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Saturday 16 Nov 2019

समकालीन गज़़ल का एक अलग चेहरा

विनयमिश्र की गज़़लें प्रतिबद्धता, मूल्यनिष्ठता और व्यापक जन सरोकारों के लिए जानी जाती हैं। उनका सद्य: प्रकाशित गज़़ल संग्रह तेरा होना तलाशूं इस बात की तस्दीक करता है। पहले गज़़ल संग्रह सच और है से समकालीन गज़़ल के परिसर में उनकी जो पहचान बनी थी, इस संग्रह से वो और पुख्ता हुई है। समकालीन कविता के रूपाकारों में आज गज़़ल को सर्वाधिक समसामयिक, कारगर और प्रगतिशील विधा का दर्जा हासिल है। कुछ लोग समसामयिकता को ही समकालीन कहने में गुरेज नहीं करते जबकि दोनों में अन्तर है। समसामयिकता वर्तमान की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हलचलों का नाम है जबकि समकालीनता जीवन के बुनियादी सिद्धांत, समृद्ध परंपरा और उज्जवल विरासत की गंगोत्री से हमें जोड़ती है। इस लिहाज से विनय मिश्र की गज़़लें समकालीनता, रागात्मक सौम्यता और जनसंवादधर्मिता के निकष पर खरी उतरती हैं। इनमें जितना परम्परा के प्रति लगाव है उतना ही प्रगतिशीलता का आग्रह भी है। इस संकलन की गज़़लें परम्परा और आधुनिकता के बीच सेतु का निर्माण करती हैं।

वो रंजिश में नहीं अब प्यार में है,

मेरा दुश्मन नए किरदार में है

घरों में आज सूनापन है केवल

यहाँ रौनक तो बस बाजार में है (पृ.13)

अदब अपने वक्त का आईना हुआ करता है और शेरी अदब भी इस दायरे से अलग नहीं है। हर दौर में कवियों ने नए तथ्य, नए प्रतीक-बिंब तथा सामाजिक, राजनैतिक सरोकारों के नए फूल खिलाकर गज़़ल को नया रूप रंग दिया है। आज की गज़़ल भी अपने समकाल को पूरी ईमानदारी और प्रखरता के साथ व्यक्त कर रही है। समकालीन गज़़लें अपने प्रगतिशील तत्त्वों तथा कला की उदात्तता के कारण यदि हिन्दी कविता में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में कामयाब हैं तो इसके पीछे उनकी जनधर्मिता ही है। माक्र्स का कथन है- प्रत्येक कला के मूल में मनुष्य है, यदि नासमझी या चालाकीवश कोई भी कला मनुष्येतर व्यवहार करती है तो वह कला नहीं एक संहारक हथियार की तरह है। गज़़ल निश्चय ही एक कलात्मक विधा है जो बेहद शाइस्ता और महीन है। गज़़ल अवाम की मद्धम आवाज वाली मौसिकी है। उसका प्राण उसका आंतरिक संगीत है, संगीत का मतलब सिर्फ  रदीफ, काफिया से न होकर उसके भाव, अनुभाव और संवेदन की थरथराती लयात्मकता से है। इसलिए कहा गया है कि लय और संरचना की लयात्मक चेतना के बिना गज़़ल कहना असंभव है। ये कहा जाता है कि आज की हिन्दी गज़़लों में प्रेम की अनुभूतियाँ बहुत कम हैं। शायद हिन्दी गज़़ल के पास व्यक्त करने के लिए और जरूरी चिन्ताजनक विषय तथा सवाल मौजूद हैं लेकिन विनय मिश्र की गज़़लों में प्रेम की अनुभूतियों की उदात्त छवियाँ उनकी रचनात्मकता का एक ज़रूरी हिस्सा हैं।

सुकून दिल का इधर नहीं है सुकून दिल का उधर नहीं है

जिधर पड़ी है नजऱ हमारी उधर किसी की नजऱ नहीं है

 

तेरा चेहरा कहूँ या याद कोई

चला मैं धूप की तस्वीर लेकर

 

खुशबू में भीगी चि_ियाँ फिर याद आ गईं

भूली हुई कहानियाँ फिर याद आ गईं

ये कुछ गवाहियाँ हैं जिनसे गज़़लकार के दिल की प्रेमसिक्त खुशबू को पहचाना जा सकता है। गज़़ल खुशबुओं का सफर और गुफ्तगू का दिलकश अंदाज़ है। विनय मिश्र की गज़़लों में तर्ज़ेबयानी, अल्फाज़ की बुलंदी, तगज़्ज़ुल के रंग और शाइस्तगी के बेहतरीन शेड्स मिलते हैं। मेरे खय़ाल की तर्जुमानी के लिए कुछ शेर देखें-

मेरा चेहरा अगर मिल जाए मुझको

तो फिर गुम है जो आईना तलाशूँ।

 

हवा क्या कह रही है अपने सुर में

जरा सरगम मिला कर देखते हैं।

इस संग्रह की गज़़लों में हवा, धूप, मौसम, नदी, साहिल, परिंदे, समंदर, मंजिल, आईना, चेहरा, आकाश, तारे यानी चेतन तो चेतन, अचेतन वस्तुओं ने भी अश्आर का लिबास पहन रक्खा है। विनय मिश्र के यहाँ प्रकृति अपने अनूठे रंग और आभा के साथ उपस्थित है। यह प्रकृति के साहचर्य और उसके प्रति आत्मीयता से ही संभव हुआ है।

एक अल्हड़पन लिए पगडंडियों पर दौड़ती

आदिवासी बस्तियों की एक लड़की है नदी

 

यहाँ पेड़ों पर अब तो जर्द पत्ते भी नहीं दिखते

हरापन चाहिए मौसम बहुत बीमार लगता  है

प्रकृति के निरंतर हो रहे शोषण के खिलाफ उसकी नैसर्गिकता और हरापन बचाने की भी चिन्ता इस संग्रह की गज़़लों में दिखाई देती है। विनय मिश्र अपने समय की पूरी ईमानदारी और सजगता के साथ जाँच परख करते हैं, उसके सवालों से लोहा लेते हैं, जवाब के लिए जिद करते हैं और उसके अंतर्विरोधों को खोलते हैं और सलीके से अभिव्यक्त करते हैं। भ्रष्ट सियासत, पंगु व्यवस्था, अनय, असंगति, बाज़ार, भूमंडलीकरण सभी उनकी गज़़ल के दायरे में हैं। फ्लैप पर वरिष्ठ जनधर्मी समीक्षक पंकज गौतम ने ठीक ही कहा है - उनकी गज़़लों में पतनशील वर्ग की जहाँ निर्मम आलोचना है वहीं प्रगतिशील जनधर्मी मूल्यों के प्रति गहरा लगाव भी है। उनकी रचनात्मकता अपने युगीन यथार्थ का साक्षात्कार करने में सक्षम है।् इस संग्रह की समकालीन हिन्दी गज़़लें किसी भी प्रकार की बनावटी अलंकारिकता और चमत्कार से संयम बरतते हुए अपने पीछे की सम्पूर्ण सांस्कृतिक चेतना और वर्तमान की राजनैतिकता को आत्मसात कर आधुनिक जीवन-मूल्यों की सही पहचान-परख के साथ शिल्प और संवेदना की नई जमीन तैयार करती हैं। विनय मिश्र की गज़़लें तासीर, तेवर, अन्दाज़े बयां और बीनाई के बेहतरीन तानों बानों से बुनी हुई हैं। ये खुद अपनी अस्मिता की परिचायक हैं। कुछ शेर द्रष्टव्य हैं-

अँधेरा भूख  बेचैनी  उदासी

मेरी किस्मत में जो भी हो अता हो

 

उँगलियों  पर  है  समय  ई मेल का

दिल की दुनिया अब तो हाथों से गई

                          

मैं अजब चेहरों के जंगल में घिरा

सब करीबी थे कोई अपना न था

 

उस हवा के साथ घर भी हवा बदली

वक्त बदला तो सभी की भूमिका बदली

गज़़ल इशारे और किनारे से बात करने की कला है। गज़़ल में अद्भुत और शालीन संवादधर्मिता है फिर बात चाहे महबूब से हो या अवाम से। गज़़ल में घन गरज वाले अल्फाज़ की रसाई नहीं है। शायद इसीलिए गज़़ल लिखी नहीं कही जाती है। असगर वजाहत मानते हैं कि रचनाकार का बुनियादी सरोकार संवेदना के धरातल पर अंत:करण और बाह्य जगत से संवाद करना है। यह संवाद अमूर्तन में प्रवेश कर इब्हाम को जन्म देता है जिसे तहदारी भी कहा जाता है। गज़़ल में तू, मैं, तेरा, मेरा, हम, वो, जैसी संज्ञाएँ किरदार के रूप में अपनी भूमिका निभाती हैं। इससे संवाद सहज और संप्रेषणीय हो जाता है। फज़़ल ताबिश का एक शेर है- रेशा रेशा उधेड़कर देखो, रौशनी किस जगह से काली है।

यह जज़्बा, यह तड़प, यह तलाश विनय मिश्र की गज़़लों में नजर आती है।

जिन्दगी से जिन्दगी ऐसे अलग

एक घर में हों कई कमरे अलग

 

इक अदद उम्मीद लेकर मैं हूँ रातों के खिलाफ

रौशनी की जंग जारी है अँधेरों के खिलाफ

 

रंग जो भरते रहे कल तक गुनाहों में

आज शामिल हैं हमारे खैरख्वाहों में

 

छन्द का अनुशासन गज़़ल की महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य शर्त है। यह छंदानुशासन भाषा का भी अनुशासन है। हिन्दी गज़़ल के सामने यह दोनों चुनौतियाँ हैं। संवेदना और विचार के नाजुक संतुलन को अपनी गज़़लों में संयमपूर्वक साधने का कौशल विनय मिश्र के पास है। उनकी गज़़लों में सघन संवाद और एक प्रतिपक्ष का चेहरा हमेशा मौजूद रहता है। जहाँ तक इन गज़़लों की संप्रेषणीयता का सवाल है ये उर्वर ज़मीन पर पकी हुई फसल की मंजिल हैं, कविता पककर निकलेगी तो वह संप्रेषित होगी ही। अगर वह संप्रेषित नहीं होती तो समझना चाहिए कि उसके पकने में कहीं कोर कसर है। तेरा होना तलाशूँ की गज़़लें इस मामले में कामयाब हैं और हमें आश्वस्त करती हैं। युगीन यथार्थ को पूरी तेजस्विता के साथ व्यक्त करने में सक्षम ये जनधर्मी गज़़लें समकालीन गज़़ल की किताब में कुछ चमकीले पन्ने अवश्य जोड़ेंगी यह मेरा विश्वास है।