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Wednesday 13 Nov 2019

इप्टा के 75 साल

 

अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) और भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) एक दूसरे के पूरक सांस्कृतिक संगठन है। प्रलेस की स्थापना (1936) के तत्काल (7 वर्षों) बाद इप्टा की स्थापना हुई थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव कॉ पी सी जोशी और प्रलेस के महासचिव कॉ सज्जाद जहीर ने देश और दुनिया के संकट को देखकर महसूस किया था कि केवल राजनीति एवं लेखन की शक्ति से सांस्कृतिक जागरूकता संभव नहीं है। उनकी यह स्पष्ट समझ थी कि सांस्कृतिक चेतना के अभाव में हम आजादी, शोषण मुक्ति और पूंजीवादी-साम्राज्यी शक्ति को पराजित करने की लड़ाई को बल और गति प्रदान नहीं कर सकते हैं।

यह सही है कि दिमागी सांस्कृतिक गुलामी के कारण राजनीतिक गुलामी लंबी आयु पाती है। जिस भी देश में सांस्कृतिक जागरूकता आई है, वहाँ हक, अधिकार और भविष्य की लड़ाई पहले और मजबूती से लड़ी जाती रही है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि में सांस्कृतिक चेतना ने सर्वोपरि स्थान हासिल किया था। जब लड़ाई तेज हुई तो संघर्षरत जनता की चेतना को उन्नत एवं दृढ़ बनाने में साहित्य और संस्कृति ने प्रेरणा उत्पन्न की थी। केवल शिक्षा हासिल कर कोई मुक्तिपथ का राही बने असंभव है। चाहे शिक्षित हो कि अशिक्षित, सांस्कृतिक चेतना उसे योद्धा बना देती है, तभी वह सिद्धांत और संगठन की अहमियत जान पाता है।

प्रलेस के निर्माण का दौर उस समय यह था कि देश अंग्रेजों की गुलामी झेल रहा था और साम्राज्यवाद की कोख से हिटलर जैसा फासिस्ट पैदा हो गया था। भारत में आजादी और फासिज्म, दोनों को समझने में साहित्य से जितना संभव हो पाया किया गया लेकिन उसे व्यापकता प्रदान करने हेतु इप्टा के निर्माण की चिंता उस वक्त के सांस्कृतिक प्रणेताओं को बेचैन बना रही थी। 1943 में इप्टा की स्थापना इसी तरह की उथल-पुथल के दौर में हुई। इस कार्य में कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय बम्बई स्थित कम्यून की भूमिका प्रधान बन गई। इसी कम्यून में सज्जाद जहीर, अली सरदार जाफरी, नेमिचन्द्र जैन, रेखा जैन, कैफी आजमी आदि रह रहे थे। प्रलेस और इप्टा एक दूसरे का पूरक बन गए। बलराज साहनी, भीष्म साहनी फिल्म में कम इप्टा में ज्यादा सक्रिय थे। सभी कम्युनिस्ट थे। इनके भीतर आजादी की बेताबी थी तो फासिज्म के पराजय के लिए कुछ भी कर गुजरने की तमन्नाएं थी।

कला विलासिता की चेरी नहीं, सामाजिक चेतना का संवाहक है। इप्टा और प्रलेस के माध्यम से सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ रही थी। सांस्कृतिक मंच का दायरा विस्तृत हो गया। जनगीतों के साथ ही लोक नाट्य मंचन ने एक सांस्कृतिक जागरण ला दिया। बदलाव के पक्षधर लेखक और कलाकार इन दोनों संगठनों से जुड़कर या प्रभावित हो कर नई पहचान बनाने में समर्थ थे। यह दौर निर्माण का था। इसने एक सामाजिक अभियान का सूत्रपात कर दिया। बड़ी प्रभावशाली भूमिका इसने अदा की। भविष्योन्मुखी इस संगठन ने राष्ट्रव्यापी भावनाओं, इच्छाओं को वाणी दे दी थी। प्रेमधन, शंकर, शैलेन्द्र गीतकार थे तो अमरशेख गायक बनकर जनता के हीरो बन गए थे। ख्वाजा अहमद अब्बास, बलराज साहनी, दमयंती, भीष्म साहनी जैसे कलाकारों के नाम चर्चा में थे। इप्टा ने व्यावसायिक संगठनों को पीछे छोड़ दिया। लहर की तरह इसने जीवन में हिलोरे पैदा की थी। इसने सांस्कृतिक अभियान का विराट रूप धारण कर लिया था। पृथ्वीराज कपूर जैसे फिल्म के मशहूर अभिनेता ने नाट्य आंदोलन में इप्टा सी संस्कृति को पृथ्वी थियेटर बनाकर आगे बढ़ाया। सम्पूर्ण देश में ऐसे कार्यक्रमों की धूम थी। इप्टा की संस्कृति ने त्याग और भाईचारे को मजबूत बनाया। दंगे की आग के बीच इप्टा के कलाकार अमन का पैगाम लेकर पहुँच जाते थे। मन बहलावे के लिए नहीं, बदलाव की लड़ाई को बल प्रदान करने के लिए इनके कार्यक्रमों ने सार्थक भूमिका को मजबूत बनाया था। बंगाल के अकाल में मर रहे लोगों को दो मुट्टी अनाज कैसे मिले, नरकंकालों में जिन्दगी कैसे पल्लवित हो जाए, इप्टा ने देश भर में मुहिम चलाकर आदर्श प्रस्तुत किया था।

इप्टा ने परम्परागत लोकशैली के नाटकों को प्राथमिकता दी। जनता इससे आसानी से जुड़ती थी। कम खर्च में ऐसे नाटक मंचित कर पाने में भी वे समर्थ होते थे। सांस्कृतिक आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र व्यापक होता है। मानसिकता निर्माण में इसकी भूमिका राजनीतिक क्रिया-कलापों से ज्यादा बढ़कर और असरदार होती है। यही कारण है कि पी सी जोशी के नेतृत्व और प्रेरणा से इसे यह स्वतंत्रता मिल रही थी कि जनतंत्रात्मक स्वरूप में अपनी गतिविधियों को व्यापकता प्रदान कराएं। पार्टी और नेतृत्व के प्रति निष्ठा नहीं, वैचारिक प्रतिबद्धता इनकी शक्ति थी। पार्टी के नियंत्रण में नहीं, विचारधारा से प्रेरित होकर वे असह्य दुखों को सहते हुए जंग के सैनिक की तरह मैदान में थे।

बलराज साहनी ने लिखा है कि -राजनीति उनके लिए जीवन को सुन्दर बनाने के लिए है। क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति हेतु की जा रही राजनीति बदलाव की शक्ति नहीं हो सकती है। बगैर राजनीति के जीवन में बदलाव संभव ही नहीं है। इसका वर्णन करते हुए स्पष्ट शब्दों में लिखा -जब सिर पर बम बरस रहे हों तो आदमी खुद को राजनीति से दूूर नहीं रख सकता। वह जानना चाहता है कि यह बम क्यों बरस रहे हैं, लड़ाइयाँ क्यों होती हैं और मानवीय मूल्यों का जनाजा क्यों निकलता है। इप्टा का गठन ही विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए हुआ था। इसका उद्देश्य कभी भी केवल मनमोहक गीत एवं नाट्य मंचन नहीं रहा है। इसका विश्वाास था ''रूप तभी सुन्दर है सत्य है जब उसके पीछे विचार हो।ÓÓ

इस गौरवशाली भूमिका को निभाते हुए इप्टा ने उत्थान-पतन के दौर से गुजरते हुए 75 साल की आयु पा लिया है। इप्टा ने 'प्लैटिनम जुबलीÓ के नाम से पटना में भव्याकार राष्ट्रीय समारोह का आयोजन करके 75 वीं वर्षगांठ मनायी। इस समारोह में 27-31 अक्टूबर, 2018 के विभिन्न कार्यक्रमों में नामचीन कलाकारों एवं बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया। बहुरंगी सांस्कृतिक छटाएं एवं विमर्श के दौर ने इसे महत्त्वपूर्ण बना दिया। सबसे आकर्षक एवं प्रभावकारी सांस्कृतिक झांकी थी। पटना में संपूर्ण देश जैसे समा गया हो। राह चलते पटनावासियों को ठिठक कर उस झांकी को देखने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा।

राष्ट्रीय एकता, विविधताओं की एकता का संदेश इप्टा का यह सम्पूर्ण कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा था। एक प्रश्न ने विमर्श के दौर को इप्टा ही नहीं, सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े वहाँ उपस्थित सभी लोगों को उत्तेजित और विचारोतेज्जित कर दिया। वह प्रश्न था - राजनीति और संस्कृति का सरोकार। राजनीतिक पार्टी से मुक्ति यानी राजनीतिक विचारधारा से मुक्ति यानी सिद्धांत आधारित रंगकर्म से छुट्टी, यह आज का नया सवाल नहीं है। विचारधारा के अंत, इतिहास का अंत, दर्शन का अंत, सिद्धांत और आदर्शों का परित्याग व्यवहारवादी बनने के लिए जरूरी है, यह कहा जाता रहा है। व्यवसायिकता के इस समय में यह सवाल इप्टा के इस कार्यक्रम में प्रस्तुत होना आश्चर्चजनक इस लिए नहीं है कि भूमंडलीकरण के युग में ऐसी प्रवृत्ति और दृष्टि को सर्वव्यापकता मिली हुई है। इसके प्रभाव से आक्रांत जनवादी सांस्कृतिक संगठन भी हैं।

हमें इस समय की चुनौतियों के संदर्भ में इस प्रश्न पर गौर करने की जरूरत है देश और दुनिया में सहिष्णुता, सद्भाव, भातृत्व की जगह घृणा, कट्टरता, अलगाव और वैरभाव ने पूंजी के आश्रय में सर ताना है। इस दौर में चालाकी भरी लफ्फाजी और समय पर चुप्पी एवं राजनीति विमुखता के कारण भारत में फासिज्म का खतरा मजबूत पाया है। घटनाएं होती हैं और हम दूर रहकर नुमाइशी प्रदर्शन करते है। हस्तक्षेपकारी भूमिका में संस्कृतिकर्मी इस तर्क से अलग रहते हैं कि यह काम राजनीति का है। हम तो आजाद हैं। यही है नकली उदासीनता और सतही दिलचस्पी। लोक से कटकर भद्रजन की वाहवाही केलिए लालायित रहना घोर अवसरवाद है।

भारत में आजादी के बाद 1947 में पूूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई थी। इसमें पूंजी के फैलाव के साथ-साथ जनता को सीमित ही सही जनवादी अधिकार भी मिला हुआ रहा। लोकतांत्रिक संस्थाएँ यहाँ स्थापित हुई। सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने से नियोजित अर्थतंत्र में स्वतंत्र आर्थिक नीतियों को प्रश्रय मिला। धर्मनिरपेक्षता आधारित संविधान को देश ने स्वीकार किया। सद्भाव और सहिष्णुता की संस्कृति विकसित हुई। टकराव के साथ ही सही पूंजीवाद के विरूद्ध संघर्ष का मार्ग भी कायम रहा।

लेकिन पूंजीवाद की कोख से द्वितीय विश्वयुद्ध काल में फासीवाद का उदय हुआ था, वही दौर बदले हुए रूप में आज भूमंडलीकरण के दौर में विश्व में सांप के फन की तरह सर उठाए हुए है। भारत में साम्प्रदायिक फासीवाद उसी का एक अंग है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने जेपी के नेतृत्व में 1977 की सरकार के समय भाजपा के राजनीतिक आवरण में साझेदारी पाकर राष्ट्रीय स्वीकार्यता हासिल कर ली। जिस संघ को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने प्रतिबंधित किया था, उसी संघ के नेतृत्व में भाजपा ने आज दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा उनकी ही निर्मित करायी है।

चूँकि आजादी की लड़ाई में संघ अंग्रेजों के साथ था और देश के निर्माण में इसने किसी प्रकार का योगदान नहीं किया है, इसलिए स्वीकार्यता के लिए इसे वे सभी आवरण चाहिए, जिससे कि यह ऊँची हाँक लगा सके।

सांस्कृतिक गुलामी कायम किए बिना राजनीतिक प्रभुत्व को बरकरार नहीं रखा जा सकता है। यही कारण है कि विवेक को मारने की मुहिम चलाई है। धर्मनिरपेक्ष पाठ्यक्रम को साम्प्रदायिक बनाया जा रहा है। इस दौर में सम्मान, पुरस्कार, सरकारी सुख-सुविधाएं, सरकार नियंत्रित संस्थानो के कमाऊ पद ,नाटकों के लिए अनुदान विदेश यात्राएं आदि के प्रलोभन से संस्कृतिकर्म की आजादी एवं उसके प्रतिपक्ष की भूमिका को मारा जा रहा है। पूंजी द्वारा अनेक प्रकार के लुभावने कार्यक्रम इनके द्वारा इन्हें वशीभूत करने के लिए लाए गए हंै।

प्रभु वर्ग ने हमारी लोक सांस्कृतिक आंदोलन को शस्त्र से नहीं बुद्धि से मारा है। उपभोक्तावाद इसी की उपज है। इप्टा, प्रलेस जैसे विचार प्रधान और आंदोलनधर्मी भविष्योन्मुखी संगठन को भी इसने प्रभावित किया है। इन चुनौतियों का सामना राजनीति-विहीन, विचारधारा-हीन एवं पूंजी से परिचालित सांस्कृतिक संगठनों के द्वारा क्या संभव है? ऐसे संगठनों का साझा मंच विकल्प नहीं, विकल्प के नाम पर भूल भुलैया की सैर कराना होगा।

जब समान उद्देश्य और लक्ष्य सामने हों तो केवल संस्कृति कर्मियों या उनके संगठनों के साझा मंच की जगह कलाकारों, साहित्यकारों और बदलाव के लिए प्रतिबद्ध राजनेताओं का साझा मंच बनाना वक्त की जरूरत है । दुनिया के कई देशों में ऐसा हुआ है। लातिन अमरीकी देशों एवं पड़ोस के नेपाल में जो तब्दीली आई है, उसमें इसी तरह का साझा मंच बना था।

स्वतंत्रता आंदोलन के दरम्यान कलाकारों और लेखकों ने यह नहीं कहा था कि मेरे गीत -संगीत और कलम ले लो, और मेरे हाथ में हथियार दे दो। इतिहास गवाह है कि उन लोगों ने गीत में अंगार भर दिए, नाटकों से भूचाल ला दिया और कलम को ही तलवार बना लिया। आज उससे भी बदतर और खतरनाक समय आ चुका है। हमें बुझे दिए को जलाना होगा। भारत में संस्कृति और राजनीति का संबंध हमेशा से रहा है। आजादी की लड़़ाई में महात्मागांधी, जवाहर लाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, सी राजगोपालाचारी, सुब्रह्यण्यम भारती, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, प्रेमचंद, निराला, मैथलीशरण गुप्त, बनारसी दास चतुर्वेदी, दिनकर और प्रलेस एवं इप्टा तथा उन जैसे समानधर्मी सभी सांस्कृतिक संस्थाओं का इतिहास यही है। लोहिया एवं जयप्रकाश नारायण स्वतंत्रता आंदोलन में उसी धारा के साथ जुड़े थे।

आज के समय में लेखक एक राजनीतिक प्राणी है। राजनीति से कन्नी काटने का मतलब है कि वह निहित स्वार्थ से प्रेरित सत्ता-सुख की प्राप्ति और लक्ष्मी की गोद में सोना चाहता है। बदलाव उसका मात्र मुखौटा है। उसके बदलावपक्षीय गीत, नाटक, कविता, कहानी, लेख सभी इस कारण से नि:ष्प्रभावी हो जाते हैं। गोर्की ने कहा है - ईमानदार एवं सच्चा लेखक और संस्कृतिकर्मी ही प्रभाव डाल सकता है। बगैर वैज्ञानिक चेतना, लोकमुखी राजनीतिक विश्वदृष्टि और हस्तक्षेपकारी शक्ति के सांस्कृतिक आंदोलन निरर्थक है। यह भी सच है कि बदलाव बड़े नामधारी लेखक, कलाकार नहीं, छोटे लेखकों और कलाकारों के द्वारा होते हैं। शर्त केवल एक है कि वे ईमानदार हों।

आज ऐसी विषैली हवा बह रही है कि हमारे आपके व्यक्तित्व की नहीं, जाति और धर्म की पहचान को प्रधान बनाया जा रहा है। हिन्दू जो बहुसंख्यक है, कट्टर बन रहा है तो मुसलमान भी छुई-मुई बने हुए नहीं हैं और न रहेंगे वे भी कट्टर बन रहे हैं। मंदिर और मस्जिद इनके लिए राजनीतिक अखाड़े हैं। फिर से रामजन्मभूमि का मसला दरपेश है। 2019 का लोकसभा चुनाव जो सामने है।

साहित्य और सांस्कृतिक को राजनीति से दूर रखकर ही फासीवाद अपना क्षेत्र निर्माण करता है। यही आज हो रहा है। लेखकों और कलाकारों का एक तबका ऐसा है जो इस विषैली हवा से आक्रांत है। हमें खुशी है कि इस सवाल पर उस विषय के विमर्श में मैं अकेला प्रतिभागी नहीं बना, मेरे बाद अनेक प्रतिभागियों ने पुरजोर तरीके से इसी मत को वहाँ प्रस्तुत किया। यह भी खुशी है कि इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणवीर सिंह जो राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के वरीय संरक्षक सदस्य हैं, ने भी इस बात को सुलझे हुए ढंग से प्रस्तुत किया कि थियेटर राजनीति से अलग हो ही नहीं सकता है। अच्छी कविताएं और अच्छे नाटकों की मांग उन्होंने की। विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि संघर्ष के दौर में उत्कृष्ट कविताएं और नाटक ही नहीं, उपन्यास और कहानियां भी लिखी जा रही है। दुर्भाग्य है कि हम पुराने नाम और उनकी रचनाएं ही पढ़-लिख रहे हैं। संघर्ष अपने अनुकूल लेखकों और कलाकरों को पैदा करता है। आज संघर्ष जारी है। इसलिए हर क्षेत्र में प्रतिरोध मुसीबतों को झेलते हुए जारी है। कलाकारों और लेखकों को सामाजिक मान्यता तभी मिलती है जब वे नैतिक रूप से लोकधर्म का निर्वाह करते है लेकिन सुख-सुविधा उन्हें इस पथ पर तीव्र गति से बढऩे से रोक देती है। शराब और पैसे ने राजनीति को जैसे प्रदूषित किया है। वैसे ही कलाकर्म भी अब इससे आक्रांत है।

इप्टा के मजबूत स्तंभ और प्रगतिशील लेखक संघ के 1976 से 1986 तक महासचिव रहे भीष्म साहनी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है ''पार्टी का नियंत्रण तो नहीं ही, निर्देशन भी सबसे कम रहा'' पार्टी से स्वतंत्र रहने का तर्क विचारधारा से दूर होने के नाम पर दिया जाता है। भीष्म साहनी का कथन देखें -''कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित लोगों की दृष्टि निश्चय ही सामाजिक स्तर पर अधिक स्पष्ट और सटीक होती है। वह साम्प्रदायिक नहीं, जातिभेद में विश्वास नहीं रखता, न ही रंग भेद में। विश्वसनीय लोग वाम विचारधारा में हैं।''इप्टा के बारे में भी उन्होंने लिखा है - ''इप्टा के बदले चरित्र ने उसकी कमर तोड़ दी। जीवन और आंदोलन से जुड़ा इसका चरित्र नहीं रहा। इप्टा में तंग नजरी आ गई। इप्टा हमारी बहुमुखी जनतांत्रिक राष्ट्रीय चेतना का वाहक था। उसका यह स्वरूप हमेशा रहना चाहिए।'' जो लोग यह तर्क देते हैं कि पार्टी के नियंत्रण के कारण सांस्कृतिक संगठन और आंदोलन कमजोर पड़ा है। वे बेईमान है। भीष्म साहनी ने स्पष्ट लिखा है कि पार्टी का नियंत्रण नहीं रहा लेकिन कम्युनिस्ट चेतना बलवती रह,ी यही होना चाहिए।

इसके इस चरित्र को बनाने और सुदृढ़ बनाने हेतु इसका राष्ट्रीय नेतृत्व सतर्क और सचेष्ट है। इप्टा के महासचिव साथी राकेश से इस संबंध में बातें होती रहती हैं। पटना में भी इस पर उनसे चर्चा हुई। वे इप्टा को सही लीक और प्रलेस से जुड़कर व्यापक मोर्चा बनाने के लिए सचेष्ट और सक्रिय हैं । हम आशावादी हैं। खतरनाक समय में हम जी रहे हैं, इसलिए छोटे-मोटे, निजी या सांगठनिक और वैचारिक मतभेदों के बावजूद मिलकर चलने के लिए तैयार होना पड़ेगा। नहीं तो एक-एक कर उसी तरह मारे जाएंगे जैसा कि इस कविता से जाहिर होता है -

मार्लिन नीमोलर की यह बहुपठित कविता प्रासंगिक है। इसे केवल भारतीय परिवेश में 'यहूदियों' की जगह 'मुसलमानों'को ध्यान में रखकर पढऩा चाहिए -

''पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए,

और मैं कुछ नहीं बोला,

क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।

फिर वे आये ट्रेड यूनियन वालों के लिए,

और मैं कुछ नहीं बोला,

क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था।

फिर वे यहूदियों के लिए आए,

और मैं कुछ नहीं बोला,

क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।

और फिर वे मेरे लिए आए,

और तब तक वहाँ कोई नहीं था,

जो मेरे लिए बोलता।''

भारत में आज नैतिक एवं वैचारिक सुदृढ़ सांस्कृतिक नेतृत्व की जरूरत है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण लाने की जवाबदेही प्रलेस और इप्टा के ऊपर है। पहचान की राजनीति (हिन्दुत्व, इस्लाम, ईसाई, अगड़ा और पिछड़ा) से मुक्त होकर ही परिवर्तन की लड़ाई को हम दिशा प्रदान कर सकते है। इसके लिए हमें सार्वजनिक संवाद की प्रक्रियाएं बढ़ानी होगी। इसके अभाव में फासिज्म को बढऩे से रोकना असंभव है। आज बाजार के हमले से विवेक को बचाना जरूरी है। विवेक की रक्षा कला, साहित्य और संस्कृति ही करती है।