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Monday 18 Nov 2019

रिश्ते-रास्ते, कुछ उलझते, कुछ सुलझते

१.अक्टूबर के हल्के गर्म दिन और ठंडी रातों में एक अजीब सी उदासी घुली होती है। शाम को घूमने जाने का मन नहीं होता ऐसे दिनों में। चुप्पी का लिहाफ ओढ़े यादों के धारदार चाकू से खुद को परत दर परत खुरचने और फिर लहूलुहान होते देखने के दिन हैं ये। घर की छत पर खड़े-खड़े देर तक शाम को घूमने जाने वाले रास्ते को तकती रहती हूँ। मन काँपता है, बहुत दिन हुए, कहीं इन रास्तों ने भी पहचानने से इनकार कर दिया तो? तेज कदमों से घर से बाहर निकलती हूँ। कॉलोनी के पीछे वाले मैदान में न बंजारों के तंबू हैं, न उनके नंगधड़ंग शोर मचाते बच्चे और न ही रहस्यमयी आभा से घिरी-घिरी साँवली औरतें। ये मैदान अब न जाने कितने ही दिनों तक सहेजे रहेगा किसी के होने के निशानों को। रतनारा सूरज एक बड़े से पेड़ के पीछे से झाँकता हुआ टप्प से गेंद की तरह लुढ़क जाता है पहाड़ों के उस पार। बेईमान प्रेमी की तरह इन दिनों सूरज ने भी बदल ली है अपने उगने और अस्त होने की दिशा। शिकायत करना बेमानी है, गोया कि मेरे कैमरे में कैद न हो पाने का मतलब यह तो नहीं न कि वो उगता ही नहीं मेरे शहर में। साथ दिखने और साथ होने में शायद इतना ही फर्क होता है। खेतों में गेहूँ की कटाई चल रही है। जगह-जगह कटी हुई बालियों के ढेर हैं। खेत खुद को लुटा-लुटा महसूस करते होंगे, बालियों से बेइन्तहां प्रेम के बाद छाती पर बची सूखी फाँस के घाव लिए। अगली बुआई का इन्तजार ही उनकी किस्मत है अब...काश कि मन पर भी फसलें उगतीं बार-बार, मन बरसों से बंजर है। निराई, गुड़ाई, बुआई कुछ नहीं होता, प्यास कहीं अटकी पड़ी है महाकाल की क्षिप्रा के तट पर आचमन करते किसी जोगी की अंजुरी में। अन्धेरा उतर रहा है पहाड़ों में, खेतों में, सड़कों में, मुझ में, साया भी इस वक्त साथ नहीं है। आँखों की कोर पर सूखती आस बुदबुदाती है। कभी तन्हाइयों में यूँ हमारी याद आएगी।

       30 अक्टूबर 2017

 

हर रोज के नियत समय से ठीक पन्द्रह मिनट लेट मैं फिर निकल चुकी हूँ तेज़ कदमों से अपने चिरपरिचित रास्ते पर। मन में एक अजीब से अवसाद को लिये, शायद इस आशा से कि ये तेज़ी से चले गये बीस मिनट मुझे जीवनदान देंगे। घर वापस लौटने तक शायद आस की एक किरण तो स्फुरित हो ही जायेगी। पुराने रिसते घावों सी बेहाल सड़क को लाँघते-फलाँघते कुछ ही दूर चलकर नजर ठहर जाती है सड़क किनारे एक दूसरे का हाथ पकड़े सहमे-सहमे से खड़े दो बच्चों पर। इतनी ठंड में भी उनके बदन पर सिर्फ चड्डी और शर्ट या फ्रॉक सा कुछ देख पूरे बदन में फुरफरी दौड़ जाती है। शायद अपनी माँ का इंतजार कर रहे हैं, जो दिनभर की दिहाड़ी के बाद नजदीक ही मंगलवार की हाट में से सौदा लेने गयी होगी। इस एक पल में मेरी नजरों के सामने घूम जाते हैं दुनिया के वो तमाम बच्चे जो अपनी-अपनी माँओं की गोद में महफूज हैं। इस हकीकत से बेखबर कि कौन जाने किस पल एक और पेशावर जन्म लेने वाला है। मेरे चहेरे पर तेजी से आती-जाती परछाइयों से अनभिज्ञ नहीं होती शकुंतला (मेरी साथी प्राध्यापक मित्र) मेरे उद्वेग का ताप उसके चहेरे से टकराकर बिखर जाता है, पर वो कुछ बोलती भी तो नहीं, हमेशा इंतजार करती है। आज शायद मेरे ही मौन की कसौटी है। कितने ही दिन यूँ ही निकलते जा रहे हैं। मुझसे नाराज रहने वालों में अब इस रास्ते के पेड़-पौधे, फूल-पत्तियाँ भी शामिल हो गये हैं। कितने दिनों से आँखों में प्यार भरकर उन्हें देखा जो नहीं। मेरे ऊपर असामाजिक प्राणी होने के लगे हुए तमाम इलजामात के बावजूद मैं घर की ही बाँहों में समा जाती हूँ। आज घर भी नाराज है मुझसे, कितने दिन हुए कविता नहीं लिखी, उसे भी मनाना है। मैं मुक्त होना चाहती हूँ अवसादों से। घर, हाँ, घर, बस वहीं है मेरे मन को ठाँव। सीढिय़ों पर मेरा छोटा सा बच्चा राह देखता बैठा होगा। मैं जोर से शकुंतला का हाथ पकड़ती हूँ वो जानती है कि अब मैं चलूँगी नहीं, बस भागूँगी, बेतहाशा। आज शायद अर्जुन (पुराना विद्यार्थी जो अब अर्धविक्षिप्त है) ने लिखी है कोई कविता। पुलिया पर बैठे-बैठे गुनगुना रहा है। पग म्हारा नाना, ए चाले छाना छाना, मैं मन ही मन बुदबुदाती हूँ सजनवा बैरी हो गये हमार।

       7 नवम्बर 2017

 

 

खामोशी के घुँघरु इन दिनों कानों में कुछ यूँ बजते हैं कि मैं खोई रहती हूँ उन्हें सुनने में और अक्सर भूल जाती हूँ इवनिंग वॉक पर जाना। कितने ही दिनों के बाद आज निकली हूँ किसी प्यारे दोस्त की डाँट खाकर अपने चिरपरिचित रास्ते पर। रास्ते कभी पुराने नहीं होते हर दिन कुछ न कुछ नया उनमें जुड़ता चला जाता है। तेज कदमों से कॉलोनी से बाहर निकलती हूँ। कॉलोनी और सड़क के बीच पसरे मैदान में बिजली के वायर झूल रहे हैं जैसे झूलती है जिन्दगी कशमकश के दो सिरों के बीच। मेरे आगे-आगे एक बच्चा अपनी माँ की उँगली पकड़े एक हाथ में माटी की गुल्लक सहेजे चला जा रहा है। मन कसकता है गुल्लक के लिए। मैं कतरा-कतरा जिंदगी गुल्लक में सहेजना चाहती हूँ ताकि उदासी के दिनों में उसे फोड़कर खुश हो सकूँ। सड़क के दोनों ओर जंगल में रंग बिखरे हैं। आम, नीम, महुआ सब बौराये हुए हैं। पता नहीं क्यों मैं ही इन दिनों होश में रहने लगी हूँ। दूर पहाड़ों ने अब भूरी चादर ओढ़ ली है। महीना पहले जब इन पहाड़ों पर चढ़कर ऊपर बने छोटे से मन्दिर में गयी थी, लौटते वक्त घने वृक्षों के बीच न जाने कितनी बार रास्ता भटकी थी। वही रास्ते आज इतनी दूर से कितने स्पष्ट नजर आ रहे हैं। रास्ते और रिश्ते यूँ भी मुझे पास से बेहद उलझाते हैं। मैं अक्सर इन्हें दूर से साफ देख पाती हूँ। मेरी तेज चाल के कारण एक बच्चा सोचता है कि शायद मैं दौड़ रही हूँ और हंसकर दौड़ते हुए मुझसे आगे निकल जाता है। वो नहीं जानता कि मैं पकडऩा चाहती हूँ मुझसे आगे भागती मेरी परछाई को। कुछ देर ठहरने के लिए, मैं ठहरना चाहती हूँ। इन उबड़-खाबड़ रास्तों से दूर सपाट रास्तों पर टहलना चाहती हूँ। रास्ते तो शायद हमेशा ऊबड़-खाबड़ ही होते हैं, कुछ हमसफर ही ऐसे मिल जाते हैं जो उन गड्ढों का अहसास नहीं होने देते। अर्जुन खिजड़ी के झाड़ के नीचे टेका लिए कुछ गा रहा है। ये उसके बौराने का महीना है। मैं ध्यान से सुनती हूँ उसके शब्द..रोज-रोज कांकरिया नंखाऊँ रे, आय-हाय के मारू मन रूमाल वालू, अनजाने ही मेरे हाथ बालों की तरफ उठ जाते हैं। खुले बालों में मैं ढूँढने लगती हूँ वो रूमाल जो किसी ने बरसों पहले बाँधा था। मन अतीत है इन दिनों रिश्ते, रास्ते सब उलझे-उलझे से, मैं भटकना चाहती हूँ, थकना चाहती हूँ, गहरी नींद में सोना चाहती हूँ। बेगम अख्तर याद आती हैं, वो जो हममे तुममें करार था।

      

              11 नवम्बर 2017

 

 

दिन बीता जा रहा है। वक्त पर कोई काम निपटता ही नहीं। बावरा मन किसी भी एक पल पर पालथी लगा कर बैठ जाता है और घड़ी की सुइयाँ आँख-मिचौली खेलकर आगे बढ़ जाती हैं। यूँ भी मन कब बँधता है वक्त के टाइमटेबल से। मन की अपनी सत्ता, अपने रिवाज, अपने नियम। खैर, पाँच बजते-बजते निकल ही पड़ती हूँ अधूरे कामों की लिस्ट और अधूरे मन को लिये। कॉलोनी की सड़कों पर दो बरस से लेकर आठ बरस तक के बच्चे साइकिलें लिये नजर आते हैं। मैं अतीत में जाकर अक्सर खोजती हूँ, आगे छोटी सी बास्केट वाली गुलाबी रंग की छोटी सी साइकिल। दो नन्हें-नन्हें हाथ। फूले गाल, दो चोटियाँ। सब लापता हैं वक्त के मंजऱ में। पहियों के निशान तक पता नहीं किस बारिश में धुल गये। उम्र का यूँ मुड़-मुड़कर पीछे देखना अक्सर बेमानी ही होता है। कॉलोनी के पीछे फैले मैदानों में अक्सर बंजारे अपना तंबू ताने रहते हैं। इन दिनों वहाँ भी वैन जैसी गाडिय़ाँ खड़ी नजर आती हैं। उसी की आड़ में दो ईंटों का चूल्हा बनाकर रहस्यमयी आभा से घिरी-घिरी उनकी साँवली औरतें खाना पकाती हैं और फिर सब गाड़ी के अंदर। आज आये, कल चल दिये। सोचती हूँ कहीं इन सबने नियत इख्तियार को तो नहीं पढ़ा है। जाने किस वक्त कूच करना हो, अपना सामान मुख्तसर रखिये। इस अजीब से खयाल पर खुद ही मुस्कराती हूँ। मन होता है कि पहियों पर चलते इन घरों को अंदर से देखूँ। कैसे सामान, जानवर, इंसान सब मेल बिठाते होंगे। खिड़कियों और दरवाजों के काँच ठकठकाते न होंगे इतने दबाव से, साँस लेने के लिये खुलते काँच अक्सर देखते होंगे किसी न किसी का बाहर गिरना। भरा-भरा मन कहाँ सहन कर पाता है देर तक भरा रहना। धीरे से दरकती है मन की दीवारें और फूटता है मन खारा होकर। कभी नदी सा मीठा पानी खारा हो जाता है तो कभी शब्दों में नमक पड़ जाता है। रास्ते के दोनों तरफ  खेत फैले हुए हैं। कुछ ही कदम की दूरी पर एक मोरनी इस तरफ  के खेत से उड़ कर उस तरफ के खेत में पहुँचती है। कितनी सधी हुई उड़ान उड़ती है। गलती से भी कभी सड़क पर नहीं उतरतीं। छोटी उड़ाने शायद ज्यादा सधी हुई होती हैं। औरतें भी तो बस इतना ही उड़ती हैं। एक घर से दूसरे घर तक, सँभल कर, सधे पंखों से, यूँ भी बड़े पंख रखने की इजाजत कहाँ होती है उन्हें। दूर पहाड़ी पर नजर करती हूँ। एक सरगम की तरह उतर रही हैं औरतें सर पर लकडियों का भारी गठ्ठर रखे। एक लय में चलती ये औरतें अपने माथे पर जंगल लादकर घूमती हैं और इनकी पीठ पर जलते हैं दिन और रात के चूल्हे जिनमें बघरते हैं आँसू खदबदाती हैं इच्छाएँ और पकते हैं सपने। औरतों के हिस्से में अक्सर कच्चे और अधपके सपने ही आते हैं। मन दूर भागता है इन दिनों बैचेनियों की आँच पर सपनों के पतीले चढ़ाने से, तपना, पकना, चटकना, बिखरना, फूटना और अंतत: जल जाना। दिसम्बर की सर्द हवाओं में बैचेनियाँ और भी बैचेन हैं। मैं समेटना चाहते हूँ अपनी तमाम बैचेनियां, खामोशी के झोले में उन्हें भरकर तिरोहित कर देना चाहती हूँ पहाड़ के उस ओर बहती नदी में खिजड़ी के झाड़ के नीचे टेक लगाए बैठे। दीन दुनिया से अलिप्त अर्जुन की तरह मौसम की बेइमानियों पर खिलखिलाना चाहती हूँ। रैदास की तरह गुनगुनाना चाहती हूँ प्रभुजी तुम चंदन हम पानी।

       22 नवम्बर 2017

दिसम्बर की सीढिय़ों पर उतर रहा है एक बरस आहिस्ता-आहिस्ता। बीते कुछ दिनों में मौसम ने न जाने कितनी बार अपना मिजाज बदला। कभी बारिश, कभी तेज हवाएँ, लेकिन अब वही हल्की ठंड और गुनगुनी धूप । यूँ भी बिगड़े हुए मिजाज मौसम के हों या मन के क्या फर्क पड़ता है। नामुराद साँसें एक लय में धड़कती ही जाती हैं। उलझा-उलझा, बिखरा-बिखरा नवंबर कोरे पन्ने सा पलट गया खुद पर कुछ लिखे जाने के इंतजार में। खूब कोशिश की। ठीक वैसे ही जैसे हर शाम कोशिश करती हूँ इवनिंग वॉक पर जाने के लिये । कमबख्त कोशिशें सुबह और शाम की नर्म धूप सी आँगन में उतरती हैं और सीला मन तपे न तपे उसके पहले सकुचाती सी उतर जाती हैं नाकामयाबी के पहाड़ के उस ओर। पकडऩे के लिये कोई सिरा भी तो होना चाहिये न । वैसे भी खालीपन के सन्नाटे में क्या पकड़ा और क्या छोड़ा। उगती और ढलती धूप में हर रोज ढेर सारी मोरनियाँ बगीचे के किनारे बनी पानी की टंकी पर कतार से बैठी दिखाई देतीं हैं, मोर कभी नहीं दिखते। ये सीलापन सिर्फ औरतों के ही हिस्से में क्यों आता है। दीवार पर फैले उनके साये वो उदास दिन हैं जिनमें सेंध लगाने के तमाम प्रयास करके जेठ की धूप भी नरम पीली पड़ चुकी है। मैं फुर्र से उड़ा देती हूँ उन्हें। खेतों में उन्हें उड़ के छुपता देख मैं सोचती हूँ कि रोज-रोज कॉलोनी से निकलकर, मैदान पार करके सड़क पर घूमने क्यों जाना, कोई तो रास्ता होगा जो इन भरे-भरे खेतों और झोंपडिय़ों से होते हुए भी निकलता होगा किसी ओर। बने-बनाये रास्तों पर चलना रास नहीं आता। अक्सर दोनों तरफ  लगी झाडिय़ों के काँटों में उलझती चली जाती हूँ। जैसे ढलता रतनारा सूरज और उसके चारों तरफ  स्याह होते बादल मुझे इस वक्त फिर  उलझा रहे हैं उस ग्रे कलर की लाल बॉर्डर और लाल पल्लू वाली साड़ी में, जिसे मैं कल से सैकड़ों बार देख चुकी हूँ। मोबाइल की स्क्रीन छूकर बार-बार उसके कपड़े को परखने की कोशिश करती हूँ। ऑर्डर के बटन पर क्लिक करने से पहले मन बार-बार आशंकित होता है। कपड़ा शरीर को सुकून देगा न, लाल रंग मेरा वाला लाल न हुआ तो? जितना जूम करके देखती हूँ उतना ही रेशों में उलझती जाती हूँ । दूर से चीजों को समझना अक्सर उलझना ही तो होता है। जैसे दूरियों वाले रिश्ते बार-बार उलझने को मजबूर करते हैं, बार-बार आशंकित करते हैं। मैं बचना चाहती हूँ तमाम तरह की उलझनों से। अपने संकोच के आवरण को फिर से ओढऩा चाहती हूँ। लौटना चाह्ती हूँ अपने चिर-परिचित पथ पर, जहाँ शकुंतला है, अर्जुन है। बाहर साँझ घिर रही है पर मन में एक धूप फिर खिल रही है। मन फिर से धूप होना चाहता है। कॉलेज के दिनों का वो दोस्त शिद्दत से याद आता है जो अक्सर बगीचे में बैठ कर गाता था, धूप में है साये का आलम, रोशन चेहरा काली जुल्फें

       5 दिसम्बर 2017

 

इतवार का दिन एक अजीब सी खामोशी का पैरहन पहने आया, जिसकी सलवटें निकालते-निकालते वक्त हाथ से फिसलता गया। घर के कामकाज में मदद करने के लिए जेसल आती है। आज पता नहीं किस उलझन में थी वह भी। उसके पतले सुते हुए गेहुंए चेहरे पर लाल-काली लकीरें लगातार बनती बिगड़ती रहीं। एक खामोशी ने दूसरी खामोशी को बस खामोश रहकर समझा। दिन ढल गया है, बाहर बच्चे शोर मचाते हुए खेल रहे हैं। आज घूमने जाने के लिए जेसल के घर वाले रास्ते पर निकली। जेसल के घर जाना याने पहाड़ों के और नजदीक जाना। मुझे देखकर उसका आदमी, बच्चे, सास-ससुर सब घर से बाहर निकल आये। चूल्हे की आँच में मक्की की रोटी बनाती जेसल का लाल चेहरा सुबह से एकदम भिन्न था। यूँ भी औरतें कब झोंक देती हैं अपने मन को आग में कोई कब जान पाता है। मैं उसे मुस्करा कर देखती हूँ। एक मुस्कान दूसरी मुस्कान को मुस्करा कर विदा करती है। कुछ देर बैठती हूँ चुपचाप पहाड़ की तलहटी में। छोटे छोटे बच्चे सूरज को हाँक रहे हैं पहाड़ के उस ओर मैं थोड़ी सी रौशनी सहेज लेना चाहती हूं अपनी मुठ्ठियों में कि मन के सीले और खामोश दरवाजे पर रोशनी का विंड चैम लटका सकूँ। किसी आने वाले इतवार को घण्टियों का पैरहन पहना सकूँ। बंधी मु_ियाँ लिए घर की ओर दौड़ती हूँ। ढलता सूरज पीछे से गुनगुनाता है। अजी रूठकर यूँ कहाँ जाइएगा। 

       4 फरवरी 2018

 

मार्च जैसे किसी ऊँचे पहाड़ की सीधी चढ़ाई है जिसे चढ़ते-चढ़ते मैं न जाने कितनी ही बार हिम्मत हारती हूँ। टूटती हूँ, थकती हूँ, क्षत-विक्षत और लहूलुहान होती हूँ। यादों की गठरी को कितना ही कसकर क्यों न बाँधो। कमबख्त खुल ही जाती है। आज इस गठरी को तिरोहित करने के खयाल से साँझ ढले जल्दी-जल्दी घर से निकली हूँ। मन की गठरी पैरों का वजन बढ़ा रही है। पूनम है आज। शायद लौटते वक्त मैं भी अपनी अमावस के अंधेरों से निकल आऊँगी। सूखे-भूरे पहाड़ों से सर पर लकड़ी का भार लिए औरतें नीचे उतर रही हैं सरगम की किसी धुन पर एक लय में लहराती सी। पहचानती हैं मुझे। मैं अक्सर इनकी तस्वीरे जो खींचती हूँ। पर ठहरती नहीं ये एक पल को भी तस्वीर खिंचवाने के लिए। मुझे ही इनकी लय के साथ तालबद्ध होकर क्लिक करना होता है। पल भर को रुकना या विश्राम करना वजन से राहत पाना नहीं होता। बल्कि अगले ही पल उसी भार को दुगना महसूस करना होता है। ये सच इनसे ही जाना मैंने फिर भी मैं बावरी न जाने क्यों ठहर जाती हूँ किसी न किसी आमंत्रण देती छाँव के नीचे। जब तक बाहर निकलूँ छाँव के भरम से मन की गठरी और भारी हो चुकी होती है और मैं फिर भटकती हूँ एक सरोवर की तलाश में जहाँ कर सकूँ उसे तिरोहित। कलाई पर बाँधी हुई घड़ी में, मैं अपने चले हुए कदमों का हिसाब देखती हूँ। काश कि मन पर हर रोज चहल कदमी करती उदासी का हिसाब रखने वाली भी कोई घड़ी होती। सूरज इन दिनों मेरे हिस्से की रोशनी कहीं और उँडेल आता है। अँधेरा गहरा रहा है। क्या फर्क पड़ता है मन की अमावस में उसे भी समा जाना है। अर्जुन कितने दिनों से दिखाई नहीं देता। पता नहीं किसके हिस्से का अँधेरा लिए भटकता है हरदम। दूर झोंपड़ी से धुँआ उठ रहा है। किसी की याद फिर उस धुएं में मचलती सी चली आती है। चाँद निकल गया। मंदिरों में घण्टियाँ बज रही हैं। सब तरफ आरती के सुर। अपने-अपने इष्ट देव को पुकारती आवाजें। मैं भी धीरे से बुदबुदाती हूँ। चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया।

       24 मार्च2018