Monthly Magzine
Wednesday 11 Dec 2019

मुक्तिकामी चेतना का अवामी शायर : वकार सिद्दीकी

अब तो शायर वकार सिद्दीकी आयु के 86 वर्ष पार कर चुके हैं। अगस्त, 1971 में अपनी नौकरी के सिलसिले में जब मैं ग्वालियर जा कर बसा तो व$कार साहब पूरे चालीस के भी नहीं हुए थे। उन दिनों, व$कार सिद्दी$की शायर से ज़्यादा, 'एक्टीविस्ट' के रूप में मशहूर थे। शिक्षा विभाग में नौकरी करते हुए, उन्हें राज्य और केन्द्र स्तरीय कर्मचारी और मज़दूर आन्दोलनों के समन्वयक के रूप में अधिक जाना जाता था। उस समय ट्रेड यूनियन आन्दोलन के पचीसों नेता उनके पीछे लामबंद थे और उनके निर्देश पर काम करना चाहते थे।

जहाँ तक उनकी शायरी का सवाल है, उनके शेर जिद्दत (नव्यता) से अधिक प्रगतिशील चेतना से लैस दिखाई देते हैं। वकार सिद्दीकी शायरी में भी अपने समय के हालात से समझौता करने की जगह परिस्थितियों से जूझने... संघर्ष करने में अधिक विश्वास रखते हैं। उनके मुक्तिकामी विचार बैठ कर सोचते रहने के स्थान पर, सोचे हुए को कर डालने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका एक ऐसा ही शेर-

क्या सोच  रहे हो  तुम बैठे  हुए  ऐसे में,

आओ, चलो, जि़न्दाँ की दीवार गिरानी है।  

                      (कारागार)

86 साल की उम्र में भी, व$कार सिद्दीकी उर्दू गद्य और पद्य दोनों में लगातार रचनारत हैं। देश को आज़ाद होते हुए भी शायर ने देखा था और 2018 में धर्म और जातिगत विद्वेष के प्रदूषण को भी उनकी बूढ़ी आँखें देख रही हैं। अपने गौरवशाली अतीत और 'माब-लिंचिंगÓ के वर्तमान समय की तुलना करते हुए अपनी अलग-अलग $गज़लों में व$कार कुछेक मर्मस्पर्शी शेर कहते हैं। यथा-

एक  शानदार  माज़ी  हमारा  भी था कभी,

देखो तो, आ गए हैं कहाँ पर कहाँ से हम

----

साँस भी लेने में दम घुटता है इस माहौल में,

इस $कदर  आलूदगी है, ज़ेहन  गंदे हो गए।

                      (प्रदूषण)

                     -------

डरा डरा-सा हरिक शख्स लग रहा  है अभी,

किसी $फसाद का खतरा बना हुआ है अभी।

------

'एक्टीविस्ट' होने के कारण, व$कार सिद्दीकी को शायरी में वैसी ख्याति नहीं मिली, जैसी एक होनहार शायर की कामना होती है। अपने संघर्षशील जीवन में, व$कार साहब को इसका बहुत मलाल भी नहीं रहा। फिर भी, मेरे विचार से वैचारिक स्पष्टता उनकी शायरी का बहुत बड़ा गुण है। निडरता भी उनके यहाँ दूसरे शायरों से अधिक मिलती है। जैसे-

मज़हब  का  नशा ऐसा सियासत पे चढ़ा है,

दहशत के निशाने पे हैं अल्लाह के घर भी।

आक्रामकता के ऐसे शेर दूसरा शायर तगज़्ज़ुल की चाशनी में लपेट कर कहता। फिर भी, व$कार सिद्दी$की की क्रांतिकारी शायरी 'नारा' बनने से इन्कार करती है। उनके काव्य-संग्रह 'फरदे-खयाल' की भूमिका में उर्दू साहित्य के विख्यात आलोचक डॉ. मोहम्मद हसन ने उनकी शायरी के इस गुण को रेखाँकित भी किया है। यथा- '.... इस तजऱ् की शायरी की कमज़ोरी आम तौर पर यह होती है कि इसमें नारेबाज़ी का उन्सर $गालिब आ जाता है और शायर का निजी लहजा मजरूह हो जाता है। यह ज़ाबिया व$कार सिद्दी$की की शायरी में बहुत कम है। इस तजऱ् की शायरी में भी ख्वाह $गज़ल या नज़्म में वो अपना इन्$िफरादी आहंग बर$करार रखने में कामयाब होते हैं।'

इक्कीसवीं सदी के पहले दो दशक समाप्त होने में अब दो वर्ष ही शेष हैं। लेकिन, नयी सदी के इन सालों में जिस गति से $गरीबी, बेरोजगारी, बलात् नारी-शोषण और नागरिक असहायता बढ़ी है, वो व$कार साहब को विचलित करती है। शेर-

भूख,   बेकारी,  जब्र,   लाचारी,

अहदेनो के अज़ाब हैं क्या-क्या!

       (नवयुग)

       ---

नयी सदी का वर्ष 2019 आते-आते जिस शैली में सत्ता के $करीबी लोग कानून के राज को चुनौती दे रहे हैं, वह जागरुक और संवेदनशील शायर को चिन्तित करता है। इस मौज़ू पर उपालम्भ की शैली में कहा गया उनका यह शेर मुलाहिज़ा $फरमाइए-

शहर  में  थाना  भी है, जेल  भी, $कानून भी है,

हम तो जब जानें कि $कातिल को सज़ा दी जाए!

              ---

अंत में, विश्व-शाँति की एक बड़े फलक पर चिन्ता करने वाला उनका यह शेर भी $खूनी हथियारों को प्रश्नांकित करता है। शेर-

ज़बाने-अम्न कब समझेगी दुनिया,

बनेंगे  जंग  के हथियार कितने?

---

आज के दौर में, 'इंकिलाब' जैसा शब्द ही कवि और कविता की स्मृति से लुप्त होता जा रहा है। इस काल-खंड में व$कार सिद्दीकी $िकलाबी शायरी के हरावल दस्ते में हैं और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है!

---

गज़लें

वकार सिद्दीकी

संंक्षिप्त परिचय

जन्म - 6 मार्च, 1932 (गुना)

शिक्षा - स्नातक

प्रकाशित पुस्तकें -

(1) फरदे खयाल (गज़ल+नज़्म)

(2) कलामे शाह मुबारक आबरू और ग्वालियरी ज़बान और तहज़ीब (गद्य)

(3) दो सर$फरोश शायर (गद्य)

(4) मोघिया लोक कहानियाँ (अनुवाद)

विशेष - ट्रेड यूनियन के लब्ध-प्रतिष्ठित वामपंथी नेता

पद - जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य

पता - 103, गार्डन होम्स, फेज़-3,

        अलकापुरी, ग्वालियर-474006 (म.प्र.)

        मो. 08989133543

(एक)

किसी सदा, किसी जुरअत, किसी नजऱ के लिए,

ये लम्हा $िफक्र का लम्हा है, हर बशर के लिए।

न काफिला, न $गुबारे-स$फर, न साया कोई,

हमारे साथ तो कुछ भी नहीं सफर के लिए।

कोई किरन तो अंधेरों को चीरकर निकले,

तरस रही हैं निगाहें नयी सहर के लिए।

(दो)

तारी$ख-नवीसी की ये तजऱ् पुरानी है,

शाहों का $फसाना है, परियों की कहानी है!

पत्थर के ज़माने से एटम के ज़माने तक,

पढ़ते ही चले जाओ इंसाँ की कहानी है।

जो रास्ता रोकेगा बह जाएगा मौजों में,

चढ़ता हुआ दरिया है, बहता हुआ पानी है।

क्या सोच रहे हो तुम बैठे हुए ऐसे में,

आओ, चलो, जि़न्दां की दीवार गिरानी है!

वो सिन्ध की घाटी हो या नील की वादी हो,

तहज़ीबो-तमद्दुन की तारी$ख पुरानी है।

(तीन)

दुनिया में बड़ी चीज़ है जीने का हुनर भी,

दरकार है जीने को बसीरत की नजऱ भी।

छत रहती है गुमसुम तो ज़मीं रहती है $खामोश,

हैरान हैं ये देख के दीवार भी, दर भी।

मज़हब का नशा ऐसा सियासत पे चढ़ा है,

दहशत के निशाने पे हैं अल्लाह के घर भी।

इस बज़्म में ऐसा भी कोई श$ख्स है जिसको,

जीने का सली$का  भी हो, मरने का हुनर भी?

तारी$ख के हर दौर में, हम अहले-जुनूँ ने,

कुछ शहर उजाड़े तो बसाए हैं नगर भी।

(चार)

देखा $करीब से तो लगा इक सुराब है,

ये जि़न्दगी हसीन सही, फिर भी $ख्वाब है।

माहौल इस ज़माने का इतना खराब है,

मरना भी $कहर है यहाँ, जीना अज़ाब है।

रातों की नींद, दिन का सुकूँ कौन ले उड़ा,

इस दौर के नसीब में क्या इज़तराब है!

गो टूटते-बिखरते रहे हैं तमाम रात,

आँखों में हर सहर को नया एक $ख्वाब है।

चाहो तो हर सवाल का मिल जाएगा जवाब,

ये जि़न्दगी $खुद एक मुकम्मल किताब है।

अन्दाज़े-$िफक्र क्या है नयी नस्ल का 'व$कारÓ,

क्या इस सवाल का भी कहीं कुछ जवाब है!

(पाँच)

डरा डरा-सा हरिक श$ख्स लग रहा है अभी,

किसी फसाद का $खतरा बना हुआ है अभी।

जुलूस एक इधर से गुजऱ गया है अभी,

जो रास्ता था कभी बन्द, वो खुला है अभी।

ये कैसी रात है घर श$ख्स जागता है अभी,

हमारे शहर में क्या वा$कया हुआ है अभी?

हरेक दिल की सदा बनके... काश... गूंज उठे,

वो नारा हमने जो दीवार पर लिखा है अभी!

हमारा अहद $फ$कत अहदे-सर$फरोशी है,

हमारे ह$क में यही फैसला हुआ है अभी।

(छह)

जब भी सीने में कोई आह दबा दी जाए,

फिर कहाँ जाए कोई, किसको सदा दी जाए?

जिनके दिल टूटे हों हालात से टकराने में,

उनकी आँखों में भी उम्मीद जगा दी जाए।

भीख की रस्म हो या जिस्म $फरोशी का चलन,

हर बुरी रस्म ज़माने से मिटा दी जाए।

शहर में थाना भी है, जेल भी, $कानून भी है,

हम तो जब जाने कि $कातिल को सज़ा दी जाए!

फिर नए अज़्म से निकले हैं जवानाने-वतन,

रास्ता रोके जो दीवार, गिरा दी जाए।

आग लगती हो मुहब्बत के चमन में जिनसे,

ऐसी अफवाहों को हरगिज़ न हवा दी जाए।

जि़न्दगी कोई नयी राह दिखाए शायद,

क्यों न $ख्वाबों की ये चिलमन ही हटा दी जाए।

(सात)

वा$िक$फ हैं खूब इश्$क के तरज़े-बयाँ से हम,

कह देंगे दिल का हाल नजऱ की जुबाँ से हम।

दुनिया के इंकलाबों की हमको खबर नहीं,

ऐसे भी बे$खबर तो नहीं, इस जहां से हम!

जलसे, जुलूस, नारे फ$कत और कुछ नहीं,

जागेंगे एक रोज़ तो ख्वाबे-$गराँ से हम।

ताबीर उसकी आज भी हम पा सके कहाँ,

देख आए थे जो $ख्वाब, न जाने कहाँ से हम?

सारे जहाँ को फिर से ज़रूरत है अम्न की,

कहते हैं आज बात ये, अहले-जहाँ से हम।

एक शानदार माज़ी हमारा भी था कभी,

देखो तो आ गए हैं कहाँ पर कहाँ से हम।

मुद्दत से इंतज़ार था जिसका हमें 'व$कारÓ,

घबरा रहे हैं आज उसी इम्तिहां से हम।

(आठ)

अहले-जऱ के अताब हैं क्या क्या,

मुफलिसों पर अज़ाब हैं क्या क्या।

रोटी, कपड़ा, मकान, इल्मो-हुनर,

जि़न्दगी तेरे $ख्वाब हैं क्या क्या।

भूख, बेकारी, जब्र, लाचारी,

अहदेनो के अज़ाब हैं क्या क्या।

जि़न्दगी यूँ ही खर्च करते रहे,

क्या बताएँ हिसाब हैं क्या क्या।

जो नहीं जानते हुनर क्या है,

उनको ब$ख्शे $िखताब हैं क्या क्या।

एक दुनिया नयी करें त$ख्लीक,

अपनी आँखों में $ख्वाब हैं क्या क्या।

(नौ)

चमन में गुल हैं कितने, $खार कितने,

बहारों के हैं दावेदार कितने।

ज़बाने-अम्न कब समझेगी दुनिया,

बनेंगे जंग के हथियार कितने?

यहाँ पर हैं करोड़ों हाथ बेकार,

वहाँ हैं बन्द कारोबार कितने।

कभी ये शहर शहरे-दिल-बरां था,

यहाँ अब रह गए दिलदार कितने।

वो मंजऱ हाय वो मंजऱ न पूछो,

कि जब बेघर हुए घरबार कितने।

लहू सिर चढ़ेगा बोलेगा किसी दिन,

रहें $कातिल ही पहरेदार कितने!

रहेगा गर्म ये बाज़ार कब तक,

अभी मांगेगी सिर तलवार कितने?

(दस)

सजा क्यों ऐसे गुनाहों की मिल रही है मुझे,

जो आज तक कभी सरज़द नहीं हुए मुझसे।

वो दर्द जिसको कोई आज तक न जान सका,

उसी ने रख दिया मुझको हिला के अन्दर से।

ये सच है मैंने दिलो-जान से है चाहा तुम्हें,

म$गर यकीन तुम्हें, मैं दिलाऊँ ये कैसे?

(ग्यारह)

आज सरमाए के चौपट सारे धंधे हो गए,

देखते ही देखते बाज़ार मंदे हो गए।

सामने कुछ भी हो, लेकिन, उनको दिखता ही नहीं,

क्या कहें, उनको कि जो आँखों के अंधे हो गए!

सांस भी लेने में दम घुटता है इस माहौल में,

इस $कदर आलूदगी है, ज़ेहन गंदे हो गए।

कोई तो $खूबी कोई तो वस्फ है उसमें, जनाब,

जब से देखा है उसे, हम उसके बन्दे हो गए।

जाने क्या देखा भरे बाज़ार में सबने 'व$कारÓ,

जितने दीदावर थे वो सारे ही अंधे हो गए।

 

शब्दार्थ

1. तारीख - नवीसी = इतिहास लेखन। 2. सुराब = मृग-मरीचिका। 3. इज़तराब = बेचैनी। 4. जवानाने - वतन = युवजन। 5. अताब = शाप। 6. सरज़द = संपन्न