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Wednesday 23 Jan 2019

समकालीन यात्रा साहित्य एवं नरेश मेहता

साहित्य का मानव समाज से बहुत पुराना रिश्ता रहा है, यह रिश्ता आदिकाल, मध्यकाल से होते हुए आधुनिक युग के समकालीन दौर में और तेजी से बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में जब मनुष्य चारों तरफ से घोर निराशा, कुंठा, भुखमरी, लूट-खसोट, महामारी, सूखा, विश्वयुद्ध की आशंका से घिरा हुआ है,  लोकतंत्र की लगातार धज्जियाँ उड़ाई जा रही हो, शासक का तानाशाही रवैया आदि अनेक कुकृत्यों का पिटारा जब बढ़ता जा रहा हो तो उस समय साहित्य की  माँग और बढ़ जाती है, क्योंकि बालकृष्ण भट्ट ने कहा भी है कि साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है। मनुष्य को विकास की अवस्था में पहुंचाने में साहित्य अपनी अग्रणी भूमिका निभाता है। उसमें भी यात्रा साहित्य ने अपनी अलग ही पहचान बना रखी है। विकास की तीव्रतम अवस्था में हम यात्रा साहित्य के अध्ययन और आस्वादन से चौमुखी कीर्तिमान स्थापित कर सकते हैं। विकास और ज्ञान का अनूठा संबंध है और ज्ञान प्राप्ति के दो स्रोत हुआ करते हैं आत्मानुभव और पुस्तकों का अध्ययन, ऐसी स्थिति में आत्मानुभव के लिए भ्रमणशीलता का महत्व अपने आप ही बढ़ जाता है। उपरोक्त संदर्भ में राहुल सांस्कृत्यायन की बात करना चाहूँगा, वे मानते थे कि ज्ञानार्जन के लिए घुमक्कड़ी जरूरी है। राहुल जी से प्रेरणा लेते हुए समकालीन यात्रा साहित्यकारों ने भी बहुत ही उच्च कोटि के यात्रा साहित्य लिखे हैं, जिनमें से यूरोपीय जन-जीवन को चरितार्थ करता हुआ अज्ञेय जी का एक बूँद सहसा उछली, निर्मल वर्मा का चीड़ों पर चाँदनी,धर्मवीर भारती का यात्राचक्र, गोपाल प्रसाद व्यास का अरबों के देश में, नरेश मेहता का कितना अकेला आकाश, भुवनेश्वर प्रसाद भुवन  कृत आँखों देखा यूरोप आदि महत्वपूर्ण हैं।

नरेश मेहता का यात्रा साहित्य कितना अकेला आकाश यूरोपीय जन-जीवन का जीता-जागता चि_ा है, जिसमें लेखक ने पैनी दृष्टि, सजग चेतना, और सर्जक मन के संगमीय पटल के अतुलनीय योगदान से यूरोप के जीवन, वहां के स्त्री-पुरुषों की गतिविधियों, मानसिकताओं और सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक अवस्थाओं को अपने मन के कैमरे में कैद किया है।

लेखक युगोस्लाविया के एक छोटे से जनस्थान स्त्रूगा में आयोजित काव्य समारोह में एक मात्र भारतीय प्रतिनिधि के रूप में सहभागी हुए तथा स्त्रूगा को देखा बल्कि वहाँ आयोजित और भी काव्य समारोह में सहभागी हुए। इस प्रकार से लेखक ने जो भी कुछ युगोस्लाविया में आँखों से देखा, कानों से सुना तथा मस्तिष्क से महसूस किया, उसी की जीवंत झलक कितना अकेला आकाश नामक यात्रा साहित्य में पिरोया है। इस यात्रा साहित्य का शीर्षक कितना अकेला आकाश, अपने व्यापक फलक को साथ लेते हुए फलीभूत होता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि जब कोई लेखक या प्राणी अपने देश से अलग दूसरे देश में जाता है तो वह अपने साथ अपने देश की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक सांस्कृतिक, आर्थिक खूबियों को साथ ले जाता है तथा अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हुए अपने देश का प्रतीक होता है। अज्ञेय भी एक बूँद सहसा उछली में कहते हैं कि हम यात्रा के दौरान दूसरे देश के तमाम पहलुओं को देखते, सुनते तथा महसूस तो करते ही हैं, साथ में दूसरे देश के लोगों को अपने देश के इतिहास, भूगोल, संस्कृति से भी परिचित कराते हैं। इस यात्रा साहित्य के शीर्षक का दूसरा संदर्भ यह भी लिया जा सकता है, लेखक का विदेश में अकेलापन, जिसका इन्होंने कई बार इस यात्रा साहित्य में उल्लेख भी किया है, इस यात्रा साहित्य की प्रमुख पात्र बुदिमका और एनी जो कि युगोस्लाविया में लेखक से मिली थी। इन्होंने लेखक के अकेलेपन को काफी हद तक कम किया तथा कवि के अकेले और सूने आकाश को काफी दीप्ति और उल्लास से भर दिया। इसी तरह के और भी कुछ यूरोपीयों के सहयोग ने इनके प्रवास को बेहद आत्मीयता से रमणीय बनाने में योगदान दिया। लेखक को अपने अकेलेपन का शायद पहले से अनुभव था इसीलिए वह यात्रा शुरू करने से पहले कहते हैं - न जाने क्यों मन में कोई विशेष उत्साह नहीं लग रहा था। बस, अपने को ढीला छोड़ दिया ताकि इस यात्रा की तमाम प्रक्रिया में से असंग भाव से गुजर सकूँ....उत्साह होता तो उत्तेजना होती और जब विदेश में अकेलेपन की जो स्थिति बनती। (कितना अकेला आकाश, पृ 9) जब लेखक को बेलग्रेड से दुबई की वापसी उड़ान की जानकारी चाहिए थी तब भी अकेलेपन का शिकार हुए थे, वे खुद कहते हैं विदेश में आपको किसी पर बराबर निर्भर रहना पड़ता है, न चाहते हुए भी- आज भर के लिए श्री बिल उपलब्ध थे कल उन्हें स्कोपिया लौट जाना हैं अत: मुझे .......... मेरी सबसे बड़ी कठिनाई थी अकेलेपन की। (कितना अकेला आकाश पृ. 24 )

इस यात्रा के दौरान लेखक की दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत भाषा की रही। सामान्यत: हम भारतीय अपनी मातृभाषा के साथ-साथ अंग्रेजी सीखते हैं, ये अंग्रेजी सीखना अंग्रेजों के द्वारा दिया हुआ अफीमी तोहफा है, जिसे सीखकर हम अपने पढ़े-लिखे होने का सबूत प्रस्तुत करते हैं, जिसका हमें फख्र भी रहता हैं कि हमें अंग्रेजी आती है। लेखक ने युगोस्लाविया में यह महसूस किया कि लोग अंग्रेजी नहीं बल्कि फ्रेंच, स्पेनिश इतालवी भाषा को ज्यादा सभ्य एवं सम्मानित समझते हैं। युगोस्लाविया के काव्य सम्मेलन में जब कोई कवि काव्य-पाठ अपनी भाषा में करता है उसके बाद उसकी कविता का अनुवाद वहाँ की भाषा में होता हैं जिसको लेखक इस प्रकार व्यक्त करते हैं- मैंने सुना कि युगोस्लाविया की भाषा जो कि यहाँ की राष्ट्रभाषा है, में अनुवाद होते हैं तथा रूसी, फ्रेंच, स्पेनिश में भी। थोड़ा बहुत ही अंग्रेजी में अनुवाद होता है। (कितना अकेला आकाश पृ 24)

जब हमारे भारत देश की सम्मानित राजशाही अँग्रेजी भाषा का ये हाल है तो बेचारी हिंदी किस हाल में होगी, जिस भाषा को हम भारतीय ही सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते हैं, तो विदेशों में हिंदी का स्थान ढूंढना कितना तर्कसंगत है यह बात लेखक की निम्न बात से स्पष्ट होता है - मैदान के सामने एक ऊँचे मंच पर, जो कि भवन का स्थाई प्लेटफार्म है, एक बड़े से बोर्ड पर अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, रूसी आदि लिपियों में 'पोएट्री' लिखा था। (कितना अकेला आकाश पृ. 22) कथित बातों को ध्यान रखते हुए, हिन्दी भाषा की बात की जाए तो विदेशों में हिन्दी की स्थिति इधर के आठ दस-सालों में बहुत तेजी से सुधरी है। यही कारण है कि बोलने वाले संख्या बल के आधार पर हिन्दी भाषा विश्व में प्रथम स्थान पर आ गयी हैं, जो हम भारतीयों के लिए सम्मान की बात है( 'हिन्दी का विश्व संदर्भ' पुस्तक के हवाले से)

लेखक ने युगोस्लाविया में यह अनुभव किया कि यहाँ के लोग हम भारतीयों को अंग्रेजों की गुलाम मानसिकता के प्रतीक के रूप में देखते हैं क्योंकि हम भारतीयों को अंग्रेजी भाषा के प्रति मोह  है। जबकि अमेरिका या अन्य विकसित देशों में लोग अपनी राष्ट्रभाषा के अलावा भी दो- तीन भाषाएँ जानते हैं। क्यूबा के कवि लोपेज लेमूस से बातचीत के दौरान लेखक ने महसूस किया कि हम भारतीयों ने अंग्रेजी भाषा को छोड़कर अन्य विदेशी भाषा सीखने की चेष्टा नहीं की। उन्हें केवल फ्रेंच और स्पेनिश ही आती थी जबकि मुझे केवल अंग्रेजी। कई बार मैंने मार्क किया कि वह बातें करने के लिए कितने उत्सुक हैं परंतु  दुभाषियों की निहायत कमी के कारण वह फ्रेंच में कुछ शब्द कहते तो उन्हें आशा होती थी कि इतनी फ्रेंच तो मैं समझ ही लूँगा और बदले में जब मैं अंग्रेजी बोलता तो वह मेरा मुंह ताकने लगते।(कितना अकेला आकाश. पृ 56)

युगोस्लाविया में शिक्षा एक समस्या है। अनेक भाषाएँ होने के कारण सभी जगह एक ही सुविधा प्रदान करना कठिन है। यहाँ भूगोल, इतिहास और विज्ञान की शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाता है तथा यहाँ की कला पर यहाँ की उलझी हुई जातीय तथा धार्मिक पृष्ठभूमि की छाप मिलती है। इन लोगों में सभी प्रकार के कला कौशल के प्रति अच्छा रुझान है, तथा यहाँ अत्यधिक कुशल कारीगर, बुनकर, लकड़हारे, पत्थर तराश एवं धातु के कारीगर  मिलते हैं।

लेखक को यूरोप में सबसे ज्यादा समस्या खाने-पीने को लेकर हुई यहाँ तक कि कुछ दिनों लेखक को बिना खाना-खाये  ही रहना पड़ा। अपने यूरोपीय अनुभव को साझा करते हुए लेखक ने बड़े ही मजेदार अंदाज में लिखा है- पश्चिम में लोग पानी के अलावा और सब कुछ पीते हैं, कभी-कभी 'मिनरल-वाटर' तक भी। पीने के लिए पानी माँगना उनके लिए आश्चर्य होता है। युगोस्लाविया में इस 'वाटर' पीने को लेकर खासी समस्या बनी रही। पहले तो 'वाटर' ही वेटर नहीं समझते। संकेत से बतलाया जाता है तो वह समझते हैं कि मुझे हाथ धोने के लिए पानी चाहिए तो, वाश-बेसिन में जाना चाहिए।  मेसेडोनियन  में 'वाटर' को 'वोडा' कहते हैं और मेरे द्वारा पीने के लिए वोडा मांगने पर वेटर आश्चर्य करते थे। (कितना अकेला आकाश. पृ 27 ) लेखक के शब्दों में-असल में वेजिटेरियन होना पश्चिम में दंड पाने जैसा है। नतीजा यह था कि मैं लगभग एक सप्ताह भूखा जैसा ही रहा। हाँ यही जूस, रोटी-मक्खन ही खाता रहा। फल यह हुआ कि जब मैं दुबई पहुँचा तो मुझे पहचानने में मेरी बेटी को ही कठिनाई हुई कि बाबा जैसा यह मैं, क्या बाबा ही हूँ। (कितना अकेला आकाश पृ. 27) युगोस्लाविया में लोग शराब उसी प्रकार पीते हैं जिस प्रकार से हम अपने देश में पानी पीते हैं, दाहिने  हाथ कोने में शराब के तीन ड्रम टोटियोंवाले रखे थे।  लोग अपनी-अपनी सुविधा और पसंदगी के साथ टेबलें चुन रहे थे। (कितना अकेला आकाश पृ. 47)  हमारे देश में भोजन के उपरांत मीठा लेना पसंद करते हैं जबकि युगोस्लाविया में आलम यह है कि यहाँ मदिरा भोजन से पूर्व, भोजन के साथ तथा भोजनोपरांत भी अनवरत पी जाती है। मुझे तो सीमित ही भोजन करना था। टेबल के दूसरे लोग आश्चर्य कर रहे थे कि मैं मांस नहीं खाता और केवल जरा-सा भोजन ही करता हूँ ।(कितना अकेला आकाश पृ. 48)

विदेश में हमेशा किसी न किसी का साथ आवश्यक प्रतीत होता है। यहाँ पर लेखक को बुदिमका, एनी और यसना का साथ काफी मददगार साबित हुआ। बुदिमका के माध्यम से लेखक ने युगोस्लाविया के बारे में बहुत कुछ जाना- समझा। लेखक कहते हैं - इस तरह के सर्वथा अपरिचित वातावरण और स्थान में भटक जाने की संभावना रहती है। वैसे पहचानने के लिए मैंने कुछ लोगों को ताड़ रखा था कि ये लोग जिधर जाएँगे उधर ही जाया जाएगा पर इसकी आवश्यकता नहीं पड़ी क्योंकि बुदिमका मेरी पथ-प्रदर्शक थी। (कितना अकेला आकाश पृ. 37) बुदिमका लेखक से भारत के बारे में बहुत कुछ जान लेना चाहती थी- भारत कैसा है, लोग कैसे हैं, से लेकर दुनिया-जहान के बारे में वह जानना चाहती है। यही होता हैं जब दो स्थान विशेष के लोग आपस में मिलते हैं तो पहली चीज सामान्य परिचय होने के बाद दोनों लोग उस स्थान विशेष की सभी चीजों से परिचित होना चाहते हैं। बुदिमका का अभिभूत कर देने वाला रिश्ता है। लेखक अनायास ही उसके चले जाने के बाद कहते हैं- बुदिमका, कई अर्थों में अत्यंत साधारण सी लगने वाली नारी कैसे सहज बन कर बिना किसी अपेक्षा के आपके निकट आती है, कुछ चिंता जैसे भी करती है। थोड़ा-बहुत अपने को कहकर कैसे निष्प्रयास अपने को सहेजकर लौट कर भी ले जाती है। इस पूरी यात्रा का जब भी स्मरण होता है तब मध्य यूरोप की ग्रामीण जैसे लगने वाली स्त्री कैसे आपकी ओर देखती, मुस्कुराती होती है, जैसे कालवृक्ष में खिला कोई सूर्यमुखी का बड़ा सा फूल हो। (कितना अकेला आकाश पृ. 62)

बुदिमका नि:स्वार्थ भाव से लेखक की हर संभव मदद करती है। जबकि उस के बच्चे एवं पति एक कार दुर्घटना में मौत के शिकार हो गए हैं और वह खुद विकलांग हैं। इसके बावजूद उसके चेहरे पर तेज, ललक, उत्साह है। लेखक ने देखा कि युगोस्लाविया के लोग जीवन को खुल कर जीते है कोई रोक-टोक नहीं जो भी काम करते हैं काफी तन्मयता के साथ करते है। जिस भूषा में हम शायद अपने बाथरूम में मुश्किल से होते होंगे, उन्हें पहने हुए भी स्त्री-पुरुष घूम रहे होते हैं। हमारे नैतिकता की परिकल्पना का इनके लिए कोई अर्थ नहीं है। (कितना अकेला आकाश पृ. 16 )

युगोस्लाविया के स्त्रूगा नामक स्थान पर जहाँ काव्य पाठ होना था वहाँ की परंपरा थोड़ी हमारे भारतीय देशों से अलग थी- हालांकि भाषा तो नहीं समझ पाता था पर लगता था कि आयोजनों का उद्घोषक ऐसा ही होना चाहिए। बड़े से मंच पर सारे कवि बैठाए गए थे। मंच के पाश्र्व में दोनों ओर अनुवाद पाठकर्ता थे। बायीं ओर सिर पर एक बड़ा-सा पियानो था। पहले एक सुंदर महिला ने पियानो-वादन प्रस्तुत किया। उसके बाद दो-एक साधारण भाषण हुए तब काव्य-पाठ आरंभ हुआ। पहली बार लगा कि इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय काव्य-पाठ का लाभ न भी सही, तो भी प्रयोजन क्या है? ठीक है स्थानीय लोगों को अपनी भाषा में अनुवाद मिल जाता है परंतु हम जैसे बाहर से आए लोगों का क्या हो  मूल भाषा भी आप नहीं जान रहे होते हैं और न ही अनुवाद की भाषा में आप परिचित हैं। (कितना अकेला आकाश पृ. 23)प्रत्येक देश में काव्य-पाठ का शुभारंभ अपने मानको के आधार पर भिन्न-भिन्न तरीकों से करते हैं, परंतु लेखक को जो सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह था स्थानीय भाषा मे अनुवाद का होना, अर्थात मातृभाषा हर जगह पूजनीय है जिस भाषा में सामान्यजन भी परिचित होते हैं।

जिस दिन लेखक ने अपना काव्य-पाठ  समाप्त किया उसके बाद युगोस्लाविया भाषा में जब उसका अनुवाद मंच से सुनाया गया तो वहाँ के लोग उत्साह, उल्लास से लबरेज दिखे - कारण जो भी रहा हो पर जैसा स्वागत उत्साहपूर्ण, मैंने उस दिन अपने संदर्भ में पाया, वैसा तो शायद भारत में भी कभी नहीं मिला होगा। काव्य-पाठ के पूर्व तालियों से लोगों ने मुझे उत्साहित किया। जब उन्होंने अनुवाद सुन लिया तो मुझे लगा कि नदी के दोनों किनारों पर दूर तथा देर तक तालियाँ बजती रही और लोग 'इंडियाÓ'इंडियाÓ का घोष करते रहे। निश्चित ही यह अभ्यर्थना मुझसे अधिक इंडिया को लेकर थी। मैं तो निमित्त भर था। उस क्षण मंच पर खड़े मुझे पहली बार लगा कि अपने देश का प्रतिनिधित्व करना कितना बड़ा आदर होता है तथा वह भी उत्तरदायित्वपूर्ण। और नहीं जानता कि मैंने इस दायित्व को अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में कितना कुछ निभाया या नहीं, पर मैंने अपनी ओर से चेष्टा अवश्य की। (कितना अकेला आकाश पृ. 59 ) कथित बातों का आभास एक अच्छा यात्री ही कर सकता हैं।

काव्यपाठ के समापन के उपरांत यहाँ के लोगों के सम्मान और खुशी व्यक्त करने का तरीका अलग दिखा- स्वर्णमाला वाला अंतिम कार्यक्रम जब समाप्त हो और मंच से नीचे उतरा, मुझे भीड़ ने घेर लिया और अपने पश्चिमी पारंपरिक ढंग से चुंबनों से, आलिंगन से लाल दिया। इस प्रगाढ़ आत्मीयता में मेरे सारे भारतीय संस्कार, व्यवहार की मान्यताएं सब ढह गयी। काव्य और काव्य का  संबोधन क्या सच ही इतना चमत्कारिक होता है? शायद हम भारतीय न अपनी अभिव्यक्ति, न आचरण, किसी में भी तो सहज या उन्मुक्त नहीं होते। एक ऐसा मिथ्यात्व, नैतिकता, परंपरा आदि के नाम पर ओढ़े रहते हैं कि हमारा वास्तविक स्वत्व, अभिव्यक्ति सभी कुछ इन आडंबरों, मान्यताओं में दबा रहता है। हमने पश्चिम की उन्मुक्तता को यदि कुछ ग्रहण भी किया है तो यह इतना उच्छंृखल स्वरूप है कि उससे जुगुप्सा होती है। (कितना अकेला आकाश पृ.59) यहाँ लेखक हम भारतीयों को एक संदेश देना चाहते कि हमें अपनी मान्यताओं और परंपरा से दो-चार कदम आगे बढ़ कर इन सब चीजों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए विदेशों से सकारात्मक चीजों को ग्रहण करना चाहिए। अपने अभिव्यक्ति एवं अन्य चीजों में थोथी नैतिकता से ऊपर उठकर वास्तविकता की ओर प्रवृत्त होना चाहिए।

 लेखक ने वहाँ के साहित्यकारों से निम्न बातें सुनी -कई कवियों ने विशेषकर साम्यवादी देशों के कवियों ने तो खुलकर कहा कि आपकी भाषा में आधुनिकता के नाम पर यह पश्चिम की जूठन क्यों लिखी जा रही है? और उससे क्या होगा? आप अपनी परंपरा को क्यों नहीं आधुनिक परिपाश्र्व देते? क्यों आधुनिकता का अर्थ आप केवल पश्चिम को ही स्वीकार करते हैं? क्या आपकी आधुनिकता का कोई भिन्न स्वरूप या सत्ता नहीं हो सकती? (कितना अकेला आकाश पृ.45) कथित बात हम सभी हिन्दी साहित्य जगत के लिए शर्मसार करने वाली घटना हैं, हमारे देश को आजाद हुए इकहत्तर साल हो गए फिर भी हम उधार की जिंदगी जी रहे हैं। हम अपने देश और साहित्य का मानक ही तय नहीं कर पा रहे हैं। हमें अपने देश की अलग पहचान स्थापित करने के लिए अपने देश के साहित्य एवं भाषा में देशी रंग लाना होगा, जिसके लिए भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग विशेष के साहित्यकारों को आगे आना होगा तथा जिम्मेदारी लेनी होगी, तभी विदेशों मे अपनी अलग पहचान स्थापित हो पाएगी।

लेखक के काव्य-पाठ समाप्त करने के उपरांत उनसे हंगरी के एक कवि महोदय मिले, जिन्होंने लेखक के काव्य पाठ की सराहना की। लेखक कहते हैं- उसकी राय थी कि भारतीय कविता को अपनी भूमि और अस्मिता नहीं छोडऩी चाहिए मेरी कविताओं में यही अच्छाई दिखाई दी। उसकी राय में तो भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो मानवता का त्राता बन सकता  है। मैं उस कम्युनिस्ट कवि को देखता ही रह गया। शायद कोई गहरी पीड़ा या व्यथा थी जिसे वह स्पष्ट तो नहीं कर सकता था परंतु भारत को एकमात्र त्राता मानना एक बहुत बड़ा संकेत था।  (कितना अकेला आकाश पृ. 46) उल्लेखित पंक्तियाँ हमारे भारत को विश्व में एक अलग ही स्थान दिलाती हैं। युगोस्लाविया में लेखक ने यह महसूस किया कि यहाँ के लोग अन्य देश के लोगों को कम जानते हैं- असल पश्चिम के लोगों की सबसे बड़ी कमी यह है कि वे लोग अपने अलावा किसी भी देश, समाज, सभ्यता, साहित्य और संस्कृति के बारे में विशेष नहीं जानते। जो भी जानते हैं वह भी कुछ ऐसा ही होता है जैसे सैलानियों के लिए जो पुस्तकालय तैयार की जाती हैं, उसमें काम-चलाऊ सूचनाएँ  और नाम दे दिये जाते हैं, बस बहुत-कुछ ऐसा ही लगता है।(कितना अकेला आकाश पृ.46) लेखक को युगोस्लाविया आने के बाद मालूम हुआ कि यहाँ के लोगों को भारतीय पहनावा-ओढ़ावा काफी पसंद आया, जब लेखक काव्य-गोष्ठी में जा रहे थे तो वहाँ के लोगों की माँग थी कि लेखक अपने भारतीय पोशाक धोती-कुर्ता में काव्य-पाठ सुनाये। तथा इन लोगों को भारत का पुनर्जन्म का सिद्धांत भी बहुत आश्चर्यचकित करता था।

           यहाँ के लोगों का घर बनाने का तरीका भी अलग होता है- यूरोप, एशिया, की अपेक्षा ठंडा भूखंड है इसलिए इन्हें आँगन-दालान जैसी चीज नहीं चाहिए होती हैं।  ये लोग धूप का सेवन पार्कों में या जलाशय के किनारे ले लेते हैं अत: इनके मकानों का प्रकार बंद डिब्बे जैसा ही होता है। जो हो, ये मकान लगते सुंदर हैं।(कितना अकेला आकाश पृ. 20) यूरोपीय जन-जीवन की आम व्यवस्थाएँ  सामान्य लोगों के हित में लाभकारी होती हैं तथा सुविधा-सुलभ होती हैं। लेखक जब यूरोप में बस से यात्रा कर रहे थे अचानक बस खराब हुई तुरंत ड्राइवर ने फोन करके दूसरी बस मंगवायी जिस पर सब यात्री चढ़ गये। जबकि भारत में ऐसी व्यवस्था दुर्लभ है। एक अन्य दूसरी घटना का जिक्र करते हुए लेखक ने वहाँ की टिकट परिवर्तन की बात कही है, टिकट कहीं का है आप अपने सुविधा के अनुसार युगोस्लाविया में टिकट को परिवर्तित करके युगोस्लाविया में ही दूसरे स्थान को भी जा सकते हैं। युगोस्लाविया का राजनैतिक जीवन शांतिप्रिय है यहाँ के लोग ज्यादा भाषणबाजी में विश्वास नहीं करते हैं, सिवाय तथ्यात्मक बातों के। यहाँ के शासन तंत्र में तानाशाही रवैया एकदम नहीं दिखा। यहाँ न किसी का भय है न किसी का डर। ये लोग खुशहाल जिंदगी जीने एवं तार्किक सोच के अलावा इनके पास ऊल-जुलूल कार्यो के लिए समय नहीं है - युगोस्लाविया को देखकर साम्यवादी शासन की जकड़बंदी का कहीं पता नहीं चलता।(कितना अकेला आकाश पृ. 22)उल्लेखित संदर्भ में लेखक ने एक बात और महसूस की-सबसे अच्छी बात यहाँ यह थी कि कोई राजनीतिक चर्चा में रुचि नहीं रखता था। ज्यादातर लोग भारतीय-दर्शन, काव्य के बारे में प्रश्न करते हैं। व्यक्तियों में केवल गाँधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर को ही जानते हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता से कम्युनिस्ट देश के कवि तथा पश्चिम और अर्जेंटीना, क्यूबा आदि के कवि भी प्रभावित लगते थे। (कितना अकेला आकाश पृ. 25) 

यूरोपीय लोग अपने और प्रकृति के बीच तारतम्यता बनाकर रखते हैं। किसी स्थान की सुषमा दो चीजों से बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, एक उस स्थान की प्राकृतिक छटा तथा दूसरा उस स्थान विशेष की कृत्रिम साज-सज्जा एवं भव्यता। यदि इन दोनों चीजों का सामंजस्यपूर्ण संतुलन हो तो उस स्थान विशेष की सुंदरता में चार चाँद लग जाते हैं। ठीक ऐसी ही मनोरम दशा युगोस्लाविया की है - भारत की तरह यहाँ मौसम अतिरंजित रूप में नहीं है, फलत: प्रकृति और प्राकृतिक व्यापार में भी संतुलन ही मिलता है। नतीजा यह होता है कि नदियाँ हैं, जो वर्ष भर  नदियाँ रहती हैं। जंगल भी अपनी आरण्यक मनोरमता सर्वथा नहीं खोते। गर्मी होती है पर पत्ती तक नहीं झुलसती। पूरे रास्ते बाल्कन पहाडिय़ों के पर्वतीपन, आरण्यक, माधवी, तंबाकू के खेतों और सेब के बगीचों के बीच से यात्रा बड़ी सुखद रही। प्रकृति की सुरम्यता के साथ मनुष्य ने सड़कों, सुरंगों और ब्रिजों तथा फ्लाई ओवरों की इतनी सम्यक चूल बैठायी है कि प्रकृति सुषमा भी आहत नहीं होती और मनुष्य के द्वारा निर्मित चीजों का हस्तक्षेप भी नहीं लगता। दोनों एक-दूसरे की प्रतिपूरक तो हैं ही, साथ ही संतुलन भी करती है।(कितना अकेला आकाश पृ. 63)। इस प्रकार लेखक ने काफी रोमांचक, उत्साहपूर्ण, ज्ञानवद्र्धक अपनी यूरोपीय यात्रा पूर्ण कीे। जिससे लेखक को युगोस्लाविया के इतिहास, भूगोल, वहाँ की संस्कृति खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज, ज्ञान-विज्ञान, प्रकृति आदि महत्वपूर्ण चीजों की जानकारी प्राप्त हुई। लेखक ने अपने पाठक  को कितना अकेला आकाश के माध्यम से शुरू से अंत तक बाँधे रखने में आशातीत सफलता प्राप्त की है।

संदर्भ ग्रंथ

1. नरेश मेहता, कितना अकेला आकाश, भारतीय ज्ञानपीठ 18, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नयी दिल्ली-110003, चतुर्थ संस्करण 2011