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Wednesday 13 Nov 2019

बनगाँव : सरहदें दिलों को नहीं बाँट सकतीं

यात्राएँ अनुभव-समृद्ध करती हैं, भीतर से भी, बाहर से भी। एक संवेदनशील रचनाकार के लिए किसी यात्रा में होना दो समांतर यात्राओं में एक साथ होना होता है। एक यात्रा बाहर चलती रहती है और उसी के साथ दूसरी यात्रा अंतर्मन में चलती है। ये समांतर यात्राएँ एक-दूसरे का प्रतिबिम्ब कतई नहीं होतीं। ये यात्राएँ कभी एक-दूसरे से हिलमिल जाती हैं, तो कभी एक-दूसरे से उलझ जाती हैं। इसी मेलजोल और इसी टकराव से रचना का जन्म होता है।

फरवरी में बनगाँव ( कोलकाता ) जाने की योजना दो माह पहले ही बन गई थी। तब से मन में एक दोहरी उत्सुकता आकार लेने लगी थी। पहली उत्सुकता थी बनगांव में कुछ वक्त बिताने की, जिसके बारे में बताया गया था कि यह भारत-बांग्लादेश की सरहद पर स्थित एक गाँव है। यहाँ हर साल 21 फरवरी को बंग भाषा दिवस मनाया जाता है। यह एक उत्सव की तरह होता है, जिसमें दोनों देशों के लोग शामिल होते हैं। किसी सरहदी गाँव का प्रवास एक रचनाकार के लिए हर नजरिए से उपयोगी साबित होता है। दूसरी उत्सुकता थी कोलकाता के प्रवास की। मैं पहली दफा कोलकाता जा रहा था। कोलकाता के बारे में कुछ सुनी-सुनाई बातें मेरे जेहन में थीं..... कि कोलकाता एक भीड़-भड़क्के से भरा शहर है, जहाँ की तंग सड़कों में अभी भी सुस्त रफ्तार ट्रामें चलती हैं और तपती सड़क पर पैदल रिक्शा खींचते हाँफते-झुलसते रिक्शा पुलर बलराज साहनी की फिल्म दो बीघा जमीन की याद दिला जाते हैं। कोलकाता की भीड़ का बड़ा ही रोचक चित्रण 1969 में भारत के दौरे पर आयी ऑस्ट्रेलियाई टीम के उप कप्तान इयान चैपल ने किया था। ऑस्ट्रेलियाई टीम टेस्ट खेलने बस में बैठकर स्टेडियम के लिए रवाना हुई। स्टेडियम पहुँचते-पहुँचते चैपल ने अपने कप्तान बिल लारी से कहा,  हमने न्यूजीलैंड की आबादी के बराबर लोग तो देख ही लिए। पहले दिन का खेल समाप्त होने के बाद होटल लौटते समय शाम की भीड़ देखकर टीम के वरिष्ठ खिलाड़ी डग वॉल्टर्स ने कहा, अब तो हमने ऑस्ट्रेलिया की आबादी के बराबर लोग देख लिए।

कोलकाता के बारे में मेरे कुछ सैलानी दोस्तों के ख्यालात भी अच्छे नहीं दिखे। लेकिन मैं उनकी बातों पर यकीन नहीं कर सकता था, क्योंकि वे खूबसूरत समुद्रतटों और भव्य शॉपिंग मॉल वाले शहरों को ही बड़ा पर्यटन स्थल मानते हैं। जबकि मेरे लिए तो एक अच्छे दोस्त का किसी नगर में होना ही उस नगर को चाहने का सबब बन सकता है। फिर कोलकाता को चाहने के तो दसियों सबब थे। सो, मैं इस प्रवास के काफी पहले से इन दोनों आकर्षणों की गिरफ्त में था।

यात्राओं के बीच, यात्राओं के साथ-साथ चलते कुछ-कुछ लिखना भी हो जाता है, जिसमें भीतरी और बाहरी...... दोनों यात्राओं के थोड़े-थोड़े अंश आ जाते हैं। यह लिखना कागज़ के एक पुर्जे से लेकर डायरी या फेसबुक की वॉल......किसी पर भी हो सकता है। इस यात्रा में भी यही हुआ। इसी के वे कुछ नोट्स, जो इस प्रवास से जुड़े हैं.........

(कवर्धा, 9 फरवरी, 2018)

20 फरवरी को कोलकाता जाना है। बनगाँव एक सरहदी गाँव है, भारत बांग्लादेश की सरहद पर कोलकाता से 80 किमी दूर। 21 फरवरी को कुछ रचनाकार मित्र वहाँ जाएँगे। यह एक विशेष दिन है, कुछ-कुछ त्योहार जैसा, जिसे दोनों देश के लोग मिलकर मनाते हैं। यह गाँव इच्छामती नदी के किनारे बसा है और इसी नदी को दोनों देशों की सीमारेखा मान लिया गया है। बनगांव के बारे में नेट पर सर्च किया तो कुछ खास जानकारी हासिल नहीं हुई। सो, कुल मिलाकर एक अनजान सी यात्रा पर निकलना है। और यही बात ही तो है जो रोमांचित करती है।

कोलकाता के लिए ट्रेन की कन्फर्म टिकट लेने में भी थोड़ी मुश्किल दरपेश आई। इरादा था 20 फरवरी को रायपुर से ज्ञानेश्वरी या मेल पकडऩे का, ताकि 21 की अलस्सुबह हावड़ा पहुँच जाएँ और तैयार होकर 10 बजे तक बनगांव के लिए निकल जाएँ। लेकिन दोनों गाडिय़ों के एसी कोच में बर्थ नहीं मिली। खैर, उसी दिन सुबह राजकोट-संतरागाछी स्पेशल एसी का वक्त भी है। उसमें आसानी से बर्थ मिल गई। सो, 19 को रायपुर के कुछ काम निबटाकर रात भिलाई में रुकने का और भोर 3 बजे दुर्ग से ट्रेन पकडऩे का तय किया है। यह गाड़ी दोपहर बाद 4 बजे तक हावड़ा पंहुँच जाती है। एक मित्र ने कहा है..... कि संतरागाछी से लोकल पकड़कर हावड़ा चले जाना। तुम्हारे पास चूंकि काफी वक्त रहेगा, इसलिए तुम रात को हावड़ा ब्रिज से हुगली नदी का नजारा देख सकते हो। संभव है कि तुम्हारी कोई कविता तैयार हो जाए। .... बात मुझे जम रही है। समय का इससे बढिय़ा सदुपयोग और क्या हो सकेगा।

(20 फरवरी, 2018)

आज सुबह 5 बजे दुर्ग से राजकोट-संतरागाछी एसी विशेष ट्रेन पकड़ी, कोलकाता जाने के लिए। यह गाड़ी पूरे 3 घंटे विलंब से आई। बताया गया कि राजनांदगांव के पास मेगा ब्लॉक की वजह से इस मार्ग की सभी गाडिय़ां देर से चल रही हैं। चूंकि नेट पर ट्रेन की सही स्थिति पता नहीं चल रही थी, इसलिए मैं ठीक दो बजे स्टेशन पहुंच गया। वहां भी सही टाइमिंग पता नहीं चली। इन्क्वायरी से इतना ही बताया जा रहा था कि ट्रेन विलंब से आएगी। कितने विलंब से, यह किसी को पता नहीं था। नतीजतन ढाई घंटे रिटायरिंग हॉल में ऊंघते बैठना पड़ा। डिब्बे में 3-4 घंटे की नींद लेने का इरादा काफूर हो चुका था। खैर, फिर भी दो-ढाई घंटे की नींद ले ही ली। अभी ट्रेन चक्रधरपुर पहुंचने वाली है, तीन- साढ़े तीन घण्टे विलम्ब से। हावड़ा 8 बजे तक पहुँचना हो पाएगा। समय पर पहुंचे तो हुगली नदी और हावड़ा ब्रिज की दृश्यावलियां देख सकते हैं।

ट्रेन साढ़े नौ बजे संतरागाछी स्टेशन पहुँची, साढ़े चार घण्टे देर से। जिस प्लेटफार्म पर ट्रेन लगी उसकी मरम्मत चल रही है। गाड़ी से उतरा तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अमूमन प्लेटफार्म पर दिखने वाली चाय-नाश्ते की दुकानें वहाँ एक भी नहीं थी। धीरे-धीरे चलते प्लेटफॉर्म से बाहर निकला। वहाँ प्रीपेड टैक्सी का स्टाल खाली पड़ा था और सामने लंबी लाइन लगी थी। मैं तकरीबन उन्नीस घंटों से सफर में था, सो मुझमें अब वहाँ कतार में खड़े होकर इंतजार करने का धैर्य नहीं बचा था। थोड़ा आगे बढ़ा तो एक टैक्सीवाला हावड़ा स्टेशन के पास स्थित होटल में छोडऩे के लिए तैयार हुआ, मुँहमाँगे किराए पर। होटल पहुँचते 11 बज चुके हैं। अब हावड़ा ब्रिज पर जाने का इरादा नहीं रहा। सुबह जल्दी तैयार होकर कोलकाता के न्यू टाउन स्थित आर्किड इन गेस्ट हाउस में पहुँचना है। वहीं से हम सभी को एक साथ बनगाँव के लिए रवाना होना है।

(कोलकाता, 21 अप्रैल, 2018)

सुबह 6 बजे सतीश जी का फोन आ गया। वे उसी वक्त हावड़ा पहुँचे थे। कहा कि जल्दी तैयार होकर ऑर्किड गेस्ट हाउस पहुँचो, नाश्ता हम सब एक साथ करेंगे, तुम्हारे लिए एक गाड़ी छोड़ दी है।

एक अच्छे टीम लीडर की तरह निश्चय ही उन्होंने सभी साथियों को फोन किया होगा। सुबह 8 बजे तक मैं तैयार हो गया था। रात 6 घंटे की गाड़ी नींद ले ली थी, इसलिए सुबह ताजा और खुशगवार लग रही थी। रवि रंजन को फोन किया, वे भी तैयार होकर हावड़ा स्टेशन के पास पहुँच चुके थे। बड़ी मुश्किल से एक बैटरी रिक्शा ढूंढा और उससे भी ज्यादा मुश्किल से रवि मिले। खैर, देर से ही सही हम वहाँ से तकरीबन 15 किमी दूर ऑर्किड के लिए रवाना हुए। यह गेस्ट हाउस दमदम एयरपोर्ट के नजदीक न्यू टाउन में स्थित है। यह इलाका अभी-अभी विकसित हुआ है, इसलिए बिल्कुल ताजे खिले फूल की तरह सुंदर और आकर्षक दिखाई दे रहा है। बिल्कुल नयी-नकोर बनी इमारतें, कालोनियाँ, साफ-सुथरी सड़कें, किनारों पर व्यवस्थित तरीके से लगाए गए हरे-भरे वृक्ष और बाग-बगीचे।

हम गेस्ट हाउस पहुँचे तो अधिकांश साथी नाश्ता कर चुके थे। रवि और मैंने जल्दी नाश्ता किया और नीचे लॉबी में बैठे साथियों के साथ हो लिए। यहाँ टीम की कमान तनवीर और इंदु ने सम्हाल ली और हम तीन गाडिय़ों में बनगाँव के लिए निकल पड़े। मेरे साथ रवि और विजय थे। कोलकाता के ट्रैफिक से जूझते हमें शहर से बाहर निकलने में एक घंटा लग गया। उसके बाद इकहरी सड़क पर हम बनगाँव की ओर बढऩे लगे। विजय ने बताया कि बनगाँव का बांग्ला में असली उच्चारण है- बोनगाँ। बांग्ला में गाँव को गाँ कहा जाता है। इसीलिए बनगाँव को बोनगाँव भी कहा जाता है। मैंने उन्हें बताया कि यह ठीक वैसा ही है, जैसे पंजाबी में गाँव को ग्रां कहा जाता है। विजय बता रहे थे कि बनगाँव को बांग्ला के ख्यात साहित्यकार बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के गृह नगर के रूप में भी जाना जाता है, जिन्होंने मर्मस्पर्शी उपन्यास इचामती लिखा है। दरअसल इच्छामती नदी का बांग्ला में उच्चारण इचामती ही है।

रास्ते में हमें दोनों ओर बड़े ही भारी तने के सैकड़ों वृक्ष दिखे। ऐसे मोटे तने मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। पूछने पर कुछ पता भी नहीं चला। इनके अलावा एक बड़ी ही रोचक बात हमने देखी- रास्ते में कई गाँव मिले, इन गाँवों के लगभग हर घर में एक तलैया थी और साथ लगी छोटी-सी बाड़ी में इमारती लकड़ी के वृक्ष लगे थे। विजय कुमार ने बताया कि चूँकि मछली बंगाल का प्रमुख आहार है, इसलिए तलैया में मछलियाँ पाली जाती हैं। इमारती लकडिय़ों के वृक्ष लगाना यहाँ की परंपरा है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। इसके लिए सरकार की ओर से कोई रोकटोक नहीं है। बातचीत के दौरान हम कब बनगाँव पहुँच गए, मालूम ही नहीं पड़ा। गाँव के बीच से होते हुए हम सरहद के पास जा पहुँचे, लेकिन हमें थोड़ा आश्चर्य इस बात को लेकर हुआ कि जिसे हम गाँव समझे थे वह एक अच्छा-खासा बड़ा नगर है। काफी बड़े बाजार हमें वहाँ दिखे। दूसरा आश्चर्य हमें इच्छामती नदी की हालत देखकर हुआ। वह बिल्कुल सूखी हुई थी, कुछ पतली गंदली धाराएँ बहती दिखीं। हमने नेट पर तो इसे एक दरिया के रूप में देखा था, जिस पर स्टीमर चल रहे थे। खैर, मैंने वहाँ खड़े एक ट्रैफिक हवलदार से पूछना शुरू किया तो इस क्षेत्र के बारे में बहुत-सी जानकारियां मिलती चली गयीं - दरअसल बनगाँव लोकसभा और विधानसभा का नाम है। बोनगाँव उत्तर 24 परगना जिले का एक ब्लॉक है, जो बनगाँव उत्तर विधानसभा में आता है। बनगाँव की आबादी एक लाख दस हजार की है और यह ईस्टर्न रेलवे के सियालदह सेक्शन का आखिरी स्टेशन है। विभूतिभूषण के अलावा इस नगर को राजनेता जीबोन रतन धर,  पुरातत्ववेत्ता राखालदास बंद्योपाध्याय और आधुनिक कविता के कवि विभाष रॉय चौधरी के लिए भी जाना जाता है। बंग भाषा दिवस को लेकर हमने वहाँ काफी उत्साह देखा। इस त्यौहार में दोनों देशों के लोग शामिल थे। बांग्लादेश के बहुत से सरहदी गांवों के लोगों के रिश्तेदार बनगांव में रहते हैं। इसी तरह सरहदी भारतीय गांवों-- गोपाल नगर, दुमा, पल्ला, चाँदपारा, फुलसारा- के लोगों के रिश्तेदार सीमांत बांग्लादेश में रहते हैं। इस दिन दोनों देशों की सरहदें खोल दी गयी थीं और वीसा-धारी लोग निर्बाध रूप से आ-जा रहे थे। उस दिन हमने देखा और शिद्दत से महसूस किया कि सरहदें देशों को तो विभाजित कर सकती हैं लेकिन लोगों के दिलों को नहीं बाँट सकतीं।  दोनों देशों के पुरुषों, स्त्रियों, बच्चों का उत्साह देखने लायक था। उनके जज्बात जैसे छलक रहे थे। जिनके पास वीसा नहीं था उनके लिए एक बड़े मैदान के बराबर एक ऐसा स्थान बनाया गया था, जहां वे पहचान पत्र दिखाकर जा सकते थे और एक-दूसरे से मिलजुल सकते थे। किसी भी तरह का कोई तनाव हमने वहां महसूस नहीं किया।  शाम के समय वहां दोनों देशों के सैनिकों की परेड हुई। यह परेड अनोखी थी, जो दोनों देश के लोगों के ऐन बीच मे हो रही थी। जैसे ही परेड खत्म हुई लोग सैनिकों के साथ फोटो खिंचाने लगे, उनसे हाथ मिलाने लगे। ये सारे सैनिक एक-दूसरे के लोगों से हाथ मिला रहे थे, उनसे मिलजुल रहे थे। बड़ा ही अविस्मरणीय था सब कुछ। दोनों देशों के सैनिक भी खुलकर एक दूसरे से मिलजुल रहे थे, कहीं कोई तनाव नहीं था, जैसा हमने वाघा बॉर्डर में महसूस किया था।

और मैं सोच रहा था कि कागज़ों पर खींची गयी रेखाएँ और नक्शे अंतत: क्यों इतने ताकतवर हो जाते है कि वे महायुद्धों और विश्वयुद्ध के बायस बनकर इस धरती पर बदनुमा दाग छोड़ देते हैं? इन बेजान रेखाओं के पीछे छिपे शातिर दिमागों ने लहूलुहान मानवता को और ज्यादा...और ज्यादा जख्मी करने, तथा और ज्यादा.....और ज्यादा खून बहाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इन नक्शों ने वास्तविक दीवारें खड़ी की हैं और हजारों वर्षों के खूंरेज इतिहास से गुजरती जो एक शांतिवादी वैश्विक व्यवस्था बनती दिखाई पड़ रही थी, वह फिर उसी खूनी दौर में वापस जाती दिखाई पड़ रही है। एक और बड़े महायुद्ध की ओर कदम बढ़ाती ये ताकतें आत्म-विनाश के लिए उतारू हो गई हैं। यूरोप के एकीकरण के बाद जरूरत एशिया को एक सूत्र में बाँधने की थी, ताकि एक युद्ध रहित विश्व के सपने को साकार करने की दिशा में सामूहिक प्रयत्न किए जाते, लेकिन एशिया को ही रणभूमि बनाकर अमन-पसंदगी के सारे सपनों को तार-तार किया जा रहा है। यह एक कड़वी वास्तविकता है कि दक्षिण एशिया दुनिया का सर्वाधिक खतरनाक इलाका है, जहाँ एटमी ताकतें सर्वनाश के लिए उतारू हैं। क्या इस इलाके में कभी उस तरह दीवारें टूटेंगी, जिस तरह जर्मनी के लोग दीवार तोड़कर एक-दूसरे के गले जा मिले थे? सपनों और वास्तविकताओं में क्या फर्क हो सकता है, यह हम सब देख रहे हैं..... कि कड़वी हकीकतें सपनों को रौंद रही हैं।

रात्रि भोज हमें न्यू टाउन स्थित एक चार सितारा होटल स्विसोटल में लेना था। यह एक बड़ा ही यादगार और आनंददायी अनुभव था। हम सभी साथी डाइनिंग हॉल में एक बड़ी टेबल से लगी कुर्सियों पर जम गए। उस बड़े हॉल में बफे सिस्टम में दसियों किस्म के सामिष-निरामिष स्वादिष्ट व्यंजन, फल, ड्राई फ्रूट्स, आइस क्रीम, पेस्ट्रीज, केक, मिठाइयाँ आदि रखे गए थे। मैं तो बस वहाँ के नए व्यंजनों का स्वाद चखने में लग गया। निश्चय ही बाकी सारे साथी भी यही कर रहे होंगे। मुख्य भोजन के लिए सभी साथी जमे तो विकास कुमार झा के रोचक संचालन में एक कवि-गोष्ठी की शुरुआत हो गई। तरह-तरह के व्यंजन और बड़ी ही सुंदर, प्रभावी कविताएँ। सब कुछ अविस्मरणीय। बदकिस्मती से मैं अपनी कोई कविता नहीं सुना पाया। दरअसल उस रात नेटवर्क की खराबी की वजह से मेरी फेसबुक वॉल नहीं चल रही थी, जबकि मेरी बहुत-सी कविताएँ उसमें मौजूद हैं। खैर, विकास जी ने आखिर में इन सारी कविताओं पर मुझे एक संक्षिप्त टिप्पणी कहने का सुअवसर देकर इसकी भरपाई कर दी।

(कोलकाता, 22 फरवरी, 2018)

कुछ दोस्त ऐसे होते हैं, जो दिलो-दिमाग के खुले कपाट पर भी बड़ी ही शाइस्तगी से दस्तक देते हैं और अंदर आने की इजाज़त चाहते हैं, जबकि उन्हें किसी भी वक्त आने का अधिकार पहले से ही हासिल होता है। कुछ शहर भी ऐसे ही होते हैं। कोलकाता ऐसा ही एक शहर है। पकी उम्र में कोलकाता पहली बार जाने पर कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। एक दिन में आप किसी महानगर को कितना जान सकते हैं! लेकिन जितना भी जाना-देखा, बड़ा ही खूबसूरत लगा। और कोलकाता के लोग, वे तो खूबसूरत हैं ही। कार से आते-जाते कुछ तस्वीरें लीं। वो 64 मंजिला इमारत भी देखी, जो अभी बन रही है और पूरी होने के बाद उसे भारत की सबसे ऊंची इमारत का दर्जा हासिल हो जाएगा। यहाँ एक आवाज सुनी थी। तकरीबन एक मिनट के लिए। आवाज जानी-पहचानी है, लेकिन पता नही क्यों उस दिन अनजानी-सी, पहली बार सुनी-सी लगी। बड़ी ही दिलकश आवाज है। कह सकते हैं कि वह खूबसूरत कोलकाता का ही एक अंश है। वह ऐसे किसी पल की आवाज है, जब वास्तविकता और स्वप्न में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। यह आवाज साथ-साथ चलती रही। वह एक मिनट भी साए की तरह साथ-साथ चलता रहा और फिर अंतर्मन में कहीं गुम हो गया। लगा कि इस आवाज की उम्र सिर्फ एक मिनट नहीं हो सकती, इससे थोड़ी-सी ज्यादा तकरीबन कई दशक है।

दोपहर के खाने के बाद सफर शुरू हुआ पुराने लेकिन भव्य कोलकाता का। तंग किंतु साफ-सुथरी सड़कों पर आराम से चलती ट्रामों औऱ पैदल रिक्शा खींचनेवालों के बीच रास्ता बनाती हमारी गाडिय़ां कॉफी हाउस के समीप रुकीं। कोलकाता का कॉफी हाउस एक बहुत ही पुरानी इमारत की पहली मंजिल पर स्थित है। यहाँ सब कुछ वैसा का वैसा ही है, जैसा वर्षों से चला आ रहा है। स्मृतियों को बदलने की कोई कोशिश नहीं की गयी है और संभवत: यही इसकी गरिमा और सुंदरता है। कॉफी पीकर हम सब निकले और एक-दूसरे के गले मिले, हाथ मिलाए और अगली बार मिलने के वादे के साथ विदा ली।