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Wednesday 13 Nov 2019

सुषमा मुनीन्द्र की कहानियों में स्त्री अस्मिता के प्रश्न

भूमण्डलीकरण, सूचना क्रांति व बाजार ने जिस खूबसूरती के साथ स्त्री मस्तिष्क को अनुकूलित कर उसे 'देह' में परिणित कर दिया है, कहा नहीं जा सकता कि स्त्री विमर्श में स्त्री की अस्मिता, अस्तित्व, पहचान जैसे शब्द अपनी वास्तविक अर्थगर्भिता और स्त्री को एक व्यक्ति के रूप में दर्ज कराये जाने वाले प्रयत्नों को कहां तक जमीनी सच्चाई के साथ निभा रहे हैं। इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध रचनाकार सूर्यबाला का मानना है ''अच्छा यह होता यदि स्त्री विमर्श, स्त्री से बनी आधी दुनिया को उसकी 'वास्तविक शक्ति बनाम आंतरिक शक्ति' से परिचित कराने की कोशिश करता। उसकी मेधा की धार बनता लेकिन ऐसा लगता है जैसे मौजूदा स्त्री विमर्श स्त्री के बहुत गहरे विस्तृत संसार को बनाने के बदले अधिकांशत: शरीर, शोषण, अर्थ, सेक्स के स्थूल धरातल पर ही अटका रह गया।''  उक्त कथन के आधार पर यदि सुषमा मुनीन्द्र के स्त्री पात्रों का मूल्यांकन करें तो ये स्त्री पात्र अपनी इसी 'वास्तविक शक्ति बनाम आंतरिक शक्ति' को पहचानने की कोशिश करते जान पड़ते हैं। सुषमा मुनीन्द्र की कहानियों में विचारधारा की जगह व्यक्तियों, स्थितियों का यथार्थ व स्त्री का एक व्यक्तित्व के रूप में विकास की गुहार दिखाई देती है। यदि स्त्री विमर्श का इतिहास लिखा जाये तो निश्चय ही सुषमा मुनीन्द्र को मन्नू भण्डारी, उषा प्रियम्वदा, कृष्णा सोबती की उस परम्परा में रखा जायेगा जो स्त्री के बारे में बात करते हुए भी किसी विमर्शीय विचारधारा का हिस्सा नहीं बनना चाहती हैं।  बेशक सुषमा मुनीन्द्र की कहानियों में आई स्त्री अपने स्थूल धरातल पर अपनी प्रतिक्रियाओं, तेवर, व्यक्तित्व की आंतरिक संघटना में कृष्णा सोबती का स्त्री से कई स्तरों पर भिन्न हैं तथापि स्त्री व पुरुष की लैंगिक भिन्नता के आधार पर किये गये रचनात्मक विभाजन में सुषमा मुनीन्द्र अपने समय की 'देह उत्सव' मनाती लेखिकाओं से अलग हट कर कृष्णा, मन्नू, ऊषा की पंक्ति में नजर आती हैं जहॉं कोरे स्त्री विमर्श की बौद्धिक चर्वणा नहीं बल्कि भारतीय समाज शास्त्रीय अन्तर्निहित सच्चाइयों के बीच स्त्री अस्मिता की शिनाख्त दर्ज होती है। शिनाख्त की प्रकृति व स्तर अलग-अलग है पर सारी वर्तमान स्थूल बहसों, खोखली चुनौतियों, खेमेबाजियों से अलग स्त्री के आंतरिक व्यक्तित्व को अपनी मूल सामाजिक सच्चाइयों, मान्यताओं, पारम्परिक अन्तर्धाराओं के बीच पड़ताल किये जाने के संदर्भों के लिहाज से एक समान है और एक जगह आकर सुषमा मुनीन्द्र का रचाव संतुलन, मन:स्थितियां बाह्य धरातल पर कृष्णा सोबती की 'ए लड़की' सरीखे विद्रोही प्रतीत होने वाले स्त्री पात्रों के पारम्परिक अन्तर्गूढ़ सत्य को उद्घाटित करने वाले संदर्भों से सम्बद्ध हो जाती हैं।  कृष्णा सोबती सी मानसिक संघटना, तीव्र अनुभूतियों की सघनता, घटनाओं का बारीक चुनाव, मन्नू भण्डारी व ऊषा प्रियम्वदा सा प्रखर आधुनिक दृष्टिकोण सुषमा मुनीन्द्र के स्त्री पात्रों में नहीं है तथापि स्त्री को एक 'व्यक्तित्व' के रूप में खोजा जाने वाला रचनात्मक संघर्ष कमोबेश इन लेखिकाओं जैसा ही है। यहां स्त्री के स्थूल स्त्रीत्व की पक्षधरता नहीं वरन उसे एक स्वतंत्र मानवीय इकाई के रूप में पहचाने जाने का प्रयत्न है जो स्त्री विमर्श को व्यापक अर्थ देता है। 

कहानी ''गणितÓ की सर्वमंगला का त्यागपत्र जहॉं महिला आरक्षण की लड़ाइयों को धता बता कर मर्दवादी राजनीतिक कुटिलताओं की पोल खोलता है वहीं भारतीय समाज की इस अन्तर्वाही सच्चाई को भी उभारता है कि अपनी सारी कुशलता, निपुणता, योग्यता, बौद्धिक विकास के साथ भी सर्वमंगला जैसी स्त्री, सत्यवान जैसे धूर्त पति को न कहने का साहस नहीं कर पाती।  यह भारतीय समाज शास्त्र की स्थूल विकासीय विचारधारा में मौजूद सुषुप्त रूढि़वाद है।  ''नारी को आदि शक्ति भले ही कहा गया है पर वह पुरुष के अंतिम निर्णय की लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघ पाती ... घर की ड्योढ़ी चढ़ते ही उसकी सारी शक्ति, क्षमता, सामथ्र्य, स्वतंत्रता चौखट के बाहर रह जाती है। (कहानी गणित) ''यही दृश्य कृष्णा सोबती की कहानी 'ऐ लड़की' का है ''लड़की, मर्द का दबदबा रहना ही चाहिये। उसका स्थान नीचे नहीं ऊपर है। .. लड़की हर नर सूरज से शक्ति खींचता है। उसी की कृपा से अपने तपोबल को जगाता-गरमाता है।  और नारी ...उसकी इष्ट है पृथ्वी। वह पराशक्ति बनी पुरुष के आगे-पीछे व्याप्त हो जाती है।'' यह भारतीय सामाजिक अन्तर्धारा की वह निपट सच्चाई है जहां अपने तमाम विद्रोह, जागरूकता, विचारशीलता, निर्णय क्षमता के बावजूद स्त्री, पुरुष की बनाई लक्ष्मण रेखा को लांघने के लिये खुद को तैयार नहीं कर पाती। सुषमा मुनीन्द्र और कृष्णा सोबती भारतीय समाज की इन्हीं जमीनी वास्तविकताओं को अपनी-अपनी तरह से उभारती हैं। यह फर्क जरूर है कृष्णा सोबती का स्वर तल्ख है जबकि सुषमा मुनीन्द्र की आवाज में संयमित प्रतिकार है। सुषमा मुनीन्द्र ने सर्वमंगला के मौन प्रतिकार और विद्रोह को बिना शोर शराबे के साबित कर दिया है ''सर्व मंगला से त्याग पत्र लेना सम्भव था मगर उसे घर से घसीट कर प्रचार कार्य में लगाना सम्भव न हुआ।  सत्यवान देखते रह गये किस तरह एक नि:शस्त्र निपट अकेली स्त्री बिना किसी रणनीति, चक्रव्यूह, छल-बल के उन्हें पटकनी दे रही है। उसका मौन उनके सारे स्वरों को मंद कर सकता है। उसकी निष्क्रियता लोगों में उनके प्रति निष्क्रियता भर सकती है। नैराश्य का एक क्षण ऐसा आया जब उन्हें लगा सर्वमंगला का गला घोट दें मगर स्पष्ट अनुभव कर रहे थे मतदाता उनके जिन हाथों को बीस वर्ष से मजबूत करते आये हैं उन समर्थ हाथों में इतना बल नहीं रहा कि वे उसे (सर्वमंगला) स्पर्श तक कर सके।'' सुषमा मुनीन्द्र के स्त्री विमर्श में सामाजिक व्यवस्था के परिवर्तनकारी विकल्प की खोज है लेकिन किरदार फुंफकारते-चिंघाड़ते हुए उच्छश्रृंखल हो सड़क पर नहीं आते हैं बल्कि अपने रिश्ते की निजता बनाये रखते हुए प्रतिरोध करते हैं। जैसे वे जानते हैं समझदार चुप्पी, असमझदार चीख से बेहतर होती है। यह जैसे अस्तित्व की लड़ाई का सुषमा मुनीन्द्र का अपना तरीका है।  कहानी 'शेष शुभ' की विनम्र किन्तु दृढ़ निश्चयी विधवा धारणा विनम्र विरोध के साथ स्थितियों को पटकनी देते हुए पुरुष की दोहरी मानसिकता से लड़ती है। विधुर गगन अपने रिक्त जीवन की पूर्ति हेतु विधवा से विवाह कर लेता है लेकिन बहुत जल्दी उसका व्यवहारगत और भावनागत अंतर सामने आ जाता है। वह धारणा के पूर्व विवाह से उत्पन्न नन्हे आलेख को स्वीकार नहीं कर पाता ''धारणा मुझे डर है जब कभी मेरा बच्चा होगा, उस पर आलेख की वजह से कोई संकट, व्यतिक्रम, दुष्टप्रभाव पड़ सकता है .... और सच बात यह है कोशिश करके भी मैं आलेख को सहन नहीं कर पा रहा हंू।''  गगन को धारणा स्वीकार है क्योंकि उसके जीवन को गति दे रही है लेकिन उसका पुत्र आलेख स्वीकार नहीं है।  यह पुरुष की उस दोहरी मानसिकता का सूचक है जहां तमाम आधुनिकतम ढकोसलेबाजियों के बावजूद गगन जैसे सुशिक्षित, आधुनिक पुरुष भी एक स्त्री को उसके अतीत, यथार्थ, वास्तविकताओं के साथ स्वीकार करने के लिये खुद को तैयार नहीं कर पाते हैं। गगन का फैसला सुन धारणा पत्नीत्व और मातृत्व में मातृत्व को चुन खामोशी से जाहिर कर देती है। आज की स्त्री जरूरत पडऩे पर पारिवारिक और सामाजिक दबावों से खुद को मुक्त कर स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता रखती है।  ''पापा, मां, मैं आलेख को नहीं छोड़ सकती।  गगन का साथ छूटता है तो छूटे। आप लोग मुझे रख सकें तो ठीक वरना किराये पर कमरा लेकर मैं पार्लर खोलने की योजना बना रही हंू ....।''  धारणा घरों को तोड़ते, स्वतंत्रता के नाम पर उच्छश्रृंखल होते अन्य सम सामयिक कहानियों के अविश्वसनीय से लगते स्त्री पात्रों के बीच अपनी परम्परागत सच्चाई के साथ भी आधुनिक और अपने व्यक्तित्व को कायम रखने में सफल है।  ये स्त्री पात्र तमाम परम्पराओं, आधुनिकताओं, सामाजिक अवधारणाओं, नैतिक मान्यताओं से गुजरते हुए अपना अस्तित्व स्वयं ढंूढते हैं।  किसी स्त्रीवादी खेमे में खड़े होकर पूर्णत: 'नकार' का अस्त्र हाथ में लिये खड़े दिखाई नहीं देते वरन स्त्री के अपने मूल विश्वास, इच्छाओं के साथ व्यक्तित्व के पूर्ण स्वीकार के संदर्भ में दर्ज हैं।  सुषमा मुनीन्द्र प्रतिबद्धता और धैर्य से ग्राह्य व अग्राह्य को नीर-क्षीर विवेक के साथ, पूर्वाग्रह से मुक्त रह कर स्त्री के जीवन को बयां करती हैं।  उनकी कहानियों में हमेशा स्त्री ही केन्द्रीय विषय नहीं होती।  न ही उनका दृष्टिकोण पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के प्रति, देह मुक्ति का राग अलापता हुआ एकपक्षीय है। यहां उस शोषण मूलक सामाजिक व्यवस्था के प्रति सवालिया निशान हैं जिसमें जीवन के कई-कई स्तरों पर स्त्री को एक मानवीय इकाई के रूप में स्वीकार करने से इंकार है। ये स्त्री पात्र पुरुषों से अलग किसी दूसरी दुनिया का निर्माण करने को कतई तत्पर जान नहीं पड़ते बल्कि पितृ सत्तात्मक - सामाजिक व्यवस्था द्वारा अपने अधिकारों, क्षमताओं, प्रतिभा का दोहन व शोषण कर एक स्वस्थ सहज मानवीय जीवन के सहज रंगों, अनुभूतियों व अवसरों से वंचित किये जाने की पीड़ा व छपपटाहट लिये हुए हैं।  पितृसत्ता द्वारा स्त्री जीवन की त्रासद परिणितियॉं इन कहानियों में दर्ज हैं। कहानी 'उपचार' की लालिमा, 'दर्द ही जिसकी दास्तां रही' की हरबो, 'हस्ती मिटती नहीं हमारी' की अम्बी, 'जोंक' की मधुबाला, 'सजीवन मूर' की चिमटी इसके सशक्त उदाहरण हैं।  'अस्तित्व' की महिला अधिकारी स्वावलम्बी, सुशिक्षित, उच्च पदासीन होकर भी अपने पुरुष बहुल विभागीय अधिकारियों की दृष्टि में 'स्त्री' पहले है, अधिकारी बाद में। स्त्री के शोषण व मानसिक अनुकूलन के लिये 'चरित्र' और 'शरीर' पुरुष वर्चस्ववादी व्यवस्था के दो प्रमुख औजार हैं। ''महिला अधिकारी? मतलब? अधिकारी, अधिकारी होता है, पुरुष या स्त्री नहीं। स्त्री को पदाधिकारी की तरह ही मान्यता दी जानी चाहिये।''यह कह कर मैडम जोरदार ढंग से खंडन करना चाहती थीं पर ऊंचे पद के बावजूद खुल कर विरोध नहीं कर सकी क्योंकि उन्हें स्त्री बोध दुर्बल बना रहा था। यह स्त्री बोध वास्तव में पुरुष वर्चस्ववादी सामाजिक व्यवस्था द्वारा किया गया स्त्री का मानसिक अनुकूलन है। सामाजिक वर्जनाओं और शोषण की यह अन्त: प्रक्रिया भारतीय स्त्री के अस्तित्व में ऐसी घुल मिल गई है कि स्त्री चाह कर भी पुरुष के अनपेक्षित, अवांछित व्यवहार का मुखर विरोध नहीं कर पाती। सुषमा मुनीन्द्र की कहानियों में भारतीय स्त्री का अन्तद्र्वन्द्व अपनी पूरी जमीनी वास्तविकता के साथ परिलक्षित होता है। इस मानसिक अनुकूलन के कारण कहानी 'जोंक' की मधुबाला, 'परिधि' की गोमती पुरुष द्वारा दी गई मानसिक प्रताडऩा व दुव्र्यवहार के बावजूद अपने अलग संसार की कल्पना नहीं कर पाती।  यद्यपि ऐसा भी नहीं है पुरुष वर्चस्ववाद इन स्त्री पात्रों को लील जाता है। ये स्त्री पात्र घर-बाहर, आधुनिकता - परम्परा, वैयक्तिक सत्य-सामाजिक सत्य जैसे कई अन्तद्र्वन्द्वों को सह कर भी मानवीय अस्मिता के विकास की प्रक्रिया में उपादेयी मूल्यों को छिन्न-भिन्न किये बिना अपने अस्तित्व की सार्थकता को प्रमाणित करते हैं। सुषमा मुनीन्द्र का यह संतुलन समकालीन महिला कहानीकारों से उन्हें अलग करता है।  यह संतुलन 'अटकी हुई बाजी' की नीतिका और 'जोंक' की मधुबाला में विद्यमान है।  नीतिका का पति केपी (कृष्णा प्रसाद) नीतिका के जुझारू, सुलझे हुए सहयोग पूर्ण व्यवहार के बावजूद उसकी बदली हुई भूमिका को स्वीकार नहीं कर पाता जबकि नीतिका, केपी को पारकिन्सन होने पर आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, कार्यालयीन दायित्वों-परोपकारों को निभाती हुई दोहरी, तिहरी भूमिका निभाती है। उसके संयम, संतुलन के बावजूद के पी अपने व्यर्थता बोध और नौकरी छूटने के बोध से उबर नहीं पाता।'' केपी और उसकी भूमिकायें बदल गईं।  केपी घर में रहने लगा, वह दफ्तर जाने लगी। अपनी नई भूमिका को उसने स्त्री की लोच-लचक वृत्ति के कारण सहजता से ग्रहण किया। केपी पुरुष के अहम् के कारण ग्रहण नहीं कर सका।'' संतुलन के साथ ही नीतिका पुरुष वर्चस्ववाद का विरोध करना भी जानती है।  अपनी सास से कहती है ''अम्मा मुझे तो सोच कर घुटन होती है, कैसे कोई एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की पूरी क्षमता, समय, ऊर्जा सोख लेता है। स्त्री किसी एक व्यक्ति (पति) को बनाने-सॅंवारने में अपना अस्तित्व क्यों मिटा दे ?  वह पति की मिल्कियत नहीं है। मैं सहयोग करने का गलत नहीं ठहराती पर दास भाव नहीं रखंूगी ..।'' यही संतुलन 'जोंक' की नर्स मधुबाला का है।  वह पति रामजी द्वारा दी जा रही मानसिक प्रताडऩा, असहयोग, चरित्र पर शंका को सहन करते हुए आखिर कह डालती है ''मेरे चरित्र पर शक है तो नौकरी छोड़ देती हंू।'' रामजी करारा व्यंग्य करता है ''मेरे लिये यह त्याग न करना।  तुम्हें घर से बाहर रहने की आदत हो गई है।  घर से बाहर रहने वाली औरतों का घर में चित्त नहीं लगता है।  मौज मारने के मौके छूट जायेंगे'' तब मधुबाला तय करती है जोंक की पकड़ को कमजोर करने के लिये जोंक के मुंह पर नमक रखते हैं।  वह नौकरी नहीं छोड़ेगी बल्कि जोंक बन कर उसका खून चूस रहे राम जी जैसी जोंक के मॅुंह पर नमक रखेगी। इसी तरह 'मेमो' की अपाहिज प्रभाती, स्कूल के इंचार्ज की गलत नियत का सटीक विरोध करती है।  ''नौकरी नहीं छोडऩा चाहती लेकिन इंचार्ज की शर्तों पर नौकरी नहीं करेगी। नौकरी पैसे के लिये कम, खुद के होने को महसूसने के लिये अधिक जरूरी है। पर अब सशर्त नौकरी करने की स्थिति बन रही है।''  प्रभाती अपने अस्मिता बोध को प्रबल कर इंचार्ज द्वारा भेजे गये मेमो के ऐसे जवाब तैयार करती है जब स्पष्ट हो जाये वह नौकरी करेगी और अपनी शर्त पर करेगी।

सुषमा मुनीन्द्र ने स्त्री के सामाजिक, पारिवारिक जीवन की बहिर्कुरूपता और बाह्य विसंगतियों पर अधिक लिखा है। या यंू कहें स्त्री से जुड़े सामाजिक पारिवारिक कारणों पर लिखा है और किसी हद तक स्त्री के आंतरिक जीवन को प्रभावित किया है।  ये कुरूपताएं, विसंगतियां स्त्री के आंतरिक जीवन को प्रभावित तो करती हैं पर इसके लिये कोई व्यक्ति विशेष या विशेष मानसिकता नहीं वरन पूरा सामाजिक-आर्थिक ढांचा दोषी जान पड़ता है। शायद इसीलिये कहानियों में पितृ सत्तात्मक समाज व मानसिकता की जर्जर, रूढ़ अवधारणाओं, मान्यताओं पर प्रहार होता है किन्तु समकालीन महिला रचनाकारों की अपेक्षा सुषमा मुनीन्द्र के स्त्री पात्रों का विद्रोह अण्डर टोन है। लेकिन सुषमा मुनीन्द्र का रचना विजन पितृ सत्तात्मक शोषणपरक सामाजिक व्यवस्था के साथ उन पूरे आर्थिक कारणों की भी शिनाख्त करता है जो इस सामाजिक विषमता व विभेद के लिये उत्तरदायी है।  सुषमा मुनीन्द्र का संबंध गांव, कस्बे, छोटे नगर से रहा है अत: ग्राम कस्बाई स्थितियों में स्त्री छवियों के भी विश्वसनीय चित्र कहानियों में मिलते हैं। सुषमा मुनीन्द्र के नगरीय, कस्बाई, ग्रामीण स्त्री पात्र सूचना क्रांति के षड्यंत्रों, बाजार की चालाकियों पुरुष वर्चस्ववादी समाज की कुचालों से जूझते हैं। 'हस्ती मिटती नहीं हमारी' की कुरूप अम्बी पति की घोर नफरत और उपेक्षा झेलती है लेकिन उसका घर नहीं छोड़ती। इस घर में रहते हुए उसे सजा मिल रही है तो उसकी उपस्थिति से पति भी आराम और अमन से नहीं रह सकेगा। यह पति के लिये बहुत बड़ी सजा होगी। अम्बी का स्त्री विमर्श से परिचय नहीं था, न ही वह स्वतंत्र चेता थी पर कानूनी हक के आधार पर उस घर में मजबूती से रहती है। भले ही उसका वैवाहिक जीवन असफल और त्रासद था। पर अस्मिता के लिये संघर्ष कुछ कहानियों में ही मुखर हुआ है।  'उपचार' की लालिमा, 'भद्र लोक के अभद्रÓ की जयति की मां, 'दर के पुल की तरह' 'की धन्य। 'अस्तित्व' की मैडम, 'मूल्यांकनकी भगवती भारतीय समाज शास्त्र की निचली तहों में बहते स्त्री के सच को ही विडम्बनात्मक रूप से व्यक्त करती जान पड़ती हैं। जहां स्त्री अपनी ऊर्जा, प्रतिभा, सहनशीलता को जाने-अनजाने पितृसत्तात्मक रूढ़ अवधारणाओं, मनमानियों, धूर्तता को पोषण देने में ही खर्च हो जाने देती है।  इसका कारण शायद यह है कि सुषमा मुनीन्द्र की कहानियां किसी खास, विशिष्ट वर्ग से संबंधित न होकर वृहद स्तर पर फैले आम भारतीय समाज के छोटे-छोटे अन्तर्विरोधों को आधार बनाती हैं।  सच यह है, तमाम तर्क-वितर्क के दिमागी युद्ध के बावजूद इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारतीय स्त्री का एक बहुत बड़ा वर्ग शिक्षा, आर्थिक अवलम्बन, बौद्धिकता के बावजूद मुखर विरोध का रास्ता अपनाने से आज भी बचना चाहता है। सामन्जस्य, संतुलन, सामाजिक-पारिवारिक भूमिकाओं, सहनशीलता को अपने व्यक्तित्व का धनात्मक पहलू मानता है।  सुषमा मुनीन्द्र के स्त्री पात्र इसी बहुल वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारतीय स्त्री को अपने अस्तित्व की लड़ाई इन्हीं अन्तद्र्वन्द्वों एवं अन्तर्विरोधों के बीच से निकल कर लडऩी है - इस सिद्धांत को अपना कर ये स्त्री पात्र कुप्रथा, रूढिय़ों, क्रूरता, चालाकियों को बेनकाब करते हैं लेकिन भौतिकवाद, आधुनिकता के नाम पर बाजार अर्थ का नंगा नर्तन व उपभोक्तावादी दृष्टिकोण को अपना कर मानवीय अस्मिता की अपनी लड़ाई के मूल ध्येय से नहीं भटकते। कह सकते हैं सुषमा मुनीन्द्र का स्त्री विमर्श, स्त्री का कुतर्कपूर्ण पक्षधर व्यवहार नहीं है वरन् सामाजिक सरोकारों से व्यापक कैनवास पर अलग-अलग बिंदुओं में स्त्री की वास्तविक इयत्ता से सम्बद्ध स्वस्थ दृष्टिकोण है।  इन्हीं अन्तद्र्वन्द्वों, मानसिक उलझनों, अन्तर्विरोधों में सुषमा मुनीन्द्र की स्त्री अपनी अस्मिता के लिये अपनी समाज शास्त्रीय सूक्ष्म वास्तविकताओं के साथ संघर्षरत है।