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Wednesday 13 Nov 2019

अभिव्यक्ति एवं अनुभूति का सुंदर समन्वय -पतली सी हँसी

साहित्य आजकल मनोरंजन का साधन हो गया है। झूठी वाहवाही लूटने के लिए कुछ भी लिखा जा रहा है। तुकबंदियों के बीच छंदबद्ध रचनाएँ कम पढऩे को मिलतीं हैं। जहां देश में लोग बड़ी संख्या में आयातित छंदों के पीछे भाग रहे हैं वहीं कुछ साहित्यकार भारतीय छंदों के संरक्षण, संवर्धन एवं विकास के लिए सतत प्रयत्नशील हैं। ऐसे लोगों में एक नाम है विजय राठौर जी का जिन्होंने विभिन्न छंदों को खूबसूरती के साथ पिरोकर प्रशंसनीय कार्य किया है। हाल ही में उनके द्वारा रचित कविता संग्रह ' पतली सी हँसी Ó प्रकाशित हुआ है।  सत्यासी कविताओं का बेहतरीन मज़मूआ है यह संग्रह। सभी कवितायें रचना प्रक्रिया की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करतीं हैं। उनकी कल्पनाशीलता जीवन की सहज स्वाभाविकता से आप्लावित है, कहने का ढंग निराला है। वे स्वच्छंद रूप से भावों को अभिव्यक्त करने की कला में माहिर हैं। उनकी कविताओं में अभिव्यक्ति एवं अनुभूति का सुंदर समन्वय  दिखाई देता है। विजय जी जीवन से जुड़े रचनाकर हैं उनका चिंतन बहुआयामी एवं प्रासंगिक है। भाषा सरल, सहज एवं पठनीय है। लगता है विजय जी कविताओं में जीते हैं। उनका सौंदर्यबोध, बिम्ब और प्रतिबिंब के प्रति सजगता काबिले तारीफ है। उम्र के इस पड़ाव में भी वे निरंतर बिना किसी मोह के लिख रहे हैं। जीवन में आवश्यकतानुसार चीजों का महत्व घटता बढ़ता रहता है, सही कहा है कवि ने -छोटी सी चपाती / कई बार बड़ी हो जाती है / पृथ्वी से / एक कतरा आँसू / बड़ा हो जाता है /समुद्र से । यह शाश्वत सच है कि मन के बागी होने पर गंगाजल भी खारा लगता है, परिस्थितियों का मन: स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ता है यथा-सफेद सपनों को / आँखों में आँज कर / देखा नीला आसमान/ और होता रहा/ लाल-पीला जिंदगी भर /घटनाओं दुर्घटनाओं से । मन का उत्सव मनाने के लिए प्रेम का होना उतना ही जरूरी है जितना तन का उत्सव मनाने के लिए विवाह का। अदृश्य प्रेम की गहराई को अलग अलग रूपों में प्रकट किया गया है, यह निर्भर करता है डूबने वाले की स्थिति पर। इसी संदर्भ में विजय जी की कुछ पंक्तियाँ बानगी के तौर पर-हृदय की बंजर जमीन पर/ जब भी अंकुराई तुम्हारी स्मृति /हरिया गया मन। आज बुजुर्गों की हालत से हर कोई अच्छी तरह वाकिफ है। वृद्धजनों के आश्रमों की संख्या में निरंतर इजाफा इस बात का जीवंत प्रमाण है। नयी पीढ़ी को इन्हें गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। कवि ने सही कहा है कि-  बूढ़ी दादी / परिवार में होती वैसे ही जैसे / पुराने निर्जल तालाब की भव्यता / बचाए रखने वाला बूढ़ा पीपल। साहित्य में हितचिंतन समष्टिगत होता है, लोक कल्याण की भावना पर आधारित होता है। विजय जी ने इस बात को खूबसूरत अंदाज़ में कहा है-जैसे मिट्टी की सार्थकता / दीवार बनने में नहीं /बीज उगाने में है  /वैसे ही आदमी की सार्थकता/ अपने लिए होने में नहीं / संसार के लिए होने में है । अच्छे दिन आएंगे जुमले से कवि अच्छी तरह वाकिफ है, मजदूरों और मेहनतकशों के जीवन की सच्चाई को उसने पूरी ईमानदारी से उकेरा है -उग रहे खेतों पर भरपूर नारे  / कट रहीं फसलें यहाँ / आश्वासनों की / लोग भूखे और नंगे / जी रहे हैं / क्या नहायेँ ,क्या निचोड़े / फिर भी अगुओं पर भरोसा कर रहे हैं।

एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है। इसका मतलब ये नहीं कि लोग तालाब में जाना बंद कर दें। जरूरत है उस मछली को तालाब से बाहर फेंकने की। साहित्य में व्याप्त प्रदूषण के प्रति विजय जी की चिंता लाजिमी है। वे विषम परिस्थितियों में साहित्य के संरक्षण के प्रति पूरी तरह आश्वस्त हैं- आदमीनुमा / विषैले सर्पों के आ जाने से / सफेद कागज़ के अक्षर / पड़ जाते हैं नीले / और उनके फुफकार में / कभी भी अर्थ हो जाते हैं / तितर बितर / फिर भी कविता में बना रहता है / ठसके से सबका आना जाना । सम्बन्धों में बढ़ रही खाई एवं रिश्तों की अहमियत पर उनका चिंतन काबिले गौर है। जैसे कायम हैं रिश्ते / कागज़ और कलम में / ठीक ऐसे ही / रिश्ते कायम रहें मेरे और तुम्हारे बीच। जयशंकर प्रसाद जी ने कहा है कि कविता जीवन की संकलनात्मक अभिव्यक्ति होती है। कवि के विचारों में परिवर्तन से कविता को नई दिशा मिलती है। इसी संदर्भ में विजय जी ने लिखा है कि -जब कविता आती है /कविता के आने से पहले / कई परिवर्तन होते हैं मुझमें। मैं का अहम सदैव प्रेम में बाधक होता है। हम को एकता का प्रतीक माना गया है। प्रेम कविता में विजय जी ने कहा है -मैं जब भी / प्रेम में होता हूँ / मैं / मैं नहीं होता / हम हो जाता हूँ / किसी और दुनिया में / खो जाता हूँ । कविता संग्रह पतली सी हँसी में विजय जी की कुछ हाइकु कवितायें भी शामिल हैं जो हाइकु कविता के महत्व को दर्शाती  हैं - हाइकु कहो/ तो भाव भी उपजे/ वर्ण ही नहीं । स्त्री के महत्व को जिस खूबसूरती से विजय जी ने अपनी कविता में दर्शाया है मेरा मानना है शायद ही किसी ने दर्शाया होगा। ये रचना उनके बहुआयामी चिंतन को आधार प्रदान करती हैं। कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं- यहाँ कोई स्त्री नहीं रहती - इसीलिए जिंदा हैं - महीनों पुरानी सिलवटें/ इसीलिए बहुत कम आती है - किचन से  भात दबकने की आवाज़/ इसीलिए नहीं गूँजती -बच्चों की किलकारियाँ/ इसीलिए बार बार जल जाती है - दूध की गँजिया/ इसीलिए इस घर से धीरे धीरे छिन रहा है- घर होने का रुतबा / यह घर धीरे धीरे तब्दील हो रहा है मकान में। संत जोसेफ ने कहा है कि - प्रत्येक दिन एक छोटा जीवन होता है। हर आने वाला दिन इस एक दिन की पुनरावृत्ति होता है। इसलिए हर दिन को महत्वपूर्ण मानकर ऐसे जीना चाहिए मानो सम्पूर्ण जीवन को हम जी रहे हैं। ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जो इंसानियत के नाम पर कलंक हो। विजय जी ने अपनी कविता में इस सच्चाई को निरूपित किया है- इस कम होती दुनिया में/ चलो कुछ जोड़ें/ जाने से पहले इसे/ रहने लायक तो छोड़ें। गांवों का तेजी से शहरीकरण हो रहा है। ग्रामीण संस्कृति लुप्त हो रही है। पहले जैसा निर्भयता का वातावरण कहीं दिखाई नहीं देता। कवि ने इस मर्म को उजागर किया है-तालाबों में अब कोई बच्चा नहीं कूदता नंगा छपाक/ हमारी तरह/ धीरे धीरे बिला रहा गंवइहापन/ शहराती होने के फिराक में। बेटे तुम कहाँ हो (अविनाश राठौर की स्मृति में ) शीर्षक से लिखी गई मार्मिक कविता में विजय जी ने अपने पुत्र के प्रति आत्मीय प्रेम को उड़ेल कर रख दिया है। समय के साथ जीवन शैली ,रहन सहन एवं आचार-विचार में बदलाव का आना मानव विकास की देन है। इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी। एक मुहल्ले के शहर में तब्दील होने की गाथा का मार्मिक चित्रण है कविता-चितरपारा, जो कवि की जन्म भूमि भी है। यथा- तालाब, बरगद-पीपल के पेड़ ,मुहल्ले की संकरी गली, जेठ के आने पर बहुओं का छिप जाना, एकजुटता, दबदबा, पनिहारिनों की कतारें, तालाब के पानी की शुद्धता एवं पवित्रता, ढेंकी की धमरस- धमरस और जांता की घरर - घरर की आवाज़ , पासे की बिसात, मरफी ट्रांजिस्टर की आवाज़ का जादू , शीशियों से बनीं चिमनियों में पढऩा ,छूही की दीवारें, लीपे हुए कमरों से मिट्टी और गोबर की गंध का उभरना, सब कुछ खो सा गया है। अब चितरपारा के पक्के मकानों में रहते हैं कंक्रीट जैसे सोच वाले भद्रजन। सभी शामिल हैं बाजारवाद की दौड़ में। विजय जी के कई काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अपना पांडित्य दिखाने के लिए समय समय पर उनकी रचनाओं पर भी कुछ लोग उँगलियाँ उठाते रहे हैं लेकिन इससे विजय जी की रचनधर्मिता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, बल्कि वे दुगुने उत्साह से लिखते रहे। उनके अन्य काव्य संग्रहों की तरह पतली सी हँसी पठनीय होने के साथ ही संग्रहणीय भी है। मुझे विश्वास है पाठकों का भरपूर स्नेह विजय राठौर जी को प्राप्त होगा। मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य एवं लंबी आयु की कामना करता हूं।