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Monday 14 Oct 2019

मेरे समय के फागुन का एक और सच

लोक कवि ईसुरी पर लिखी जा रही आज मेरी किताब पूरी हुई। मुझे संतोष की सांस लेना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। एक अधूरापन मुझे घेरे हुए हैं। किसी रचना को पूरा करते-करते भी मैं अधूरेपन से मुक्त नहीं हो पाता हूं। शायद सभी रचनाकारों के साथ ऐसा होता होगा : मेरी तकलीफ यह है कि मैं जो लिखता हूं उसकी तस्दीक के लिए मुझे रचना से बाहर आना पड़ता है। लिखने में जिस स्मृति और जिन प्रसंगों ने मुझे उत्प्रेरित किया- क्या वे सचमुच में जैसे रचना में हैं- वैसे अभी भी अपनी भौतिक स्थिति में है। अब यही ले लीजिए कि ईसुरी पर काम करते हुए मैं लगातार कई महीनों तक उनके साथ था- उनके समय के साथ था। उनकी फागों के गहरे प्रभाव में था। उनकी फागों को सुनते मेरा बचपन बीता है। गांव में उन दिनों फागुन का महीना एक अलग तरह का गहमा-गहमी लेकर आता था। खेतों का हरापन पीतांबर ओढऩे लगता था! पलाश के जंगल अग्नि की लालिमा से दहकने लगते थे। लाल रंग का विस्तार हो जाता था युवा चेहरों पर इस लालिमा को अक्सर ताक-झांक कर देख लिया जाता था। फसलें काटने के लिए 'चैतुए' अपना डेरा-डंगल लादे समूचे कुनबे के साथ पास की अमराईयों में अपने अस्थायी आवास बनाने में मशगूल हो जाते। 'चैतुआ' शब्द 'चैत्र' महीने से बना है। चैत्र में फसल की कटाई होती है। उतरते फागुन से लेकर चढ़ते चैत्र तक की अवधि में खेत साफ हो जाते। खेत में खड़े बिजूके अकेले पड़ जाते। पहाड़ों से उतरकर आजीविका प्रेरित मजदूर ही इस फसल कटाई के असली 'हीरो'होते थे- इन्हें ही चैतुए कहा जाता था।

चैतुए आते थे फसल काटने के लिए, गांव से मजदूरी लेने के लिए, लेकिन वे गांव को दे जाते थे- राग-रागिनियों से भरापूरा एक संसार। मुझे लगता है कि हमारे देश में कलाओं के वितरण का महत्वपूर्ण कार्य मजदूरों और घुमंतू साधु-संतों तथा विचरणशील चरवाहों के माध्यम से ही अधिक हुआ है। कलाएं भी शायद अपनी एकांतिक तोडऩा चाहती हैं। चैतुए अक्सर उस क्षेत्र से मेरे गांव में आते थे, जो ईसुरी का क्षेत्र कहा जाता है। बुंदेलखंड का यह बराना इलाका था। 'बराना'एक नदी है- और इसी नदी के नाम से यह क्षेत्र जाना जाता है। वे आते थे तो ईसुरी की फागें अपने साथ लाते थे। वे फागें फगुनौटी हवा से लबालब भरी रहती थीं। उनमें शबाब ऐसा रहता था कि आंखों से लेकर दिल तक एक ग•ाब की सेंधमारी-सी चलती रहती थी। बतरस के झरने फूट पड़ते थे। फागुन लगते-लगते दिन का सीना तनने लगता है। सूर्य की किरणों से आंच आ जाती है। ''दिन ललित बसंती आन लगे। रवि के रथ ठहरान लगे।''दिन ललित हो उठे हैं- ऐसा इसलिए कि बसंत में सूर्य की गति मंद-सी पड़ रही है। शीत की सिहरन की जगह शरीर पर पसीने की बूंदों की झलक स्पष्ट हो रही है।

चढ़ती गर्मी की रातें अपनी उठान में गर्म हो रही हैं। नई दुलहिन परेशान है- प्रिय का शरीर पसीना-पसीना हो गया है। श्रृंगार के चौगान में स्वेद की गंध का भी अपना नशा है, लेकिन बेचारी यह दुलहिन परेशान इसलिए है कि वह प्रिय को पसीना से भीगा नहीं देखना चाहती है। उस समय बिजली तो थी नहीं कि प्लग दबाया और पंखा घूमने लगा। एक मात्र सहारा बिजना ही था जिससे ठंडी हवा पाई जा सकती थी। बिजना बांस की तीलियों और खपच्चियों का बना पंखा या फैन होता था। इसे डुलाकर हवा पाई जाती थी। दुलहिन के हाथ में पंखा है, किन्तु वह डुला नहीं पा रही है- वह उसे फिरा नहीं पा रही है। प्रिय कहता है- ''डुलाओ न! मैं गर्मी से व्याकुल हो रहा हूं!'' दुलहिन अपने मीठे बोल उचारती है- ''मोरी पतरी कलाई, जबर कंगना प्रिया! कैसे डुलाऊं रस के बिजना।''मेरी कलाई नाजुक है- कलाई में धारण किया गया कंगन बहुत भारी है। अब मैं रसीली हवा देने वाला पंखा कैसे झलूं? ईसुरी की यह नाजुक ख्याली भरी फाग जब हम अपनी चढ़ती किशोरवय में सुनते थे, तब फागुन की $िफ•ाा में जा$फरानी की गंध-सी महमहा उठती थी। ईसुरी की फागें बतरस का मधुकोष ही है। प्रेमिका ने प्रिय को अनदेखा क्या किया? प्रिय उत्तेजित हो उठा ''ऐसी भरन कौन की भर गई। हम ठाड़े तुम कड़ गई।'' हम खड़े थे, और तुम हमें अनदेखा करते हुए चली गई। ये तो बताओ? तम किसके कहने पर ऐसा कर रही हो? ऐसे अनेक संवादों से ईसुरी की फागें रस सिक्त हैं। चैतुए जब हार थककर अपने डेरे पर आते थे, तब ढोलक नगडिय़ा और मंजीरों के साथ ऐसी ही रस-भरी फागों से मंजरियों से लदी अमराईयों में मस्ती घोल देते थे। उनके श्रम परिहरण का यह मनोरंजन-काल होता था।

गांव कम ही जा पाता हूं। अबकी बार जब गया- तब सूर्य की किरणों में प्रखरता आ गई थी। फागुन की दोपहरी चिलचिला-सी रही थी। मैं सुस्ताने के लिए छांह तलाश रहा था। नामो-निशान नहीं था। फसल कट रही थी। लेकिन चैतुए गायब थे। एक भारी मशीन जिसे हार्वेस्टर कहा जाता है, खेतों को सफाचट कर रही थी। कटाई, गाहनी, उड़ावनी सब एक साथ हो रहा था। बस मशीन ने फसल में अपना मुंह मारा और अनाज पीछे से खरखराने लगा। महीनों का काम घंटों में सिमट गया। अच्छा ही हुआ। जब न चैतुए मिल रहे हों, न मजदूर तब मशीन का सहारा ही लिया जा सकता था, तो लिया जा रहा है। इसके उलट भी सोचा जा सकता है। मशीन ने मजदूरों को पलायन के लिए बाध्य किया। एक हार्वेस्टर पचास मजदूरों को विस्थापित कर रहा है। मशीन, मानवीय श्रम का मूल्य ही समाप्त कर चुकी है। मजदूर, महंगाई, मशीन और मान हनन की मार से भागा-भागा फिर रहा है। दिल्ली, पंजाब! मैं इस यंत्रीकृत समय में कुछ और सोचने लगता हूं। क्या करूं? पाया ही है ऐसा मन कि वह फागुन में ईसुरी, गंगाधर, फकीरे लाल जैसे लोक कवियों की फागें सुनना चाहता है। फगुवारों के साथ होना चाहता है। लेकिन यहां तो विशाल चक्कों से दबकर खेत की छाती को भूकंप के झटके लग रहे हैं। कानफोड़ू शोर में कोयल की कूक ही गायब नहीं है, बल्कि कोयल जैसे पक्षियों का भी अतापता नहीं चल पा रहा है।

मेरे गांव का फागुन तो मजदूरों, चैतुओं, कामगारों और किसानों के कारण ही चगन-मगन रहता था। लोक गीतों, लोक रागिनियों और लोक कलाओं के यही असली जागीरदार थे। लोक परंपराओं के यही जन, संरक्षक और संवाहक थे। नृत्य जैसी कला इनके जातिगत विशेषणों से जानी जाती थी। ढिमरियाऊ नाच, अहीर नाच, धोबी नाच आदि इसी ओर संकेत करते हैं। दरअसल ये लोक कलाओं के घराने जैसे थे। इनकी गतिभंगिमा से इनके ताल-स्वर अपने चक्र में निबद्ध रहते थे। फाग गायन में सबका सामूहिक योगदान रहता था। फाग के साथ किया जाने वाला नृत्य पूर्व में 'रास' कहलाता था। बाद में इसे 'राई' नाम दिया गया। 'राई' में बेड़नियां नृत्य करती हैं। यह नृत्य यदा-कदा भद्र मंचों पर आयोजित होता रहता है। यह एलीट वर्ग के मनोरंजन परिक्षेत्र का हिस्सा जो बन रहा है। अन्यथा ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकांश कलाएं, जन पलायन के साथ ही अपने जीवंत होने के दायरे से बनाकर अपने भीतर प्रयोगशील रहती हंै- और गतिज ऊर्जा से मंडित होती रहती हैं। वे म्यूजियम से या पुस्तक में या फिर परिवेश रहित परिस्थितियों में स्थगित हो जाती हंै। मैंने ईसुरी पर किताब पूरी की और मैं बड़ी ललक के साथ गांव गया कि किताब के ईसुरी से रूबरू हूंगा, किन्तु गांव के ईसुरी नदारद थे। नई पीढ़ी तो ईसुरी नाम से भी परिचित नहीं थी।

''उड़त गुलाल लाल भये बादल!''  की याद लेकर गांव पहुंचा था। अपने बचपन से मिलने के लिए! लेकिन न तो गांव की गलियों में और न गांव की अथाई में मुझे उड़ती गुलाल दिखी, न लाल होते बादल : एक सूना-सपाटा सा माहौल पसरा हुआ था। यही दिन होते थे, जब हम होली के लिए लकडिय़ां इकट्ठी करते थे। रात में कभी-कभी किसी के खलिहान से कोई लकड़ी चुराकर होली के ढेर में रख देते थे। खलिहान वाला न लकड़ी वापस उठाता था, न ही वह हमारे ऊपर गुस्सा होता था। बल्कि वह खुश ही होता था कि उसकी लकड़ी होली के काम आई। गांव की यह उदारता बचपन के भीतर कुंठा रहित परिवेश का निर्माण करती थी। हमारा बचपन फागुन जैसा फैलता था। एक छोर से दूसरे छोर तक निर्बाध आवाजाही शुरू हो जाती थी। नई-नई पगडंडियां बनने लगती थीं, खेतों की फसल क्या कटी-खेत ही हमारे गिल्ली डंडा खेलने के मैदान बन गए। हम पतंग बनाकर आकाश के चारों कोनों में उड़ाने लगे। भले ही हमारा आकाश और हमारी धरती एकदम सीमित थी, किन्तु इसी सीमित दायरे में हम असीमित हो उठते थे। होली की लपट की ऊंचाई हमारे अड़ोस-पड़ोस के गांव के छोर को भी अभिभूत करती थी। हम प्रसन्न होते थे कि हमारी होली की लपट सभी गांवों से ऊंची उठी। ईसुरी को हमने इसी समय सुना। नगडिय़ा की चढ़ती सुर लहरी पर पहली बार हम यही मोहित हुए। यहीं से हमारे भीतर चुपके-चुपके कविता का बीजारोपण हुआ। फाग गायक, रणछोड़ी महराज के मुख से सुना ''जो कऊं, छैल छला हो जाते परे उंगरियन राते। भौं पौछत काजर के दंतन सामू रोज दिखाते।'' रणछोड़ी महराज ने ही हमें इसका अर्थ समझाया था। प्रिया, प्रियतम से कहती है कि यदि तुम हमारी अंगुली में अंगूठी जैसे धारण किए जा सकते तो तुम से कभी वियोग न होता। मुंह पोंछते, काजल लगाते तुम हरदम दिखाई देते। हमारा बचपन हमसे छूट रहा है और हम कल्पनाओं की रंगीनियों में भटकने लगे थे। इसलिए इन पंक्तियों पर हम मुग्ध थे!

गांव में न ही बचपन था, न ही होली की हुड़दंग थी। पता चला कि यहां का बचपन तो मुंह अंधियारे ही स्कूल बस में बैठकर पास के कान्वेन्ट स्कूल को चला जाता है। यह स्कूल गांव से कोई तीस किलोमीटर दूर शहर की सीमा में स्थित है। रात सात बजे बस लौटती है। बच्चों से बचपन छीन लिया गया है। वे थके-हारे हो रहे हैं। उनके चेहरे •ार्द पड़ रहे हैं। भर फागुन में वे रोनी-रोनी सूरत-शक्ल में चाभी भरे खिलौनों की तरह अपनी जीवन-चर्या के चक्र में फंसे हैं। उन्हें बड़ी लड़ाइयां लडऩी है। न जाने कितनी नौकरियों के लिए उन्हें कितने टेस्ट देना है। ये डाल से छूटे बंदर बन रहे हैं। गांव में यदि कोई रंग दिख रहा है- कोई होली का हुलास दिख रहा है- तो वह है- चुनाव का रंग, चुनाव का हुलास! रंग-बिरंगे पोस्टर दीवारों पर चिपके हैं। नेताओं की चर्चा आम है। आश्वासनों का कीच उछाला जा रहा है। ऋण-माफी के गीत गाए जा रहे हैं। भद्दी भाषा के गुब्बारे फोड़े जा रहे हैं। हमारे गांव का बचपन इसी फागुन की छांव में विकसित हो रहा है। राजनीति की तिकड़मबाजी में फंसी पीढिय़ों का सच हमारे सच से अलग है- लेकिन यही मेरे समय का सच है। इस समय में आंख मिलाए बगैर हम रह भी नहीं सकते!