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Wednesday 24 Apr 2019

सपनों के कवि त्रिलोचन शास्त्री

त्रिलोचन! हां, मतलब त्रिलोचन शास्त्री। वही त्रिलोचन जिन्हें हिंदी कविता के इतिहास में 'सॉनेट' का साधक माना जाता है। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कटधरा चिनारी पट्टी गांव में 20 अगस्त 1917 को जन्मे त्रिलोचन की असली पहचान सिर्फ इसमें नहीं है कि आपकी कविताओं के कुल सत्तरह संग्रह हैं या आप हिंदी, संस्कृत अरबी-फारसी के कितने मर्मज्ञ थे। इसलिए भी नहीं कि आपने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम. ए. करने के बाद लाहौर से संस्कृत में शास्त्री की उपाधि ली और उसके बाद शास्त्री बन गये। ऐसी बहुत सारी बातें आपके जेहन में होंगी जिनके आधार पर आप इन्हें याद करते होंगे। किन्तु मैंने जिस रूप में इन्हें जाना है उसके पीछे एक क्षेपक का उल्लेख जरूरी है, जो निम्नलिखित है-

1980-81 की बात है। यूपी कॉलेज वाराणसी के छात्रावास नंबर-4 में रहता था मैं। छात्रावासों में कुछ शब्द पीढिय़ों से चले आते हैं। बच्चे उसका इतिहास जाने बगैर प्रयोग करते रहते हैं। इसी परंपरा का पालन करते हुए हम लोग उस छात्रावास के एक बिहारी पहलवान रामबचन सिंह को त्रिलोचन भी कहते थे। रामबचन सिंह का असली परिचय यह है कि वे मेस में सबसे पहले भोजन करने पहुंचते थे और लगभग सभी साथियों के भोजन करने तक साथ देते थे। वार्डेन साहब (श्रीप्रकाश सिंह जी) के आदेशानुसार उनकी थाली में रोटियां गिनकर नहीं, नापकर रखी जाती थीं। मतलब यह कि एक बीते की ऊंचाई तक जितनी रोटियां आ जाती थीं, उतनी पहली बार में दी जाती थीं। उसके बाद भी यदि पहलवान जी दुबारा (भोजपुरी में ओड़ावन या उड़ावन) मांगते थे तो कम से कम आधे बीते की ऊंचाई तक रोटियां पुन: दी जाती थीं। उसी अनुपात में दाल-सब्जी और अन्य चीजें भी। इतना सब खाने के बाद भी एक बार जब वे अंतर छात्रावासी दंगल में पराजित हो गए थे तब हमलोग उन्हें घुसियाते हुए अखाड़े से अपने छात्रावास में लाये थे।

इस क्षेपक का संबंध त्रिलोचन शास्त्री से है। यह संबंध मुझे तब पता चला जब मैंने काशीनाथ सिंह जी की पुस्तक 'याद हो कि न याद हो' पढ़ी। मेरे से लगभग चालीस साल पहले (1940) नामवर सिंह जी भी यूपी कालेज के किसी छात्रावास में ही रहते थे। त्रिलोचन जी और नामवर जी बचपन के इयार थे। इसलिए एक बार नामवरजी ने त्रिलोचन जी को अपने छात्रावास में बुलाया था। छात्रावास का रसोइया, जिसे वहां महाराज कहा जाता है, अभी नया-नया, शायद उसी दिन काम संभाला था। त्रिलोचनजी को खिलाने लगा। खाने लगे शास्त्रीजी....एक-दो-दस-बीस नहीं, सौ से भी अधिक रोटियां अकेले खा गये थे। कहते हैं कि उसके बाद सुबह ही रसोइया अपना काम छोड़कर भाग गया था। संभवत: उसी समय से छात्रावास में अधिक खानेवाले छात्र के लिए त्रिलोचन जी मुहावरे की तरह प्रयुक्त होने लगे थे। रामबचन जी उसी मुहावरे से नवाजे गए थे।

'चम्पा काले अच्छर नहीं चीन्हती' जैसी प्रसिद्ध कविता के रचयिता, प्रभाकर, वानर और हंस जैसी पत्रिकाओं के संपादक रह चुके त्रिलोचन शास्त्री ने प्रूफरीडरी से लेकर रिक्शा खींचने तक का जीवन संघर्ष झेला है। बाजारवाद के विरोधी रचनाकार त्रिलोचन शास्त्री के पेट में ऐसा जरूर कुछ था जो खिलानेवाले को अचंभे में डाल देता था। मित्रता ही एक ऐसा संबंध है जिसके द्वारा व्यक्ति का आंतरिक स्वभाव सामने आता है। यही कारण है कि नामवर जी अपने मित्र की बातें घर में भी बताया करते थे। नामवर जी की माता वागेश्वरी देवी जी त्रिलोचन शास्त्री के स्वभाव की चर्चा कई बार सुन चुकी थीं। वे त्रिलोचन को अपनी भोजपुरी टोन में सुविधानुसार शास्तरी जी भी नही,ं सीधे 'तस्तरी जी' कहती थीं।

एक बार नामवर जी ने जब अपनी माता जी को बताया कि शाम को 'तश्तरीजी' अपने घर पधारने वाले हैं और भोजन भी यहीं करेंगे तो उनकी मां दौड़ती हुई अपनी रसोई देखने गईं। लौटकर बताइं कि 'अगर तस्तरी जी न आते तो सबकी खातिर एक पनरहिया (पन्द्रह दिनों) भर रातिब था।' कहते हैं कि जब त्रिलोचन जी उनके घर पधारे तो सबसे पहले एक घड़ा पानी पीये थे। जानकार लोग बताते हैं कि बनारस की सड़कों पर पैदल घूमने वाले त्रिलोचन शास्त्री अपने स्वभाव से एकदम फक्कड़ थे। अव्यवस्थित दाढ़ी-बाल की चिंता किये बगैर, ढीली-ढाली कमीज और पैजामा में सबसे अलग दिखने वाले त्रिलोचन जी तार्किक बहस करने के लिए मशहूर थे। एक से एक लोगों से पहचान थी उन्हें, पर कभी किसी से नहीं कहा कि उन्हें परेशानी है। किसी की महंगी सवारी पर बैठने की अपेक्षा किसी छात्र की सायकिल के डंडे पर बैठना उन्हें ज्यादा पसंद था।

प्रगतिशील धारा के प्रमुख कवि त्रिलोचन की काव्यभाषा गंवई भाषा सिर्फ इसलिए नहीं है कि उन्होंने गांव को जीया है। इसलिए भी है कि नागरी परिवेश ने उन्हें छुआ तक नहीं है। स्वभाव से फक्कड़ और मस्त त्रिलोचन ने दुख और पीड़ा को अपना सहचर बना लिया था। प्रसंग है कि एक बार जब वे बनारस के गोदौलिया पथ पर सायकिल से जा रहे थे कि एक ऊंट के पेट के नीचे से सायकिल निकालने का विचार आया। ऊंट की नकेल पकड़ा आदमी अभी कुछ समझ पाता, उससे पहले ही इनकी सायकिल ऊंट के पेट के नीचे से गुजर गई। फिर! फिर क्या बस कपड़े फटे और एक हाथ टूट गया। उसके बाद एक हाथ से तीन मील सायकिल चलाते हुए अस्पताल पहुंचे और डॉक्टर से बोले-''डॉक्टर! पलास्टर-फ्लास्टर नहीं चलेगा, बस जरा-सा यह हाथ सीधा कर दो।''

बरसात का मौसम था। धरासार पानी बरस रहा था। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र हिंदू विश्वविद्यालय से लौट रहे थे। चौराहे पर उन्होंने रिक्शा छोड़ा और छाता लगाए, धोती खुंटियाए घर के लिए बांसफाटक वाली रोड पर बढ़े। देखा, फुटपाथ पर अधभींगा त्रिलोचन खड़ा है।

'मात्र कुर्ता ?' आचार्य ने पूछा।

त्रिलोचन ने कांख में दबाए कपड़े की ओर इशारा किया, 'नहीं, पाजामा भी है। छींटे-कीचड़ पड़ रहे थे।'

उनके जीवन से जुड़े ऐसे कई प्रसंग मिल जाते हैं, जो साबित करते हैं कि त्रिलोचन जैसा कवि बड़ी मुश्किल से देखने और सुनने को मिलता है। बनारस जैसे सांस्कृतिक नगर में रहते हुए त्रिलोचन जो तिरस्कार और उपेक्षाएं झेलते रहे वैसा सहनशील चरित्र खोजने पर भी नहीं मिलेगा। पर स्वाभिमानी ऐसा कि बगैर किसी का एहसान लिये पूरे नगर में सिर उठाकर चलता रहा। सच कहा जाए तो 'इस बस्ती (बनारस) में चालीस वर्षों से एक त्रिलोचन रहता था, जिसका कुछ नहीं उखाड़ सकीं मुसीबतें?Ó एक प्रसंग जो त्रिलोचन के विशेष चरित्र का उद्घाटन करता है, इस प्रकार है-

1947 की बात है। होली से एक दिन पहले नामवर सिंह जी के छोटे भाई का गवना होने वाला था। गवना की बारात गई थी सकलडीहा स्टेशन से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर रैपुरा गांव में। नामवर जी अपने मित्र त्रिलोचन शास्त्री के साथ रात में सीधे रैपुरा पहुंचे थे। बारातियों के भोजन से पहले किसी ने सूचना दी कि भोजन की पंगत बैठने पर बारातियों को रंगने के लिए घरातियों ने एक कंडाल रंग घोल रखा है। इसमें दुलहे के बड़े भाई (नामवर सिंह) और उनके साथ बनारस से आये खास मेहमान (त्रिलोचन) को तो किसी भी स्थिति में छोडऩा नहीं है। जैसे ही यह बात त्रिलोचन को मालूम हुई, ''त्रिलोचन कुर्ता-पाजामा उतारकर लंगोट पहने चल पडे, 'घोषणा कर दो कि यहां रंगो-बू से डरनेवाले नहीं हैं। जिसको जितना रंग डालना हो डाल ले।'.....इस सूचना से कि बनारस से आया एक बाराती लंगोट पहनकर खाने आ रहा है- तहलका मच गया था।''

त्रिलोचन आमतौर पर लोकजीवन के ही कवि माने जाते हैं। किन्तु तत्सम शब्दों से उन्हे परहेज नहीं था। ''आत्म-विश्लेषण, एकान्वित, अवलंबित, मिथ्याभिमान, ज्योतिष्क लोवन, धर्मविनिर्मित, प्रत्यवरोहारोह, जीवनानुरक्त, वृक्षशीर्षरेखा, अनुभवसंभावन, सहस्रपात, प्रतिबिंबित-इस तरह के सैकड़ों शब्द उनकी कविता की भाषा में सिर ताने दिखाई पड़ते हैं। इन संस्कृतनिष्ठ शब्दों का कलमकार गंगा जैसी नदी के तेज प्रवाह से भी पंगा लेकर इस तट से उस तट पर पहुंच जाने की कूबत रखता था, कोई शायद ही विश्वास करे। लेकिन मौत से जूझने की प्रत्यक्ष कला इनमें जरूर थी। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि अपने विद्यार्थी जीवन में नामवर सिंह बनारस के लंका पर गोविन्द लॉज में रहते थे। वहीं नगवां स्थित अकलू भवन में त्रिलोचन भी रहते थे। दोनों सुबह दौड़ लगाते हुए गंगा स्नान करने जाते थे। एक दिन त्रिलोचन ने कहा कि वे गंगा में डुबकी लगाकर जमीन छूते हुए दूसरे तट पर जा सकते हैं।

नामवर सिंह के कहने पर दोनों एक साथ डुबकी लगाये पर नामवर सिंह थोड़ी ही देर में पानी की सतह पर आकर सांस लेने लगे और अपने आसपास शास्त्री जी को ढूंढऩे लगे। तभी दूसरे तट से इन्होंने आवाज दी-'यहां हूं मंै।' इन्हें दूसरे तट पर देखकर नामवर जी केवल इसलिए नहीं अचंभित हुए कि कैसे पहुंच गए वहां त्रिलोचन, बल्कि इसलिए भी कि त्रिलोचन जी का सिर फटा हुआ था और रक्तस्राव हो रहा था। उस रक्तस्राव को रोकने के लिए शास्त्री जी जख्म पर मिट्टी का लेप कर रहे थे। इससे भी बड़ा अचरज यह कि पूछने पर जवाब मिला की नदी की धार में एक मुर्दे से लड़कर बाहर निकले हैं कविराज! और यह जख्म उस मुर्दे की हडिय़ल उंगली की खरोंच है। इसके बाद ''नामवर पानी में हल गए और दो-तीन कोशिशों के बाद एक ऐसी फूटी हुई हंडिया लेकर ऊपर आए जिसमें त्रिलोचन के सिर के बाल फंसे थे।''

यह है सपनों का त्रिलोचन! हंडिय़ा में मुर्दा देखनेवाला त्रिलोचन। वह आकाश छूना चाहता है लेकिन यह भी चाहता है कि उसके पांव धरती न छोडें़। वास्तव में त्रिलोचन शास्त्री अपनी कविता 'फेरीवाला' की तरह गांव-गांव, नगर-नगर, गली-गली, डगर-डगर घूमता हुआ संभावनाओं से भरे हर युवा कवि-लेखक को पुकारता रहा-

''सपनों से ही मेरी झोली भरी हुई है/घर के बाहर के/पास के पड़ोस के/देस के विदेस के/ भूखे ग्रहलोक के/नदी के समुद्र के/जहाज के विमान के/पर्वत के बादल के/मुक्ति के विमान के/सपने लो, मनचीते सपने लो।''