबत नहीं आती। आखिरकार अम्मा को ही कहना पड़ा, अभी ज्यादा नहीं बिगड़ा है। बाँट लीजिए खेत।  हम, संदीप और स्नेहा गाँव पर रहेंगे। आप और संजीव पटना। कितना टाइम लगता है? पटना से गाँव, आठ घण्टा। आप आते-जाते रहिएगा।

अगली बार बाबूजी बंटवारे के लिए ही गए थे। ताऊजी को लगा कि जिस खेती का वह पूरा उपभोग कर रहे थे, अब वह आधी हो जाएगी। पहिले तो वह बाबूजी को समझाने लगे, ई कीड़ा तुम्हारे दिमाग में किसने डाल दिया। तुम खेती करोगे कि शहर में नौकरी? दो नाव की सवारी नहीं हो पाएगी। बच्चे भी तुम्हारे छोटे हैं। उनकी पढ़ाई-लिखाई पर भी असर पड़ेगा। खेत कोई भागे थोड़े जा रहा है।

बाबूजी चुपचाप ताऊजी की बात सुनते रहे। ताऊजी की बात खत्म होते ही वह हाथ जोड़कर बोले, भाई साहब आप बड़े हैं, आप जो कह रहे हैं, वह ठीक ही है। आप तो जानते हैं। जब दो पैसे बचाने का समय था, तो मैं पैसा गाँव भेज देता था। अब खर्चा बढ़ गया है। पैसे नहीं बचते हैं। नरेंद्र ने शहर में घर ले लिया। आपने भी यहाँ अपने लिए नया घर बनवा ही लिए हैं । लेकिन हमारे पास तो कुछ भी नहीं है। ना यहाँ और न उहाँ। मैं भी अब अपना परिवार यहीं रखूँगा। दो पैसा बचेगा तो एकाध कोठरी मैं भी बनवा लूँगा।

ताऊजी को मजबूरी में झुकना पड़ा। ताऊजी बंटवारे में भी नीयत सही नहीं रख पाए। बाबूजी को ऊसर-बंजर ही देने के इच्छुक थे। वह तो मंजू बुआ का हस्तक्षेप हो गया, बड़का भाई, छोटका भैया के साथ कोई अन्याय नहीं होना चाहिए। हर खेत से आधा-आधा। घर-दुआर के लिए भी आधी जमीन। नाहीं तो बूझ लीजियेगा। दो की जगह तीन हिस्सा लगेगा।

मंजू बुआ के कारण ही ताऊजी ज्यादा बेईमानी नहीं कर पाए। बाग-बगीचा तो पहले ही बिक चुका था। बैलों और भैंसों में हिस्सा देने से साफ मना कर दिए। घनश्याम शहर में कमाए और हम खेती में पसीना बहाए हैं। उसी से ये जानवर दरवाजे पर दिख रहे हैं। बाप-दादा छोडकर नहीं गए थे। इसमें हिस्सा कैसा है?

घर बनवाने के लिए नए घर के बगल वाली जमीन सीने पर पत्थर रख कर दे दिए। देना तो वह घर के पिछवाड़े की बंसवारी वाली जमीन देना चाहते थे। पर मंजू बुआ के आपत्ति के कारण वह मजबूर हो गए। बाबूजी जी ने कहीं कोई विरोध नहीं किया । उन्हें जो मिलाए उसे चुपचाप स्वीकार कर लिया। लेकिन ताऊजी के लिए यह सब दु:खद था। वह तो यही सोच रहे थे कि या तो छोटा भाई हमेशा के लिए शहर में बस जाएगा और यदि आना होगा भी तो पंद्रह-बीस बरस बाद। नौकरी पूरी होने के बाद। लेकिन यूँ अचानक ऐसे बंटवारा हो जाएगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं किए थे। ऊपर से मंजुआ टपक गई। पूरा बहनापा निभा दिया और छोटे भाई को वह सब भी देना पड़ा जो वह नहीं देना चाहते थे।

बाबूजी ने अपने विभाग से कर्ज लिया और देखते-देखते तीन कमरे खड़े कर दिए । अम्मा संदीप और स्नेहा गाँव पर रहने लगे। खुद संजीव बाबूजी के पास पटना में ही रुक गए।

ताऊजी को बंटवारे का ऐसा सदमा लगा कि वह बीमार हो गए। पता नहीं कौन सी बीमारी थी कि उनका गठीला शरीर सूखने लगा। बाबूजी पटना ले जाकर दिखाए और नरेंद्र भाई लखनऊ, लेकिन कोई भी डॉक्टर उनका मर्ज नहीं पकड़ पाया। फिर उनका चलना-फिरना मुश्किल हो गया और वह बिस्तर पकड़ लिए। बंटवारे के बाद तीन साल तक वह जीवित रहे थे। अम्मा तो यही कहती रही, भाई के साथ किए बेईमानी को नहीं पचा पाए। ऊपर वाला भी सब देखता है। धरती पर ही पूरा नरक भोग कर मरे हैं।

धीरे-धीरे तीन कमरे का घर सात कमरों वाले मकान में बदल गया। अम्मा संजीव से कहती, यदि तुम्हारे बाबूजी का चलता तो कुछ भी न हो पाता। उ तो मेरा करेजा था कि औरत होते हुए पूरे दमखम के साथ डटे रहे। मजाल था मेरे जायजाद का एक तिनका भी कोई छू लेता। बहुत तपस्या से ई सब खड़ा की हूँ ।

अम्मा की बात पर संजीव ने कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। बंटवारे के समय ग्यारह साल के थे। बाबूजी के कारखाने जाने के बाद वह सहमे से घर में बैठे रहते थे। स्कूल में भी वह सामान्य नहीं रह पाते। उनके तो बचपन की हत्या हो गई थी । गिरधारी मास्टर उसे जब-तब सहलाते रहते । उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। लेकिन वह किससे बताते? अम्मा तो उनके पास थी ही नहीं और बाबूजी से तो वह उनके मरने तक बात करने से घबराते थे। संजीव तो आज भी किराये के मकान में रह रहे हैं। जैसे बाबूजी रहते थे। खेती-बाड़ी का उपभोग तो संदीप ही कर रहे हैं। ताऊजी की तरह।

लेकिन संदीप दूसरा सोचते थे, अम्मा बेकारे हो हल्ला करती हैं। का फायदा हुआ हमें। संजीव भाई शहर में रुक गए तो आज नौकरी कर रहे हैं। शानदार जिंदगी जी रहे हैं। गाँव में का धरा है। इहाँ रहने का नतीजा तो हम भुगत रहे हैं। सारा जाँगर खेती में चला गया। ऊपर से कोई गार्जियन था नहीं, पढ़ाई का समय लखेरई में चला गया। खेती-बाड़ी का जो हाल है, किसी से छिपा है क्या। कल संजीव भाई आएंगे, आधा खेत अधिया लेंगे। हमें क्या मिलेगा, घंटा !

हालांकि बाबूजी के मरने के बाद संदीप ने एक होशियारी किया था। अम्मा को भी एक तिहाई का हिस्सेदार बना दिया था। अब यदि दोनों भाई में बंटवारा होता भी है, तो दो हिस्सा उनके पास ही रहना था। बाबूजी के रिटायरमेंट का पैसा भी अम्मा ने बाबूजी पर दबाव बनाकर संदीप को ही दिला दिया। संजीव तो नौकरी कर रहे हैं। छोटकु की चिंता रहती है। दू पइसा उसके पास भी रहेगा तो मन मजबूत बना रहेगा।

संदीप इस बात को कभी स्वीकार नहीं किए, बाबूजी को केतना मिला ही था। जो मिला था, उ त स्नेहा के बियाह में कम पड़ गया। तो हमको का देते, घुंइया!

संजीव यह बात अच्छी तरह समझते थे। लेकिन बोलने का मतलब था, आपसी टकराव। गाँव से फायदा कुछ भी नहीं था। इन सबके बावजूद, जितना उनके सामथ्र्य में था, वह संदीप की मदद कर देते। लेकिन संदीप की अपेक्षाएं बढ़ती जा रही थीं।

संजीव की भी अपनी सीमाएं थी। वह लार्ड गवर्नर तो थे नहीं। तृतीय श्रेणी के कर्मचारी थे। छोटा सा वेतन था। उसमें अपना घर चलाना मुश्किल था। फिर स्नेहा के विवाह से लेकर बाबूजी के निधन तक, हर जगह नौकरी करने कारण सारा बोझ उन्हीं पर लाद दिया गया। जाहिर है, इसके लिए उन्हें कर्ज भी लेना पड़ा। लेकिन वह अपना रोना किससे रोते। बाबूजी उनकी कठिनाइयों को समझते थे। लेकिन अब तो वह भी नहीं रहे।

संजीव की बेटी सयानी हो गई थी। अब उन्हें उसके विवाह की चिंता थी। बेटा भी बीटेक कर रहा था। अब तो उनके पास खर्चा ही खर्चा था। ऐसे में वह अब संजीव को कहाँ से दे पाते। शुरू में संजीव ने उन्हें संकेत दिया, क्या बताएं भाई साहब, साला खेती पइसा माँगता है। और हम यहीं मात खा जाते। नहीं तो। ई पंपिंग सेटवा भी पुराना हो गया है। ऐन सिंचाई के समय धोखा दे जाता है। बाबूजी इसे पच्चीस साल पहले खरीदे थे। केतना साथ दे भाई।

संजीव अब ऐसे मामले में चुप रहते। मुँह खोलने का मतलब था पैसा दो। और अब वह इस स्थिति में बिलकुल नहीं थे। ऐसे में वो बाबूजी वाला फार्मूला अपना लिए। पहले वह हर तिमाही गाँव का चक्कर लगा लेते थे। लेकिन वह छमाही जाने में भी घबराने लगे। धीरे-धीरे संदीप के समझ में आ गया कि बड़े भाई कुछ देने वाले नहीं हैं। तो वह नाराज हो गए, का किए हैं भाई साहब। खाली जिनगी भर अपना ही पेट पालते रहे हैं। यह जो घर-दुआर चमकता हुआ देख रहे हैं। हमारे खून-पसीने का नतीजा है । रिश्तेदारों के माध्यम से ऐसी खबरें उन्हें भी मिलती। वह चुपचाप सुन लेते। इसका कोई जवाब भी तो नहीं था उनके पास।

कभी-कभी संजीव को लगता कि वह धीरे-धीरे बाबूजी में बदलते जा रहे है और संदीप ताऊजी जैसा।