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Tuesday 15 Oct 2019

स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया

स्त्रीमुक्ति के विमर्श को कई नजरिए से परखा जा सकता है। काल की दृष्टि से इसे ऐतिहासिक, पौराणिक और समकालीन परिदृश्य के आधार पर परखा जा सकता है। अवधारणा की दृष्टि से इसे अलग प्रकार से परिभाषित कर सकते हैं। पुरुष अपने नजरिए से इसे परिभाषित करता है। जो स्त्री की आकांक्षा से भिन्न होता है। एक तरफ पारंपरिक विचारधारा को मानने वाले पुरुष परंपरा, धर्म और संस्कृति के नाम पर नारी स्थिति एवं स्तर को यथावत् कायम रखने की इच्छा रखते हैं तो दूसरी ओर कुछ मध्यमार्गी पुरुष थोड़ा आगे बढ़कर स्त्रियों को नौकरी करने, सभा-समारोहों में भाग लेने या अपनी बात रखने की रियायत देता है। परंतु आधुनिक बुद्धिजीवी पुरुष नारी के यौन-संबंधों, रिश्तों या स्वयं के विषय में खुद स्त्री को फैसला करने की रियायत सिद्धांतत: स्वीकार तो जरूर करता है, लेकिन जब उसे स्वयं उस पर अमल करना पड़े तो मुकरने लगता है।

मध्य युग की मानसिकता से आधुनिक मानसिकता, जिसमें नारी मुक्ति समाहित है, तक का सफर भिन्न-भिन्न देशों या एक ही देश के विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग स्तर पर पाया जाता है। कहीं स्त्री मुक्ति के काफी नजदीक पहुँची है, कहीं अभी तक गुलाम है, तो कहीं दोराहे-चौराहे पर खड़ी या अधर में लटकी है। मुक्ति या परिवत्र्तन ऐसे ही नहीं होता, न ही मुक्ति के रास्ते अकेले-अकेले चलकर मिलते हैं। इसके लिए सामूहिक और व्यक्तिगत, दोनों स्तर पर मुक्ति की इच्छा के साथ संघर्ष जरूरी है। मुक्ति तभी मिलती है जब उसकी जरूरत महसूस की जाती है। आज स्त्री-मुक्ति की जरूरत महसूसना या उसका अहसास जगाना (स्त्री और पुरुष दोनों में ही) इस मुहिम की सबसे बड़ी चुनौती है। दरअसल अभी तक स्त्री व पुरुष दोनों ने ही इस जरूरत को शिद्दत से महसूस नहीं किया, खासकर एशियाई समाज में।1

स्त्री-मुक्ति की राह में अभी लम्बा सफर तय करना बाकी है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। इस व्यवस्था की संरचना बड़ी ही चालाकी से की गई है और आज भी हो रहा है। इस ढाँचे का ताना-बाना बड़े ही बारीक ढंग से आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, वैधानिक, सांस्कृतिक व्यवस्था और मूल्यों-मर्यादाओं, संस्कारों, आदर्शों एवं चिंतन के विविध रूपों, विचारधाराओं, गतिविधियों के आधार पर किया गया है।

इस पितृसत्ता के कारनामे हैरतअंगेज हैं। इसके तरीके असीम व अवधि असीमित  हैं। इसने एक तरफ  स्त्री को घर की चहारदीवारी में कैद कर रखा है और इसके घरेलू श्रम का अवमूल्यन करता रहा है तो दूसरी ओर विभिन्न मान्यताओं और संस्कारों के जरिये शोषण के रूप को स्वभाविक और सहज ठहरा उसे सामाजिक मान्यता के रूप में स्त्री के मन-मस्तिष्क में स्थापित करने की भरपूर कोशिश करते आए हैं। इसी संदर्भ में वरिष्ठ नारीवादी कथाकार कृष्णा सोबती का कहना है- स्त्री-पुरुष का इस समाज में क्या खूब विभाजन है जिसमें मरदों के हिस्से महफिल, मुजरे, खेल-तमाशों और औरत के हिस्से बाल-बच्चे, तीज-त्योहार, पूजा-व्रत आदि।2

हम इस बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं कि स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर सचमुच परिवार और समाज में अपनी स्थिति परिवर्तित कर सकती है। जबकि सच्चाई यह है कि स्वयं के कमाए पैसे पर भी स्त्री को खर्च करने की पूर्ण आजादी नहीं है और उनके चेकबुक-पासबुक पतियों के पॉकेट में ही रहते हैं। नौकरी के दौरान कार्यस्थान पर उसे विभिन्न प्रकार के मानसिक, शारीरिक शोषण तथा यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है। हमेें यह नहीं समझ लेना चाहिए कि केवल आर्थिक स्थिति बदलते ही स्त्री में पूर्ण परिवर्तन हो जाएगा। यद्यपि मानव विकास क्रम में आर्थिक अवस्था एक आधारभूत तत्व है, जो व्यक्ति का नियंता है, किन्तु उसके बावजूद नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि व्यवस्थाओं में भी परिवर्तन की पूरी जरूरत है, जिनके बदले बिना नई स्त्री का आविर्भाव संभव नहीं होगा। आज तो यह समझ में आता है कि आधुनिक स्त्री अतीत और भविष्य के बीच टुकड़ों में बँटी हुई है। 3

स्त्री-मुक्ति के संबंध में जहाँ तक पूँजीवाद का प्रश्न है तो वह स्त्रियों को अवसर और आजादी प्रदान कराकर पितृसत्ता से झट से गठजोड़ भी कर लेता है और स्त्री श्रम को कम कर आँकता हैै। भूमंडलीकरण के प्रभाव स्वरूप पूंजीवाद और इसके कई उत्पादों ने एक स्तर पर स्त्री देह को आजाद करने में भूमिका निभाई है। वहीं दूसरे स्तर पर अपने हित और व्यावसायिक लाभ हेतु स्त्री-शरीर को एक 'आब्जेक्ट' के रूप में पेश करने की कोशिश की है। स्त्री देह की मुक्ति आवश्यक है। देह की आजादी पितृसत्तात्मक बंधनों, मूल्यों, मान्यताओं से होनी चाहिए न कि इस देह की सर्वोपलब्धता से।

स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति कामना के सर्मथकों पर यह आरोप लगाया जाता है कि इनका कोई देशी अस्तित्व व संस्कृति नहीं है। सच तो यह है कि जब से पित्तृसत्ता की जड़ें फैली हैं इसके प्रतिरोध में आवाजें भी उठती रही हैं। गार्गी, थेरीगाथा की स्त्रियाँ अंडाल, अक्क महादेवी, पंडिता रमाबाई, ताराबाई शिंदे, मीराबाई, सहजोबाई, सावित्रीबाई फूले, महादेवी वर्मा जैसी अनेक आवाजों में उनकी पीड़ा और प्रतिरोध शामिल है। पितृसत्ता का इन आवाजों को कुचलने और दबाने का कुचक्र विभिन्न स्वरूपों में देखा जा सकता है। यदि ऐसा नहीं होता तो 'सीमंतनी उपदे' जैसी स्त्रीवादी पुस्तक लेखिका अज्ञात न होती। पितृसत्ता से बगावत करने वाली महिलाएं हर मुल्क में हुई हैं। 19वीं सदी में चीन में जिउजिन, श्रीलंका में सुगला, ईरान में कुर्तउल ऐन, इंडोनेशिया में कर्तिनी सहित अनेक स्त्रियाँ हर देश में मिलेंगी। यूरोपीय महिलाओं को अपने राजनीतिक हक 'वोट देने का अधिकार' हेतु भी लंबी लड़ाई लडऩी पड़ी थी।

धर्म भी स्त्रियों के शोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी भी धर्म में जब तक स्त्रियों को बराबरी का हक नहीं मिलता, तब तक उस धर्म को लेकर आधी-आबादी में संशय की स्थिति बनी रहेगी। इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण गत वर्षों में अलग-अलग घटनाओं में विभिन्न धर्मगुरुओं के काले कारनामों के खुलासे से हुआ। इन्होंने धर्म की आड़ में बच्चियों एवं महिलाओं के भावनाओं के साथ-साथ यौन-शोषण भी किया था।

दरअसल धर्म और धर्मग्रंथों की व्यवस्था की आड़ में महिलाओं को उनके हक से दूर रखा जाता है। किसी भी धर्म में जब तक स्त्रियों को बराबरी का हम नहीं मिलता और पितृसत्ता कायम रहती। तब तक इस धर्म को लेकर आधी आबादी के मन में संशय बना रहेगा। यह संशय किसी भी धर्म हेतु उचित नहीं है। 4

सदियों से समाज में सामंती मानसिकता के कारण किसी भी जाति, वर्ग या समूह की स्त्री जन्म से ही अपने को असहाय और अबला समझकर पुरुषवादी मानसिकता का शिकार होती रही है। स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि जब तक महिलाएँ स्वयं अपने विकास के लिए आगे नहीं आएंगी तब तक उनका विकास असंभव है। सामाजिक रूढिय़ों और परंपराओं के जाल में जकड़ी स्त्रियाँ अपने अधिकार और अस्मिता के प्रश्न को लेकर जूझती नजर आती हैं।

स्त्री की स्थिति भी युगों से ऐसी ही चली आ रही है। उसके चारों ओर संस्कारों का ऐसा पहरा रहा है कि उसके अंतरतम जीवन की भावनाओं का परिचय पाना ही कठिन हो जाता है। वह किस सीमा तक मानवी है और उस स्थिति में उसके क्या अधिकार रह सकते हैं, यह भी वह तब सोचती है जब उसका हृदय बहुत अधिक आहत हो चुकता है।5

वास्तव में देखा जाय तो स्त्रियों की स्वयं की सोच भी उनकी वास्तविक स्थिति के लिए कारक है। विशेषकर यौन स्वतंत्रता, स्त्री-देह अथवा घर-परिवार के दायरे को लेकर। इन महिलाओं के भी तीन वर्ग हैं। पहला वर्ग उन स्त्रियों का है जो स्त्री-स्वतंत्रता की परिभाषा, परंपरा को कायम रखते हुए विशुद्ध नैतिकतावादी ढंग से अपनी दुनिया और जीवन जीने में विश्वास रखती हैं। दूसरा वर्ग वह है जो घर-परिवार की सीमा से बाहर कैरियर की नई-नई उचाइयाँ छूकर उपलब्धियों का ढेर लगाना चाहती हैं। तो तीसरा वर्ग उन स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करता है, जो परंपरा, नैतिकता, परिवार और सामाजिक रूढिय़ों को धता बताकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को उद्देश्य बनाकर जीने का ढंग और शर्तें स्वयं निर्धारित करती है।

बहरहाल स्त्री-अस्मिता और उसके अधिकार का प्रश्न केवल नारी प्रश्न नहीं बल्कि संपूर्ण मानवता का प्रश्न है। पुरुष सांस्कृतिक सत्ता ने स्त्री को वह सामाजिक सुविधा नहीं दी, जो कि पुरूष को परंपरा में मिलती रही है। स्त्री ने एक जीव के रूप में जन्म तो लिया, मगर इसके बाद पुरुष की सभ्यता और सत्ता पर अपनी मान्यताएँ ही नहीं, सब कुछ समर्पित करती रही।6

इस स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया को साकार करने हेतु अभी काफी संघर्ष करना होगा। लगभग पूरी पितृसत्ता की व्यवस्था ही बदलनी होगी। इस मुक्ति कामना की आग अपने अंदर निरंतर जलाए रखना होगा और इसे रोज अचेतन में भी स्वप्न के रूप में जीवित रखना होगा। कवि अरुण कमल की यह कविता 'स्वप्नÓ को आत्मसात कर लेना होगा:

वह बार-बार भागती रही

बार-बार हर रात एक ही सपना देखती

ताकि भूल न जाए मुक्ति की इच्छा

मुक्ति ना भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न

बदले ना भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न।

संदभर्:-

1. स्त्री मुक्ति: संघर्ष और इतिहास, रमणिका गुप्ता, पृ.22

2. दिलो दानिश, कृष्णा सोबती।

3. स्त्री उपेक्षिता, प्रभा खेतान, पृ.343.

4. अनंत विजय, टेलीविजन पत्रकार, हिन्दुस्तान (राँची), 22 मार्च, 2017।

5. महादेवी वर्मा, शृंखला की कडिय़ाँ, पृ.92

6. औरत अस्तित्व और अस्मिता, अरविंद जैन, पृ.14.