Monthly Magzine
Tuesday 23 Oct 2018

अब तक किसी नहीं सुनी

अब तक किसी नहीं सुनी

तितलियों के पीछे

अब भागने को मन नहीं करता

कोयल की कूक,भौरे की गुंजन

कुछ भी नहीं भाता

पतझड़ के इस मौसम में

बसंत बहारों के गीत कैसे गाऊं।

 

संक्रमण काल के इस विषम दौर में

फटासी शब्दों के चक्र बनाकर

नहीं थपथपाना चाहता हूं अपनी पीठ।

 

मैं उन अभिव्यक्तियों के साथ रहना चाहता हूं

जिससे महसूस किया जा सके

किसी के भूख की तड़प को,

मैं उनके दर्द में शामिल होना चाहता हूं

जिनसे छीना गया रोटी का हक

जिनके अरमान महलों में कैद है

सर पर जिनके छत तक नहीं है,

मैं भी जलना चाहता उन बहुओं के साथ

जो दहेज के दावानल में जला दी जाती हंै।

मैं उन बेबी हालदारों का दर्द

दुनिया के सामने लाना चाहता हूं

जिनको अब-तक कोई प्रबोध कुमार नहीं मिला।

 

मैं उन सारी संवेदनाओं में विलीन हो जाना चाहता हूं

और लिखना चाहता हूं

कुछ कविताएं उनके लिए

जिनके चीखों की गूंज

अब तक किसी ने नहीं सुनी।