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Friday 14 Dec 2018

सपने और भी हैं बहुत

सपने और भी हैं बहुत

जिंदगी के सुंदर सपनों से भरी हैं मेरी आंखें

आंखों से निकल कर ये अब

रोशनी की तरह बाहर धरती पर फैलना चाहते हैं

गुलमोहर की तरह खिलना चाहते हैं

लेकिन मेरे आसपास निर्मित होती दुनिया में

लहूलुहान चेहरों का भयावह दृश्य है।

मेरे सपनों को नष्ट करने की

जैसे रची जा रही है राजनीतिक साजिश

सभी शासकों के पास होता है यह दिमाग

मेरे साथ करोड़ों लोग हाथ, पांव, आंख, नाक,

जुबान, हृदय की तरह जुड़े हैं

उनमें और मुझमे एक-सी बेचैनी

एक-सी तड़प और गुस्सा भी।

हिंसा और तनाव में जी रहे लोग

उनकी चेतना में दबी हैं असंतोष की चिनगारी

आग और धुएं में घुट रहे प्रतिदिन।

लेकिन सड़कों पर उतर कर विरोध क्यों नहीं करते

क्या उनकी स्वतंत्रता छीन ली गयी है

या फिर उन्हें पुलिस के डंडे सेे दबाया जा रहा।

मैं जानता हूं तख्तापलट राजनीति से

दिल्ली हमेशा भयभीत रहती है

गांव-गली-मुहल्ले की आवाजें 

संसद की दीवारों से जा टकराती हैं

और पूरी दिल्ली में अशांति छा जाती है।

मेरे ये दुख, दर्द, पीड़ा के सपने

उनको बहुत बेचैन करने लगे हैं

जिनका साम्राज्य झूठ और लूट

हत्या और दंगे के खंभे पर टिका है

और जो चाहते हैं लोकतंत्र की कुर्सी पर बैठ कर

पूरे देश को एक कत्लखाने में बदल डालना

जादुई भाषा में करोड़ों को बांध कर

राजनीति का कारोबार चलाना।

मेरे इन सपनों में हैं

असंख्य मूक-बधिर कमजोर आदमी के

छोटे-छोटे सुख-दुख के सपने

बच्चे, बूढ़े ,जवान ,मां-बेटी की खुशी के सपने

आत्महत्या करते किसान और मजदूर के सपने

मैं इन्हें अपनी जिंदगी में- मां-बाप के सपने की तरह

बचाता आ रहा हूं वर्षों से।

सपने और भी हैं बहुत

उनको भी चाहता हूं इस इतिहास के अंधेरे

और त्रासदी के रक्त-रंजित युग से बाहर निकालना

और उनकी जिंदगी को समर्पित कर देना

जिनकी आंखों में सदियों से सूनापन है।

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तूफान

जब कोई ताकतवर

किसी कमजोर का निवाला

निगलता है तो वह

मेरे गले में आकर फंसता है

और छटपटाती है मेरी जिंदगी।

औरों की जिंदगी से ऐसी

गाढ़ी दोस्ती है मेरी कि-

देह किसी की क्यों न हो

भूख, प्यास, दु:ख

चिंता और भय का

अनुभव हम एक समान करते हैं।

सच कहता हूं

किसी के हिस्से का सुख, खुशी

जब भी कोई ताकतवर

अपनी खुशहाली के लिये छीनना चाहता है

मेरी रगों में उसके खिलाफ

तूफान उठ खड़ा होता है।