Monthly Magzine
Monday 21 Oct 2019

एक वो भी दिवाली थी

रामम-रावण युद्ध की इस कथा से हम सभी परिचित हैं कि लंकापति रावण का वध राम ने लंका में उसकी ही धरती पर किया था। अश्विन माह की अमावस को रावण वध हुआ था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार इसके तत्काल बाद राम ने विभीषण का लंका में राज्याभिषेक करवाया किंतु विभीषण के लाख आग्रह पर भी वे उनसे थोड़ी भी सेवा ग्रहण करने तैयार नहीं हुए ...समय पर उन्हें भाई भरत के पास पहुंचने की चिंता जो थी! वे कहते हैं-इस समय सत्य का आश्रय लेने वाले धर्मात्मा भरत मेरे लिये बहुत कष्ट सह रहे हैं, अत: अब तुम ऐसी व्यवस्था करो कि हम किसी तरह शीघ्रातिशीघ्र अयोध्या लौट सकें।(यु.कां.121.5) तब विभीषण पुष्पक विमान बुलवाते हैं जो राम को वनवास की अवधि पूरी होने के एक दिन पूर्व ही अयोध्या के निकट भरद्वाज मुनि के आश्रम में पहुंचा देता है। उसी दिन राम अपने आने की सूचना हनुमान के द्वारा भरत के पास भिजवाते हैं , साथ ही कहते हैं -यह बात सुनकर भरत की जैसी मुख-मुद्रा हो, उनकी जो चेष्टाएं हो ,उस पर ध्यान रखना और उन्हें समझना तथा भरत का मेरे प्रति जो बर्ताव हो उसको भी समझने का प्रयास करना...'तत्वेन मुखवर्णेन दृष्टया व्याभाशितेन च' अर्थात् उनके मुख की कांति ,दृष्टि और बातचीत से उनके मनोभावों को समझने की चेष्टा करना। '(यु.कां.125.15) वस्तुत: श्रीराम यहां जानना चाहते थे कि इन 14 वर्षों में भरत कहीं बदल तो नहीं गये...राज्यलक्ष्मी ने कहीं उन्हें आकर्षित तो नहीं कर लिया । यहां राम एक बड़ी व्यावहारिक बात कहते हैं-

सर्वकामसमृ़द्धं हि हस्त्यश्वरथसंकुलम्।

पितृपैतामहं राज्यं कस्य नावर्तयेन्मन:।। (यु.कां.125.16)

अर्थात् समस्त मनोवांछित भोगों से संपन्न तथा हाथी,घोड़ों और रथों से भरपूर पितरों का राज्य सुलभ हो तो वह किसके मन को पलट नहीं देता?  

वैसे भरतलला के प्रति रामभद्र के ये वचन कुछ कठोर एवं निर्दय से लगते हैं किंतु ऐसा नहीं है। राम एक सामान्य व्यवहार को ध्यान में रखकर ही इसे कहते हैं। यह कहते हुए उनके मन में भरत के प्रति निश्चय ही कोई दुर्भावना नहीं थी। आगे वे कहते हैं-भरत यदि कैकेयी की संगति से अथवा चिरकाल तक राज्य-वैभव के संसर्ग में होने के कारण स्वयं ही राज्य पाने की इच्छा रखते हों तो प्रसन्नतापूर्वक नि:शंक होकर समस्त भूमंडल का शासन करें। मुझे उस राज्य को नहीं लेना है। (यु.कां.125.17)

(परवर्ती रामकाव्यों में राम के मन की ऐसी किसी चिंता का उल्लेख लगभग नहीं है। मराठी रामायण रामविजय में श्रीधर राम के भरद्वाज आश्रम में एक दिन रुकने का अन्य कारण बताते हैं। यहां राम हनुमान से कहते हैं कि भरद्वाज ऋषि के प्रेम के कारण ही हम आज यहां रह गये। अत: शीघ्रता से आगे जाकर भरत को हमारे आने का समाचार दो-राम वि. 35.82 । संस्कृत नाटक अनर्घराघव में रावण-वध के बाद ही राम हनुमान को अयोध्या भेज देते हैं। यहां लंका से लौटते समय हनुमान को पुष्पकविमान में न पाकर सीता आश्चर्यपूर्वक पूछती हैं कि  किष्किंधानाथ के सेना के नायक तथा रघुकुल के दु:खहर्ता हनुमान कहां हैं? इस पर राम बताते हैं,'रावण-वध के पश्चात् मैंने रविबिंब में पिताश्री को देखा था। उनकी आज्ञा से राज्याभिषेक की तैयारी को प्रस्तुत करने के लिये मैंने हनुमान को पहले ही अयोध्या भेज दिया है। -7.11)

अस्तु, वाल्मीकि के अनुसार विप्र-वेश में हनुमान अयोध्या पहुंचते हैं। नंदीग्राम में हनुमान भरत को  प्रतिक्षण ,प्रतिपल मानों संास रोककर अग्रज के आगमन की राह देखते पाते हैं! हनुमान से मिलकर, उनसे राम के आगमन का समाचार सुनकर,भरत वैसे ही हर्षित होते हैं जैसे पानी के लिये तरसती तपती हुई धरती को वर्षा की बंूदें मिली हों! इस शुभसमाचार के बदले हनुमान को क्या दूं ,हर्षातिरेक में वह यह समझ ही नहीं पाते हैं। चौदह वर्ष बाद मिले इस आनंद की अमृतवर्षा से स्वयं को सिंचित देखकर वे कह उठते हैं,'जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि' अर्थात् यह कहावत सच है कि मनुष्य यदि जीता रहे तो उसे कभी न कभी हर्ष और आनंद की प्राप्ति होती है, भले सौ वर्ष बाद हो (यु.कां.126.2)।

और फिर भरत ने सारी अयोध्या को दुल्हन की तरह सजवाया। अपने मंत्रियों एवं नगर के प्रतिष्ठित नागरिकों को राम की अगवानी हेतु साथ चलने का निमंत्रण दिया। अयोध्या के सारे नागरिक सज-धज कर उनके साथ आये। अग्रज की जिन पादुकाओं को चौदह वर्ष पूर्व अश्रुपूर्ण आंखों से चित्रकूट से लाकर अवध के राजसिंहासन पर स्थापित किया था ,उन्हीं पादुकाओं को स्वयं अपने मस्तक पर धारण कर कुमार भरत पुन: अश्रु छलकाते हुए शंखों और भेरियों की गंभीर शुभध्वनि के साथ राम के स्वागत हेतु चल पड़े। पर कितने अलग थे आज के अश्रु 14 वर्ष पूर्व बहे अश्रुओं से! वाल्मीकि या तुलसी ने इस पर कुछ लिखा तो नहीं है पर सहृदय पाठक स्वयं इसका अनुमान कर सकते हैं।

अस्तु, राम-मिलन हेतु बड़े उतावले थे भरतलला...इसीलिये राम के आगमन का कोई चिह्न न देख क्षण भर में ही वे विकल हो उठे। रहा नहीं गया तो हनुमान से बोल पड़े-ऐसा तो नहीं कि आपने भ्राता राम के आने की मिथ्या समाचार दिया हो? वानरों का चित्त चंचल होता है। कहीं आपने प्रभु के आने की झूठा समाचार तो नहीं उड़ा दिया। मुझे तो कहीं राम के दर्शन नहीं हो रहे हैं (127.24)?   

किंतु फिर अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी भरतलला को। थोड़े ही पलों में उन्होंने नीलगगन में प्रात:कालीन सूर्य के समान प्रकाशित पुष्पक विमान को आते देखा जिसमें सीता और लक्ष्मण के साथ उनके आराध्य बैठे थे...और फिर, 'राम आ गये...राम आ गये...राम आ गये...',अयोध्यावासियों का यह हर्षनाद मानों अम्बर तक पहुंचने लगा। अब संदेह का तनिक भी अवकाश नहीं था। प्रभु साक्षात् भरत के सामने खड़े थे! हर्षित भरत ने बड़े विनीत भाव से उन्हें प्रणाम किया। इस पर श्रीराम ने उन्हें खींचकर विमान पर चढ़ा लिया, हृदय से लगाया और फिर गोद में बैठा लिया...अखिर वे भी तो कब से इस क्षण की प्रतीक्षा में थे! 

फिर भरत ने श्रीराम की उन रत्नजटित स्वर्ण चरणपादुकाओं को विनयपूर्वक अपने हाथों से श्रीराम के पैरों में पहनाया जो अब तक अयोध्या के राज्यसिंहासन पर विद्यमान थीं, साथ ही बद्धांजलि हो कहा-प्रभो! आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ। मेरे पास धरोहर के रूप में रखा हुआ सारा राज्य मैं आज आपके श्रीचरणों में लौटा रहा हूं। आप राज्य का खजाना, कोठार एवं सेना देख लें, 'भवत: तेजसा सर्वं कृतं दशगुणं मया' अर्थात् आपकी कृपा से मैंने सबको दस गुणा कर दिया है। कृपया इसे स्वीकार करें।

तदन्तर शुभ-मुहूर्त में श्रीराम का बड़े धूमधाम से भरत ने अवध की राजगद्दी पर अभिषेक करवाया। इस अवसर पर राम ने लक्ष्मण को युवराज पद देना चाहा किंतु लक्ष्मण ने यह पद स्वीकार नहीं किया। यद्यपि लक्ष्मण ने राम के साथ पूरे 14 वर्ष तपस्या की थी किंतु संभवत: भरत की तपस्या के आगे वे स्वयं अपनी तपस्या को तुच्छ समझते थे इसलिये 'ततोऽभ्यशिंष्द् भरतं महात्मा' अपने स्थान पर भरत का युवराज पद पर अभिषेक करवाया। (ओडिय़ा विचित्र रामायण के अनुसार  लक्ष्मण ने युवराज पद यह सोचकर स्वीकार नहीं किया कि कहीं लोग यह न कहें कि इसीलिये ये राम के साथ वन गये थे। तब राम ने भरत को मंत्री पद सौंपा। यहां भरत राम से विनय करते हैं कि सुमंत्र तथा आठ मंत्रियों को भी सरोपा प्रदान करें-छांद 82।)

तो ऐसा है हमारे प्रणम्य भरतलला का उज्जवल चरित्र!

वाल्मीकि के इस बालिश व्यक्तित्व के साथ तुलसीदास के यहां भी पूरा-पूरा न्याय किया है। यद्यपि विनम्रतापूर्वक उन्होंने भरतचरित्र को कविकुल अगम बताया है पर स्वयं उनकी लेखनी इस चरित्र को लिखकर कितनी निखरी है ,यह मानस को पढऩे वाला ही जानता है। अस्तु मानस में राम भरद्वाज के आश्रम में पहुंचकर हनुमान को अपने आने की सूचना भरत को देने तत्काल अयोध्या भेजते हैं ,यह कहते हुए कि भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु।। इधर चौदह वर्ष के आखिरी दिन का पूर्व दिन भरत के लिये मानो सरक ही नहीं रहा था। यद्यपि उनके शुभसूचक दाहिने अंग फड़ककर शुभ समाचार के आगमन की सूचना दे रहे थे पर मन जैसे सहसा विश्वास ही नहीं कर पा रहा था कि सचमुच प्रभु आ रहे हैं!...कहीं उन्होंने कुटिल जानकर मुझे भुला तो नहीं दिया होगा! मेरी करनी ही ऐसी है जिससे सौ कल्पों तक मेरा निस्तार नहीं है। किंतु शुभ-लक्षण भरोसा दिला रहे हैं कि राम अवश्य आएंगे ,पर कब? यदि अवधि बीत गई और फिर भी मेरे प्राण शरीर में ही रहे तब क्या होगा? तभी विरह-समुद्र में डूबते भरत के मन को बचाने के लिये मानो हनुमान नौका के रूप में प्रगट हुए। कानों में अमृत घोलते शब्द सुनाई पड़े-

जासु विरहं सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पांती।।

रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।।

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।।( मानस,उ.कां. 5.2)

यह सुखद समाचार देने वाले का परिचय जान भरत ने उन्हें गले लगा लिया। संसार भर की निधि देकर भी वे हनुमान के उऋण नहीं हो सकते थे। नीर-नयन से उन्होंने हनुमान से पूछा-

कहु कपि कबहुं कृपाल गोसाई। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।

हनुमान समझ गये कि ये प्रभु के प्रिय भाई हैं, जिनका गुणगान करते स्वयं रघुबीर नहीं थकते, ये इतने विनीत और पुनीत क्यों न होंगे।

अंतत: प्रतीक्षा की घडिय़ां समाप्त हुई। थोड़ी देर बाद ही भरत राम के चरणों में थे। राम उन्हें हृदय से लगाने विकल थे पर भरत थे कि परे भूमि नहिं उठत उठाए। तब बलात ही उठाकर राम ने उन्हें गले से लगाया। यहां तुलसी कहते हैं कि दोनों भाइयों के मिलन की उपमा क्या दूं? प्रभु मिलन अनुजहि सोह मो पहि जाति नहिं उपमा कही..किंतु कविशिरोमणि तुलसी भला इस सुंदर दृश्य को बिना उपमा के यूं ही छोड़ देते!..सच तो यह है कि उपमाएं चेरी बनी हमेशा उनकी कलम की नोंक पर रही है...यहां भी उन्हें एक सुंदर उपमा मिल गई। वे लिखते हैं जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले वर सुषमा लही...मानों प्रेम और श्रंृगार शरीर धारण कर मिले और श्रेष्ठ शोभा केा प्राप्त हुए।   

हर्ष और रुदन से भरा यह मिलन-समारोह समाप्त होने के अनंतर राम के राजतिलक की तैयारी का समय आया। राम ने वनवासी का चोला उतार कर राजसी वस्त्र पहने...पर सर्वप्रथम उन्होंने अपने भाइयों को स्नान करवाया...भाइयों में भी सबसे पहले उन्होंने स्वयं अपने हाथों भरत की जटाओं को सुलझाया। कितना पवित्र रहा होगा वह क्षण जब राम ने यह कार्य किया होगा! भरतलला धन्य हुए। तुलसी सच ही कहते हैं-भरत भाग्य प्रभु कोमलताई सेश कोटि सत सकहिं न गाई।।    

वैसे अन्य रामायणकारों ने भी इस राम-भरत मिलाप के दृश्य को सजीव बनाने का सुंदर प्रयत्न किया है। आइये कुछ ऐसे ही दृश्य देखें।

तमिल कवि कंबर के अनुसार अयोध्या से लौटते समय राम भारद्वाज मुनि के आश्रम में एक दिन रुकते हैं क्योंकि वे भारद्वाज के आतिथेय को नहीं टाल सकते थे किंतु उनके मन में भरत के लिये चिंता बराबर थी। उन्हें शंका थी कि कहीं उन्हें देर होता देख भरत आग में न कूद पड़े...इसलिये वे हनुमान को पहले भेजते हैं, यह कहते हुए कि यदि उन्होंने आग लगा ली हो तो आग बुझा देना। यहां वे चिंहारी हेतु हनुमान को अपनी अंगूठी भी देते हैं (यु.कां.4088)।

सचमुच राम को न आता देख भरत आग में कूदने की तैयारी करने लग गये थे। शत्रुघन को वे कहते हैं -समय बीत गया है। मैं अब प्राण त्याग करूंगा। तुम राजा बनोगे। शायद राम सोचते हो कि भरत को राज्येच्छा होगी...इसलिये नहीं आ रहे हैं। यह सुन शत्रुघन ने कर्ण ढंाक लिये। ऐसे क्षुब्ध हो गये मानो किसी ने विष खिला दिया हो, बोले-भाई! मैंने आपका क्या अपराध किया है जो मुझे राजा बनने कह रहे हो? राजा के पीछे उनकी रक्षा करने गया ,वह छोटा सहोदर था। अभी जो प्रभु के लौट आने की अवधि बीत चुकी है सोचकर, जो प्राण त्यागने तैयार है, वह भी छोटा सहोदर है, पर मैं भी तो एक छोटा सहोदर हूं! क्या मैं निर्लज्ज होकर राज्य करूं! यही बात है न? ज्येष्ठ के वनगमन के बाद आपने समृद्धनगर में रहना अपमान की बात होगी, यह सोचकर तपोवन से नंदीग्राम को आवास बनाया, क्या यह सोचकर कि मेरे बाद शत्रुघन राजा रहेगा? यही मुझ दास के संबंध में विचार था न आपका (वही,4109-11)? इस पर भरत समझाते हैं कि श्रीराम मेरे कारण ही विलंब कर रहे हैं...मैं नहीं रहूंगा तो वे तुरंत आकर राजकार्य संभाल लेंगे...इसलिये जाओ मेरे अग्निप्रवेश की तैयारी करो(वही, 4111)। और फिर सबके मना करने पर भी भरत आग में प्रवेश करने जा रहे थे...तभी किसी ने आकर आग को बुझाते हुए उच्चस्वर में कहा- प्रभु आ गये! राम आ गये ! यदि आप अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देगें तो क्या प्रभु जीवित रहेंगे? आप जल्दी कर रहे हैं ,अभी चालीस घडिय़ां बाकी है। यदि मैं झूठा साबित हुआ तो आपसे पहले अग्नि में प्रवेश करूंगा। ...यह हनुमान थे। भरत को और अधिक विश्वास दिलाने के लिये हनुमान ने राम की अगूंठी भी दिखाई। तब कहीं भरत शांत हुए।

संस्कृत में रचित आनंद रामायण में भी राम के आने का लक्षण न देख भरत आत्मदाह हेतु चिता सजाते हैं और शत्रुघन से कहते हैं-मुझे लगता है कि रावण ने युद्ध में राम व लक्ष्मण को मार डाला है। इसी कारण वे अब तक नहीं लौटे हैं। इसीलिये मैंने सब राजाओं को सेना सहित लंकेश के साथ युद्ध हेतु बुलवा भेजा है। आज सूर्यास्त तक मैं चिता में प्रवेश करूंगा। तब तुम हम तीनों भाइयों का अंतिम संस्कार कर सीता को छुड़ा लाना (सारकांड 12.65-70)। शारदादासकृत ओडिय़ा बिलंका रामायण में राम अपने आने का भरत को कोई समाचार नहीं भेजते। सरयू के तट पर संध्या समय पहुंच कर वे वहीं रुक जाते हैं। लक्ष्मण से वे कहते हैं ,'अयोध्या जाने में मेरा मन संकुचित हो रहा है। तुम राजा से हमारे आने का समाचार देने जाओ। माता से कहना कि यदि राजा का स्नेह होगा तभी मैं अयोध्या आऊंगा।' इस पर लक्ष्मण क्षुब्ध हो बोल उठते हैं ,' आप ऐसे दुर्बुद्धिपूर्ण वचन क्यों कह रहे हैं? आप अयोध्या के राजा है। आपको शीघ्र अयोध्या चलना चाहिये।' राम अधिक कुछ न कहकर वही रेत में शयन करते हैं। इधर कौशल्या चौदह वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने पर भी राम के अब तक न आने से परेशान थीं। उन्होंने गुरु वशिष्ठ से अपने मन का दर्द कहा। तब उन्होंने ध्यान लगाकर दिव्य चक्षु से देखकर बताया कि राम सीता सहित सरयू तट पर पहुंच चुके हैं। ...और तब भरत माताओं तथा अयोध्यावासियों के साथ राम की अगवानी हेतु निकल पड़े। किंतु भरत को सैन्यवाहिनी के साथ आते देख लक्ष्मण कहते हैं कि भरत अवश्य युद्ध हेतु रहे हैं। आप आज्ञा दीजिये मैं आज भरत को सेना सहित मार डालूंगा। इस पर राम कहते हैं कि यदि भरत हमें यहां से भगाना चाहते हैं तो कोई बात नहीं, मैं जानकी के साथ पुन: वनप्रांत में चला जाउंगा। तुम भरत की सेवा में रहना यदि तुम्हारे साथ झगड़ा हो तो मेरे पास आ जाना। ...किंतु ऐसा नहीं करना पड़ा। भरत सादर उन्हें अयोध्या ले गये (पूर्वखंड पृ.2-7)। उल्लेखनीय है कि बिलंका रामायण में अन्य रामायणों के समान चित्रकूट में भरत के आने का वर्णन नहीं है जहां लक्ष्मण भरत के प्रति संदेह करते है,तब राम उन्हें ऐसा करने से बरजते हैंं।  

अस्तु, प्राय: सभी रामायणों में अयोध्या पहुंचे राम का भरत अश्रुपूर्ण हृदय से स्वागत करते हैं तथा उन्हें अयोध्या के राजसिंहासन पर आसीन कराते है ...और तभी उन्हें चैन मिलता है। चौदह वर्ष के वनवास के बाद लंकापति रावण का संहार कर सीता और अनुज सहित लौटे राम का स्वागत जाहिर है कि अयोध्यावासियों ने भी भरत के समान ही उत्साह से किया होगा...घर घर दीपक जलाये होंगे...मिठाइयां बांटी होंगी। उल्लेखनीय है कि हम भारतवासी सदियों से इस दिन की सुखद स्मृति को ही दीपावली के रूप में मनाते आ रहे हैं।

(लेखिका सेवानिवृत प्राचार्य हैं। उन्होंने भारत सरकार के संस्कृति विभाग के सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत रामायण पर शोधकार्य किया है।)