Monthly Magzine
Wednesday 13 Nov 2019

बेहतर मूल्यों के लिए व्यंग्य की लयात्मक मार

36,क्लीमेन्ट्स रोड ,सरवना स्टोर्स के पीछे पुरुषवाकम, चेन्नई (तमिलनाडु )-600007 मो. 09425083335

मौसमी भावनाएँ' व्यंग्य संग्रह के बाद 'सठियाने की दहलीज पर'' प्रदीप उपाध्याय का दूसरा व्यंग्य संग्रह है। इस व्यंग्य संग्रह की अधिकतर रचनाएँ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाचक्र की सुर्खियों को अपने वैचारिक संस्पर्शीं से लपेटते हुए चुटीले प्रहार से मारक बनाती है। देखा जाए तो इन व्यंग्यों में वैचारिकता, व्यंग्य, टिप्पणी और फिल्मी गीतों की लय से लपेटती व्यंजनाएँ एक खास तरह की शैली में ढलकर आये हैं। यों भी व्यंग्यकार ने 'अपनी बात' में इस सोद्देश्यता को रेखांकित किया है-'मूलत: व्यंग्य विचार से पैदा होता है और विचार को पैदा भी करता है।' और इन व्यंग्यों में एक टिप्पणीकार के साथ एक स्वस्थ विचार भी व्यंग्य की प्रकृति में समाया हुआ है। इन व्यंग्यों में यथास्थिति और भ्रष्टताओं पर चोट करने की बेबाकी साहसिक है।

'सठियाने की दहलीज पर' संग्रह की रचनाएँ घटना आधारित तात्कालिकता से उपजी हैं। कई बार घटनाओं की विस्मृति के साथ रचनाएँ बासी हो जाती हैं। पर लेखक ने इस तात्कालिकता में वैचारिक और मूल्यवादिता को इस तरह संजोया है कि वे तात्कालिकता के बावजूद समय की लम्बाई में जीती हैं, अपने समय की साक्षी भी बनती हैं और बेहतर मूल्यों की आकांक्षाओं से विसंगत पर प्रहार करने की पाठकीय मानसिकता को भी संजोती है। यह वैचारिक संस्पर्श भारी भरकम होकर व्यंग्य की प्रकृति को प्रभावित न करे, इसके लिए व्यंग्यकार फिल्मी गीतों की लयों पर अपनी बात को बढ़ा देने की लोकप्रिय शैली का चितेरा बन जाता है। यों बोलते हुए समाज की जीवंत मुहावरेदानी भी कदम कदम पर रचनाओं की संप्रेषणीयता बनाती है। ये रचनाएँ बिम्बों प्रतीकों की भाषायी नक्काशी में न सँवरकर अभिधा शैली में ही व्यंग्य के नश्तर में व्यंजित हुई हैं। 'जो नौजवान शादी के पहले जेंटलमैन लगता है, शादी के बाद सिर्फ मैन रह जाता है और रिटायरमेंट के बाद डाबरमैन होकर रह जाता है।'परिहासमयी यह छलाँग जीवन की अवस्थाओं, विवशताओं और प्रवृत्तियों की आसान व्यंजना दे जाती है।

चाहे मोबाइल पीढ़ी के प्रेम तरानों में पुराने लोगों का खुन्नस भरा दर्द हो या पोस्ट ऑफिसों से गंगाजल का धंधा, उड़ते पंजाब की नशीली सुर्खियाँ हों या मिड डे मील्स की छिपकलियाँ; ये व्यंग्य महज सूचनाओं की रसवादी अदायगी नहीं देते बल्कि उन प्रतिक्रियाओं में सहज प्रतिक्रिया और प्रतिकार की ताकत भी रची बसी होती हैं। और प्रतिक्रियाएँ बेबाक ढंग से योजनाओं का राजनैतिक लाभ लेने वाले आकाओं या नौकरशाही पर सीधी मार भी करती हैं। कभी-कभी तो ऐसे मुद्दे शासन,समाज और न्याय के सामने भी खड़े हो जाते हैं। 'जब ईश्वर एक है तो अलग-अलग मजहब के लोगों के लिए अलग-अलग नियम-कायदे क्यों? ऐसा तो नहीं कि अलग-अलग प्रोजेक्ट बनाकर पायलट टेस्टिंग के लिए डाल रखे हों! कहीं शादी समझौता तो कहीं विवाह संस्कार! और इन विवादों के आगे आम आदमी की टपकती छत और फिल्मी रोमांस के सावनिया गीतों के स्पेक्ट्रम और आम आदमी की पीड़ाओं को सहलाते आनंद के सरकारी मंत्रालयों के इंतजाम। मगर नेपथ्य में तो गैंगरेप, किसानों की आत्महत्याएँ और भूख की चिन्ताएँ। ऐसा नहीं कि व्यंग्यकार हर विधायक अंदाज को व्यंग्य का शिकार बनाता है, पर स्वच्छता अभियान के साथ दिमागी खरपतवार को भी सफाई के मुहाने पर ले आता है।

इन रचनाओं में राजनीति के विविध परिदृश्यों में घटनाचक्र ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि मूल्यों का विघटन भी अलार्म बजाता है। दाग अच्छे हैं में लेखक सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि में यही व्यंग्य दागता है- 'दाग लगना फैशन की तरह हो चला है, जो जितना दागदार होगा वह समाज में उतना ही सर ऊँचा करके चल सकता है, वह उतना ही छाती फुलाकर चल सकता है।' और साफ दामन वालों की कसक भी नपुंसक सी लगती है-'दूसरों की हरियाली देखकर अपने बंजरपन को कोसने के अलावा कुछ नहीं करते हैं।' लेखक नामचीन घटनाओं और व्यक्तियों को भी सामने ले आता है, पर कभी सांकेतिकता में भी व्यंजनाएँ ज्यादा असरदार हो जाती हैं। कई बार जनप्रतिनिधियों के प्रशिक्षण या इंग्लैण्ड की तरह माईन्ड रीडिंग के आधार पर नेतृत्व चयन की बात आ जाती है पर भारतीय परिदृश्य में राजनीति के ककहरे को वह जन्मजात ही पाता है। इसीलिए किताबी ज्ञान की अपेक्षा आरोपों के जिद्दी दागों से ऊँची होती नेतृत्व की अहमियत में चार चाँद की क्वालिफिकेशन को वह सिद्धि के रूप में रेखांकित करता है और आम आदमी की समझ के आगे सवाल खड़ा हो जाता है - 'कब व्यक्ति कौरव पक्ष का हो जाता है, कब पांडव पक्ष का। कब दुर्योधन हो जाता है और कब अर्जुन!'

इन व्यंग्यों में लेखक ने आतंकवादियों की हिमायत करते सोच पर अपनी पेलेटगन चलाई है। नौकरशाही की हैरतअंदाज सोच पर भी तीर चलाये हैं। समाजवादी अर्थ व्यवस्था से उपजे पूँजीवादी कंगूरों पर भी मूल्यगत प्रहार किये हैं। व्यवस्था के 'लीकेजेसÓ को अमेरिकी ट्रेड टॉवर से लेकर मुन्ना भाइयों और कमीशनखोरों तक खूब उकेरा है। ऊँचे लोगों की आत्मकथाओं में आम आदमी की व्यवस्था के नदारद पन्नों को, गरीबी रेखा के मानक में उलझे झंझटों-बवालों को, प्याज के आँसू बहाती किसानी को, पत्थरबाजों को सहलाती अभिव्यक्ति की आजादी को, हिंसा पर कड़कड़ाते निंदा-बयानों को, अपनी नाकामी दूसरों के मत्थे मढऩे के खिसियानी बिल्ली के स्वभावों को, आधुनिकता के बीच चुटिया काटने के अन्धविश्वासों को, गँवई अशिक्षा के बीच डिजिटल की मुसीबतों को, कनिष्ठ-वरिष्ठ की मानसिकताओं को, आचारसंहिता और नियमों के अंदाजों की शेरदिली को जी भर लपेटा है पर जुगाड़ संस्कृति में तो यह प्रहार चौतरफा है-'जुगाड़ कला है तो विज्ञान भी है, जुगाड़ संस्कृति है, जुगाड़ व्यवहार शास्त्र का अमोघ अस्त्र है, जुगाड़ जीवन दर्शन है तो यह जीवन शैली भी है।' भानुमती के कुनबे का यह जुगाड़ प्रौद्योगिकी इस व्यंग्य में समाजशास्त्र, राजनीति ही नहीं बाजार में भी सेंध लगाती हुई भारतीयता के कलात्मक फन को इंगित करती है। लेखक का यह चौकन्नापन भी है समूचे परिदृश्य को लेकर और वैचारिक टिप्पणीकार के साथ व्यंग्य का नश्तर भी।

इन रचनाओं में विचार का यह प्रवाह को शिथिल या गंभीर बनाता है तो भाषा की सहजता और फिल्मी तर्जों के लयात्मक अंदाज इसे सहज ही बहा देते हैं। पर व्यंग्यकार अपनी बात को सादृश्यों या कलात्मक प्रतीकों, बिम्बों में नहीं कहता इसलिए कहीं-कहीं सपाटबयानी  भी नजर आती है। पर इतना जरूर है कि ये रचनाएँ पाठक के सोच को उस वैचारिकता की ओर ले जाने की आरंभिक प्रतिज्ञा से जुड़ी है, जो स्वस्थ मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध है।