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Sunday 22 Sep 2019

कोचिंग

बड़ा लज्जित महसूस किया था उसने जब आईआईटी कोचिंग के पहले टेस्ट का परिणाम आया था। छयालीस बच्चों के बीच उसका बयालीसवां नम्बर था। पापा-मम्मी ने जिन अपेक्षाओं के साथ उसे इतनी दूर आईआईटी  की कोचिंग के लिये भेजा था, उसे उनकी उम्मीदें ढहती हुई प्रतीत हुई थीं। कई दिन लग गए थे उसे निराशा के इस अँधेरे से निकलने में। मेहनत तो वह खूब करता था परन्तु जिस एकाग्रता की जरूरत ऐसी परीक्षाओं के लिए होती है वह उससे नहीं हो पा रहा था। जितना वह मन को स्थिर करने की कोशिश करता उतना ही उसका मन भटकता हुआ छतरपुर की गलियों में पुराने दोस्तों, माँ और सांभवी के बीच ले जाता। मोबाइल पर माँ से वह रोज ही बात करता था लेकिन उन्हें कितना मिस करता है यह कहने का साहस उसे नहीं होता था। सांभवी। उसकी प्यारी छुटकी, कितना अर्सा बीत गया था उससे झगड़ा किए हुए, उसकी चोटी खींचकर सताए हुए, कोटा आकर उसे उसकी हर छोटी-छोटी बात याद आती थी। वह भी तो उसे कितना परेशान करती थी, जब भी उसके साथ चेस खेलती तो सम्भावित हार को भांपकर हमेशा मोहरों को उछाल देती थी और दूर खड़ी होकर जीभ दिखाती थी।  कैरम खेलते हुए भी अक्सर वह ऐसा ही करती थी।

एक बार तो सांभवी ने हद ही कर दी थी जब उसने उसके साथ चेस खेलने से मना किया था तो चिढ़ कर उसने टेबल टेनिस के नए बटरफ्लाय रेकेट की रबर ही निकाल दी थी। वह कितना रोया था और झगड़ा था सांभवी से, कई दिनों तक वह उससे बोला भी नहीं था । अब इस घटना को याद कर उसे दुख होता है। सांभवी की ऐसी कितनी ही नादानियां अकेले में उसके साथ गल-बैंया करती, कभी उसकी आँखे नम कर जातीं तो कभी होंठो पर हंसी ले आती । उसे लगता कि इन दो तीन माहों में एकाएक वह बहुत बड़ा हो गया है - 16 साल से एकदम 25 साल का । सोचता तो फिर सोचता ही रहता वह, चलचित्र की भाँति अनेक चित्र उसके मन-मस्तिष्क पर उभरते चले जाते। जब याद आता कि सुबह उसका फिजिक्स का टेस्ट है तो हड़बड़ाकर उठता, मुँह पर पानी के छींटे मारता और फिर किताबों में खो जाने की कोशिश करने लगता।

दो माह बीतते-बीतते उसने अपनी रैंकिंग में कुछ सुधार कर लिया था। यह स्थिति सुखद तो नहीं थी, पर उसे आगे बढ़ाने में शक्तिवर्धक टॉनिक की तरह अवश्य थी। उसे पता था मंजिल काफी दूर है। वह निर्धारित समय में सभी प्रश्नों को हल नहीं कर पा रहा था। समय का दवाब उसे हरा रहा था। कई प्रश्न उसे आते हुए भी छूट जाते थे। अगले एक माह तक वह अपनी रंैंकिंग मे मामूली सुधार ही कर पाया। उसके मन में डर बैठने लगा कि समय के कारण वह पीछे छूट जाएगा। उसके साथी भी उसकी कोई मदद नहीं करते थे वह उनका प्रतिद्वंदी जो था। कॉम्पिटिशन की इस भावना के कारण बहुत से बच्चों की बाल-सुलभ मौलिकता खतम हो रही थी। अधिकांश बच्चे एक-दूसरे को सहयोगी समझते ही नहीं थे । टीचर्स उसकी मदद तो करते थे परंतु अंग्रेजी में बात ना कर पाने की अपनी कमजोरी के कारण वह उनसे पूछने में झिझक महसूस करता था, कहने को तो वह भी छतरपुर के एक नामी कॉन्वेण्ट स्कूल में पढ़ता था। पर अंग्रेजी के स्थान पर वहां अधिकतर पढ़ाई हिन्दी में ही होती थी। इस कारण भी उसकी जिज्ञासाएं मन में ही दबी रह जातीं थी।

दोस्त बनाने में वह शुरू से ही सेलेक्टिव था। अव्वल आने वाले स्टूडेण्ट उसकी ओर उपेक्षित नजर से देखते थे और जो उससे दोस्ती करना चाहते थे उसे वे लड़के पसन्द नहीं थे। टेस्ट में सबसे फिसड्डी रहने वाले नंदन मेहरा और सुरेश जाटव अक्सर उसके आगे पीछे घूमते रहते थे और चिकने क्या हाल हैं, कहते हुए अजीब निगाहों से उसे देखते थे। वह यथासम्भव उनसे बचकर ही रहता।

चित्रा के रूप में उसे अपने स्वभाव के अनुरूप दोस्त मिली। चित्रा को भी एक दोस्त की तलाश थी। वह भी उसी की तरह एक छोटे शहर देवास से कोचिंग लेने आयी थी। दोनों में शीघ्र ही गहरी दोस्ती हो गई। वह दूसरे बच्चों की तरह खुदगर्ज नहीं लगी थी उसे। उसी की तरह निश्छल और सहज स्वभाव की थी वह। वह अपनी माँ के साथ एक फ्लैट लेकर रहती थी।

कोचिंग क्लास में भी वह चित्रा के पास ही बैठने लगा था। कई बार क्लास अनवरत रूप से छ: सात घण्टे लगती और बीच में बमुश्किल बीस मिनट का ब्रेक -मिलता। चित्रा उसके साथ अपना टिफिन शेयर करती और जिद करके अपने हिस्से के ब्रेडरोल और गाजर का हलवा भी उसे खिला देती। दिन-प्रतिदिन वह अपने में बहुत परिवर्तन अनुभव करने लगा था। घर की भी अब उतनी याद नहीं सताती थी। चित्रा की संगति में वह ज्यादा खुशमिजाज और व्यवस्थित हो गया था। वीकली-टेस्ट्स में भी उसका परफारमेंस सुधरता जा रहा था। चित्रा उसकी यथासम्भव मदद करती थी।

कोटा में उसका मन लगने लगा था। आण्टी के यहां का खाना भी उसे अब उतना तीखा नहीं लगता था। दीपावली पर उसे छ: दिनों की छुट्टियां मिली थी। सांभवी, माँ, पापा, दादी और दोस्तों को कोटा के अनुभव सुनाने में ही सारा समय निकल गया। घर पर सभी ने उसमे बहुत परिवर्तन महसूस किया। वह बड़ा धीर-गम्भीर हो चुका था। मम्मी-पापा तो यह देखकर बहुत आश्स्त हुए पर सांभवी को अचम्भा हुआ कि भाई अब सच में बड़ा भाई हो गया है। जब वह कोटा वापस आने को था तो तभी रुचिरा दीदी की शादी का कार्ड मिला। रुचिरा उसकी बुआ की लड़की थी, वह चाह कर भी उनकी शादी में शामिल नहीं हो सकता था।

वह दुखी मन से कोटा वापस लौटा तो एक और बुरी खबर ने उसे अन्दर तक हिला दिया। उसके साथ कोचिंग में पढऩे वाले सार्थक विश्वास ने पंखे से लटक कर जान दे दी थी। सार्थक कोटा के माहौल में स्वयं को एडजस्ट नहीं कर पा रहा था। टेस्ट में भी वह अन्तिम तीन से ऊपर नहीं उठ पा रहा था। नंदन मेहरा और सुरेश जाटव तो उससे भी नीचे रहते थे टेस्ट में। पर दोनों को कभी चिन्ताग्रस्त नहीं देखा था उसने। हमेशा किसी ना किसी के चक्कर में लगे रहते थे। पर सार्थक अक्सर अकेला ही रहता था। किसी से ज्यादा बातें भी नहीं करता था। खबर सुनकर वह रोया तो नहीं लेकिन अन्दर  तक हिल जरूर गया था। अपेक्षाओं से मुक्ति का क्या केवल यही एक तरीका है? पेरेण्ट्स तो भले के लिए अपने से दूर पढऩे को भेजते हंै, यदि उसका मन यहां नहीं लग रहा था तो उसे अपने पेरेण्ट्स से बात करनी थी। वैसे तो आज हर पेरेण्ट्स का सपना ही अपने बच्चों को आईआईटी में पढ़ाना है। पेरेण्ट्स भी अपने बच्चों का मन क्यूं नहीं समझ पाते और उन्हें अपने से दूर इस कोलाहल में छोड़ जाते हैं भटकने के लिए, कितने किस्से सुने हैं उसने पिछले तीन-चार माहों में मन को झकझोर देने वाले। सात-आठ बच्चों ने पिछले सत्र में अपनी जान दे दी थी मेंस पास नहीं कर पाने के कारण। स्मिता का किस्सा तो सबसे अलग था। वह तो प्रेग्नेण्ट थी इसलिए उसने फाँसी लगा ली थी।

वह हर बात अपनी माँ से शेयर करता था। उनसे बात कर उसके मन को सुकून तो मिलता ही था उसे हर मुश्किल से जीतने का साहस भी मिलता। जब भी वह इस तरह की किसी घटना के बारे में सुनता। कुछ बनने के उसके इरादे और भी मजबूत हो जाते। वह कतई कमजोर नहीं है। किसी भी स्थिति में हार नहीं मानेगा। हर स्थिति से लड़ेगा वह। वह कायर नहीं है जो भाग खड़ा होगा, सोचते हुए उसका मन आत्मविश्वास से भर जाता ।

ऑण्टी के यहां उसके अतिरिक्त देवांग रहता था, जो उससे दो साल सीनियर था तथा दो बार मेंस एग्जाम दे चुका था किन्तु एक बार भी पास नहीं हो पाया था। बड़े ही बेफिक्र किस्म का लड़का था वह।  पढ़ाई को लेकर जरा भी गम्भीर नहीं दिखता था। कोचिंग के बाद रूम पर उसने देवांग को शायद ही कभी पढ़ते देखा था । जब भी वह ऑण्टी के यहां देवांग से टकराता तो वह मोबाइल पर बतियाते ही दिखाई देता। वह सोचता बड़े बाप का बेटा है इसलिए मौज करने यहां आया है।  देवांग से ही उसे पता चला था कि वह पापा-मम्मी से जिद करके अपने कुछ दोस्तों के साथ यहाँ कोचिंग के लिये आया था। देवांग उसे किसी पहेली से कम नहीं लगता था। हर माह के पहले सप्ताह में वह ऑण्टी से दो-तीन दिन की छुट्टियां लेकर अपने किसी अंकल से मिलने जाता था। जब लौटता तो उसके साथ कुछ नये कपड़े, गैजेट और कुछ गिफ्ट भी होते थे।

जब वह कोटा आया था तब माँ ने उसे बहुत सारे इंस्ट्रक्शंस दिये थे, क्या करना है और क्या-क्या नहीं करना है। दो साल तक कोई फिल्म नहीं देखनी है, ना ही क्रिकेट में समय गंवाना है। टेबल-टेनिस के रेकेट को हाथ नहीं लगाना है और स्केचिंग को तो भूल ही जाना है। सुबह-शाम दूध जरूर पीना है और खाने में लापरवाही बिल्कुल नहीं करना है । बाप रे इतने इंस्ट्रक्शन एक साथ, उसने सोचा था, पर माँ को उनकी सारी बातें मानने के लिए आश्वस्त किया था। अपने शौकों को उसने सपने पूरे होने तक तिलांजलि दे दी थी । चित्रा को गाने का शौक था । वह तो अपने साथ हारमोनियम भी लेकर आयी थी और यदा-कदा रियाज भी करती रहती थी। गाकर वह पढ़ाई के तनाव को कम करती थी। चित्रा उसे स्केचिंग के लिये प्रेरित करती थी, पर वह टाल जाता था । जब एक दिन चित्रा ने उससे बहुत जिद की तो उसे मानना ही पड़ा। अगले दिन उसने चित्रा का ही स्केच बनाकर उसे गिफ्ट किया तो चित्रा की खुशी देखने लायक थी। उसकी आंखों में अजीब सी चमक उतर आयी थी। उसने भी अपने दिल में कुछ अलग सी हलचल महसूस की थी। रात में जब उसने माँ से बात की तो उन्हें सब-सब नहीं जितना जरूरी था उतना सब बता दिया - माँ, तुम नाराज मत होना प्लीज,  आपसे किये प्रॉमिस को मैंने आज तोड़ दिया है, कई दिनों से स्केच बनाने का मन हो रहा था तो आज बनाया है एक स्केच -अब आगे ध्यान रखूंगा मां। उसे लगा था माँ नाराज होगी पर वह तो खुश हुई सुनकर-शानू,  मेरे बच्चे,  मुझे नहीं पता था तुम प्रॉमिस को लेकर इतने सीरियस होगे, मैं तो केवल यही चाहती थी कि तुम जिस काम के लिये इतनी दूर गये हो उसके उद्देश्य से नहीं भटको, क्यूंकि मैंने तुम्हें खाना-पीना भूलकर स्केचिंग में खोते देखा है, तुम तो हर काम ही उसमें डूबकर करते हो, मेरे लाल कभी-कभी तुम स्केचिंग भी कर सकते हो और क्रिकेट भी देख सकते हो। उसे लगा माँ का गला रुँधने लगा है और वह बोलते बोलते रुक गई है । 

माँ की बातों से उसे बहुत हिम्मत मिली और दिल का बोझ भी उतर गया। उत्साह में उसने वह स्केच अपनी व्हाट्सएप प्रोफाइल में लगा दिया। सांभवी का तुरन्त मैसेज आ गया - भैया तो तुमने यह स्केच बनाया है - कौन है यह? अभी माँ को बताती हूं, तुम कैसी पढ़ाई  कर रहे हो, सब पता लग गया है मुझे। अरे डर गये, तुम भी क्या याद करोगे भैया। नहीं बताऊंगी। दिखने में तो कोई खास नहीं है ुफिर तुमने इसका स्केच क्यूं बनाया। अच्छा सबसे पहले प्रोफाइले पिक हटाओ। किसी ने देख ली तो खैर नहीं तुम्हारी।

सांभवी भी कितनी बड़ी और समझदार हो गयी है। सात-आठ महीने में ही छोटी सी गुडिय़ा से एकदम जिज्जी बन गयी है, कैसी होगी सांभवी। वह खुद को किताबों में खपाने का प्रयास करने लगा।

आठवें मंथली टेस्ट में उसे चौथी रैंक मिली। वह बहुत खुश था - वह चित्रा के साथ इस खुशी को सेलीब्रेट करना चाहता था - उसने चित्रा के पसंदीदा पनीर रोल और मिण्ट चॉकलेट चिप्स आइस्क्रीम पैक कराई । वह चित्रा के फ्लैट की ओर जा ही रहा था कि रास्ते में नंदन मेहरा टकरा गया। उसका हाथ पकड़ कर बोला -चिकने कहां जा रहा है? मेरे रूम पर चल। बहुत मजा दूंगा तुझे।

छोड़ो मुझे, कहते हुए उसने किसी तरह अपना हाथ छुड़ाया और दौड़ लगा दी। इस आपाधापी में सारा सामान सड़क पर ही बिखर गया। रूम पर आकर वह बहुत रोया ।

वह अब तक हर अनहोनी के बाद स्वयं को मानसिक रूप से पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बनाता आया था पर इस घटना ने उसे बहुत व्यथित कर दिया था । वह रात भर सो नहीं सका । बार-बार नंदन का चेहरा, उसका हाथ पकडऩा और वहशी आमन्त्रण उसकी नजरों में घूम जाता। सुबह जब उठा तो पूरा बदन टूट रहा था । ठीक से चलते भी नहीं बन रहा था । अगले दिन कोचिंग भी नहीं गया । शाम को चित्रा उसके रूम पर आ गई । क्या बताता उसे? कैसे बताता उसे? ये भी कोई बताने की चीज है। चित्रा बार-बार पूछती रही पर वह कुछ नहीं, कुछ नहीं। कहकर टालता रहा।

इस बीच उसे देवांग की याद आई। देवांग दो दिनों से अपने रूम में ही था। वह अन्दर चला गया। देवांग के कमरे में किताबें कम अनेक तरह के गैजेट की भरमार थी। महंगी जींस और टी शर्ट कुर्सी पर पड़ी हुई थी। उसे विश्वास हो गया कि देवांग बहुत पैसे वाले का बेटा है जिसके लिये कोचिंग-क्लास मनोरंजन का स्थान है। दो दिन पहले ही देवांग अंकल से मिलकर आया था। जिद करके देवांग उसे अंकल से मिलने उनके होटल ले गया था। पहली नजर में अंकल उसे बहुत भले और नेक इंसान लगे थे । उस दिन दोनों ने ही अंकल के साथ खाना खाया था । दो घण्टे तक वह अंकल के साथ रहा था जब उसने लौटने के लिये कहा तो अंकल और देवांग ने भी उसे रात में वहीं रुकने के लिए कहा था, दोनों ने अगले दिन वॉटरपार्क जाने का कार्यक्रम बना लिया था और उससे भी चलने को कहा था। पर वह किसी तरह बहाना बना कर अकेला लौट आया था। अंकल उसे पार्कर पेन का एक सेट गिफ्ट करना चाहते थे पर उसने शालीनता से मना कर दिया था। अंकल ने उसे गले लगा कर और उसके गालों को थपथपाकर विदा किया था ।

इसके बाद उसे देवांग के अंकल के बारे में जानने की इच्छा होने लगी थी। वापस लौटने पर देवांग ने बताया था- खत्री अंकल से पहली बार वह एक दोस्त के साथ मिला था, दोस्त की भी किसी सोशल साईट पर उनसे मुलाकात हुई थी। अंकल की जालंधर में स्पोर्टस गुड्स की मेन्यूफेक्चरिंग यूनिट है। अपने बिजनेस प्रमोशन के लिये वह हर माह यहाँ आते हैं दो-तीन दिनों के लिए।

वह हर बार इतने महँगे-महँगे गिफ्ट क्यूं देते हैं? उसने कह तो दिया फिर उसे लगा कि यह कहकर उसने गलती कर दी है। वह कहते हंै कि मुझसे मिलने के बाद उन्हें यहाँ पर बहुत बिजनेस मिलने लगा है और उनका बिजनेस खूब चलने लगा है - उन्होंने तो पहली भेंट में ही मुझे स्मार्टफोन दिया था। इसके बाद से जब भी उन्हें बड़ा ऑर्डर मिलता है वह मुझे कुछ ना कुछ गिफ्ट करते हैं। एक बार मैं उनके साथ उदयपुर गया था तो उन्हें एक करोड़ का ऑर्डर मिला था। त बसे वह मुझे हर बिजनेस ट्रिप में अपने साथ ले जाते हैं।

उसे देवांग की कहानी पता नहीं क्यूं बड़ी रहस्यमयी लगी थी । वह यहाँ कोचिंग लेने आया था लेकिन एक अनजान अंकल के बिजनेस की उसे ज्यादा चिन्ता थी । यह बात उसे कचोटती थी और वह इसका उत्तर तलाशने की कोशिश लम्बे समय से कर रहा था। तभी अंकल का फोन आ गया वह जालंधर पहुंच गये थे । देवांग ने उन्हें बताया कि अभी शशांक उसके पास बैठा है । देवांग का इस तरह उसके नाम का जिक्र करना उसे असंगत लगा। वह उठ कर जाने लगा तो देवांग ने रोक लिया। कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा। देवांग की कराह के साथ कमरे में पसरा मौन टूटा । देवांग के पेट में मरोड़ उठी थी, वह उठकर बाथ रूम की ओर भागा, शशांक तुम रुकना अभी।

देवांग के फोन पर बार-बार मैसेज आ रहे थे। वह अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाया और देवांग का फोन उठाकर देखने लगा। अंकल का मैसेज था-तुमसे मिलकर जब भी आता हूं तो मन बहुत उदास रहता है। कुछ दिनों तक तुम्हारा हैंग ओवर रहता है। अगली बार जब मैं आऊंगा तो अपने दोस्त को मिलने के लिए जरूर लाना। बड़ा कमसिन है कमबख्त।

मैसेज ने उसका मूड खराब कर दिया। उस रात भी वह पढ़ नहीं सका । उसे ठीक से नींद भी नहीं आई। उसे बार-बार अंकल से हुई पहली मुलाकात याद आ जाती । जिस तरह से उन्होंने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे गले लगाया था और उसके गाल थपथपाए थे। उसमें उसे पितातुल्य अंकल का वात्सल्य तो उस दिन भी नहीं लगा था, आज वह उस स्पर्श के माने जान गया था। उसने क्लास में जतिन मिश्रा और भुवन काले के बीच कुछ-कुछ होने वाले किस्से सुने थे। नंदन मेहरा और सुरेश जाटव के इशारे भी वह समझता था। लेकिन वही सब अंकल और देवांग , उसका सर घूमने लगा और वह कब सो गया उसे पता ही नहीं चला ।

वह कोशिश करके भी अपने मानसिक विचलन को समेट नहीं पा रहा था । अगले दो टेस्ट्स में उसकी रैंकिंग गिरकर सत्रहवीं हो गई । चित्रा भी असमंजस में थी। वह उससे भी ज्यादा बात नहीं कर रहा था । क्लास में भी दूर बैठने लगा था।

ग्यारहवीं की परीक्षाएं आ रहीं थी अतएव दो माह के लिए कोचिंग क्लासेज बन्द होने वाली थीं। वह चित्रा से नजरें चुरा कर शीघ्रता से क्लास रूम से बाहर निकल आया था। नंदन मेहरा भी तेजी से उसके पीछे लपका। चित्रा ने दोनों को बाहर जाते देख लिया था।

चिकने कब तक तड़पायेगा, जाने से पहले एक बार तो देता जा। नंदन उसका रास्ता रोक कर कह रहा था।

तड़ाक, नंदन के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा पड़ा। दोनों के बीच चित्रा खड़ी थी नंदन भाग खड़ा हुआ। चित्रा उसका हाथ पकड़़ कर एक तरफ ले गई। वह कुछ बोल नहीं सका। आँखों से आँसू बह रहे थे। चित्रा भी रो रही थी । समय का कैसा फेर है ये, देश में दामिनियां भी सुरक्षित नहीं है, और तो और लड़के भी। लड़कों का दिखने में अच्छा होना भी कितना बड़ा अभिशाप है ।

देवास जाने से पहले चित्रा और ऑण्टी ने उसे ट्रेन में बिठा कर रवाना किया। पूरी यात्रा में चित्रा की याद उसके साथ बनी रही। वह कितना बौना है उसके सामने। कहने को मर्द है लेकिन जरा सी परेशानी में ही टूटने लगा था। चित्रा तो उसके लिए बिना कुछ सोचे किस तरह भिड़ गई थी नंदन से। अगर नंदन उसके साथ कुछ कर बैठता तो, सोचकर ही उसकी हृदय-गति बढ़ गई। अब कभी वह चित्रा को दुख नहीं पहुंचायेगा, हाथ जोड़कर माफी मांगेगा उससे। उसने अपने सबसे अच्छे मित्र को बहुत दुख पहुंचाया है। चित्रा से माफी जरूर मांगेगा। वह बहुत भली है। माफ कर देगी ।

दो माह पंख लगाकर उड़ गए। माँ और सांभवी उसे कोटा तक छोडऩे आए। दो दिन साथ में रहे। पर सांभवी चित्रा से नहीं मिल पाई, वह तब तक कोटा नहीं आई थी। माँ का जाना जरूरी था। वह पापा और दादी को ज्यादा दिन अकेला नहीं छोड़ सकती थी।

कुछ दिन और बीत गये। नंदन जो घर गया तो फिर लौट कर ही नहीं आया। सामना होने पर उसका दोस्त सुरेश भी नजरें नीची किए निकल लेता।  आईआईटी मेंस का रिजल्ट आ गया। उसे अच्छे माक्र्स मिले थे लेकिन देवांग इस बार भी असफल हो गया था। वह इम्तहान देने के लिये घर गया था तो लौट कर ही नहीं आया था। शायद उसे पता था कि उसका रिजल्ट क्या आने वाला है। कोचिंग, पढाई और चित्रा के साथ उसकी दिनचर्या इतनी व्यस्त थी कि उसे देवांग के बारे में सोचने का ज्यादा समय ही नहीं मिला।

   एक दिन जब वह कोचिंग से वापस लौटा तो आण्टी उसे बाहर ही मिल गईं। उन्होंने उसे बताया कि देवांग अब नहीं आएगा। उसके पापा ने आठ-दस लाख का कर्ज लेकर उसे कोचिंग के लिए कोटा भेजा था। तीन बार में भी जब वह मेंस ही क्लीयर नहीं कर पाया तो हताशा में और कर्जदारों के दवाब के चलते उसके पापा ने ट्रेन से कटकर आत्महत्या कर ली। आज ही उसके अंकल उसका सारा सामान ले गए हैं । सुनकर उसे रोना आ गया। आँखों के सामने अंधेरा घिरने लगा। यदि आण्टी ना संभालती तो वह गिर ही जाता। उस दिन आण्टी ने उसे कमरे में नहीं जाने दिया। नीचे अपने पास ही सुलाया, अपने हाथों से ही उसे खाना खिलाया । रात में उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- शशांक तुम बहुत बहादुर बच्चे हो और समझदार भी, मैंने तुम्हें बहुत जिम्मेदारी से सब काम करते देखा है । हर परिस्थिति से जूझने की ताकत है तुममें। आज तुम्हारे पापा का फोन आया था, दादी नहीं रहीं। वह एकदम चौंक कर उठ बैठा - क्या कह रहीं हैं आण्टी आप। मम्मी ने तो कुछ नहीं बताया मुझे। दोपहर में ही बात हुई थी उनसे। मेंस के रिजल्ट के बारे में बताया था।

इसके बाद ही तुम्हारे पापा का फोन आया था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि तुम्हारी खुशी के क्षणों में वह ये दुखद खबर कैसे दें। तुम्हारी दादी भी चाहती थीं कि तुम्हें डिस्टर्ब ना किया जाए तभी उन्होंने उनकी बीमारी की खबर भी तुमको नहीं दी थी, कहते हुए आण्टी ने उसे अपने सीने से लगा लिया। वह धीरे-धीरे सुबक रहा था। आण्टी ने कहना जारी रखा, अब तुमको दादी की इच्छा पर भी खरा उतरना है। पापा चाहते हैं कि तुम अपनी कोचिंग पर फोकस करो और इस दुख को अपनी राह में आड़े ना आने दो।

जब वह कुछ संयत हुआ तो उसने सांभवी को फोन लगाया - छुटकी तुमने भी मुझसे दादी की बीमारी की बात छुपा कर रखी, कहते कहते वह रो दिया, मैं दादी को देख भी नहीं सका।

उसे दो दिन लग गये सामान्य होने में। इस दौरान चित्रा ने उसे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा। दादी की मौत ने उसे बहुत दुख पहुंचाया था। पर उसका निश्चय और दृढ़ हो गया था। उसे जीतना ही है, अपने लिये, दादी के लिए, पापा के लिये, चित्रा के लिये और देवांग के लिये भी। देवांग के लिए इसलिए भी ताकि भविष्य में कोई देवांग बनने कोटा न आए। जब अगले मंथली टेस्ट का परिणाम आया तो वह क्लास में सबसे आगे था । इतना आगे कि दूसरे स्थान पर आने वाली चित्रा उससे पूरे दो अंक पीछे थी। चित्रा से आगे निकल जाना उसे अच्छा तो नहीं लगा था पर चित्रा खुश थी। इसके बाद तो हर टेस्ट में पहले दो स्थान उन दोनों ने अपने लिए सुरक्षित कर लिए। कभी वह आगे रहता तो कभी चित्रा।

आईआईटीएडवांस का जब रिजल्ट आया तो दोनों ही प्रथम पचास बच्चों में स्थान बनाने में सफल रहे। वह सोच रहा था कि कुछ बनने के सफर में कितना कुछ छूट जाता है पीछे। ना वह परिवार की खुशियों में सम्मिलित हो सका और ना दुख के क्षणों में वह परिवार का साथ दे सका। समय चलता है तो चीजों भी पीछे छूटती चलती हैं - उसने बहुत कुछ खोया है पर दूसरे नजरिये से देखें तो जिंदगी के सही मायने भी सीखे हैं - हार ना मानने के, हर हाल में हौसला कायम रखने के, टूटने के क्षणों में स्वयं को सहेज कर रखने के, और सबसे बड़ी बात अपने लिए सही मित्र चुनने के। उसे चित्रा ना मिली होती तो नंदन मेहरा उसका मानसिक शोषण करता रहता या फिर वह भी जतिन मिश्रा या भुवन काले की प्रतिकृति बन जाता या कोई खत्री अंकल उसे देवांग बना सकते थे। सब कहते ही हैं यह उम्र होती ही है बहकने की। कोचिंग में तो केवल विषय सिद्धि ही सिखाई जाती है असली कोचिंग तो जिंदगी का सार समझने की है जिसे कोई सिखाता नहीं है स्वयं सीखना होता है ।