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Sunday 21 Apr 2019

एक भारतवंशी गांव का अंतरंग

मार्सेल काबो (1912-1972) मारीशस के फ्रेंच भाषी लेखक थे। उनकी पांच वर्ष की आयु में ही उनके पिता के आकस्मिक निधन के बाद उनका जीवन संघर्षों एवं अभावों के बीच बीता। मां और दादी का उन पर गहरा प्रभाव था। मां ने यदि विभिन्न छोटे-मोटे घरेलू काम करके उनके जीवन को आगे बढ़ाया तो दादी ने उन्हें फ्रेंच साहित्य से परिचित कराते हुए साहित्य के प्रति उनकी गंभीर अभिरुचि विकसित की। परिवार की इन स्त्रियों की उनके जीवन में जो भूमिका थी वस्तुत: उसी से, उनके रचनात्मक सरोकारों के साथ उनकी विश्व-दृष्टि का निर्माण हुआ। बहुत छोटी आयु में ही उन्होंने 'लेकोंत दे मीजी'और ब्रिटिश कवि टॉमस ग्रे की 'स्लेजी रिटन इन ए कंट्र्री चर्च यार्ड' का अध्ययन किया था।

मार्सेल काबो का उपन्यास 'नमस्ते' मारीशस के एक भारत-वंशी गांव वाले दे प्रेत पर केन्द्रित है। भौगोलिक दृष्टि से, यह पीटरबोथ और लेपूस की तराइयों के बीच अवस्थित गांव है। अभिमन्यु अनंत के प्रसिद्ध उपन्यास 'लाल पसीना' का मुख्य प्रेरणास्रोत भी वस्तुत: मार्सेल काबे का यही उपन्यास है। आंचलिक प्रकृति और जीव-जंतुओं एवं प्राणी जगत के प्रति गहरे रागात्मक लगाव की दृष्टि से यह हिन्दी के फणीश्वरनाथ रेणु की रचनाओं से पर्याप्त निकट पड़ता है। प्रेमचंद सहित जिन प्रमुख हिन्दी लेखकों के प्रभाव का उल्लेख मार्सेल काबो के प्रसंग में प्राय: किया जाता है उनमें यशपाल और रेणु प्रमुख हैं।

मार्सेल काबो और उनके उपन्यास 'नमस्ते' को ठीक से समझने के लिए उनके इस कथन को ध्यान में रखना जरूरी है जो उन्होंने सन् 2003 में प्रहलाद राम शरण द्वारा संपादित पत्रिका 'इन्द्रधनुष'के उन्हीं पर केन्द्रित अंक में एक वक्तव्य के रूप में दिया था- ग्रामीण होकर मैंने अपना अधिकतर जीवन उन किसानों के बीच अभावग्रस्त वातावरण में बिताया है, उनका जीवन जीकर और उनकी थालियों में खाकर, मैंने वहां की जमीन, वृक्ष और जल से प्यार किया है। कथा के केन्द्र में जो भारतवंशी गांव वाले दे प्रेत है उसके समूचे भूगोल और जनजीवन से जैसा गहरा तादात्म्य स्थापित करके मार्सेल काबो ने अपना यह उपन्यास लिखा है वह किसी लेखक के लिए रचनात्मक तैयारी की दृष्टि से ईष्र्या की वस्तु हो सकता है। उस जीवन की सादगी एवं रस-गंध की जीवंत प्रस्तुति के लिए अमेरिकी दार्शनिक थोरो के वाल्डेन सरोवर का स्मरण भी मार्सेल काबो के इस उपन्यास के प्रसंग में प्राय: आता है।

मार्सेल काबो का नमस्ते वस्तुत: एक गैरभारतवंशी कवि का उपन्यास है जिसे हिंदी मूल की जनता के लिए लेखक की एक रचनात्मक चुनौती के रूप में लिया जा सकता है। जो काम किसी हिंदी भाषा मूल के लेखक के द्वारा किया जाना चाहिए था, उसे एक फ्रेंच मूल के लेखक ने किया। लेकिन साहित्य एवं कला की दुनिया भाषा की इन या ऐसी दीवारों को सत्य मानकर नहींचलती। भारत के शर्तबंद कामगार मजदूर के रूप में जो अर्धदास सन 1834 से 1923 के बीच मारीशस पहुंचे, उनके अभावों, संघर्ष, जीवन शैली और कुल मिलाकर अपने पुरखों के प्रति उनके लगाव को अंकित करना ही वस्तुत: इस उपन्यास का उद्देश्य है। कायदे से इस उपन्यास का प्रकाशन सन 2012 में मार्सेल काबो के शताब्दी वर्ष में होने की योजना बनी थी। लेकिन पर्याप्त विलंब से यह काम अब हुआ है। नमस्ते के नायक राम के जीवन की अनेक घटनाएं इसके संपादक एवं प्रस्तुतकर्ता प्रह्लïाद रामशरण के अपने जीवन से मेल खाती हैं। सन 1957 में प्रह्लïाद रामशरण उसी गांव में अध्यापक हुए जो इस उपन्यास के केेंद्र में है। उसी अवधि में उन्हें वस्तुत: मार्सेल काबो की रचनाओं को व्यवस्थित रूप में पढऩे-समझने का अवसर मिला। नमस्ते के इस अनुवाद और संपादन के बीज भी वस्तुत: उसी काल में पड़े। जैसा रि उपन्यास का नायक अपने अनुभव से समझता है- अगर जमीन में एक बीज बोया है और यदि सब ठीक रहा तो आज नहींतो कल वह पनपेगा ही। नमस्ते वस्तुत: उसी बीज का वृक्षान्तरण है-एक बड़े और छतनार वृक्ष के रूप में।

अपने चाचा शिव की मृत्यु के बाद राम उसका वारिस बनकर ब्रादो गांव से आता है- जैसे बीस साल का शिव ही हो- जिद्दी, अविश्वासी और झगड़ालू। राम जैसे शिव का ही बीज हो। जीवन के ताप में तपकर वह कुंदन बने व्यक्ति का उदाहरण है। जीवनयापन के लिए उसने तरह-तरह के काम किए हैं- रास्ते पर पत्थर बिछाए हैं, ऐलो काटा है, फल बेचे हैं, मछली बेची है, तरबूज की खेती की है। अपने काम के प्रति निष्ठा एवं समर्पण सदैव उसके जीवन का सूत्र रहा। राम और उसके खेत के बीच खुली मित्रता थी। ('नमस्तेÓ संस्करण 2018 पृ. 10)Ó चाचा की संपत्ति में उसे पहाड़ और सड़क के बीच चार बीघा जमीन, एक गाय, दो बकरियां और सचमुच चूल्हे की राख के नीचे गड़े रुपए। चाचा शिव ने रात का भोजन एक मुट्ठी चावल और एक मिर्च खाकर यह सम्पत्ति जोड़ी थी। सफेद महीन धोती पहने और लोगों के लिए 'नमस्तेÓ के संबोधन के साथ राम गांव में आता है। गांव में उसका यह अभिवादन-नमस्ते-उसी प्रकार स्वीकार्यता पाता है जैसे पिंपागाई और बर्बट उस नमस्ते के बिना उगेगा ही नहीं। गांव में उसकी दोस्ती शराबी प्रेम से होती है। गांव वाले राम के बारे में अधिक से अधिक जानकारी भी उसी से प्राप्त करना चाहते हैं। उसका पिता खुजली के घाव से मरा था और उसकी बहन कोई सती-सावित्री नहीं थी।

राम को पढऩा आता था। एक 'महाराज' ने उसे पढ़ाना सिखाया था और वह जितना गाता था, एक पुस्तक को लेकर गाता था। शायद इसीलिए गाय लाल कहता था- 'राम अकेला बातें करता है।' उसके पास कांसे की एक बांसुरी थी, जिसे उसने एक चीनी दुकान से खरीदा था। बड़े उत्साह और पैशाचिक अवस्था में वह उसे बजाता था। कद से थोड़ा नाटा होने पर भी उसका व्यक्तित्व आकर्षक और मनोहारी था। मेहनती होने पर भी वाक्वा के पत्ते के तिनकों की तरह कोमल जिससे क्रेसों (पानी भाजी) बांधते हैं। उसका रंग लौकॉट जैसा थोड़ा-सा पीला चिकना और सुनहरा था, पर खूब काले मरमिट जैसे बाल बांधे तक लंबे थे। सचमुच आधी धरती पर ऐसा सुंदर युवक ढूंढ पाना असंभव था।

चारखंडों में नियोजित नब्बे पृष्ठों का यह उपन्यास अपने कलेवर की सीमा का आहरण भी माना जा सकता है। दयानंद सरस्वती के 'सत्यार्थ प्रकाश', उद्धरण 'नमस्ते' संबोधन को आधार बनाकर दिया गया शीर्षक आदि और सबसे अधिक कथा नायक राम की अभिरुचियां एवं दैनिक गतिविधियां यह संकेत देती है कि कथा का विकास आर्य समाज आंदोलन को प्रमुखता से अंकित करेगा। लेकिन ऐसा नहीं है। यह भी लगता है कि गिरमिट मजदूर के रूप में उसके जो पुरखे कभी भारत से आए थे, उनके जीवन को आधार बनाकर इसमें गिरमिटिया पूर्वजों की कथा होगी- मारिशॅस में उनके बसने और उस टापू के प्रति उनके लगाव की। बैठका- अर्थात राम की पाठशाला में पढऩे आने वाले बच्चों के लिए मुख्य आकर्षण गाए जाने वाले गीत थे। इन गीतों में पुरखों के देश का यशोगान होता। उन गीतों को गाते हुए राम सचमुच अपने पूर्वजों के देश में चला जाता। जहां हाथी, शेर और मृग का वर्णन होता। विभिन्न सूत्रों से इन पूर्वजों के बारे में जो तथ्य वह एकत्रित करता है उन्हीं से यह पता चलता है कि बाबा की कलकत्ता से मारिशस की यात्रा जहाज से 30 दिन में पूरी हुई थी- लंगोटधारी जहाज से। खाली लंगोट पहने, भविष्य को बताते, संवारने का लालच देकर जहाज पर चढ़ाए जाने के कारण ही शायद जहाज का यह नाम पड़ा हो। टापू में शुरू के वर्ष दुख और अपमान के वर्ष थे। शायद ही किसी को अन्य देश में बसने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ा हो। यहां गन्ने उपजाये जाते थे और बदले में मुट्ठी भर चावल, भूख और ठंड। उत्पीडऩ के परिणामस्वरूप मजदूरों के साथ घटी दुर्घटना के बाद उसकी लाश को समुद्र में फेंक दिया जाता और दुर्घटना को 'हादसा' कहा जाता।

उमावती से लंबे प्रेम-प्रसंग के बाद राम का विवाह हुआ है। बेलतेर गांव में जाने पर इस प्रेम की शुरूआत हुई थी। राम से उसका यह पहला विवाह भी नहीं था। उमावती का पहला विवाह उसकी तेरह वर्ष की उम्र में हो गया था। फिर पति ने उसे छोड़ दिया। राम की पत्नी की भी मृत्यु हो चुकी थी। इन स्थितियों में दोनों का मिलना-जुलना हुआ  और यह सन्निकटता एक प्रगाढ़ रिश्ते में बदल गई।

उमावती की प्रवृत्ति का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि साड़ी से अधिक वह अपने पति का ध्यान रखती है। वह कुछ ज्यादा ही खिलंदरी, शरारती और हंसमुख है। इस अल्हड़ दाम्पत्य जीवन की अनेक जीवंत एवं आत्मीय छवियां उपन्यास के संक्षिप्त कलेवर में विन्यस्त हैं। उमावती के व्यक्तित्व और सौंदर्य की तुलना तथा उपमाओं के लिए लेखक ने मारिशस की प्रकृति जीव-जन्तु और अनेक घरेलू उपादानों का बहुत सहज रूप में उपयोग किया है। उसके घने-काले, लंबे और चमकदार बालों की उपमा के लिए चूल्हे पर देर तक चढ़ी कढ़ाई की पेंदी का उल्लेख किया गया है। ऐसी उपमाओं एवं उत्प्रेक्षाओं से उसके व्यक्तित्व में लोक-कथा के तत्वों का समावेश होता है। देवेन्द्र सत्यार्थी ने बहुत समर्पित भाव से बहुत समय लगाकर लोक गीतों का संकलन किया। उनके ऐसे ही गीतों का प्रेमी अपनी प्रेमिका के बालों की उपमा मस्जिद के मुल्ला की स्याही से देता है। वह पूछता है-

तुमने मस्जिद में रहने वाले मुल्ला की स्याही देखी है?

मेरी प्रेमिका के बहन उससे भी ज्यादा काले हैं।

दो साल तक कोई संतान न होने पर अंतत: उमावती गांव की सबसे बूढ़ी स्त्री रुकमिन के यहां जाती है जो दाई का काम करने के साथ ही जड़ी-बूटियों की भी जानकार हैं। रुकमिन से 'नमस्ते' कहकर ही अभिवादन करती है जो उन दोनों को समानता एवं आत्मीयता के सूत्र से जोड़ता है। सात पुडिय़ों में सात दिन की दवा देते हुए वह उसे आश्वासन देती है कि उसके बेटा ही होगा- बिलकुल बाप की तरह। उस बच्चे को लेकर वह फिर आने को भी कहती है। तब वह उसे वह घास देगी जो खुजली को दूर करती है। गर्भ धारण न करने तक उमावती के दुख और अवसाद की मानसिकता का भी लेखक ने बहुत विश्वसनीय अंकन किया है। ऐसे प्रसंगों में सब कहीं घरेलू और परिचित उपमाओं को ही आधार बनाया गया है। गर्वीली और ढीठ लीला का विवाह इसी वर्ष के शुरू में हुआ था। अब वह गर्भवती है। उमावती को लगता है जैसे राह चलते सबकी नजरें उसके पेट पर लगी हैं। उसे यह अपने नारीत्व का अपमान लगता है- विशेषकर उस अंग का जहां बच्चा घने अंधकार में विकसित होता है। विन की गर्भवती पत्नी लीलावती के आगे वह स्वयं को फूटे गमले की तरह खाली पाती है।

उपन्यास अनेक संभावनाओं का संकेत देता है। शुरू में ही स्वामी दयानंद सरस्वती के 'सत्यार्थ प्रकाशÓ के उद्धरण और उपन्यास के शीर्षक से लगता है कि लेखक आर्य समाज के आंदोलन का इसमें विस्तारपूर्वक अंकन करेगा। लेकिन ऐसा नहीं है। यह प्रभाव 'ओमÓ, 'होमÓ, 'वेदÓ, 'पंडितÓ, 'नमस्तेÓ आदि कुछ शब्दों में ही सिमट कर रह गया है। भारत से लाए गए गिरमिट मजदूरों के आरंभिक जीवन एवं पारिस्थितिक संघर्ष के अंकन की भी यहां अपार संभावनाएं थीं। लेकिन इसके भी बाबा के प्रसंग में कुछ संकेत मात्र देकर लेखक आगे बढ़ जाता है। उपन्यास में मारिशस का वैविध्यपूर्ण संसार अनेक देशों एवं धार्मिक समुदायों के लोगों की एक भरी-पूरी दुनिया है। लेकिन वे भी प्रसंगवश संक्षेप में ही कथा का हिस्सा बन पाते हैं। मुख्य कथा राम और उमावती के पारिवारिक जीवंत उनकी दाम्पत्य चुहलों और रस-रंग के आधार बनाकर विकसित होती है। कथा के विकास में संयोग की भूमिका उपन्यास का सबसे कमजोर पक्ष है।

संयोग से आए एक तूफान के कारण ही एक झटके में राम की हरी-भरी दुनिया उजड़ जाती है। गर्भ के साथ उमावती उस तूफान की भेंट चढ़ जाती है। पर्याप्त परिश्रमपूर्वक लेखक ने उनके दाम्पत्य जीवन की जो सहज छवियां अंकित की हैं, उन्हें देखते हुए राम का विक्षिप्त होना बहुत अस्वाभाविक या बड़ी अनहोनी जैसा नहीं लगता। राम की इस विक्षिप्तावस्था की विविध स्थितियां और उन स्थितियों में राम के विविधवर्णी अनुभव बेशक उपन्यास में पर्याप्त जगह छेंकते हैं- खासतौर से कथा के संक्षिप्त कलेवर की पृष्ठभूमि में। बीच-बीच में, राम के इलाज के प्रसंग में, ओझा-गुणियों के झाड़-फूंक के प्रसंग भी उपन्यास में विस्तार से अंकित हैं। शांत और सामान्यत: निरापद विक्षिप्तावस्था के कारण किसी को नुकसान पहुंचाए बिना वह निकलती-बैठती स्त्रियों की चर्चा और बच्चों के उपहास का केन्द्र भी बनता है जो जब-तब उस पर पत्थर भी फेंकते रहते हैं।

अपने बच्चे को जमीन पर लिटाकर कमला जब पेड़ पर चढ़ी अमरुद तोड़ रही है, राम उसके बच्चे को उठाकर भाग जाता है, शोर-शराबे, धर-पकड़ के बाद दोनों मिलते भी हैं। मृत बच्चे की देह एक खेत में मिलती है और इसी तरह राम ठठरी बना एक कुएं में लटका मिलता है।

अपनी टिप्पणी में आनंद मल्लू ने 'नमस्ते' की जिन कुछ सीमाओं का संकेत किया है, वे विचारणीय है। संयोगों की विशिष्ट भूमिका के कारण ही यह संघर्ष से अधिक समर्पण का प्रतिपादन करने वाली रचना है। उमावती और राम के दांपत्य जीवन की छवियां जिस उन्मुक्तता से अंकित हैं, उनकी पृष्ठभूमि  में राम की विक्षिप्तावस्था बहुत अविश्वसनीय भले ही न लगे, लेकिन प्रेम का यह अतिरेक अपने समय से आगे की चीज़ अवश्य लगता है। उस समय स्त्री की, कम से कम भारतीय समाज में सामान्यत: यही स्थिति थी कि एक के मरने के बाद विधुर जल्द ही दूसरा विवाह करता था, जिसमें प्राय: उसकी पहली पत्नी के बच्चे भी शामिल होते थे, इस योग्य होने पर। ऐसे विवाह कालान्तर में पर्याप्त सफल भी होते थे और घर-गृहस्थी उन्हींके सहारे चलती थी।

नमस्ते भले ही किसी भारतवंशी लेखक की रचना न होकर एक फ्रेंच लेखक की रचना हो, भारत की मिट्टी और परंपराओं के प्रति प्रवासी भारतीयों का लगाव बहुत स्वाभाविक है। मारिशॅस, सूरीनाम, त्रिनिदाद आदि में कई पीढिय़ां बिता चुके ये प्रवासी भारतीय आज भी अपने पूर्वजों की धरती और मिट्टी को लेकर-अपनी जड़ों के प्रति- गहरे नास्टेलजिया के शिकार हैं। उनके व्रत-पर्व, उत्सव-त्योहार, धार्मिक परंपराएं उनमें कई पीढिय़ों बाद भी गहरी ललक का भाव उपजाते हैं। अपनी जड़ों की तलाश में अपने पुरखों की धरती की पहचान सचमुच उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि होती है। लेकिन देखने में आ रहा है कि उनकी इस स्वाभाविक ललक का उपयोग-दोहन-धर्म के दुरुपयोग से सत्ता तक पहुंची हिंदुत्ववादी शक्तियां अपने ढंग से करने की कोशिश करती हैं। ये दोनों भिन्न स्थितियां हैं जिसके प्रति मारिशॅस के हिंदी लेखकों को भी सजग रहने की आवश्यकता है।