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Thursday 14 Nov 2019

ज्योंही बब्बाज़ी ने अपनी गोद से उतारा मुन्नी को

ज्योंही बब्बाज़ी ने अपने गोद से उतार अपनी मुन्नी को दादी को दिया, दादी ने झट उतार बिस्तर पर पटक दिया और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी। जैसन तैसन अपन लईका मन ला बड़े करे हो दूसर के टुरी ला पाले के मोर ना मन है ना हिम्मत (जैसे तैसे अपने बच्चों को बड़ा किया है अब दूसरे की बेटी को पालने की ना तो हिम्मत है ना ताक़त )। इसमें भी बेटी शब्द के साथ मुँह से घृणा टपक रही थी। जिसके जन्म से घर में मातम मना रही दादी कैसे उसे ही स्वीकार करती। मुन्नी बेचारी तो बिस्तर पर गिर कर भी हंस ही रही थी। दौड़ कर रेवा बुआ आई और मुन्नी को प्यार करने लगी सचमुच पहली बार जन्म के बाद मुन्नी को माँ की गोद मिली थी। अम्मा अपने बढ़ते हुए पेट, फिर से बेटी ना पैदा हो, इस डर से इतनी लाचार थी कि चाह कर भी अपनी बेटी को गले ना लगा पाई। इस नए परिवेश में दादी की उपेक्षा और बब्बा जी के प्यार, बुआ के दुलार से मुन्नी बड़ी हो रही थी। दादी की पुरज़ोर कोशिश रहती कि धोखे से भी मुन्नी का साया भी अम्माँ पर ना पड़े क्योंकि लड़की की छाया से दूसरी भी लड़की ही पैदा होती है। सचमुच आदमी अपनी ही सोच का ग़ुलाम होता है। बेचारी उन्होंने कहाँ बायोलाजी पढ़ी थी, जो मालूम होता कि वाइ क्रोमसोम तो उनके बेटे के पास थे, जो बेटे पैदा करने के लिए ज़रूरी थे। इतनी उपेक्षा से बेख़बर मुन्नी नाचती गाती दौड़ती गिरती बड़ी हो रही थी। अम्मा की तो अपनी जायी बेटी, वो भी पहला बच्चा दूर से देख के आँसू टपका लेती थी। भले पढ़ी लिखी थी पर पली तो अंधविश्वासों के साथ थी। आज भले ही ये सारी बातें बेमानी लगती है और तो और मुन्नी जी तो बड़ी होकर भी रोज़ अपनी बेटियों की डाँट खाती है- मॉम वाई यू आर सो बैकवर्ड? काँट यू फ़ाइट योर ओन बैटल ? दादी और पापा से डरने की ज़रूरत नहीं है। पापा अपना खाना ख़ुद गरम करेंगे।

बचपन की स्मृतियों में एक विचित्र आकर्षण होता है। ये तो मुन्नी यानी मुझे बाद में अम्मा द्वारा बताई गयी यादें हैं। पर, कभी-कभी लगता है, जैसा एक सपना था। परिस्थितियाँ बहुत बदल जाती हैं। मुन्नी की छाया से भी दूर रहने वाली दादी की आँखों का तारा बनने में महज़ एक महीना लगा मुन्नी को, तब तक तो ख़ानदान का चिराग़ मुन्ना भी अम्मा के पेट के अंदर ही किलकारियाँ भर रहा था। वो बब्बाज़ी जिन्होंने अपनी बेटियों की शादी मैट्रिक पास करा कर दी थी, मुन्नी में कलेक्टर, मजिस्ट्रेट तो कभी डॉक्टर के सपने देखने लगे थे । लेकिन दादी का सपना तो एक अच्छे ख़ानदान में मुन्नी की शादी था। ये उन दिनों की बात है जब स्त्री और दलित में कोई अंतर नहीं था। दलित जिस मंदिर का एक एक ईंट रख कर निर्माण करता है, उस के अंदर उसका प्रवेश ही निषिद्ध था। उसी तरह घर की धुरी हो कर भी घर पहले पिता, फिर पति का होता था। वो जन्मदात्री तो ज़रूर है, मगर वंश पिता के नाम पर चलता है और बेटा ही वंशधर कहलाता है। कुछ हद तक आज भी कुछ बदला नहीं है लेकिन मुन्नी की दोनों बाग़ी हिरणियाँ आज सरनेम के नाम पर पहले अपने नाना फिर पापा का लिखती हैं। जबकि शादी होने के बाद अनजाने में मुन्नी से डॉक्टर सुनीता बनी मुन्नी ने कब अपने नाम से पिता का नाम काट पति का नाम जोड़ लिया उसे इसका अहसास ही नहीं हुआ। जब कोई पुराने सरनेम से पुकारता है तो दो बार सोचना पड़ता है कि ये उसकी कभी पहचान थी। बेटियाँ तो माँ के इस सो कॉल्ड अजस्ट्मेंट को पागलपन का नाम देती हैं। उसकी ही कई सहेलियाँ हैं जो अभी भी अपने पुराने सरनेम के साथ हैं, जो बेटियों की आदर्श हैं।

मुन्नी अब दादा दादी की बेटी बन कर ही बड़ी हो रही थी, जहाँ बेशुमार प्यार था, ख़ूब सारा खाना पीना था लेकिन शहर नहीं था। शहर से मेरा मतलब चमकती सड़केें, पक्के मकान और बिजली से था। पर जब घर के पेड़ की हवा पास आती तो लगता माँ का आँचल हो। घर के नौकरों के बच्चे ही मुन्नी के संगी साथी थे। उन्हीं के साथ दिन रात खेला करती। दादी के आँख का बाल बन गयी थी पर उनका प्यार कभी हाथ में गुड धर या कभी बूंदी का लड्डू रखने तक ही था। यदा कदा वो मुन्नी के ब्याह के गीत ज़रूर गाती थी। विवाह क्या है? मुन्नी को पता ही नहीं था पर ये ज़रूर समझने लगी थी कि उसे सुंदर चूडिय़ाँ पहनाईं जाएँगी, घर पर पूड़ी पकवान बनेंगे। उस समय थी तो ढाई साल की ही पर बड़ी चतुर। बुआ के साथ गाँव में ही एक शादी में गयी थी। वहाँ दुल्हन की चूडिय़ों और शादी के पकवानों में उसके सपने फँस गए थे। लगातार एक ही रट - मैं बिहाव करहूँ महूँ चूड़ी पहरहूँ (मैं शादी करूँगी चूड़ी पहनूँगी)। उन सपनों में भाग्यवश दूल्हे की कल्पना नहीं थी । लगातार सबकी क्वीन विक्टोरिया रोए जा रही थी। मरता क्या ना करता, मुन्नी की झूठी शादी का ड्रामा रचाया गया। पार्वती की बारात की तरह शंकर जी की सेना यानी घर के धूल और पसीने से नौकर मुँह से ही शहनाई और हाथ में थाली को ढोल की तरह बजाते हुए आये। घर की औरतों यानी बुआ और नौकरनियों ने शोर मचाया, बारात आ गयी, छोटी सी दुल्हन हाथ में चूडिय़ाँ पहने मुस्कुरा रही थी। सबने मिलकर पूरी, हलवा और खोवे के बने गुलाब जामुन खाये। मुन्नी की विदाई छोड़ झूठी शादी की सभी रस्में निभाई गयी।

आज जब सब जगह मी टू छाया हुआ है, तो मुझे यानी मुन्नी को भी अपना मी टू  याद आ जाता है। ना तो कभी दादी ना अम्माँ और ना ही बुआ ने सिखाया कि लड़की के कुछ प्राइवेट पार्टस होते है, कुछ बैड टच तो कुछ गुड टच भी होता है। मुन्नी की लगातार ऐसी कई शादियाँ हुई , चूडिय़ों के रंग बदलते रहे लेकिन बाराती घराती नहीं बदले। आज भी वो घटना दिलो दिमाग़ में उसी तरह बसी हुई है । मुन्नी तब तीन साल की थी। शादी में एक नया आगंतुक था जो बब्बा जी से मिलने आया था।  वैसे तो वो गाँव के चुनाव के सिलसिले में बब्बाजी से मिलने आया था। उसे भी झूठी शादी का मेहमान बना लिया गया। मुन्नी कुछ समझने भी लगी थी सो इस बार चूडिय़ों के साथ चुनरी भी उढ़ा दी गयी और बुआ ने थोड़ा मेकअप भी कर दिया था। उस आगंतुक ने मुन्नी के हाथ पाँच रुपए रख दिए जो शायद मुन्नी ने पहली बार अपने हाथ में धरे थे। बस फिर क्या, मुन्नी तो उन्हें भी बब्बा कह उनके पीछे पीछे घूमने लगी। उन महाशय ने पहले मुन्नी महारानी को अपनी गोद में बिठा कसकर छाती से चिपकाया जिसमें उस छोटी सी नासमझ मुन्नी को घुटन होने लगी, वो ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी। मोको छोड़ दे, मोको छोड़ दे मैं मर जाहू (मुझे छोड़ दें, मैं मर जाऊँगी )। लेकिन उस झाडिय़ों में मुन्नी की आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था। उन्होंने बेतहाशा मुन्नी को चूमना आरम्भ कर दिया, मुन्नी चिल्लाने लगी। मुन्नी के चिल्लाने की आवाज़ जानवरों को चारा डालने आये मंगलु(घर का नौकर) ने सुनी और वो दौड़ कर आवाज़ की तरफ़ आया। तब तक वो महाशय मुन्नी की चड्डी उतार कर बाजू में रख चुके थे। किसी के आने की आवाज़ सुन वो बब्बाजी तो सरपट उलटे पाँव भागे। मंगलु ने वहाँ मुन्नी को देखा तो उसे डाँट कर अपने पास बुलाया। उन दिनों नौकर भी परिवार का एक हिस्सा हुआ करते थे और बच्चों को डाँटने का पूरा हक़ रखते थे। मुन्नी उससे अपनी झाडिय़ों में उलझी चड्डी ढूँढने की जि़द करने लगी। उसने फिर अपनी प्यारी मुन्नी को डाँटा कि चड्डी को झाडिय़ों में फेंकने की क्या ज़रूरत थी। मुन्नी फिर प्यार से बोली, मैं नई फेकों, बब्बा जी फेंकिस। मंगलु ज़ोर से हँसा कि पागल बनाने वाली बच्ची है। भला मालिक क्यों फेकेंगे अपनी ही पोती की चड्डी? उसने मुन्नी को समझाया कि सुबह होते ही वो उसकी चड्डी ढूँढ लाएगा।  मुन्नी मंगलु के साथ घर आ गयी और अपने सभी साथियों को लेकर खेलने में मशगूल हो गयी। शायद भगवान ही मंगलु के रूप में आये और एक बड़ा हादसा टल गया।

उसके बाद जीवन में कई बार कई लोगों के अपने से चिपकाने का ढंग बड़ा अजब सा लगा। अम्मा से इसकी शिकायत भी की पर उलटी डाँट मुन्नी को ही पड़ी- क्या ज़रूरत है लोगों की देह पर चढऩे की? चुपचाप घर पर पड़ी नहीं रह सकती। उसके बाद जब माहवारी शुरू हुई तो जिस तरह से एक पढ़ी लिखी अम्मा ने जानकारी दी, वो तो एक मिसाल ही थी - अब तुम लड़की नहीं हो समझी, लड़कों यानी पुरुषों चाहे भाई, बाप, चाचा की छांव से भी बच के रहना। पुरुष भेडिय़े होते हैं, कभी दबोच लेंगे तो कहीं मुँह दिखाने के क़ाबिल भी नहीं रहोगी। कुँवारी माँ का मुँह काला कर दिया जाता है। पढ़ाई बंद हो जाएगी, सो अलग। लोगों के बर्तन माँजने का काम करना पड़ेगा। बाप रे ये धमकी तो शायद एक प्यारी सी अल्हड़ मुन्नी के लिए तालीबानी धमकी से भी कहीं बहुत ज़्यादा थी। तब तक तो मुन्नी यही समझती थी कि परियाँ ही पेट में बच्चे डाल जाती हैं। जब बाबूजी को देखती भेडि़ए की तरह उनके मुँह में दो दाँत दिखते। उसे चाहने वाले हर पुरुष से कोसों दूर रहने लगी। जब कभी बाहर जाती अम्मा धमकी देतीं। किसी लड़के के पास ना जाना। परिवार में कोई भी गर्भवती होता तो मुन्नी बेचारी उस भेडिय़े के बारे में सोचती जिसने उसकी ये हालत की। फिर भगवान का शुक्रिया अदा करती कि मौसी कुँवारी नहीं हैं, नहीं तो मुँह काला करना पड़ता। उन दिनों मुँह काला से मुन्नी की सोच बदनामी नहीं बल्कि कोई पहचान ना सके थी। आज जब उनकी बेटियों को इन सारी चीज़ों का पता उनसे ज़्यादा है और वे अपनी माँ की खिल्ली उड़ाती हैं। कल शाम पूरी मी टू 'पर बहस होती रही। बेटियाँ और उनकी सहेलियाँ बेझिझक अपने एक्सपिरीयंस शेयर कर रहीं थी। लेकिन अडल्ट मुन्नी यानी डॉक्टर सुनीता ने लम्बी साँस भर अपना एक्सपिरीयंस ख़ुद से शेयर किया। अपनी अम्मा की धमकी बता कर वो उनकी प्यारी नानी की छवि उनके ज़ेहन से मिटाना नहीं चाहती थीं। वो एक अलग ज़माना था और वहाँ एक नहीं उनके जैसी मुन्नी और अम्मा की तरह माँ थी और 'मी टूÓ की कल्पना भी नहीं थी।