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Wednesday 13 Nov 2019

साहित्य का भविष्यवाद

उत्तर आधुनिकता के पश्चिमी पण्डों ने भविष्यवाद का नारा क्या दिया, दुनिया भर में भविष्य-भविष्य का ऐसा घनघोर गर्जन हुआ कि क्या ज्ञान-विज्ञान और क्या कला-साहित्य, सभी के गली-कूचे से लेकर मैदानों-महलों तक भविष्यवाद के ही नगाड़े बजने लगे। भारतीय प्रज्ञा तो मूल रूप से सांस्कृतिक-प्रज्ञा है और संस्कृति को हमने अतीत की ही वेशभूषा में लपेट रखा है, इसलिए हमें साहित्य, कला, ज्ञान-विज्ञान आदि सभी जगह अतीत का ही पुतला दिखाई देता है। हमारे साहित्यकारों को भी या तो अतीत से उल्फ़त है या फिर वर्तमान के बोझ तले दबे दबे वे भविष्य की ओर ना जाने किन उम्मीदों से ताक रहे हैं, जबकि पश्चिम के लोगों ने पश्चिम के ही यमलोक में साहित्य, साहित्यकार, इतिहास, पाठक, पुस्तक, पुस्तकालय आदि सबको पटक कर इन सबकी मृत्यु की ऐसी घोषणा कर दी है कि अब साहित्य पैदा ही कैसे हो, अगर हो भी तो वह हमारे वर्तमान या आज के लिए न होकर ऐसे भविष्य के लिए हो जिसका चेहरा ही अभी साफ नहीं है। साहित्य का मानवीय भविष्य मशीनी भविष्य की ओर जा रहा है।

मनुष्य ने अपने दिमाग में तीन काल-अतीत वर्तमान और भविष्य के नामों से बिठा रखे हैं। अतीत का मोह तो सारी दुनिया में है- एक अबीसीनियन कवि एगथन ने तो यह तक कह दिया था कि ''भगवान भी अतीत को बदल नहीं सकता''। चीनी दार्शनिक कंफ्यूशस भी कहता था- ''अगर भविष्य को दिव्य बनाना है, तो अतीत का अध्ययन करो''। वर्तमान को लेकर भी बड़ी उदास प्रतिक्रियाएँ अक्सर जाहिर की जाती हैं। होरेस नाम का एक विचारक काव्य-शास्त्री तो अक्सर कहता था-'' वर्तमान जैसा तो कोई वक्त होता ही नहीं। यह भी भूल जाओ कि भविष्य जैसी कोई चीज है। भविष्य आपको क्या देगा, यह गिनना छोड़ दो और भविष्य की उम्मीद पर जीना छोड़ दो।''

साहित्य के भविष्य के अनेक सदमे हो सकते हैं। एल्विन टॉफलर ने अपनी दो पुस्तक- द फ्यूचर शॉक और द थर्ड वेव में इन सदमों को गिन-गिन कर चुना है। क्या हमारा समकालीन साहित्य ऐसा है जो अपने वर्तमान से भविष्य की यात्रा कर सके और साहित्य भविष्य में जिन्दा रह कर पठनीय और संरक्षणीय बना रहे? जब फूकूयामा, और मिशेल फूको इतिहास का ही अवसान घोषित कर रहे हैं, रोर्टी साहित्यकार का अंत बता रहा है और नायपाल जिसका समर्थन कर रहा है, तो क्या हमारा साहित्य भविष्य की प्राणवायु गृहण कर सकेगा? वर्ष 1931 में ही एल्ड्यूअस हक्सले ने भी अपने उपन्यास 'द ब्रेव न्यू वल्र्डÓ में भविष्य के डर गिनाए थे, पृथ्वी पर आबादी का आतंक, पर्यावरण और पानी के विनाश एवं भूकंपों से थरथराती पृथ्वी, मनुष्य की भौतिक दौड़ में नैतिक जीवन की बलि और स्त्री-उत्पीडऩ से ग्रस्त समाज यदि ये सब भविष्य के खतरे हैं तो हमने ही क्या पूरे संसार ने, क्या ऐसा साहित्य रचा जो पृथ्वी प्रकृति और मनुष्य सबको भविष्य में जीने का आश्वासन दे सके? हक्सले ने भविष्य के अन्य कई खतरे बताये थे, जैसे- क्वालिटी और मॉरेलिटी या गुणवत्ता और नैतिकता का संख्या एवं मात्रा के आगे विनाश, अति-संगठनवाद, लोकतांत्रिक समाज में केवल प्रचार ही प्रचार, वस्तु विक्रय में विज्ञापनवाद की कला दिमागी कट्टरपन, रासायनिक प्रयोग, चेतना में गिरावट, मीडिया का अतिवाद, मुक्ति की शिक्षा आदि।

यदि हम अतीत में झाँके तो तुलसीदास मध्यकाल से चलकर आज तक अपनी सम्पूर्ण लोकप्रियता से जीवित हैं। कबीर अभी भी बाज़ार में खड़ा समाज के पाखण्डों को चुनौती दे रहा है, प्रेमचन्द के बाद कहानी कितनी भी अधिक प्रयोगशील और उत्कृष्ट हुई हो, मगर प्रेमचंद को भविष्य के कथाकार के रूप में क्या वह निरस्त कर सकती है? यदि अतीत अपने वर्तमान से छलांग लगाता हुआ भविष्य की रचना का विश्वास देता रहा है, तो क्या हमारी पूरी छायावादी, राष्ट्रवादी, प्रगतिवादी, मानववादी तथाकथित मानव-चेतना इन कालों के कवि, कथाकारों, आलोचकों आदि के लिए भविष्य का भी कोई लोकमंच रचती है? संभवतया प्रसाद की 'कामायनीÓ, निराला की 'राम की शक्तिपूजाÓ या अज्ञेय, मुक्तिबोध, निर्मल वर्मा जैसे कुछ साहित्यकार अपने साहित्य के साथ भविष्य में प्रस्थान कर सकें, वर्ना जिस गति से पुस्तकें छप-छप कर साहित्य का एक बड़ा कूड़ादान पैदा कर रही हैं, उससे तो लगता है भविष्य अगर होगा तो विज्ञान का होगा, ज्ञान का होगा, तकनीक या प्रौद्योगिकी का होगा, डिजिटल-अर्थशास्त्र का होगा, सूचना-क्रांति का होगा, यहाँ तक कि भारतीय कलाओं में नृत्य और संगीत एवं फिल्म का भी होगा, मगर साहित्य का भी होगा ऐसा कह पाना तो विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता। हमने टॉफलर, हक्सले, स्टीफेन हाकिंग आदि को पढ़ कर चिन्ता करना तो सीख लिया, मगर उनकी चेतना से लोकसंवेदी साहित्य का निर्माण कहाँ किया?

एल्विन टॉफलर के विचारों से जो डर एवं सदमे पैदा किए गए हैं उनको क्या हम भविष्य का साहित्य रचकर समाप्त कर सकते हैं? वह कहता है अतीत से मोहभंग होगा, तो क्या हमने अतीत से मोहभंग के विरूद्ध का साहित्य रचा? वह कहता है भविष्य के लोग साहित्य से विमुख होंगे? क्या हमने ऐसा रचा जो टॉल्सटाय, शेक्सपीयर, तुलसीदास के साहित्य की तरह भविष्य में भी पाठक-मुखी बना रहे? वह यह भी कहता है कि हम अपने अनुभवों को भी समय में कैद करके उसकी सीमा तय कर देंगे, क्या अनुभव से सीमाओं को खंडित करने का साहित्य हम रच सकें? वह कहता है एक प्रकार की किराया-क्रांति आएगी, घर, बाजार, हमारे पहनने-ओढऩे के कपड़े, शादी के जोड़े, वाहन आदि सब किराये से मिलेंगे और यौन-तृप्ति के लिए किराये पर लिव इन रिलेशन होंगे या कांट्रेक्टर लिविंग यानी ठेके पर प्यार और सेक्स उपलब्ध होंगे, क्या इस किराया क्रांति के दुष्परिणामों के विरूद्ध कोई साहित्य रचा गया? यह भी कहा गया कि स्थायित्व की मृत्यु हो जाएगी और भविष्य में हम घुमन्तू बंजारों की तरह आव्रजन करेंगे तो क्या भविष्य का ऐसा साहित्य हम रच सके जो स्थायी साहित्य होगा न कि, वह तुरंत पैदा होगा और तुरन्त मर जाएगा। पुस्तकें अगर अपने पढ़े जाने की प्रतीक्षा करते करते ग्रंथालयों या घरों में दीमकों का भोजन बन गईं तो क्या एक पुस्तक-विरोधी समाज पैदा नहीं होगा? टाफलर के कई अतिवादी निदान और निराकरण हैं। वह कहता है भविष्य हत्याओं आत्महत्याओं और चलते रास्ते वाहनों से लिफ्ट मांग कर यात्रा करने का होगा, यहाँ तक कि भूगोल की भी दुखद मृत्यु इस रूप में हो जाएगी कि दुनियाभर के देश आतंकवाद एवं नये हिंसक और गुप्त युद्ध से सीमाओं को कुचल कर रख देंगे। टाफलर यह भी कहता है कि हमारे पास अपने आत्मीय लोगों, मेहमानों का ठीक से स्वागत करने का भी समय नहीं होगा, हम नए मगर बहुत ही क्षणिक मित्र चुनेंगे और स्थायी दोस्तों को त्यागने के मौके ढूँढेंगे, बच्चे पैदा करेंगे मगर परवरिश की जिम्मेदारी किसी अन्य पर छोड़ देंगे, और तो और जीन्स बैंकों में टेस्ट-ट्यूब से माँ-बाप रहित संतानों का जन्म होगा। क्या ऐसे में बच्चों का बाप टेस्ट ट्यूब और माँ लेबोरेट्री होगी? हमारे पास एक प्रकार का नया यांत्रिक ऊर्जा तंत्र तो होगा मगर क्या हम ऐसे ऊर्जा तंत्र के प्रति आगाह करने वाला साहित्य रच रहे हैं? अब जो कुछ हो रहा है वह ऐसा लग रहा है जैसे जीव-जन्तु, मनुष्य सबके लिए बायोलाजिकल फेक्टरी विकसित की जा रही है, जहाँ सभी जीव-जन्तु एवं मनुष्य क्लोन्स में बदल जाएँगे और क्या अब भविष्य के ये ही विषय साहित्य की किसी फेक्टरी में साहित्य बनेंगे? अर्थात क्या साहित्य भविष्य में वह होगा जो पढ़े जाने के बजाए कम्प्यूटर के परदे पर देखा जाएगा?

साहित्य का भविष्य वर्तमान के सद्मों से ग्रस्त है। न हमारे पास अब बड़ा दार्शनिक, विचारक, संत, नेता और सर्जक है, न ऐसी कोई महान कृति जो वर्तमान की विकृतियों से टकरा कर भविष्य को सृजन की नई कल्पना, नया व्योम या नई पृथ्वी दे। क्या हमारा साहित्य भविष्य में स्मरण के योग्य बनेगा? भविष्य का साहित्य क्या रोबोट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टीवी चेनल्स और तकनीकी तमाशों का साहित्य होगा या मनुष्य को आज के मनुष्य से अधिक बड़ा मनुष्य बना देने का साहित्य? हम विज्ञान से यह उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि वह तो यांत्रिक संवेदना का तंत्र है, मगर साहित्य से तो यह उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य का साहित्य यांत्रिक न होकर, वर्तमान से बड़ा साहित्य हो और साहित्य की मृत्यु की घोषणा करने वाले पश्चिम को यह बता सकें कि साहित्य अतीत का हो, वर्तमान का हो, या भविष्य का, वह जीवन का पर्याय है, मृत्यु का नहीं। भविष्य का साहित्य वही होगा जो जीवन का साहित्य होगा न कि मृत्यु का। भविष्य के साहित्य का सबसे बड़ा खतरा तो भाषा है। टॉफलर ने पहले ही कह दिया था-भाषा का रूप अत्यन्त लघु हो जाएगा जिसे एब्रीविएशंस कहते हैं। क्या आगामी कविता, कहानी की भाषा एब्रिविएशंस में होगी। यदि भाषा की हत्या इस रूप में कर दी गई तो साहित्य का भविष्य जहाँ दम तोड़ देगा, वहीं भविष्य के साहित्य के लिए ऐसे रचनाकार पैदा होंगे जो साहित्य को सृजन के बजाए उत्पाद बना दें। और खतरा यह है कि हमारी अपनी भाषा ही अगर मर गई तो फिर हमारा भी भविष्य क्या होगा और भविष्य का साहित्य क्या होगा! 

उत्कृष्ट साहित्य तो वह होता है जो अपने समय में प्रासंगिक और पढ़ा जाने योग्य हो और भविष्य भी जिसका सुरक्षित हो। जिस प्रकार हमारे लोकगीत, लोक कलाएँ, लोकाचार, हमारी दंत कथाएँ, उपनिषदों और पुराणों की कथाएँ आज तक प्रचलित और लोकप्रिय हैं। वैसा कोई पंचतंत्र, जातक-कथा या लोक-कथा हम भविष्य को दे सकेंगे भविष्य आखिर सच पूछा जाए तो न काल है न स्पेस। वह एक वर्चुअल टाइम या काल्पनिक समय है। भविष्य का साहित्य तभी साहित्य कहला सकता है जब वर्तमान का साहित्य वर्तमान को पार करने की ताकत रखता हो, वर्ना साहित्य का भविष्य कम्प्यूटरों के नेटवर्क और वेबसाइट को सौंप कर हम भी कर दें अपने वर्तमान साहित्य की अंत्येष्ठि की घोषणा और भविष्य में वर्तमान की मौन का शिलालेख लेकर पहुँचे। भविष्य का साहित्य अगर सचमुच नए विषय, नए शिल्प, नए तेवर, नई भाषा और नए विचार से रचा जाकर यांत्रिक या तकनीकी तानाशाही से बच सका तो हो सकता है हमारा आज का साहित्य भी आगामी कल का साहित्य हो जाए वर्ना वर्तमान को अंतत: अतीत का दास बन कर अतीत के ही विश्राम-घाट पर जाकर स्मृति-विहीन होने को मजबूर होना पड़ेगा। हमें सोचना होगा कि हमारे पूर्वजों ने तो भविष्य-पुराण तक रच दिया था और उन्होंने जो साहित्य रचा वह अतीत से वर्तमान की यात्रा करता हुआ भविष्य का भी साहित्य बन गया। हमें अब स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि क्या हम जो साहित्य रच रहे हैं, वह भविष्य तक जाकर जि़न्दा रह सकेगा?