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Sunday 22 Sep 2019

मुल्क के बंटवारे के दर्द को जीने और लिखने वाला साहित्यकार - सआदत हसन मंटो

उन दिनों फिल्मों में काम करने  के लिए पंजाबी लड़के ज्यादातर लाहौर जाते थे। लेकिन उनको तो फिल्मी अखबारों में काम करना था लिहाजा वे अमृतसर से मुंबई आ गए . .फिल्मी रिपोर्टिंग के साथ साथ फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी पकड़ लिया,  फिल्म लेखक के रूप में सफल नहीं हुए। शायद उनको मालूम भी था कि फिल्मी लेखक के रूप में वे सफल नहीं होने वाले हैं। जब असफल होने लगे तो फिल्मी लोगों ने उनसे कहानी लिखवाना बंद कर दिया।  आज की मुम्बैया जबान में कहें तो वे फ्लाप लेखक थे लेकिन उस दौर के बंबई के सबसे बड़े सितारों, श्याम और अशोक कुमार से उनकी गहरी दोस्ती थी। मुसीबतों को कभी भी अड़चन न मानने वाले महान कहानीकार ने कभी हार नहीं मानी। उनके नाम की एक नई फिल्म आयी है जिस में एक ऐसा संवाद है जो उनकी सारी बात को कह देता  है और वह संवाद हैै, जब उनका किरदार अपनी बीवी से कहता है कि, मैं आग बेचता हूँ सफिया ,आग। उसकी चिंगारियां दूसरों की राख में नहीं झोंक सकता। मेरी मुराद सआदत हसन मंटो से है जिनकी तुलना कभी फ्रेंच लेखक मोपासां से की जाती है तो कभी, रूसी लेखकों ताल्स्तॉय और चेखव से। फिल्म अभिनेत्री नंदिता दास ने मंटो नाम की एक फिल्म बनाई है। यह वही कथाकार है जिसकी उर्दू किताबें अभी थोड़े दिनों पहले तक पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के शरीफ घरों के बच्चों के हाथों में दिखने की मनाही थी। मैं मंटो हिन्दुस्तानी कहानीकार मानता हूँ, हां गरीबी में झुलसने, पागल होने और मरने के लिए वे पाकिस्तान चले गए थे।  अपनी जान से प्यारी बंबई को छोड़कर वे लाहौर इसलिए चले गए थे क्योंकि मुंबई शहर से उनके सारे मुस्लिम दोस्त पाकिस्तान जा चुके थे। वे जाना नहीं चाहते थे, लेकिन एक दिन उनके एक हिन्दू दोस्त ने कह दिया कि तुमको यहाँ कोई खतरा नहीं है, यहीं रहो लेकिन अगर तुम मेरे दोस्त न होते तो मैंने ही तुमको मारा डाला होता। इस बातचीत के बाद वे घर आये, अपनी बीवी और लड़कियों को साथ लिया और लाहौर चले गए। रोमांटिक और इंसानी रिश्तों की कहानियां लिखने वाला मंटो बंटवारे के दर्द को देखने के बाद एक ऐसा  इंसान बन गया जो बंटवारे की खूंरेजी के बाद तहस नहस हो रहे इंसानी रिश्तों का सबसे बड़ा कहानीकार है। बंटवारे की जो तफसील सरकारी किताबों में है, वह तो सरकारी आंकड़ेबाजी है, अखबारों में बंटवारे की भयानक सच्चाई भी मिल जायेगी लेकिन मंटों के यहाँ बंटवारे के दर्द की परतें एक के बाद एक खुलती जाती है, हैवानियत बेपर्दा होती रहती है और समझ में आने लगता है कि इंसान किस हद तक हैवान हो सकता है। उनके साहित्य को पढऩे से साफ नजर आ जाता है कि बंटवारे की नीचता को मंटो की कलम ने घेर रखा है और उसको वह आने वाली नस्लों के लिए एक विरासत के रूप में छोड़कर जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

नंदिता दास की फिल्म मंटो इसी महान कहानीकार की जीवनी का किस्सा बताने की कोशिश करती है। कहानी को इस तरह से बुना गया है कि उसमें मंटो की कुछ कहानियों के किरदार भी शामिल होते हैं क्योंकि मंटों की जिंदगी को उनकी कहानियों के बिना समझना नामुमकिन है। मंटो केवल 43 साल जिंदा रहे और इस जि़ंदगी में उन्होंने जो लिखा वह 22 कहानी संग्रह, एक उपन्यास, तीन निबंध संग्रह, कुछ रेडियो नाटक, कुछ फिल्मी कहानियां, दो जिल्दों में आत्मकथा के रूप में उपलब्ध है। नंदिता दास की फि़ल्म में मंटो का रोल नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी कर रहे हैं।

मंटो के काम को भारत और पाकिस्तान क्या पूरी दुनिया में सराहा गया है। इस फिल्म के बहाने मंटों के काम को एक बार फिर परखा जाएगा, समझा जाएगा और नए सिरे से मंटों फैशन में आ जायेंगे। उनके काम को एक बार फिर से समझने की जरूरत है। मंटो ने अपनी पहली कहानी 1931 में लिखी थी उसके बाद से 23 साल तक लिखते रहे .. वे पकिस्तान तो चले गए थे लेकिन अपने दूसरे वतन मुंबई को कभी भी अपने से बाहर नहीं निकलने दिया। वे जिंदगी भर खुद को 'चलता-फिरता बंबईÓ कहते रहे। बंबई में उन्होंने 'चंद रुपयों से लेकर हजारों और लाखों कमाए और खर्च किए' लेकिन अपने नए मुल्क  लाहौर में, उनकी हालत खस्ता थी। मंटो लिखते हैं कि  ''दिन रात मशक्क़त के बाद मुश्किल से इतना कमाता हूं जो मेरी रोजमर्रा की जरूरियात के लिए पूरा हो सके। ये तकलीफदेह एहसास हर वक्त मुझे दीमक की तरह चाटता रहता है कि अगर आज मैंने आंखें मींच लीं तो मेरी बीवी और तीन कमसिन बच्चियों की देखभाल कौन करेगा।

पाकिस्तान ने मंटो को बहुत ही दर्द दिया। वे विभाजन को कभी स्वीकार नहीं कर पाए। विभाजन के दर्द को इस विषय पर लिखी मंटो की कहानियां ही बिलकुल साफ बयान करती हैं। बहुत ही भारी मन से वे दो राष्ट्रों के सिद्धांत पर तंज करते हैं और कहते हैं कि , ''मुल्क के बंटवारे से जो इंकलाब बरपा हुआ, उससे मैं एक अर्से तक बागी रहा और अब भी हूं। लेकिन बाद में उस खौफनाक हकीकत को मैंने तस्लीम कर लिया''। लेकिन लगता है कि मंटो ने मुल्क के बंटवारे की हकीकत को कभी भी तस्लीम नहीं किया। तस्लीम करने वाले इकबालिया बयान के बाद के उनके लेखन में  इंसानी तकलीफों के जो झुण्ड के झुण्ड नजर आते हैं वे इस बात को नकारते  हैं। उनका कृतित्व विभाजन की त्रासदी की अनुभूति की तल्खी को कभी भी कम नहीं होने देगा। वे कहते तो हैं कि बंटवारे को तस्लीम कर लिया लेकिन 'तस्लीम करने ' के दावे के तुरंत बाद, अपने सियाह हाशिए  के वाक्यांशों में  विभाजन की खौफनाक हकीकत को फिर सामने ला देते है। सियाह हाशिये दहशत को एकदम सामने लाकर खड़ा कर देने वाली रचना  है। जब कुएं में लूटी हुई चीनी फेंकने गया भी आदमी चीनी के बोरे के साथ कुएं में गिर जाता है और बाद में उसकी लाश निकाली जाती है तो जाहिर है कि कुएं का पानी मीठा हो गया था। लेकिन वहां क्या होता है। मीठे पानी के कारण उस आदमी  की मजार पर दीये जलने लगे, यह अपने आप में दहशत का  साधारणीकरण है लेकिन दर्द के दायरे को बहुत ही विस्तृत बना देता है। करामात, गलती का सुधार, घाटे का सौदा, रियायत, हैवानियत, मिस्टेक ,सफाई पसंद ,साम्यवाद, हलाल और झटका ,ऐसे दस्तावेज हैं जो केवल और केवल मंटो की कलम से ही निकल सकते थे। यह छोटी कहानियाँ  'टोबा टेक सिंह' से कम अहम नहीं हैं ,हालांकि  टोबा  टेक सिंह  भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन के साहित्य का सबसे बड़े क्लासिक है. मंटो तकसीम के पागलपन को पहचानते हैं। लेकिन वे इस बात के भी गवाह हैं कि यह पागलपन खत्म होगा और उस बात को उनकी कहानी 'यज़ीदÓ में महसूस किया जा सकता है.,मंटो  तीस के दशक में मुंबई आये थे. ?िल्मी सपनों के शहर में अपनी रोटी कमाने के लिए उन्होंने संघर्ष किया। इस प्रक्रिया में वे स्वतंत्र पत्रकारिता के सिम्बल भी बन गए। बाद के वर्षों में जिसे संविधान के मौलिक अधिकारों वाले खंड में अभिव्यक्ति की आजादी कहा गया, उसको उन्होंने पूरी तरह से जिया। इसमें दो राय नहीं कि मंटो उर्दू कहानी के सबसे जबरदस्त  हस्ताक्षर हैं लेकिन उनकी फिल्मी पत्रकार के रूप में लिखी गयीं रिपोर्टें भी हमेशा ही मीडिया की स्वतन्त्रता की मिसाल के रूप में याद की जायेंगी। अपने समय के महानतम लोगों के बारे में मंटो ने जो लिखा है वह उस दौर में तो फिल्मी खबरें या डायरी आइटम रहे होंगे लेकिन आज वह हमारी विरासत का हिस्सा है . . अशोक कुमार और श्याम से उनकी बहुत ही अच्छी दोस्ती थी। अशोक कुमार अक्सर मंटो को अपनी कार में उनके घर तक छोड़ भी आते थे। एक बार मुंबई में दंगा हुआ था . . मुसलमानों के इलाके से गाड़ी जा रही थी। मंटो लिखते हैं कि एकाएक कुछ दंगाई सामने आ गए। दादा मोनी भी डर गए , मंटो तो खैर दहशत में थे ही। जब उन लोगों ने अशोक कुमार को देखा तो बिना कोई नुकसान पहुंचाये जाने दिया क्योंकि अशोक कुमार को मुसलमान अपना आदमी मानते थे। नरगिस के बारे में उनका वर्णन बहुत ही दिलचस्प है। उनकी पत्नी रफिया ने ऐसे ही नरगिस को फोन मिला दिया था, दोस्ती हो गयी। एक दिन नरगिस ने जिद किया कि अपनी सहेलियों से मिलने जाना है, नरगिस की माँ, जद्दन बाई ने अकेले नहीं जाने दिया। खुद साथ आयीं। लेकिन जब उनको पता चला कि यह तो मंटो का घर है तो उन्होंने कहा कि अगर मुझे मालूम होता कि बेबी तुम्हारे घर आ रही है... इस के बाद का जुमला मंटो ने पूरा किया और कहा तो आप न नाजिल होतीं। 

इतनी अजीबोगरीब शख्सियत के मालिक मंटो के बारे में नंदिता दास ने जीवनीनुमा फिल्म बनाने की कोशिश की है। यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म को किस तरह से स्वीकार किया जाता है लेकिन इतना तो तय है कि इस फिल्म के बहाने एक बार फिर सआदत हसन मंटो जैसे महान साहित्यकार के बारे में चर्चा शुरू हो जायेगी।