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Sunday 26 May 2019

साधारण के रहस्य और सौंदर्य का कवि: केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह नई कविता के अंतिम कवि थे और सबसे अंत में वे गए। सबसे पहले नई कविता के पहले स्तम्भ मुक्तिबोध का 1964 में निधन हुआ और अंतिम स्तम्भ का 19 मार्च, 2018 में। अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीनों सप्तकों के इक्कीस कवि और उससे बाहर के भी अनेक कवि आज नहीं हैं। पर इन कवियों ने सामूहिक रूप से एक इतिहास का निर्माण किया है।

जैसा कि नामवर सिंह ने कहा है- केदार ने अपनी पीढ़ी को शब्द दिए हैं। यह कथन जितना केदार जी के लिए उपयुक्त है, उतना ही नई कविता के सभी महत्त्वपूर्ण कवियों के लिए। मैं कहना चाहता हूँ, केदारनाथ सिंह ने हिन्दी कविता को बिल्कुल अछूते और अनूठे बिम्ब दिए हैं। उन्होंने 'तीसरा सप्तक' के अपने 'वक्तव्य' का प्रारंभ ही इस स्वीकृति से किया है- कविता में मैं सबसे अधिक ध्यान देता हूं बिम्ब-विधान पर। बिम्ब-विधान का सम्बन्ध जितना काव्य की विषय-वस्तु से होता है, उतना ही उसके रूप से भी। विषय को वह मूर्त और ग्राह्य बनाता है, रूप को संक्षिप्त और दीप्त। इस 'वक्तव्य' के अंत में उन्होंने यह भी स्वीकार किया है- मैं मन को बराबर खुला रखने की कोशिश करता हूँ, ताकि वह आस-पास के जीवन की हल्की से हल्की आवाज को भी प्रतिध्वनित कर सके। समाज के प्रगतिशील तत्त्वों और मानव के उच्चतर मूल्यों की परख मेरी रचनाओं में आ रही है या नहीं, मैं नहीं जानता। पर उनके प्रति मेरे भीतर एक विश्वास, एक लालसा, एक लपट जरूर है, जिसे मैं हर प्रतिकूल झोंके से बचाने की कोशिश करता हूँ, करता रहूँगा।

ये दोनों बातें केदारजी की कविताओं को जाँचने, परखने के लिए ध्यान में रखना आवश्यक है। पहली बात यह कि मन को खुला रखने के कारण उनकी कविताओं में जड़ता और घेराबंदी नहीं है। दूसरी बात यह कि जीवन के उच्चतर और प्रगतिशील मूल्यों के प्रति उनकी आस्था सदैव बनी रही। प्राय: यह देखा गया है कि बिम्बधर्मी कवि रूपवादी या कलावादी खेमे में चले जाते हैं और जीवन से कटते जाते हैं। पर केदारजी बिम्बवादी होते हुए भी जीवन से गहरे रूप में जुड़े कवि हैं। उनके बिम्ब साधारण जीवन से उठाए हुए हैं। ऐसा होने के कारण साधारण जीवन के प्रति उनकी सम्पृक्ति प्रकट होती है। 'आधुनिक हिन्दी कविता में बिम्बविधान' नामक उनकी पुस्तक हिन्दी की एक श्रेष्ठ आलोचनात्मक शोध-कृति है, जिसमें उन्होंने बिम्बवादी कवियों के रूपवादी हो जाने के खतरों की ओर संकेत किया है। इसमें एक जगह उन्होंने महावीरप्रसाद द्विवेदी के एक कथन को आदर के साथ उद्धृत किया है- जो साधारण है, वही रहस्यमय है, अनन्त सौन्दर्य से युक्त है। इसी सौन्दर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य के कवियों का काम होगा।

केदारजी साधारण के रहस्य और सौंदर्य को उद्घाटित करने वाले कवि हैं। उनमें उदात्त चेतना है। यह किस प्रकार प्रकट होती है, इसे समझने के लिए उनकी सबसे छोटी कविता 'दिशाÓ को देखें- हिमालय किधर है?/ मैंने उस बच्चे से पूछा जो स्कूल के बाहर पतंग उड़ा रहा था।/उधर-उधर - उसने कहा, जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी!/मैं स्वीकार करूँ, मैंने पहली बार जाना, हिमालय किधर है? इस कविता में मैं, बच्चा, स्कूल, पतंग धीरे-धीरे एक अनुभव में रूपांतरित होते जाते हैं और यह भाव-बोध स्थापित करते हैं कि हिमालय वहाँ है, जहाँ ऊँचाई है, ऊँचा उठने की कामना है। इस तरह साधारण-सी लगने वाली जीवन-स्थितियों में भी उदात्त का बोध ही इस कविता का रहस्य है।

केदारनाथ सिंह ने परिपक्व काव्य-लेखन की विधिवत शुरूआत 1950 से की। अपने प्रारम्भिक लेखन में उनका झुकाव गीतात्मक, संगीतात्मक और लयात्मक काव्य-शिल्प के प्रति था। उनकी 1950 की लिखी, किंतु अप्रकाशित 'घर' नामक यह कविता देखें-

बहुत दिनों पर घर आया हूँ

पूछ रहा हूँ घर

कच्ची लोनी मिट्टीवाला

चूल्हे और अंगीठी वाला

गर्म महकता घर!

दूध भरे थन-सा धरती पर

झुका हुआ वह घर!

बंधा हुआ खूंटे से

वह हर सांझ रंभाता घर!

इस गीतात्मक कविता में घर का जो जीवंत शब्द-चित्र है और उसमें अनेक बिम्ब हैं, जो एक गाँव के पूरे परिवेश को अभिव्यंजित करते हैं। सवाल उठता है कि हिन्दी कविता में पहला कदम रखने वाला यह कवि किससे प्रभावित है? किसी से नहीं, अपितु अपना रास्ता स्वयं बना रहा है। उस दौर में त्रिलोचन का संग-साथ उन्हें सॉनेट की ओर खींच ले गया। पर कविता का पूरा मुहावरा उनका स्वयं का गढ़ा हुआ था। बेशक, त्रिलोचन उनके काव्य-गुरु थे, लेकिन उनके सॉनेट में उनका अपना ही रंग है। 1950 में ही लिखित और असंकलित उनका यह सॉनेट पूरे गाँव को उसकी दीन-हीन दशा में देखते हुए एक गरिमा के साथ प्रस्तुत करता है, यह रेखांखित करते हुए कि 'कैसा रंग ला रही फाकामस्ती'-

मैं हूँ, मेरे ऊपर साँसों का पहरा है।

लौट रहे हैं लोग, हुई संझवन की बेला।

और अधिक सूनेपन को करता गहरा है

मुझ-सा ही दूरी पर का वह ताड़ अकेला।

पहला दिया दिखा, पेड़ों के पार अंधेरा

उतर रहा धीरे-धीरे सरपत के वन पर।

निकल मकानों से चुपचाप धुएँ का घेरा

जमता-सा जा रहा नदी की हर सिहरन पर।

एक वृद्ध पीपल की अंधियारी शाखों में

बिला गई सब धरती की रेखाएँ भूरी।

डूबा पीपल, डूब गया पथ, पर आँखों में

फैली ही रह गई स्याह कोसों की दूरी।

देखो, कैसा रंग ला रही फाकामस्ती

अंधियारे में झिलमिल-झिलमिल करती बस्ती।

यह शाम के गाँव का दृश्य-बिम्ब कितना जीवंत है। यह उनके गाँव चकिया ही नहीं भारत के सभी गाँवों का यथार्थ है। केदारजी में लोक-जीवन के प्रति रूझान उनके प्रारंभिक जीवन में कुछ ज्यादा ही था। वे आधुनिक होते हुए भी लोक से सम्पृक्त थे। उनकी शुरुआती कविताओं में भी सुगठन है। यही कारण है कि 1952 में अज्ञेय उनकी कविताओं से प्रभावित हुए और पहली बार साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'प्रतीकÓ में उनकी कविताएँ प्रकाशित कीं। उन कविताओं के प्रकाशन के साथ ही केदारजी नई कविता के प्रमुख कवियों में शुमार हो गए। फिर उस दौर की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं और संकलनों में उनकी कविताएँ छपीं। 1959 में 'तीसरा सप्तकÓ में अज्ञेय ने उनकी कविताएँ संकलित कीं और 1960 में प्रसिद्ध कथाकार मार्कण्डेय ने उनका पहला कविता-संग्रह 'अभी, बिल्कुल अभीÓ प्रकाशित किया। उनका अंतिम संग्रह 'सृष्टि पर पहराÓ 2014 में प्रकाशित हुआ, जिसका समर्पण दिलचस्प है- 'अपने गाँव के लोगों को, जिन तक यह किताब कभी नहीं पहुँचेगीÓ। केदारजी को ताउम्र यह बात सालती रही कि उनकी कविताएँ देश-दुनिया के बीच पढ़ी जा रही हैं, समादृत हो रही हैं, लेकिन उनके गाँव के लोगों तक नहीं। इसका कारण था, गाँव के लोगों का अशिक्षित होना। जब 1989 में उन्हें 'अकाल में सारस' कविता-संग्रह पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला था, तब उन्होंने अपने वक्तव्य में यह उल्लेख किया था कि उनके गाँव के एक बुजुर्ग ने उनसे कविता सुनाने का आग्रह किया था और वे नहीं सुना पाए थे। लेकिन उन्हीं के गाँव के कामेश्वर प्रसाद सिंह हिन्दी के प्राध्यापक हो गए हैं, जो केदार जी की कविता को न केवल समझते हैं, बल्कि उन पर लिखते भी हैं। उन्होंने केदारजी के व्यक्तित्व पर 'केदारनाथ सिंह: चकिया से दिल्ली'नामक एक पुस्तक अपने संपादन में निकाली है जो उन्हें जानने-समझने के लिए एक जरूरी किताब है। प्राय: यह देखा गया है कि किसी रचनाकार की सही परख उसके बाद की पीढ़ी ही करती है। जिन गाँवों के निरक्षर लोग केदारजी की कविता पढ़ नहीं पाते थे, अब पढऩे में सक्षम हो रहे हैं।

केदार जी की कविताओं में शहर भी है और गाँव भी। उन्होंने अपनी कविताओं में गाँव और शहरों के जो बहुविध बिम्ब दिए हैं, वे साधारण जीवन से ही उठाए हुए हैं। उनमें रोचकता है, मनोरंजन है, विनोद है। दूसरी ओर गम्भीरता भी है। मैंने उनकी दो प्रारम्भिक ग्रामीण परिदृश्य की कविताएँ प्रारंभ में उद्धृत की हैं, जिसमें शाम के परिवेश में गाँव का अंकन है। उसी तरह उनकी 'शहर में रात' कविता पूरे शहर के बहु-आयामी जीवन के अनेक जीवन-स्थितियों को दिलचस्प अंदाज में रखती है-

बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है

वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर हैं

वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा

वह क्या है जो दिखता है धुआँ-धुआँ-सा

वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे

हैं उलझ गये जीने के सारे धागे

यह शहर कि जिसमें रहती हैं इच्छाएँ

कुत्ते-भुनगे-आदमी-गिलहरी-गाएँ

यह शहर कि जिसकी जि़द है सीधी-सादी

ज्यादा-से-ज्यादा सुविधा सुख आजादी

तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में

यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में

साथियों, रात आयी, अब मैं जाता हूँ

इस आने-जाने का वेतन पाता हूँ

जब आँख लगे तब सुनना धीरे-धीरे

किस तरह रात-भर बजती हैं जंजीरे

इस कविता में शहर में रात घिरने के बाद के अनेक परिदृश्य, बिम्ब और जीवन-स्थितियों का चित्रण है। आसमान में बादल का घिरना, लोगों की अपने घर पहुँचने की बेचैनी। शहर अनेक जीव-जन्तुओं का आश्रय भी है। सबकी अपनी-अपनी इच्छाएँ। सबका लक्ष्य है कि उन्हें अधिक से अधिक सुख-सुविधा और स्वाधीनता मिले। यह शहर अनेक स्वरूपों में दिखाई पड़ता है। दफ्तरों का यांत्रिक जीवन। आने-जाने का वेतन पाना। फिर पूरा शहर जब नींद के आगोश में डूबता हुआ अपने अनेक तरह की जंजीर रूपी बन्धनों की आवाज को सुनता है और अपनी परवशता का एहसास करता है।

केदार जी की कविताओं में गाँव और शहर के अनेक जीवन चित्र हैं। उनकी कविताएँ रूप, गुण, धर्म और स्वरूप में विलक्षण हैं। वे उनके खुले मन और दृष्टि से प्रकट होती हैं। 'सृष्टि पर पहरा' संग्रह में उन्होंने 'कविता' शीर्षक कविता में लिखा है- जिन्दा है वह/ सिर्फ पता बदल गया है। तात्पर्य यह कि कविता आज भी अपना अस्तित्व बचाये हुए है। फर्क सिर्फ  यह है कि वह आज वहाँ रहती है, जहाँ पहले नहीं रहती थी। तात्पर्य यह कि कविता हर युग में अपनी जगह बदलती रहती है। बहुत सारे लोग यह सवाल उठाते हैं कि पुरानी कविता जहाँ रहती थी, आज की कविता वहाँ नहीं रहती। कविता का स्वभाव ही है कि हर युग में वह जगह ही नहीं बदलती, अपने आत्म-रूप के साथ-साथ परिधान भी बदलती रहती है। केदारजी कहते हैं-

और वह आज भी जिन्दा है

मृत्यु की सारी घोषणाओं के बाद

लोग अब भी उसे सुनते हैं

शहरों में कस्बों में

कभी-कभी हवा के साथ बहकर

किसी हाट-बाजार तक

टहल आती है उसकी कोई पंक्ति

जब बोलते हों लोग

तो कभी सुनना रुककर

उनके शब्दों के बीच की फाँक में

कई बार सहसा कौंध जाती है वह

पता लगा लो- जो मारे जाते हैं जंगलों में

उन युवा होठों पर

अक्सर होती है कोई-न-कोई कविता

केदार जी अंतिम सांस तक कविता जीते रहे। कविता पर अटूट भरोसा था उन्हें। कविता के बारे में तभी वे बेलौस ढंग से लिख सके-

जाने कैसी बनैली प्रजाति की लतर है

किसी राष्ट्रीय उद्यान में

खिलती ही नहीं।

केदारजी दिल्ली में रहते हुए भी सुदूरवर्ती इलाकों के जीवन को भी महत्त्व देते थे और उन्हें भी आधुनिक मानते थे। उनके 'उत्तर कबीर' कविता-संग्रह में 'विमर्श' नामक कविता उनके इन विचारों को स्थापित करती है। उनका मानना था कि कविता जीवन-राग है, जो आदिम अवस्था से आधुनिक व्यवस्था तक फैली हुई है। वे हिन्दी को अपना देश मानते थे और भोजपुरी को अपना घर। वे अपने घर में देश को और देश में घर को खोजते रहते थे। उनमें राष्ट्रीय चेतना भी थी और आँचलिक चेतना भी। वे दोनों में किसी को छोड़ नहीं सकते थे। आज जब वे नहीं हैं, उनकी 'जाऊँगा कहाँ'कविता बार-बार पढ़ता हूँ, गुनता हूँ। कितनी आत्मीयता, लगाव और स्नेह कवि को घर और बाहर की तमाम चीजों से था, जिससे जीवन में उनका रिश्ता रहा था। ऐसे में 'माँझी का धूल' (जो उनकी एक विलक्षण कविता है।) की कोई कील बन जाने की इच्छा भी है। इस कविता के अंत वे इस तरह से करते हैं-

देखना

रहेगा सब जस का तस

सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी

साँझ को जब लौटेंगे पक्षी

लौट आऊँगा मैं भी

सुबह जब उड़ेंगे

उड़ जाऊँगा उनके संग

केदार जी इस जीवन से विदा लेकर भी इस दुनिया से विदा नहीं हुए। उनकी कविताओं में 'साधारण' के प्रति अटूट आस्था, जीवन और प्रकृति के अनेक अनछुए, हँसते-मुस्कुराते हुए बिम्ब, कविता का अपना एक अलग मुहावरा उनके कवि-व्यक्तित्व को ऐतिहासिक महत्त्व प्रदान करता है। बहुत पहले उन्होंने अपनी पत्नी की मृत्यु पर चार पंक्तियाँ लिखी थीं-

मैं जा रही हूँ- उसने कहा

जाओ- मैंने उत्तर दिया

यह जानते हुए कि जाना

हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है।

       आज केदारजी के जाने के बाद इस हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया (अर्थात् जाना) को गहराई से महसूस कर रहा हूं।