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Monday 09 Dec 2019

स्वाभिमान की रक्षा

आत्माराम ने अब तक बहत्तर बसन्त देख लिए थे लेकिन इन दिनों वे स्वयं को बहुत थका-थका सा महसुस करने लगे थे। वैसे उनके साथ के शर्माजी और इस्माइल भाई अभी भी बहुत फिटफाट थे और खुशहाल जीवन जी रहे थे। कभी-कभी उन्हें इन दोनों से ईष्र्या भी होती थी लेकिन फिर सोचते कि यह तो उनका भाग्य है कि उनके बेटे-बहू, पोते-पोती उनके साथ हैं। उन्होंने भी तो चाहा था कि बेटे-बहू साथ ही रहें..लेकिन किसे दोष दें..अपना-अपना भाग्य है।

वे पत्नी के साथ छोटे से कस्बेनुमा शहर सारंगपुर में अपने पैतृक मकान में ही रह रहे थे। कभी यह मकान हवेलीनुमा था लेकिन भाइयों के बीच बंटवारे के बाद जो छ: चश्मे का हिस्सा मिला था, उसी में पूरी जिन्दगी बसर कर ली। वैसे यह भी कम नहीं था। हाँ, भाईयों ने अपने हिस्से के मकान दूसरों को बेच दिये और उनके लिए झगड़े की वजह पैदा कर दी। नित नये झगड़े पड़ोसियों द्वारा... कि घबराकर वे अपना हिस्सा भी बेच दें लेकिन वे भी अपनी जिद पर थे। शहर में एक ही तो मुख्य मार्ग था और वही मुख्य बाजार भी। अधिकांश लोगों ने अपने मकानों में दुकानें निकाल ली थीं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक ही था कि लोगों की निगाहें भी उनके मकान के बचे हुए हिस्से पर रहती। उन्होंने सोच रखा था कि मकान तो किसी भी हालत में नहीं बेचेंगे क्योंकि पूर्वजों की यही तो एक आखिरी निशानी बची थी। उन्होंने तो यह भी चाहा था कि दोनों भाई भी अपना हिस्सा न बेचे और बेचें भी तो उन्हें ही दें लेकिन भाई -भैयाबन्दी का मामला ही कुछ अलग रहता है। जब कुछ अवधि के लिए बेटों की बहुत मान मनुहार के बाद वे उनके पास रहने चले गये तो भाईयों ने मौके का फायदा उठाकर उन्हें बिना बताये ही मकान के अपने हिस्से दूसरों को बेच दिये और उनके लिए मुसीबत छोड़ गये। उन्हें जो हिस्सा मिला था वह मुख्य भवन के मध्य का हिस्सा था और सभी की दीवारें भी कॉमन थीं। जिन लोगों ने भवन के अन्य हिस्से खरीदे ,उन्होंने वहाँ दुकानें खोल ली और इन्हें हर तरह से परेशान भी करने लगे, वे लोग चाह रहे थे कि आत्माराम भी अपना हिस्सा उन्हीं को बेच दे। उनके द्वारा कई बार अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें अपमानित करने पर वे बहुत आहत सा महसूस करते और उनके स्वाभिमान को भी ठेस लगती थी लेकिन वे टस से मस नहीं हुए और अपने स्वाभिमान को बनाए रखा। उनके मित्रों ने भी बराबर उनका साथ दिया।

आत्माराम के दो बेटे सुमित और अमित... उन्होंने दोनों ही बेटों को अच्छी शिक्षा-दीक्षा दिलाई क्योंकि वे स्वयं भी एक शिक्षक थे और उनके पिता भी शिक्षक ही थे। वे हमेशा सोचते कि उन्होंने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी दिये हैं तो उनके जीवन के उत्तराद्र्ध में दोनों ही बेटे उन्हीं के पास आकर रहेंगे और उनका कहा मानेंगे...लेकिन ऐसा नहीं हो सका। बड़े बेटे सुमित ने सरकारी नौकरी पा ली तो उसे वापस अपने शहर में लौटने की बात कैसे कह सकते थे। उसका विवाह भी उसी के साथ उसके विभाग में उसकी सहकर्मी सुजाता के साथ दोनों परिवारों की रजामंदी से कर दिया था। छोटा बेटा अमित बहुराष्ट्रीय कम्पनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, कुछ समय पूना में रहने के बाद कम्पनी की ओर से ही अमेरिका चला गया। पूना में ही उसके साथ उसी कम्पनी में कार्यरत मेघा को वह पसन्द करता था और उसी से विवाह करना चाहता था। गैर जाति में होने से पहले तो आत्माराम और उनकी पत्नी सहमत नहीं हुए लेकिन जब अमित जिद पर आ गया तो अन्तर्जातीय विवाह  के लिए वे बेमन से सहमति दे पाए। विवाह के बाद जब अमित ने अमेरिका जाने की बात कही थी तब आत्माराम ने अमित से कहा भी था कि- बेटा, अपने शहर में मेन मार्केट में ही अपना मकान है। तुम क्यों नहीं इसी में कोई डीलरशिप लेकर शोरूम खोल लेते हो। बाप-दादा की अपनी प्रापर्टी है। हमारे बाद इसे कौन संभालेगा। तब अमित ने कहा था कि पिताजी इस कस्बे में कौन रहेगा और फिर यहाँ हमारा भविष्य भी क्या है। वैसे भी इस पुराने मकान का मोह भी क्या रखना, धीरे-धीरे यह भी खण्डहर ही हो रहा है। हम पूना में इससे अच्छा मकान खरीद लेंगे। हाँ,आप चाहेंगे तो इस मकान को डिसमेंटल कर शॉपिंग काम्प्लेक्स बना सकते हैं। आपकी आमदनी भी शुरू हो जाएगी और हम किसी न किसी रूप से यहाँ से जुड़े भी रहेंगे। तब आत्माराम ने कहा था कि- बेटा, हमारे पुरखों ने अपना खून-पसीना एक कर यह मकान बनाया था और सभी लोग यहाँ मिलजुलकर रहते थे। यहाँ हमारे कुटुम्ब का कितना मान था। वह तो तुम्हारे काकाओं को दुर्बुद्धि आई और उन्होंने अपने हिस्से के मकान बेच दिये। हमारे पूर्वज उन्हें कभी माफ नहीं करेंगे। उनकी बात काटते हुए इस पर अमित ने तर्क दिया कि- पिताजी, पूर्वजों का तो पता नहीं लेकिन दोनों काकाओं का इन्दौर शिफ्ट होने का फैसला उनके हित में ही रहा। उन लोगों ने अपना व्यवसाय भी वहाँ पर अच्छे से जमा लिया और उनके बच्चे भी अच्छे से पढ़-लिख गये। इंसान को जिन्दगी में और क्या चाहिए। आखिर कब तक वह पुराने खूंटे से बंधा रहे। तब आत्माराम चुप रह गए थे लेकिन भीतर ही भीतर आक्रोशित भी थे किन्तु कर भी क्या सकते थे क्योंकि अमित ने तो अपना रूख स्पष्ट कर ही दिया था। तब उन्होंने निश्चय कर लिया था कि वे अपने स्वाभिमान के साथ ही रहेंगे और इसी शहर में रहेंगे। किसी तरह का समझौता नहीं करेंगे, अपनी जड़ों को नहीं छोड़ेंगे,चाहे जिस स्थिति में रहना पड़े। हालांकि पड़ोसियों से वे बेहद परेशान हो चुके थे। रोजाना किसी न किसी बात पर विवाद होते थे। इन विवादों से उनका स्वभाव भी ऐसा हो गया था कि पड़ोसी दुकानदार की गलती न भी हो तब भी उन्हें यही लगता कि उनके साथ हरकत जानबूझकर की जा रही है। कभी वाहन घर के सामने लगाने की बात पर तो कभी घर के सामने थूकने की बात पर। तब भी वे अपने हठ पर कायम थे।

लेकिन आज जब सुबह-सुबह उनके पास छोटे बेटे अमित का फोन आया तो वे असहज हो गए। तभी से वे बहुत गुस्से में थे और मन ही मन बड़बड़ा भी रहे थे। वैसे तो बुढ़ापा होता ही ऐसा है कि आदमी उम्र के साथ सामन्जस्य इसी दौर में बैठा नहीं पाता है और उसे लगता है कि दुनिया बहुत बदल गई है और जो भी हो रहा है अच्छा नहीं हो रहा है। खैर,उनके व्यवहार पर पत्नी आशा ने आकर पूछा भी तो उन्होंने झिड़की लगा दी। आखिर अपना गुस्सा पत्नी के अलावा और किस पर उतार सकते थे, इस उम्र में! या तो घर के बाहर बैठे आवारा कुत्तों पर या फिर गाय-ढोर पर। ये नहीं मिले तो अपनी निरीहता भरा गुस्सा अपनी निरीह पत्नी पर। वृद्धावस्था में यही स्थिति स्त्री के साथ भी। निरीह प्राणियों पर या फिर निरीह पति पर अपना गुस्सा उतारकर राहत महसूस करते हैं वरना तो जीना ही दुश्वार हो जाए। यह स्थिति दोनों ही जानते हैं और इसीलिए इन बातों का बुरा भी नहीं लगाते। आशा भी उनके स्वभाव से अच्छी तरह से परिचित थी..जानती थी कि यह गुस्सा कुछ ही देर तक अन्दर रहेगा। जल्दी ही उबाल मारेगा और स्वयं ही वे आकर सारी बातें रख देंगे। इसलिए आशा ने कुछ देर चुप रहना ही ठीक समझा। कुछ समय बाद आत्माराम ने स्वयं ही आशा के पास आकर कहा- देखो इस छोटे की करतूत! अब अमेरिका से वापस आकर पूना में अपना मकान बना लिया है तो उसकी चौकीदारी के लिए उसे हमारी जरूरत आ पड़ी है। अब हमारी सेहत का उसे ख्याल आ रहा है वरना तो उसने कभी हमें पूछा ही नहींं। मैंने उसकी कितनी खुशामद की थी कि यहीं आकर अपना व्यवसाय शुरू कर दे। कम से कम अपनी पैतृक सम्पत्ति की हिफाजत तो हो जाएगी। सुमित तो आने से रहा, उसकी सरकारी नौकरी है। सरकारी नौकरी छुड़वा भी तो नहीं सकते।

हाँ, बात तो ठीक है लेकिन छोटू हमें वहाँ बुला रहा है तो इसमें गलत भी क्या है। आज के हालात में क्या वे लोग यहाँ आकर रह सकते हैं और फिर उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का क्या होगा! इस छोटे से शहर में अच्छे स्कूल भी तो नहीं हैं। आशा ने छोटे बेटे का पक्ष रखना चाहा।

आत्माराम यह सुनकर एकदम से भड़क उठे। वे बोले - देखो,मुझे अपना स्वाभिमान प्यारा है। मैं क्यों अपने बेटों के कहे अनुसार चलूं और फिर यहाँ अपने मकान के झगड़े भी क्या कम हैं! हमारा अपना भी स्वाभिमान है या नहीं। जब चाहा बुला लिया और जब चाहा वापसी का टिकिट कटवा दिया। कब तक खानाबदोश सी जिन्दगी बसर करेंगे जीवन के अन्तिम पड़ाव पर। अब हम उनके पास नहीं जाने वाले।

उनके गुस्से को ठण्डा करने के लिहाज से उनकी पत्नी बोली- अजी इसमें स्वाभिमान वाली बात कहाँ आ गई। अपने ही बेटे-बहू के घर आने-जाने में कैसा स्वाभिमान। जब वे विदेश जाने वाले थे तभी तो हमें बड़े बेटे के घर या इस वाले घर पहुँचाने की बात कही थी। बड़के की अपनी समस्या थी सो उसने उस समय मना कर दिया था। उसका मकान भी तो बहुत छोटा है। तब छोटू ने हमें यहाँ तक अपनी गाड़ी से छुड़वाया भी तो था। बेचारे बेटा-बहू स्वयं छोडऩे आये थे। इसलिए फिर से रहने के लिए बुलाया है तो इसमें बुराई क्यों खोज रहे हैं!

क्यों बुराई वाली बात क्यों नहीं है। जब बड़ी बहू की डिलीवरी होने वाली थी तो कैसी खुशामद करके वे हमें यहाँ से ले गये थे तब क्या उनका मकान छोटा नहींं था! और बाद में यही छोटू ने भी किया था और इसी बात को लेकर दोनों भाईयों में तकरार भी तो हुई थी। आत्माराम बोले।

अरे,जब छोटू के घर नन्हा-मुन्ना आने वाला था तो बड़के को भी तो सोचना चाहिए था। ऐसे ही समय तो बड़ेे-बूढ़ों का घर में रहना जरूरी होता है। आशा ने पक्ष रखा।

बच्चों को थोड़ा बड़ा करने के बाद बुजुर्ग काम के नहींं रहते और बोझ बन जाते हैं और शायद इस घर से उस घर ,उस घर से इस घर या फिर वृद्धाश्रम! उनका गुस्सा फूट पड़ा।

नहीं जी, इस बार छोटू ने विदेश से आने के बाद शहर में बहुत आलीशान मकान बनाया है। अब बहू-बेटे तो नौकरी पर चले जाते हैं। इतना बड़ा घर नौकरों के भरोसे तो छोड़ नहीं सकते। आजकल नौकर-चाकर भी विश्वासपात्र कहाँ रह गये हैं। घर के लोग रहें तो बेफिक्री रहती है। आशा ने कहा।

इस पर उन्हें कोई जवाब नहीं सुझाई दिया। बेटे-बहू के घर जाने में अपने स्वाभिमान की रक्षा के प्रश्न पर अब वे निरूत्तर थे, शायद बढ़ती उम्र का भी तकाजा था और सेहत भी ढल रही थी। उन्होंने आशा से कहा कि - अमित को फोन कर दो कि लेने आ जाएं, तभी हम जायेंगे। और फिर वे पूना जाने की तैयारी करने में मशगूल हो गये।