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Wednesday 20 Nov 2019

प्रस्तावना

जनवरी से नए साल की शुरूआत होती है। पाठकों को कोई उपहार देने के लिए यह एक बेहतर समय है। यही सोचकर आज मैं एक ऐसी पुस्तक की चर्चा करना चाहता हूं जिसका शीर्षक ही द गिफ्ट  अर्थात उपहार है। वैसे पुस्तक का पूरा शीर्षक द गिफ्ट ऑफ एंगर है, किन्तु इसका भारतीय संस्करण संक्षिप्त नाम से ही छपा है। आप समझ गए होंगे कि चर्चित पुस्तक अंग्रेजी की है। मैं सामान्य तौर पर हिन्दी पुस्तकों की चर्चा करते आया हूं। गो कि समय-समय पर अन्य विषयों को भी मैंने उठाया है लेकिन 2018 में तो इस स्तंभ में सिर्फ पुस्तक चर्चा ही हुई है। मैं आपके साथ यह जानकारी भी साझा करना चाहूंगा कि करीब एक माह पूर्व दिसम्बर 2018 में मैंने जब द गिफ्ट को पढ़ा तो यह पुस्तक मुझे इतनी पसंद आई कि मैंने इसकी तीस प्रतियां खरीदीं और उपहार में परिवार के सदस्यों और मित्रों को भेंट कीं।

मुझे यदा-कदा जब कोई पुस्तक बहुत अच्छी लगती है तो मैं उसकी पांच-सात प्रतियां भेंट देने के लिए अक्सर खरीदता हूं। रूद्रांशु मुखर्जी की नेहरू एंड बोस : टु पैरेलल लाइव्•ा, नयनतारा सहगल की नेहरू : सिविलाइजिंग अ सेवेज वल्र्ड दो ऐसी ही पुस्तकें थीं। साने गुरुजी की भारतीय संस्कृति की तो मैंने एक साथ सौ प्रतियां भेंट देने के लिए खरीदी थी। आप जानना चाहेंगे कि द गिफ्ट में ऐसा क्या खास है। सबसे पहले तो यह बता देना चाहिए कि यह पुस्तक महात्मा गांधी के जीवन दर्शन पर आधारित है। दूसरा उल्लेखनीय तथ्य है कि इसके लेखक गांधी के पौत्र अरुण गांधी हैं। दक्षिण अफ्रीका में जन्मे-बढ़े अरुण ने परिस्थितिवश कई साल भारत में गुजारे और अब वे विगत कई वर्ष से अमेरिका में रहते हैं। उनके भारतवासी पुत्र तुषार गांधी के नाम से आप परिचित ही होंगे!

कहने की आवश्यकता नहीं होना चाहिए कि महात्मा गांधी स्वयं एक महान लेखक और पत्रकार थे। उन्होंने देश और दुनिया के प्रश्नों पर जितना विपुल लेखन किया उतना उनके मानसपुत्र और राजनैतिक उत्तराधिकारी जवाहरलाल नेहरू के सिवाय शायद दुनिया के किसी और राजनेता ने नहीं किया। यही नहीं, गांधीजी पर जितनी किताबें लिखी गई हैं वह भी अपने आप में एक रिकॉर्ड है। उन पर उनके जीवनकाल में ही पुस्तकें लिखना प्रारंभ हो गया था। मुझे याद आता है कि रायपुर के विद्वान राजनेता रामदयाल तिवारी ने 1937 में गांधी मीमांसा शीर्षक से एक वृहद ग्रंथ लिखा था। यह सिलसिला अब तक चला आ रहा है। हर साल गांधीजी पर दो-चार नई किताबें आ ही जाती हैं। द गिफ्ट ऑफ एंगर 2017 में प्रकाशित हुई थी। मुझे विश्वास है कि इसके बाद भी कुछ और पुस्तकें आ गई होंगी जिन्हें मैं नहीं देख पाया हूं।

एक रोचक तथ्य की ओर ध्यान जाता है। गांधीजी के सबसे छोटे बेटे पत्रकार देवदास गांधी, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के दामाद थे। राजा जी स्वयं उद्भट विद्वान एवं लेखक थे। उनकी लिखी दशरथनंदन श्रीराम  व महाभारत कथा  की लाखों प्रतियां बिकी हैं। वे तमिल भाषा के एक मान्य कथाकार भी थे। उनके कहानी संकलन कुब्जा सुंदरी का हिन्दी रूपांतरण दशकों पहले प्रकाशित हुआ था। गांधी के पौत्र, राजाजी के नवासे और देवदास भाई के तीनों बेटों ने साहित्य जगत में अपनी पहचान कायम की। शांति निकेतन में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहे रामचन्द्र गांधी की पुस्तक सीता की रसोई काफी चर्चित हुई थी। राजमोहन गांधी ने भारत के राजनैतिक इतिहास के विभिन्न आयामों पर दर्जनों किताबें लिखीं हैं। गोपाल गांधी ने विक्रम सेठ के उपन्यास अ सूटेबल ब्वाय का हिन्दी में अनुवाद कोई अच्छा सा लड़का शीर्षक से किया था। वे अखबारों में निरंतर स्तंभ लेखन कर रहे हैं।

राजमोहन गांधी ने लगभग दस-ग्यारह वर्ष पूर्व महात्मा गांधी पर एक विशद जीवनीपरक ग्रंथ की रचना की थी जिसका सीधा-सादा शीर्षक था- मोहनदास। इसमें राजमोहन ने बेहद संतुलन और सावधानी के साथ अपने  महान पितामह के जीवन का तटस्थ विश्लेषण किया था।  गांधीजी को समझने के लिए यह एक अत्यंत उपयोगी ग्रंथ है। इस सिलसिले को बापू के दूसरे पुत्र मणिलाल के बेटे अरुण गांधी ने अपनी तरह से आगे बढ़ाया है। पुस्तक का आकार बहुत बड़ा नहीं है। लगभग तीन सौ पेज में पूरी बात कह दी गई है, लेकिन अपने आप में यह एक संपूर्ण ग्रंथ है। जिस सरलता के साथ अरुण गांधी ने द गिफ्ट में महात्मा जी के जीवन दर्शन को समझाया है वह अद्भुत व अभिनंदनीय है।

महात्मा गांधी 1916 में भारत लौट आए थे, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में वे अपने पीछे बेटे मणिलाल को उनके परिवार सहित छोड़ आए थे ताकि फीनिक्स आश्रम व उनके विचारों के अनुरूप अन्य कार्य जारी रहे। अरुण गांधी की आयु 1945 में बारह वर्ष की थी जब वे माता-पिता और छोटी बहन इला के साथ भारत आए। ऐसी कुछ योजना बनी कि बारह वर्षीय अरुण दो साल बापू के साथ रहेंगे। और यहीं से पुस्तक की शुरूआत होती है। अरुण लिखते हैं- मैं बहुत क्रोधी स्वभाव का था और मेरे लिए यह शायद ठीक समझा गया कि मैं अपने विश्व प्रसिद्ध दादा याने बापू जी के साथ उनके आश्रम में रहूंगा तो मेरे स्वभाव में वांछित बदलाव आएगा।  सेवाग्राम में गांधीजी के सानिध्य में रहते हुए अरुण गांधी के न सिर्फ स्वभाव में परिवर्तन आया, बल्कि उन्हें गांधी जी के विचारों, कार्यक्रमों व दर्शन को समझने का भी नायाब अवसर मिला।

वे एक रोचक किस्सा बयान करते हैं। प्रारंभ में कुछ समय छोटी-बहन इला भी सेवाग्राम में साथ थी। आश्रम में स्वाभाविक ही सादा भोजन बनता था। लेकिन अरुण और इला इस बात से परेशान हुए कि सुबह, दोपहर, शाम खाने में सिर्फ कुम्हड़ा या कद्दू की सब्जी ही बनाई जाती थी। रोज-रोज एक ही सब्जी खाकर इन बच्चों को उससे अरुचि होने लगी। उन्हें यह देखकर भी आश्चर्य होता था कि सारे आश्रमवासी बिना शिकायत किए वही सब्जी खा लेते थे। छह वर्षीय इला से एक दिन जब रहा नहीं गया तो उसने बापू से शिकायत की कि हमें हर दिन एक ही साग क्यों खाना पड़ता है। इसे सुनकर स्वयं गांधी भी आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने आश्रम के प्रबंधक को बुलाकर पूछताछ की। जवाब मिला- आपने ही तो कहा था कि आश्रम की जमीन पर जो पैदावार होती है उसी का इस्तेमाल किया जाए। इस साल कद्दू की पैदावार भरपूर हुई है, उसे खपाने के लिए तीनों वक्त उसे पकाया जा रहा है। तब गांधी जी ने निर्देश दिया कि जो अतिरिक्त पैदावार है उसे पास के गांव ले जाओ और वहां किसानों से विनिमय कर दूसरी सब्जियां ले आओ।

इस प्रसंग का उल्लेख कर अरुण गांधी ने गांधीजी के जीवन के दो पहलुओं को स्पष्ट किया है। एक तरफ तो पता चलता है कि वे सादगी और मितव्ययिता में विश्वास करते थे, लेकिन दूसरी ओर उनमें व्यावहारिक समझ भी थी। अरुण इसके साथ यह भी स्पष्ट करते हैं कि आश्रम में रहने वाले और गांधीजी की भक्ति करने वाले सारे लोग एक तरह के नहीं थे। एक ओर जहां बड़े-बड़े विद्वान और विचारक उनके पास आते थे वहीं तीसों दिन कुम्हड़े की सब्जी पकाने वाले मूर्ख भी थे।

द गिफ्ट  में कुल जमा तेरह अध्याय हैं जिनमें से ग्यारह अध्याय को उन्होंने पाठ की संज्ञा दी है। इन ग्यारह पाठों के शीर्षक ही एक प्रकार से गांधी दर्शन को समझने की कुंजी है। इनका नामोल्लेख करने से बात स्पष्ट हो जाएगी। पाठ-1) क्रोध का इस्तेमाल बेहतरी के लिए करो। पाठ-2) अपनी बात निर्भय होकर कहो। पाठ-3) एकांत का मूल्य समझो। पाठ-4) खुद अपनी कीमत जानो। पाठ-5) झूठ सिर्फ कबाड़ है। पाठ-6) अपव्यय हिंसक है। पाठ-7) बच्चों का लालन-पालन अहिंसात्मक हो। पाठ-8) विनम्रता में ताकत है। पाठ-9) अहिंसा के पांच स्तंभ। पाठ-10) परीक्षा देने तैयार रहो। पाठ-11) वर्तमान के लिए पाठ। इनमें से प्रत्येक पाठ को अरुण गांधी ने एक-एक अध्याय में विस्तारपूर्वक और कई जगह उद्धरण देकर समझाया है। इसमें उन्होंने यह चर्चा भी की है कि अपनी जीवन यात्रा में गांधी की ही सीख उन्हें कब, कहां, कैसे काम में आई।

पहले पाठ में ही वे एक मर्मस्पर्शी अनुभव का वर्णन करते हैं। 1955 में अरुण किसी कारणवश दक्षिण अफ्रीका से भारत आए। यहां उन्हें आकस्मिक सर्जरी के लिए अस्पताल में दाखिल होना पड़ा। अपनी नर्स सुनंदा से प्रेम कर विवाह में परिणति हुई। दक्षिण अफ्रीका की तब की रंगभेदी सरकार ने उनकी पत्नी को वी•ाा देने से इंकार कर दिया। मजबूरी में अरुण गांधी को भारत में रुकना पड़ा। रोजगार की तलाश करना पड़ी। कोई दस बरस बाद वे अपने एक मित्र को लेने जहाजघाट गए। उसी जहाज से उतरे एक गोरे यात्री ने उनका हाथ पकड़कर जानना चाहा कि वह एक सप्ताह के लिए भारत आया है और क्या वे बंबई देखने में उसकी मदद कर पाएंगे। उसने अपना परिचय दिया कि वह दक्षिण अफ्रीका का संसद सदस्य जैकी बैसन है। अरुण को उसका परिचय जानकर बहुत गुस्सा आया। सोचा कि इस गोरे को एक थप्पड़ रसीद करूं। इन्हीं लोगों के बनाए कानून के चलते मैं अपनी पत्नी के साथ दक्षिण अफ्रीका वापिस नहीं जा पा रहा हूं।

यह गुस्सा क्षणिक था। लेखक को गांधी जी की सीख याद आई। उसने सांसद बैसन से कहा कि मैं आपकी सरकार की नीतियों का विरोधी हूं। लेकिन आप मेरे शहर में अतिथि हैं सो मेरा कर्तव्य बनता है कि आपके प्रवास को सुखद बनाने में मदद करूं। अरुण और सुनंदा गांधी ने  श्री एवं श्रीमती बैसन का पूरा ख्याल रखा। उन्हें बाम्बे की सैर कराई। वे जब जाने लगे तो बैसन ने अरुण से कहा कि तुमने मेरी आंखें खोल दी हैं। मेरे देश में रंगभेद की जो बुराई है उसे मैं समझ गया हूं। देश लौटने के बाद में उसका विरोध करूंगा। और ऐसा ही हुआ। सांसद बैसन ने रंगभेद के खिलाफ खुलकर बोलना शुरू किया। इससे गौरांगों के बीच उनकी निंदा होने लगी इसके चलते वे अगले चुनाव में हार गए, लेकिन उन्होंने न्याय और समता का पक्ष लेना नहीं छोड़ा।

द गिफ्ट सरल भाषा में लिखी एक ऐसी पुस्तक है जो गांधीजी के माध्यम से सार्थक जीवन जीने के सूत्र देती है। वैसे तो मैं चाहूंगा कि हर व्यक्ति इस पुस्तक को पढ़े, लेकिन युवा पीढ़ी के लिए इसका विशेष महत्व है। फर्जी साधुओं, महात्माओं और स्वयंभू भगवानों के झांसे में पडऩे के बजाय अगर हम गांधी के रास्ते पर चलें तो एक बेहतर समाज की रचना संभव करना कुछ आसान हो जाएगा।