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Sunday 21 Jul 2019

भागवत की कक्षा या आरएसएस के मेक-ओवर की कसरत

राजधानी दिल्ली में विज्ञान भवन में सितंबर के मध्य में हुई आरएसएस के सरसंघचालक, मोहन भागवत की तीन दिवसीय व्याख्यानमाला, इस तिरानवे साल पुराने सांप्रदायिक, दकियानूसी और प्रतिक्रियावादी संगठन का मेकओवर करने की, एक बड़ी और बहुप्रचारित कोशिश थी। मेकओवर की इस कोशिश की जरूरत क्यों पड़ी, यह स्वत:स्पष्टï है। मोदी राज के चार साल में न सिर्फ आरएसएस की ताकत बहुत बढ़ी है और देश के शासन पर उसका प्रभाव बहुत बढ़ा है, सरकार तथा शासन के साथ उसका रिश्ता आज जितना प्रत्यक्ष तथा प्रकट है, इससे पहले कभी नहीं था। बेशक, वाजपेयी के राज में भी शासन में आएसएस की दखलंदाजी की शिकायतें होती थीं और जसवंत सिंह को शुरूआत में वित्त मंत्री न बनाने देेने जैसे, इस दखलंदाजी के चर्चित प्रसंग भी सामने आए थे। इसके बावजूद, इस रिश्ते में एक तरह की अप्रत्यक्षता थी और वास्तव में एक हद तक इसे छुपाने की भी कोशिश की जाती थी, जो कई बार विफल भी हो जाती थी। लेकिन, अब यह रिश्ता बेहिचक खुले में सामने आ चुका है। आरएसएस द्वारा नियुक्त किए गए ग्रुप, विभिन्न मंत्रालयों के काम में सीधे तथा व्यवस्थित तरीके से दखल देते हैं, सरकार के वरिष्ठï मंत्री आरएसएस के अधिकारियों के सामने हाजिर होकर अपने काम की रिपोर्ट पेश करते हैं और सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष व अन्य शीर्ष नेता, हर चंद महीनों पर गा-बजाकर आरएसएस पदाधिकारियों से 'परामर्श' हासिल करते रहे हैं।

यह कसरत क्यों?

इसका नतीजा यह हुआ है कि एक ओर अगर आरएसएस की ताकत बहुत बढ़ी है, तो दूसरी ओर आम लोगों के बीच तथा खासतौर पर सार्वजनिक राय बनाने वाले पढ़े-लिखे मध्य वर्ग के बीच (जिसमें बड़ा हिस्सा खाते-पीते, सवर्ण व बहुसंख्यक समुदाय के लोगों का है) उसकी छवि, उसके राजनीतिक मोर्चे के रूप में भाजपा की छवि के साथ, ज्यादा खुले तौर पर गुंथ गयी है। आरएसएस यह देख सकता है कि उसकी सांप्रदायिक, दकियानूसी तथा प्रतिक्रियावादी छवि, यहां से आगे एक संगठन के रूप में उसके विस्तार में ही बाधक नहीं है बल्कि उसके राजनीतिक बाजू के समर्थन आधार के विस्तार में भी बाधक है। मिसाल के तौर पर आरएसएस की यह छवि, नरेंद्र मोदी की 'सबका साथ, सबका विकास' जैसे सपने बेचने की सामथ्र्य को भी कम करती है। यह जनतांत्रिक प्रणाली के दायरे में सत्ता तक आरएसएस की पहुंच के मौकों को और इस तरह उसके अपने विस्तार के मौकों को भी घटाता है। जाहिर है कि अब जबकि नरेंद्र मोदी की सरकार से आम लोगों की उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी हैं और उसके खिलाफ विभिन्न तबकों का असंतोष तेजी से बढ़ रहा है, आरएसएस खतरे की घंटी सुन सकता है। इस खतरे में एक पहलू, उसके लिए पूंजीपति वर्ग के आम अनुमोदन के कमजोर पडऩे का भी है। आरएसएस की छवि का मेकओवर करने की भागवत की कोशिश, इस खतरे से बचाव की भी कार्रवाई है।

बेशक, अपनी छवि के मेकओवर इस कोशिश तक भी आरएसएस, कोई एकाएक नहीं पहुंच गया है। इस संदर्भ में चंद महीने पहले के उस प्रसंग को याद कर लेना उपयुक्त होगा, जब पूर्व-राष्टï्रपति तथा पुराने कांग्रेसी नेता, प्रणव मुखर्जी को आरएसएस के प्रचारकों के दीक्षांत समारोह के मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में अपना वक्तव्य देने के लिए बुलाया गया था। लेकिन, टेलीविजन चैनलों के माध्यम से देश भर में पहुंच सुनिश्चित किए जाने के सारे मौकों के बावजूद, वह आयोजन नागपुर में आरएसएस के मुख्यालय में था और इस माने में उसकी पहुंच सीमित थी। साथ में स्वयं भागवत का संबोधन होने के बावजूद, उस आयोजन में मुख्य संबोधन पूर्व-राष्टï्रपति का ही था। यानी उस आयोजन से आरएसएस की छवि बदलने में सीमित मदद ही मिल सकती थी। यह दूसरी बात है कि यह मदद भी, इससे पहले ऐसे मौकों पर आरएसएस के मुख्यालय में बुलाए गए दूसरे 'बाहरीÓ लोगों के पहुंचने से हुई मदद के मुकाबले गुणात्मक रूप से ज्यादा थी। इन्हीं कोशिशों की अगली कड़ी के तौर पर, नोबेल पुरस्कार सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता, कैलाश सत्यार्थी को विजय दशमी पर आरएसएस स्थापना दिवस के समारोह को भागवत के साथ संबोधित करने के लिए, नागपुर में आरएसएस के मुख्यालय में बुलाया गया। संक्षेप में इस सारी कसरत का मकसद, आरएसएस को और उससे जुड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा को भी, आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक कामनसेंस से अनुशासित जनमत के बीच, 'सामान्य' के रूप में स्वीकार्य बनाना है।

फिर भी, दिल्ली के विज्ञान भवन की व्याख्यानमाला, छवि निर्माण की आरएसएस की एक ऊंची कूद थी। इस बहुप्रचारित आयोजन के लिए विशेष आमंत्रण देकर, देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे अनेक जाने-पहचाने चेहरों (सेलिब्रिटीज़) को छांट-छांटकर बुलाया गया था, जो आरएसएस के सांगठनिक दायरे से बाहर होते हुए भी, उससे थोड़े-बहुत प्रभावित जरूर हैं। दो दिन का व्याख्यान और तीसरे दिन का विस्तृत किंतु चुनिंदा तथा अपने ही हिसाब से उठायी गयी शंकाओं का समाधान, इस आयोजन में उपस्थित नीम-समर्थकों को भी और सीधे टेलीविजन प्रसारण तथा टीवी व अखबारों में विस्तृत रिपोर्टिंग के जरिए, आम लोगों को भी, यही संदेश देने का प्रयास था कि आरएसएस, उनकी चिंताओं पर ध्यान दे रहा है और उनके मन के मुताबिक खुद किसी हद तक बदलने के लिए भी तैयार है। संक्षेप में आम धारणा के विपरीत वह, अपने आग्रहों को लेकर कट्टïर नहीं, रीजनेबल है। अचरज की बात नहीं है कि खुद आरएसएस के पैरोकारों ने इसे न सिर्फ लोगों की शंकाएं दूर करने की कोशिश के रूप में प्रचारित किया है बल्कि आरएसएस के गैर-समर्थकों से भी संवाद के लिए तैयार होने से लेकर, उसके खुलेपन तक का सबूत बताया है। एक प्रमुख संघ-चिंतक ने तो इसे गोर्बाचोव की तर्ज पर, भागवत का ग्लासनोस्त क्षण ही करार दे दिया है। 'खुलापन', इस कसरत की आरएसएस की प्रस्तुतियों का केंद्रीय शब्द है।

सांप्रदायिक चेहरे को छुपाने की कोशिश

लेकिन, जैसाकि हम आगे देखेंगे यह कुल मिलाकर मेकओवर का ही खेल है, न कि इस सांप्रदायिक, दकियानूसी और प्रतिक्रियावादी संगठन में किसी वास्तविक बदलाव या विकास का। बेशक, ऐसा नहीं है कि मेकओवर में भी कुछ बदलता ही नहीं हो। कुछ न कुछ तो बदलता ही है। लेकिन, सिर्फ उतना ही जितना, छवि बदलने के लिए जरूरी हो। मेकओवर में मुख्य ध्यान पुरानी वस्तु की नयी प्रस्तुति पर ही होता है। इसमें बदलाव सिर्फ आवश्यक न्यूनतम होता है, जबकि निरंतरता अधिकतम। और इस नयी छवि के लिए आवश्यक न्यूनतम बदलाव को बढ़ा-चढ़ाकर रेखांकित करना भी, मेकओवर का जरूरी हिस्सा होता है। अचरज नहीं कि मेकओवर की इस कसरत में आरएसएस ने असत्य, अद्र्घ-सत्य और चुप्पी, सभी का सहारा लेकर, बिना कुछ खास बदले ही बहुत बदल देने का भ्रम पैदा करने की कोशिश की है। लेकिन, यही तो मेकओवर का असली मकसद होता है। यह दूसरी बात है कि इस कोशिश में आरएसएस के खास कामयाब होने में संदेह है, लेकिन उसकी चर्चा हम इस टिप्पणी के आखिर में करेंगे।

स्वाभाविक रूप से आरएसएस के सांप्रदायिक चरित्र का प्रश्न, वह सबसे ज्वलंत प्रश्न है, जिस पर मेकओवर की यह कसरत सबसे ज्यादा केंद्रित रही है। आरएसएस प्रमुख ने अपने दो दिन के व्याख्यान में भी और प्रश्नों के उत्तर देते हुए भी, यही बताने की कोशिश की है कि आरएसएस पर लगने वाला सांप्रदायिक होने का आरोप गलत है। आरएसएस, सांप्रदायिक नहीं है बल्कि राष्टï्रवादी है। वह ''हिंदू राष्टï्र'' की स्थापना का लक्ष्य लेकर चलता जरूर है, लेकिन उसकी कल्पना भी संप्रदाय-आधारित न होकर, इस देश की परंपरा के बुनियादी मूल्यों के अर्थ में सांस्कृतिक है। भागवत ने प्रयासपूर्वक यह भी रेखांकित किया कि यह मानना सही नहीं है कि आरएसएस की कल्पना के ''हिंदू राष्टï्र'' में मुसलमानों के लिए कोई जगह ही नहीं है। आरएसएस के किसी सरसंघचालक के मुंह से यह सुनकर बहुत से लोग चौंके भी होंगे कि, ''हम कहते हैं कि हमारा हिंदू राष्टï्र हंै। इसका मतलब इसमें मुसलमान नहीं चाहिए, ऐसा बिल्कुल नहीं होता। जिस दिन ये कहा जाएगा कि यहां मुसलमान नहीं चाहिए, उस दिन यह हिंदुत्व नहीं रहेगा।'' इतना ही नहीं भागवत ने, आरएसएस के सबसे प्रमुख सिद्घांतकार तथा उसके संगठन का व्यापक ताना-बाना खड़ा करने वाले दूसरे सरसंघचालक, एम एस गोलवलकर के भाषणों के आरएसएस में बहुपठित संकलन, ''बंच ऑफ थाट्स''से औपचारिक रूप से किनारा भी कर लिया है। और बहुत ही बातों के अलावा जिन्हें अब दोहराने से आरएसएस बचना चाहता है, इस पुस्तक के एक अध्याय में दो-टूक शब्दों में ''मुसलमानों'', ''ईसाइयों'' तथा ''कम्युनिस्टों'' को, इसी क्रम में, ''हिंदू राष्ट्र'' के लिए मुख्य आंतरिक शत्रु या खतरे ही घोषित किया गया है।

गोलवलकर से परहेज, गोलवलकरवाद से प्यार

याद रहे कि इससे पहले आरएसएस, हालांकि इतने ढोल-पीटकर नहीं, गोलवलकर की ही तीस के दशक के आखिर की कृति ''वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड''से भी, जिसे आरएसएस का सैद्घांतिक आधार बल्कि उसकी गीता माना जाता था, अपना पीछा छुड़ा चुका था। यह दूसरी बात है कि तब उसकी गोलवलकर के विचारों को सीधे-सीधे असामयिक कहने की हिम्मत नहीं हुई थी और इसलिए, यह बहाना बनाया गया था कि यह गोलवलकर की लिखी पुस्तक तो थी ही नहीं। यह तो सावरकर की पुस्तक का सरल अनुवाद था, जिस पर गलती से लेखक की जगह गोलवलकर का नाम छप गया था। इस पुस्तक में गोलवलकर ने ''हिंदू राष्टï्र''को परिभाषित करते हुए, भारत में राष्टï्रवादियों के लिए, जर्मनी के नाजियों के यहूदियों के सफाए के कारनामे का आदर्श पेश किया था। गैर-हिंदुओं के लिए उन्होंने फार्मूला दिया था- 'विदेशी तत्वों के लिए सिर्फ दो रास्ते ही रहते हैं, या तो खुद को राष्टï्रीय नस्ल में विलीन कर दें तथा उसकी संस्कृति को अपना लें या उसके रहमो-करम रहें, जब तक कि राष्टï्रीय नस्ल उन्हें ऐसा करने दे...हिंदू धर्म का आदर करना तथा उसके आगे शीश नवाना सीखें, हिंदू नस्ल तथा संस्कृति यानी हिंदू राष्टï्र के गौरवान्वयन के सिवा और कोई विचार मन में नहीं लाएं और अपने पृथक अस्तित्व को मिटा दें..'। वह यह भी कहते हैं कि गैर-हिंदुओं को कोई विशेषाधिकार तो क्या सामान्य नागरिक अधिकार तक हासिल नहीं होंगे। अचरज नहीं कि मेकओवर की अपनी कोशिश के हिस्से के तौर पर भागवत, गोलवलकर के लेखन से आरएसएस को अलग करने के जरिए, सबसे प्रमुखता से और बलपूर्वक यही दिखाने की कोशिश करते हैं कि उसने गैर-हिंदुओं, खासतौर पर इस्लाम तथा ईसाई धर्म को मानने वालों के प्रति, शत्रुता के रुख के अपने इतिहास से अलग कर लिया है और अब उसका रुख बदल गया है।

लेकिन, आरएसएस के मूल सांप्रदायिक चरित्र को परिभाषित करने वाले इस प्रश्न पर, भागवत के ही अनुसार आरएसएस का अब का रुख क्या है? हिंदू धर्म क्या है, सनातन धर्म क्या है, भारतीय धर्म क्या है, वे किसे हिंदुत्व कहते हैं, हिंदू राष्टï्र क्या है, आदि पर दो दिन के अपने व्याख्यान में भागवत ने खूब जलेबी बनायी है। प्रवचनकर्ता/ पौराणिक कथावाचक की शैली की अपनी प्रस्तुति में वह इस आयोजन में उपस्थित अपने नीम-समर्थकों को इन मुद्दों पर भ्रमित करने में या कन्फ्यूज करने में कितने सफल हुए होंगे यह तो कहना मुश्किल है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह धुंधलका फैलाकर, असली प्रश्न से बचने की कोशिश ही है। असली प्रश्न बहुत सीधा और सरल है। क्या आरएसएस, भारत में रहने वाले सभी लोगों को धर्म, जाति, लिंग और भाषा के अंतर से ऊपर उठकर, बराबर का नागरिक मानता है? याद रहे कि यही भारत के संविधान का मूलाधार है, उस संविधान का जो स्वतंत्रता के संघर्ष के मूल्यों से निकला है और जिसे सूत्रबद्घ करने में डा.अंबेडकर ने केंद्रीय भूमिका अदा की थी। सभी जानते हैं और गोलवलकर के उक्त विचार, जिनसे सीधे जुड़ाव स्वीकार में अब आरएसएस को हिचक हो रही है, इसके गवाह हैं कि आरएसएस को, ईसाइयों तथा मुसलमानों को बराबर के नागरिक मानना अब तक हर्गिज मंजूर नहीं था। इस सिलसिले में यह याद दिलाना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि जिन्ना से भी कई बरस पहले, आरएसएस के घनिष्ठï सहयोगी रहे सावरकर ने ही हिंदुओं और मुसलमानों के पृथक राष्टï्र होने का सिद्घांत पेश किया था और हिंदू राष्टï्र की स्थापना के लिए, जनता तथा देश के विभाजन का रास्ता दिखाया था।

सांप्रदायिक चेहरा ढांपने की कसरत

भागवत अब हिंदू राष्टï्र, सनातन धर्म, भारतीय परंपरा, भारतीय धर्म वगैरह की जलेबी के पीछे, इसी सचाई को छुपाने की कोशिश करते हैं कि उन्हें मुसलमानों तथा ईसाइयों को बराबर का नागरिक मानना मंजूर नहीं है। इसके लिए मूल तर्क वास्तव में वही है, जो आरएसएस की स्थापना के समय तक सावरकर द्वारा पेश किया जा चुका था। सावरकर ने सिर्फ हिंदू धर्म से भिन्न, एक राजनीतिक राजनीतिक परियोजना के रूप में ''हिंदुत्व'' को, उसके ''हिंदू राष्टï्र'' की स्थापना के लक्ष्य को तथा इसके लिए 'सेना का हिंदूकरण तथा हिंदुओं का सैन्यीकरण' करने के रास्ते को ही स्पष्टï नहीं किया था, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय की परिभाषा के लिए  ''मातृभूमि'' के साथ ''पुण्यभूमि'' की शर्त जोड़कर, यह भी स्पष्टï किया था कि भारत से बाहर जन्मे धर्मों के मानने वाले समुदायों यानी मुसलमानों और ईसाइयों को, भारतीय राष्टï्र का हिस्सा नहीं माना जा सकता है। उन्हें विदेशी या बाहरी ही माना जाएगा। गोलवलकर ने इसी विचार को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाते हुए, हिंदू राष्टï्र में गैर-हिंदुओं को अधिकारहीन बाहरी बनाने का फार्मूला पेश किया था। भागवत ने बेशक, गोलवालकर के उक्त फार्मूले को दोहराया तो नहीं है बल्कि ''हिंदू राष्ट्र'' के मुसलमानों की मौजूदगी के बिना पूरा नहीं होने की बात भी कही है। फिर भी वह वास्तविक भारतीय धर्म के बहाने से घुमा-फिराकर, भारत में जन्मे बनाम भारत से बाहर जन्मे धर्मों के विभाजन को ही दोहराते नजर आते हैं। नतीजा यह कि उदार तथा असांप्रदायिक दिखाई देने की भागवत की सारी कसरत अंतत: गोलवालकर के इस फार्मूले पर ही सिमट जाती है कि भारतीय (हिंदू पढ़ें) परंपराओं का आदर करने वाले (गैर-हिंदू) ही, हिंदू राष्टï्र में स्वीकार किए जा सकते हैं। आरएसएस द्वारा खड़ा किया गया मुस्लिम राष्ट्रीय मंच इसका आंखें खोलने वाला उदाहरण है कि आरएसएस की कथित उदारता की सीमाएं कहां तक हैं? इसमें कथित भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से भिन्न परंपरा के लिए कोई जगह नहीं है। हां! इसमें इसकी ही इजाजत होगी कि 'मुसलमान निजी स्तर पर अपने धर्म का पालन करते रहें, जबकि सार्वजनिक जीवन में भारतीय/ हिंदू परंपराओं का पालन करते रहें'। (क्रिस्टोफर जैफरलेट, 26 सितंबर, इंडियन एक्सप्रैस)। इसे धर्म से परे सभी नागरिकों की बराबरी की स्वीकृति किसी भी तरह नहीं कहा जा सकता है। यह दूसरी बात है कि राम माधव के अनुसार (इंडियन एक्सप्रैस, 25 सितंबर) भागवत का इतना कहना भर बहुत बड़ी बात है कि आरएसएस तो धर्मनिरपेक्षता के इस विचार को स्वीकार करने के लिए भी तैयार है कि 'सभी धर्म बराबर हैं' क्योंकि आरएसएस में अब तक यही माना जाता रहा है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ''सर्वपंथ समादर'' है, लेकिन ''सर्वपंथ समभाव'' नहीं! 

यह दिलचस्प है कि भागवत ने अपनी प्रस्तुति में और सवालों के जवाब में भी, भारतीय परंपरा की विविधता पर बहुत जोर दिया है। यह वह क्षेत्र लगता है जहां मेकओवर में बदलाव का पहलू सबसे सक्रिय नजर आता है। पर जैसा कि हम पीछे कह आए हैं, विविधता का यह स्वीकार उनकी परिभाषा के हिसाब से भारतीय मानी जा सकने वाली परंपराओं तक ही सीमित है। बेशक, नागपुर से निकलकर इस विशाल देश के कोने-कोने तक पहुंचने की अपनी नौ दशक से ज्यादा की यात्रा में आरएसएस ने भी काफी कुछ सीखा है और उसका दिमाग भी कुछ तो खुला ही है। ब्राह्मïणवादी परंपरा के अलावा उसे और भी बहुत कुछ स्वीकार करना पड़ा है। दक्षिण की परंपराएं इसमें खास हैं। फिर भी यह समावेशीपन सिर्फ कथित भारतीय या हिंदू कहलाने वाली परंपराओं तक सीमित है। वास्तव में, बहुलता के इस स्वीकार का मकसद यही है कि 'दूसरों' (मुसलमानों, ईसाइयों) के मुकाबले में, अन्य को ज्यादा से ज्यादा इक_ïा किया जाए। आदिवासियों की नितांत भिन्न परंपराओं को हिंदू घोषित करने की उतावली इसी रणनीति का हिस्सा है।

जनतांत्रिक  मूल्यों से बुनियादी दुश्मनी

हिंदी को पूरे भारत की भाषा मनवाने के आग्रह की उग्रता में कमी तथा उससे बढ़कर अंग्रेजी के विरोध में कमी और कम से कम सिद्घांत के स्तर पर सभी भारतीय भाषाओं को बराबर महत्व देने की जरूरत का स्वीकार, इसी का हिस्सा है। इसके बावजूद, आरएसएस अब भी संस्कृत के सिर्फ इसलिए राष्टï्रीय भाषा बनने का सपना देखता है कि पुरानी परंपराएं उसी जुड़ी हुई हैं। दूसरी ओर, उसके उर्दू के विरोध में कमी का कोई संकेत अब तक तो देखने को नहीं मिला है। कुछ ऐसा ही किस्सा संघ के एकात्मक शासन के आग्रह के कमजोर पडऩे तथा संघीय ढांचे को एक हद तक स्वीकार करने का है। वास्तव में है यह व्यवहारवादी समायोजन ही। वर्ना संघात्मक व्यवस्था के इस मूल विचार का कि भारत, विभिन्न भाषायी राज्यों का संघ है, आरएसएस अब भी उतना ही विरोधी है। हां! संघीय व्यवस्था के उसके नकार ने अब उल्टा रूप ले लिया है। यह रूप है भाषायी इकाइयों की सत्ता ही नकारने का। आरएसएस, प्रशासन के लिए सुविधाजनक जनपदों के पक्ष में, इन इकाइयों को तोड़े जाने या कमजोर करने के लिए काम कर रहा है। छोटे राज्यों का नारा इसी का हथियार है। वास्तव में ''बंच ऑफ थॉट्स'' को लेकर आरएसएस की एक परेशानी यह भी है कि इसमें विशेष रूप से स्वतंत्रता के बाद के पहले डेढ़-दो दशकों के ''गुरुजी'' के ऐसे कई वक्तव्य हैं, जिनमें स्वतंत्र भारत के संविधान के मूलाधार के खिलाफ धार्मिक ही नहीं, जाति, लिंग, भाषा की भी बराबरी के बुनियादी जनतांत्रिक मूल्यों का विरोध किया गया है और 'हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान' का, मनु के विधान का, एकात्मक शासन का तथा स्त्री अधिकारहीनता का ही नारा बुलंद किया गया है। यानी भागवत आज आरएसएस की जो उदार छवि गढऩे की कोशिश कर रहे हैं, यह उसका सीधे-सीधे खंडन करता है। यह संकलन आरएसएस के लगभग तीन दशक के वास्तविक इतिहास की झलक जो दिखाता है। याद रहे कि अब शासन की मदद से तेजी से गढ़े जा रहे इतिहास के विपरीत, इस वास्तविक इतिहास में आरएसएस को मुसलमानों तथा ईसाइयों के भी साथ तो, एक राष्टï्र में रहने का विचार तक मंजूर नहीं था। इसीलिए राष्टï्रीय आंदोलन के पूरे दौर में उसकी भूमिका, विदेशी राज के खिलाफ लडऩे तथा उसके खिलाफ भारतीय जनता को एकजुट करने के बजाए, देशवासियों के ही एक हिस्से के खिलाफ लडऩे और विदेशी शासन की मदद करने की ही रही थी। इसीलिए तो, राष्टï्रीय आंदोलन के पूरे दौर में ब्रिटिश हुकूमत ने आरएसएस पर कोई रोक लगाने की जरूरत नहीं समझी थी। हां! वे उसकी सांप्रदायिक उग्रता को जरूर कुछ चिंता की नजर से देखते थे। दूसरी ओर, राष्टï्रीय आंदोलन का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस ने जरूर अपने सदस्यों के आरएसएस में जाने पर या आरएसएस के सदस्यों के कांग्रेस का सदस्य बनने पर, पाबंदी लगाना जरूरी समझा था।

आरएसएस को राष्टï्रवादी मनवाने की कोशिश

असत्य और अद्र्घ-सत्य के मिश्रण से, भागवत ने राष्टï्रीय आंदोलन के दौरान और उसके फौरन बाद की आरएसएस की भूमिका की जो 'राष्टï्रवादीÓ प्रस्तुति की है, वह इतिहास से पूरी तरह से अपरिचितों को ही प्रभावित कर सकती है क्योंकि इसका वास्तविक इतिहास से कुछ लेना-देना ही नहीं है। वास्तव में संघ परिवार के इतिहास के पुनर्लेखन के वृहत्तर अभियान के पीछे, उनकी यह मजबूरी भी है। इतना ही नहीं, आरएसएस के संस्थापक डा हेडगेवार को एक ''महत्वपूर्ण स्वतंत्रता सेनानीÓÓ बनाने और इसके जरिए, आरएसएस के गठन को एक राष्टï्रवादी उद्यम बनाकर पेश करने तथा उसे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ राष्टï्रीय आंदोलन में जगह दिलाने की, इधर जोर-शोर से कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन, खुद हेडगेवार के संघ अनुमोदित जीवनीकार की पुस्तक, ''केशव, संघ निर्माता'' में दिया गया विवरण, इसे उजागर करने के लिए काफी है कि आरएसएस के गठन के पीछे मूल प्रेरणा, मुस्लिम-विरोध की और निचली जातियों को साथ लाकर, ऊंची जातियों को सुरक्षित करने की थी। आरएसएस को लंबे अर्से तक मराठी ब्राह्मïणों का संगठन अकारण ही नहीं माना जाता रहा है। और अपने गठन के बाद आरएसएस ने जो पहला 'राष्टï्रवादी'कारनामा अंजाम दिया था, वह था नागपुर में एक मुस्लिमविरोधी दंगे में सक्रिय रूप से हिस्सा लेना। वास्तव में उसके बाद से ही आरएसएस अपने विस्तार के लिए लगातार सांप्रदायिक दंगों का सहारा लेता आया है, जिसकी गवाही साठ तथा सत्तर के दशकों में हुए विभिन्न दंगों की न्यायिक जांच कमेटियों की लगभग सभी रिपोर्टें देती हैं। इसे 'राष्ट्रवाद' मानने के लिए,  आरएसएस के बाहर के लोगों का तैयार होना मुश्किल है।

यह दिलचस्प है कि मेकओवर की इस कोशिश में भागवत ने सिर्फ सांप्रदायिक प्रश्न तथा जाति प्रश्न पर ही नहीं बल्कि राष्टï्रीय झंडे, संविधान, हिंदू कोड बिल बहस, भाषाओं की समानता, संघीय ढांचे, नारी समानता आदि, राष्टï्रीय आंदोलन की सभी प्रमुख प्राप्तियों के मामले में आरएसएस के वास्तविक रुख को ढांपने के लिए अद्र्घ-सत्य, असत्य और चुप्पी का जमकर सहारा लिया है। मिसाल के तौर पर संघ की भगवा ध्वज में आस्था के बावजूद, उसके राष्टï्रीय ध्वज को पूरी निष्ठïा देने का दावा करते हुए, वह दुहरे असत्य का सहारा लेते हैं। एक तो वह अद्र्घसत्य के सहारे यह दावा करते हैं कि पहले तो सहमति भगवा ध्वज पर ही थी, बाद में ही उसे बदलकर तिरंगा झंडा अपना लिया गया! दूसरे, वह यह सरासर झूठा दावा करते हैं कि कांग्रेस ने जब पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया, 'तो डाक्टर साहब ने सब शाखाओं से कहा कि हम लोग तिरंगे झंडे के साथ संचलन निकालें।' वास्तव में इसके सभी साक्ष्य मौजूद हैं कि संघ प्रमुख का स्पष्टï निर्देश था--अपने केसरिया ध्वज के साथ! इसी प्रकार, भागवत हिंदू कोड बिल की बहस के संदर्भ में डा. अंबेडकर को अनुमोदन के स्वर में उद्धृत तो करते हैं, लेकिन इस सचाई को छुपा जाते हैं कि आरएसएस, अंबेडकर द्वारा पेश किए गए हिंदू कोड बिल के सबसे उग्रविरोधियों में था और ठीक इसी तर्क से उसका विरोध कर रहा था कि यह, हिंदू धर्म पर हमला है।

महिलाविरोधी भी, ब्राह्मïणवादी भी  

वास्तव में सबरीमला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2018 के फैसले के पालन का, आरएसएस तथा उससे जुड़े अन्य संगठनों द्वारा ही नहीं, भाजपा राज्य इकाई द्वारा भी, हिंदू धर्म के विरुद्घ बताकर खुलकर जो विरोध किया जा रहा है, वह बताता है कि भागवत की मेकओवर की सारी कोशिशें अपनी जगह, आरएसएस और उससे संचालित संघ परिवार, परंपरागत रूप से वंचित रही हिंदू महिलाओं तथा अवर्ण जातियों के बराबरी के अधिकार तक स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, तब हिंदू-इतर धर्मों के मानने वालों के बराबरी के अधिकार स्वीकार करने का तो सवाल ही कहां उठता है। इससे उदारता तथा महिला अधिकारों की पक्षधरता के संघ के सारे दिखावे की कलई खुल जाती है। इसमें तीन-तलाक से पीडि़त मुस्लिम महिलाओं की चिंता का दिखावा भी शामिल है, जो वास्तव में संघ परिवार के लिए अपने मुस्लिमविरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक औजार भर है। यह दिलचस्प है कि महिलाओं के लिए आरएसएस के दरवाजे बंद ही होने के बचाव में भागवत 2018 में भी, आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार की यही दलील दोहराते नजर आते हैं कि संगठन के काम के लिए महिलाओं के बीच पुरुष जाएंगे तो उससे गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं। इसके अलावा, ''राष्टï्र सेविका समिति'' के रूप में महिलाओं के लिए अलग संगठन और 'माताओं-बहनों द्वारा प्रत्यक्ष संघ कार्य में भी महत्वपूर्ण सहायता किए जानेÓ की ही आड़ में, वह इस सचाई को छुपाने की ही कोशिश करते नजर आते हैं कि आरएसएस और संघ परिवार, मूलत: एक मर्दवादी संरचना है। भागवत महिलाओं के लिए ''सम्मान और स्वतंत्रता'' की बात तो करते हैं, लेकिन यह स्वतंत्रता खुद स्वतंत्र नहीं है और उसके ऊपर सम्मान को बैठा दिया गया है, जो स्त्री की स्वतंत्र एजेंसी का सम्मान नहीं है बल्कि एक पूरी तरह से मर्दवादी ढांचे से परिभाषित सम्मान है।

ठीक ऐसा ही मामला जातिक्रम पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का है। बेशक, गोलवलकर के सूत्रीकरणों के विपरीत, अब आरएसएस जाति व्यवस्था का सैद्घांतिक रूप से बचाव नहीं करता है। वह जाति व्यवस्था को हिंदू समाज की एक बुराई मानने के लिए भी तैयार है, हालांकि पुरानी भारतीय परंपरा में स्त्री की ही तरह निचली जातियों की भी अधिकारहीनता के लिए, मध्यकाल के मुस्लिम शासकों की ही जिम्मेदार ठहराता है, ताकि प्राचीन भारतीय समाज के महिमामंडन में कोई बाधा न पड़े। यहां तक कि भागवत के ताजा बयान से तो ऐसा लगता है कि आरएसएस ने अब आरक्षणों की व्यवस्था का अपना विरोध भी छोड़ दिया है। दो साल पहले ही बिहार के विधानसभा चुनाव के मौके पर 'आरक्षण की समीक्षा'की मांग करने वाले भागवत दिल्ली में अपने व्याख्यान में इसकी पैरवी करते दिखाई दिए कि आरक्षण कब तक चलता है, इसका फैसला वे तबके ही करें जिनके लिए यह प्रावधान किया गया है। बहरहाल, यह राजनीतिक कार्यनीति का ही मामला ज्यादा लगता है। वैचारिक स्तर पर आरएसएस न सिर्फ खुद को सवर्णों के साथ विशेष रूप से जोड़कर देखता है बल्कि जाति व्यवस्था के अंत के लिए, इस व्यवस्था से तथा इसमें ऊंची जातियों को दिए गए विशेषाधिकारों के खिलाफ, लडऩे की भी कोई जरूरत नहीं समझता है। उसके हिसाब से जाति व्यवस्था की मुख्य समस्या, इसमें निहित निचली जातियों का दमन नहीं, इसकी वजह से हिंदू समाज का विभाजन है। भागवत कहते हैं कि अंधेरे से लडऩे से तो अंधेरा बढ़ेगा ही। उसके सामने (हिंदू एकता की) 'और बड़ी लकीर खींच दो, अंधेरा खुद छंट जाएगा'। वास्तव में आरएसएस ने हमेशा 'दूसरों' से लडऩे के लिए सवर्णों को मजबूत करने के लिए ही, निचली जातियों का समर्थन जुटाना चाहा है। वर्ना महिलाओं की ही तरह अवर्णों की भी स्वतंत्र एजेंसी उसे मंजूर नहीं है।

आरएसएस और जनतंत्र

भारत की जनतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के दायरे में एक सामान्य संगठन के रूप में आरएसएस की स्वीकृत बढ़वाने के अपने इस उद्यम में भागवत का, उसकी जनतांत्रिक वैधता सिद्घ करने पर विशेष जोर रहा। इस क्रम में भागवत ने भारत के संविधान में अपनी पूरी निष्ठïा के संदिग्ध प्रदर्शन के अलावा, सरासर हवाई दावों तथा जुबान की सफाई के सहारे, कम से कम दो पहलुओं से, आरएसएस को लेकर लोगों की पूरी तरह से तथ्य-आधारित धारणाओं को भी झुठलाने की कोशिश की है। इनमें पहली धारणा का संबंध आरएसएस के अलोकतांत्रिक चरित्र से है, जिसकी अभिव्यक्ति उसके सांगठनिक ढांचे में भी होती है। यह आम जानकारी में है कि आरएसएस, आनुषांगिक संगठनों के साथ अपने संबंधों के मामले में ही मूलत: अलोकतांत्रिक नहीं है, वह अपने आंतरिक ढांचे में भी अलोकतांत्रिक है। आरएसएस सिर्फ एकचालकानुवर्तित्व यानी एक चालक के अनुकरण के सिद्घांत पर ही नहीं चलता है बल्कि उसका यह चालक यानी सरसंघचालक, किसी प्रकार से चुने जाने के बजाए, अपने पूर्ववर्ती सरसंघचालक द्वारा ही मनोनीत किया जाता है और खुद ही अपना कार्यकाल तय  करता है तथा अपना उत्तराधिकारी मनोनीत करता है। बहरहाल, भागवत ने नेतृत्व की इस निरंकुश व्यवस्था को भी यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की है कि संघ में सरसंघचालक के पास कोई वास्तविक शक्तियां हैं ही नहीं, वह 'केवल मित्र, गाइड एंड फिलासफर' है और वास्तविक शक्तियां तो सरकार्यवाह के पास होती हैं, जिसका हर तीन साल में विधिवत चुनाव होता है। इस दावे को खुद संघ के लोग भी शायद ही गंभीरता से लेंगे।

इसी प्रकार, भागवत ने यह दिखाने के लिए भी कोरी गप्प का सहारा लिया है कि आरएसएस में सभी स्वयंसेवकों की राय के आधार पर ही निर्णय लिए जाते हैं। झूठ के प्रयोग की अति करते हुए, वह यह हास्यास्पद दावा करने की हद तक चले गए हैं कि, 'सबसे लोकतांत्रिक पद्घति देखनी है तो संघ में आइए।' और ऐसा ही अविश्वसनीय दावा उन्होंने यह किया है कि, 'संघ का काम चलाने के लिए हम एक पाई भी बाहर से नहीं लेते हैं।' यह तब है जबकि इसके साथ वह बड़ी मुस्तैदी से और मौजूदा कानूनों की दलील देकर, इसका बचाव भी करते हैं कि आरएसएस को न तो एक संगठन के तौर पर रजिस्टर कराया गया है और न अन्य संगठनों के विपरीत उसे अपना ऑडिटशुदा जमा-खर्च हिसाब किसी शासकीय एजेंसी के सामने रखना होता है। वास्तव में एक संगठन के तौर पर आरएसएस की 'पारदर्शिता' का आलम तो यह है कि उसकी कोई सदस्य सूची तक नहीं है, जिससे वह कभी भी, किसी के भी करनी से अपना पल्ला झाड़ सकता है। रही बात 'पाई भी बाहर से नहीं लेने' की तो यह सचाई अब सब  के सामने आ चुकी है कि आनुषांगिक संगठनों के आरएसएस के लंबे चौड़े ताने-बाने का संचालन, 'बाहर' के पैसे से ही होता है और इसमें विदेशी चंदों का एक बड़ा हिस्सा भी शामिल है।

आरएसएस और राजनीति

भागवत का यह दावा तो और भी हास्यास्पद है कि आरएसएस का राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है, उसका किसी राजनीतिक दल के साथ कोई जुड़ाव नहीं है और उसकी शासन के निर्णयों में न कोई दिलचस्पी है और न वह इन निर्णयों को प्रभावित करने की कोशिश करता है। आज जब मोदी राज के साढ़े चार साल का अनुभव लोगों के सामने है, जहां राजनीतिक शासन पर ही नहीं, तमाम शासकीय तंत्र तथा तमाम सरकारी-अद्र्घ-सरकारी संस्थाओं पर भी आरएसएस अपना शिकंजा बहुत कस चुकी है, राजनीति तथा शासन के प्रति आरएसएस के उदासीन रुख तथा उसके सिर्फ 'भारतीय मूल्यों' के प्रसार तथा नागरिकों के संस्कार पर ही अपने केंद्रित रखने के पाखंड का कोई असर होगा, यह मानना मुश्किल है। यह संयोग ही नहीं है कि भागवत, भाजपा के आरएसएस का राजनीतिक बाजू होने के इस सबूत से इंकार तक नहीं कर पाए कि आरएसएस से सिर्फ भाजपा में ही सांगठनिक सचिव भेजे जाते हैं। हां! उन्होंने यह हास्यास्पद बहाना जरूर बनाया कि और कोई दल आरएसएस से ऐसी मांग करता ही नहीं है। जाहिर है कि भागवत की कक्षा में यह किसी ने नहीं पूछा कि भाजपा ही उससे ऐसी मांग क्यों करती है और अपनी सामान्य सांगठनिक प्रक्रिया से अलग,आरएसएस के भेजे सांगठनिक सचिवों को राज्य/ क्षेत्र इकाइयों में सर्वेसर्वा बनाकर क्यों बैठाती है? भागवत भी गोयबल्स के पक्के अनुयायी हैं, जो इस पर यकीन करते हैं कि कोई बड़ा झूठ बोलकर और सौ बार बोलकर, उसे लोगों से सच मनवाया जा सकता है।

इसीलिए, यह अचरज की बात नहीं है कि आरएसएस की उदारता के अपने सारे दिखावे के बावजूद, भागवत ने धर्मांतरण, लव जेहाद, राम मंदिर आदि से लेकर, गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग तक, उन तमाम ठोस मुद्दों पर भी संघ परिवार के उस आचरण का थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ का बचाव ही किया है, जो बढ़ते पैमाने पर हिंसा व तनावों का ही कारण नहीं बन रहा है बल्कि सत्ता पर संघ परिवार के नियंत्रण की पृष्ठïभूमि में, उसकी भूमिका के प्रति आम नागरिकों की और यहां तक कि आम हिंदुओं की भी चिंताओं को बढ़ा रहा है। जाहिर है कि सिर्फ भागवत की चिकनी-चुपड़ी बातों से लोगों की ये आशंकाएं दूर नहीं हो जाएंगी। मोदी सरकार के खिलाफ आम जनता के बढ़ते असंतोष की पृष्ठïभूमि में, जैसे-जैसे अगला चुनाव नजदीक आता जाएगा, वैसे-वैसे सत्ता पर संघ परिवार के नियंत्रण को बनाए रखने के लिए,  सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ज्यादा से ज्यादा जरूरी होता जाएगा और आरएसएस का उदारता का मुलम्मा उतरता जाएगा। ऐसा लगता है कि मेकओवर की भागवत की तीन दिन की कसरत भी, आरएसएस और संघ परिवार का मामूली सा मेकअप ही करा पायी है--एक बार मुंह धोया और चेहरा ज्यों का त्यों!   

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