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Tuesday 23 Oct 2018

7/1/7 (सात जनवरी दो हजार सात)

अमरीका वासियो को 9/11 और मुम्बई  वासियों को 26/11 कभी  नही  भूलेगा, उसे  भी 7/1/7 यानी 7 जनवरी, 2007 की तारीख कभी नहीं भूलेगी। उस दिन की स्मृतियां उसे आज भी कचोट रही थी। मगर उसके दर्द का कारण न तो किसी आतकवादी संगठन द्वारा किया बम विस्फोट था ना ही किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से था। उसका दर्द तो उसके पढऩे के साहित्यिक शौक के कारण उसे मिला था।

हुआ यह कि वह अंग्रेजी और हिन्दी साहित्य को लेकर जब कालेज में पढ़ रहा था, तब नीत्शे, टेनीसन, इलियट और हिन्दी के पुरातन और आधुनिक कवियों को पढ़ते-पढ़ते उसे साहित्य से गहरा लगाव हो गया था। वह किसी भी तरह के फुर्सत के क्षणों में कालेज लायब्रेरी में पाया जाता था । हिन्दी और अंग्रेजी की कई पत्र पत्रिकाएं वह पढ़ता और लेख लिखता था। किसी प्रोफेसर को पढ़ाते-पढ़ाते अगर किसी कवि या लेखक का कोई उद्धरण याद नहीं आता तो वह झट से बता देता था। इसलिये छात्राओं में भी वह चर्चा का विषय बन गया था। लड़कियां उससे मिलकर अपने पाठ्यक्रम में साहित्य संबंधी समस्यायें सुलझाया करती थी।

 आम निम्न्र मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं की तरह जब वह बी.ए. पास करके कालेज से बाहर हो गया तो उसे नौकरी की जरूरत महसूस हुई, तब उसे पता चला कि शेक्सपियर से लेकर इलियट तक और सूरदास से लेकर नीरज तक साहित्यकारों के बारे में उसका ज्ञान उसे रोजी रोटी नहीं दिला सकता। एक साल यूं ही भटकने के बाद उसे कालेज के एक मित्र की ख्यातनाम राजनैतिक हस्ती वाली मां की कृपा से जब एक प्राइवेट सीनियर सेकेण्डरी स्कूल में किसी लीव वेकेन्सी के कारण तीन महीने के लिये दो हजार रूपये महीने पर इंग्लिश टीचर का जॉब मिल गया तो उसने मित्र की मां के चरण स्पर्श करके और मित्र को गले गलाकर उसका एहसान जीवन भर नहीं भुलाने का वादा करके उसे तुरन्त लपक लिया।

यह जॉब यद्यपि अल्पकालीन था मगर उसे अतिरिक्त खुशी इस बात की हुई कि उसके पढऩे का शौक साथ साथ चलता रहेगा। शिक्षण कार्य करते हुये एक सप्ताह हो गया तो उसने स्कूल की लाइब्रेरी के बारे में जिज्ञासा की, तब एक टीचर ने मुस्कारते हुए लाइब्रेरी के नाम पर जिस सीलन की बदबू से सराबोर छोटे से कमरे के दर्शन उसे कराये उसमें तीन अलमारियों में बेहद पुरानी पुस्तकें भरी हुई थी। आलमारियों को देखते ही लगता था कि उन्हें बहुत कम ही खोला गया है। महिलाओं की एक पत्रिका और दो तीन  स्थानीय समाचार पत्र एक मेज पर बेतरतीब से पड़े हुए थे। लायब्रेरी की हालत देखकर उसने प्रिसींपल से भेंटकर जब इस विषय में बात की तो पहले तो उन्होंने उसे ऊपर से नीचे तक घूर कर देखा, मगर उनके घूरते ही उसका परेशान चेहरा देखकर जब वह संतुष्ट हो गई कि वह एक हानिरहित पढ़ाकू युवक है, तो उसे बैठने का इशारा किया। वह उन्हें धन्यवाद देकर बैठ गया तो वह बोली-''उपेन्द्र! अभी तुम प्योरली सब्सीट्यूट पोस्टिंग पर हो। कॉलेज छोड़े तुम्हे ज्यादा समय नही हुआ हैं, फिर भी कालेज की रूमानियत से निकल कर दैनिक जीवन के ठोस धरातल से जितनी जल्दी सामंजस्य बिठा लो अच्छा रहेगा। खाली समय में ज्यादा पत्र पत्रिकाएं पढऩे के बजाय दो-एक ट्यूशन ले लो, नहीं तो दो हजार में क्या तो घर परिवार को दोगे और कितनी पत्र पत्रिकाएं खरीदोगे,  मुझे तुम्हारी पारिवारिक स्थिति का  पता है, इसलिये सलाह दे रही हूँ। बुरा लगे तो इग्नोर कर देना। वैसे मैंने तुम्हें यह सलाह स्कूल की पिं्रसीपल के बजाय एक शुभचिंतक की तरह दी है।''यह कहकर उन्होंने बड़ीे ही अपनत्व  भरी दृष्टि से उसे देखा तो वह लज्जित सा हो गया और केवल ''जी '' कहकर हडबड़ाया सा कमरे के बाहर निकल गया।

इसी तरह दिन बीतने लगे। शाम को वह पत्र पत्रिकाओं को पढऩे के लिये सार्वजनिक पुस्तकालय जाने लगा। मगर वहां अधिकतर पत्र पत्रिकाएं कई टाइमपास पाठकों के हाथ से गुजरते हुए क्षत-विक्षत स्थिति में मिलती थी, और स्तरीय साहित्यिक पत्र पत्रिकाएं वाचनालय में होती ही नहीं थी। उनके बारे में पूछने पर या तो- अभी आई नही होगी जबाब मिलता, या देख लो, यहीं कहीं कोई पढ़ रहा होगा, का निर्देष मिश्रित दिलासा मिल जाती  थी। कई दिनों के बाद एक दिन उपस्थित असिस्टेन्ट लायब्रेरियन से उसने तीव्र प्रतिवाद किया तो उसने बड़ी शान्ति से उसे अपने पास बैेठा कर समझाया कि स्तरीय साहित्यिक पत्र पत्रिकायें -दोपहर के बाद सम्बन्धित विभाग के तमाम सरकारी पदाधिकारियों के घरों पर जाती है , इसलिये सायंकालीन पाठकों को माह के अंत में ही उपलब्ध हो पाती है।  

इसी तरह तीन महीने  बीत गये। उस दिन क्लास खतम होते ही पिं्रसीपल ने उसे बुलवाया तो वह एक ज्ञात आशंका से अन्दर तक कांप गया।

प्रिंसीपल के कमरे में वह दाखिल हुआ तो उसका चेहरा पीला पड़ गया था। उसको स्वयं की आवाज गले में फंसती हुई लग रही थी। प्रिंसीपल की अनुभवी आंखों ने उसके चेहरे पर सब कुछ पढ़ लिया था, इसलिये उन्होंने उसे बैठने का संकेत करके चपरासी को पानी लाने का आदेश देकर बोली-उपेन्द्र मैंने तुम्हें यह कहने के लिये बुलाया है कि अवकाश पर गई टीचर ने अवकाश बढ़ा लिया है। मैंने तुम्हारे पढ़ाने का ढंग देखकर ट्रस्ट के अध्यक्ष से इस बाकी सेशन में तुम्हें कन्टीन्यू करने की सिफारिश की थी जो उन्होंने मान ली है। अब इस सेशन में तुम कन्टीन्यू करो। ठीक है ?

अल्प वेतन की ही अल्पकालीन नौकरी के भी समापन की आशंका से उसकी आवाज अभी तक गले में फंसी हुई थी इसलिये वह धन्यवाद भी नहीं कह सका। केवल स्वीकृति में सिर हिलाकर उठा और कृतज्ञता दिखाते हुए प्रिंसीपल के पैर छू लिये।

वह वर्ष 2007 के जनवरी मास की 7 तरीख यानी 7/1/7 थी।

इसी 7 जनवरी की शाम को जब वह घर पहुंचा तो मां ने उसे एक लिफाफा दिया। लिफाफे पर एक ख्यातनाम अन्तरराष्ट्रीय अंग्रेजी पत्रिका नाम छपा था। उसे झटपट लिफाफा खोल कर देखा। पत्रिका के प्रबन्ध निदेशक की ओर से उसके नाम एक पत्र था, जिसमें किन्हीं मिस्टर शर्मा द्वारा उसका नाम उन तक भिजवाने के लिये उन्हें धन्यवाद देते हुए लिखा था कि वह इस अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका का सम्माननीय ग्राहक बना लिया गया है और उसे निर्धारित कीमत से आधे दामों पर यह पत्रिका साल भर भेजी जावेगी। वह इसके पहले अंक की वी.पी.पी. मात्र साढ़े चार सौ रूपये चुका कर अवश्य प्राप्त करले। पत्र के साथ ही एक प्राफॉर्मा संलग्न था जिसमें उसे पत्रिका दस अन्य सदस्य बनाकर भेजने पर पत्रिका के स्वीपवॉश कान्टेस्ट  में एक प्रतिभागी के रूप में शामिल किये जाने का उल्लेख था।

इस कथित स्वीपवॉश कान्टेस्ट के बारे में बताया गया था कि पत्रिका इस प्रतियोगिता में अन्तिम चयनित चार प्रतियोगियों को 25 लाख रुपये प्रति प्रतिभागी देगी तथा शेष प्रतियोगियों को 5000 आकर्षक पुरस्कार, जो कम से कम दस हजार रूपये मूल्य के होंगे, वितरित करेगी। एक वाक्य इस पत्र में रेखांकित किया गया था कि वह इस महानगर से इस प्रतियोगिता के लिये चुना गया एक मात्र भाग्यशाली व्यक्ति है। कान्टेस्ट में कोई तिथि या अवधि घोषित नहीं की गई थी। पत्र पढ़ते-पढ़ते उसे लगा कि 7 जनवरी उसके जीवन में एक महत्वपूर्ण तारीख बनने जा रही है। 7 जनवरी को सुबह उसे अपनी छोटी सी नौकरी की कार्य अवधि पढऩे की सूचना मिली और शाम को यह पत्र। मगर ज्यों ही उसे साढ़े चार सौ रूपये की वी.पी.पी. छुड़ाने की बात याद आई वह उलझन में पड़ गया। तीसरे ही दिन उसके स्कूल से लौटने पर मां ने उसे बताया कि पोस्टमेन एक वी.पी.पी. लेकर आया था। मगर घर में साढ़े चार सौ रूपये नहीं होने के कारण वी.पी.पी. नही छुड़ा सकी। पोस्टमेन उसे वापिस ले गया और डाकखाने जाकर तीन दिन में उसे छुड़ा लेने का निर्देश दे गया है।

जैसे-तैसे रूपयों का इन्तजाम करके चौथे दिन वह डाकखाने पहुंचा तो संबंधित क्लर्क ने उसे सुबह आते ही सबसे पहले नहीं छुड़ाई गई वी.पी.पी. वापिस भेजने का काम करने की बात बताई तो वह भड़क गया। उसने क्लर्क को कहा कि कार्यालय समय शाम को पांच बजे तक होता है, तब उसने सुबह सबसे पहले यही काम क्यों किया तो क्लर्क नियमों का हवाला देकर अपने काम मेंं जुट गया। काउण्टर पर लाइन में पीछे खड़े लोगों ने भी उसे लाइन से उसे धकिया कर काउण्टर से हटा दिया तो उसे ऐसा लगा कि इन सबने मिलकर उसके हाथ से पच्चीस लाख का बियरर चैक छुड़ा लिया है। वह लाइन से निकल कर घर लौटा तो बेहद उदास था।

इसके बाद पांच-सात दिन ही बीते थे कि उसे पत्रिका की ओर से एक पत्र मिला, जिसमें वी.पी.पी. नहीं छुड़ाने के कारण छपे हुए थे उसे सही कारण पर निशान लगाकर पत्र वापिस पत्रिका को तुरन्त भेजना था जिससे कारणों पर विचार करके उसे वी.पी.पी. पुन: भेजी जा सके। पत्र पढ़कर उसकी उदासी के बादल छंट गये और उसने ''आउट आफ  स्टेशन'' होने के कारण पर निशान लगाकर पत्र भेज दिया। सातवें दिन वी.पी.पी. वापिस आ गई। अबकी बार उसने साढ़े चार सौ रूपये मां के पास अग्रिम जमा करा दिये थे, इसलिये मां ने वी.पी.पी. छुड़ा ली थी।

पत्रिका देखकर उसे खासी निराशा हुई। पत्रिका के 108 पृष्ठों में 48 पूरे पृष्ठ के विज्ञापन थे। 32 आधे पृष्ठ विज्ञापनों से भरे हुए थे। सभी विज्ञापन भारतीय विशाल औद्योगिक घरानों के उत्पादों के थे। दो लेख योरोपीय समाज की समस्याओं पर आधारित तथा एक लम्बा यात्रा वृत्तान्त किन्हीं यूरोपीय लेखकों के थे। केवल एक लेख भारतीय लेखक का - भारत में बैंकिग की खामियों पर बेहद क्लिष्ट अंग्रेजी में था जिसमें बैंकिंग से सम्बन्धित तकनीकी शब्दों की भरमार थी। कुछ स्थाई स्तम्भ थे, जिनमें प्रकाशित सामग्री का अर्थ समझने के लिये योरोपीय समाज की सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान आवश्यक था। मतलब पत्रिका में एक आम मध्यम वर्गीय अंग्रेजी जानकार भारतीय के लिये कुछ विशेष पठनीय नहीं था। मगर 25 लाख के इनाम में प्रतिभागिता के आकर्षण में उसने पत्रिका का यह दोष माफ  कर दिया।

अब वह दस ग्राहक बनाने की मुहिम में जुटा तो उसे पता चला कि यह काम उस जैसे निम्न मध्यमवर्गीय परिबार के शिक्षित युवक के लिये मुश्किल ही नहीं असम्भव प्राय ही था क्योंकि आम आदमी अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका का नाम भी नहीं जानता, और पत्र पत्रिकाएं उसके घरेलू बजट में फिट नहीं हो पाने के कारण उसकी दिलचस्पी भी इनमें नहीं ही होती है और जहां संभावना बनती थी, वहां एक तो उसकी स्वयं की पहुंच की सम्भावना नगण्य ही थी, फिर भी उसने ऐसी एक दो जगह किसी  माध्यम से पहुंच बनाई तो उसे पता चला कि वहां यह पत्रिका स्वयं पहुंच रही थी, जब कि उस वर्ग के लोगों के पास पत्रिका वगैरह पढऩे का समय ही नहीं होता, पत्रिकाएं उनका साहित्यबोध और इन्टीलेक्चुएलिटी के प्रदर्शन के लिये ड्राइंगरुम की सेण्ट्रल टेबिल पर पड़ी रहती हैं।  

वह इन दिनो ग्राहक नहीं बना पाने की समस्या को लेकर इतना परेशान हो गया था कि वह जिस दिलचस्पी से छात्रों को पढ़ाता था वह खत्म हो गई थी। एक दिन प्रिंसिपल ने उसे बुलाया और कहा- ''उपेन्द्र, इंग्लिश में तुम्हारी एफीशियेन्सी और पढ़ाने की लगन देखकर मैंने तुम्हारा नाम रिकमण्ड किया था। मगर टवेल्थ क्लास की छात्रायें कह रही थी कि अब तुम पढ़ाने में उतना इन्ट्रे्स्ट नहीं ले रहे हो। अगर यह बात प्रबंधन तक पहुंच गई तो सेशन एण्ड तक तुम्हारी कण्टीन्यूटी मुश्किल हो जायेगी। यहां तो महीने दो महीने के जॉब के लिये भी लाइन लगी रहती है। अगर कोई पर्सनल प्राब्लम है तो उसे जॉब के साथ मिक्स मत करो। वैसे भी मार्च में ट्वेल्थ के स्टूडेण्टस की वार्षिक परीक्षा होगी। अगर जरूरत हो तो एक्स्ट्रा क्लास लो। मगर स्टूडेण्टस की शिकायत नहीं आनी चाहिये।''

प्रिंसिपल की बात सुनकर एक दफा तो उसे तैश आ गया। उसे लगा कि कह दे कि दो हजार रुपये में आठ घन्टे माथा फोड़ी के लिये रख लें किसी दूसरे को। इतना श्रम कुछ दिन ही करके अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका के दस ग्राहक बना देगा तो पत्रिका उसे पच्चीस लाख के इनाम का प्रतिभागी बना देगी, जो उसे इस स्कूल में टीचर से क्लर्क तक का फटीचर काम करते हुए पूरी जिन्दगी में मिलना तो दूर सोचना भी नसीब नहीं होगा, मगर फिर किसी अज्ञात चेतना से थोड़ा संयमित होकर ''जी अच्छाÓÓ कहकर चला आया। शाम को वह आदत के मुताबिक पब्लिक लायब्रेरी जा रहा था कि उसका कालेज के दिनों का दोस्त मिल गया। उसने उससे उदासी का कारण पूछा तो उसनेे कुछ हिचकिचाहट के साथ अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका के दस ग्राहक बनाने की अपनी समस्या बताई। सुनकर दोस्त हंस पड़ा तो उसे लगा यह इण्टरमीडियट पास निम्न मध्यमवर्गीय अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका का महत्त्व ही नहीं समझ रहा, इसलिये इससे बात करना बेकार है।  उससे पीछा छुड़ाने के लिये -''अरे यार मां की तबियत खराब है, उनकी दवा लेकर जाना है, इसलिये अभी चलता हूँ। फिर मिलेगे।'' कहकर वह चल ही दिया था। मगर दोस्त ने जब पूछा- अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका के दस ग्राहकों के बारे में क्या सोचा है तो वह पुन: उलझन में पड़ गया। उसके दोस्त ने जब उसे वह फार्म उसे दे देने के लिये बोला तो उसने काफी संशय के साथ फार्म उसे देते  कहा- ''यार। तुम हो तो शुरू से जुगाडू़, मगर यह अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका के ग्राहक बनाने का मामला है तुम....कहते हुए वह असमंजस में हकलाने लगा तो - तुझे आम खाने से मतलब कि पेड़ गिनने से, कहकर दोस्त हंसता हुआ चला गया, तो आशा की धुंधली किरण से उसकी उदासी फिलहाल तो दूर ही हो गई। चार पांच दिन बीत गये, मित्र न तो मिला न उसकी ओर सेे कोई सूचना स्कूल के फोन नम्बर पर आई तो वह आशंकित हुआ कि उसके मित्र ने शायद उसका मन रखने के लिये एक तसल्ली दे दी थी। अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका के दस सदस्य बनाना हंसी खेल थोड़े ही है, यह सोच कर उसने अपने मित्र से मिलकर सही स्थिति जानने और काम नहीं होने पर उसे लताडऩे का निश्चय किया। 

वह शाम को लायब्रेरी जा रहा था तो उसका वह दोस्त रास्ते में ही मिल गया। दस ग्राहक बना देने की बात  पूछने पर वह दोस्त हंस पड़ा, तो वह बुरा मान गया, तब उसका दोस्त बोला- ''भइया कई दफा तेरी नकल करके परीक्षा में पास होने का तेरा एहसान है मुझ पर इसलिये तुझे बता देता हूँ। तुम ज्यादा पढ़े लिखे- समझदार- साहित्यिक लोग बड़ी जल्दी भावनाओं में वह जाते हो, अकल से काम ही नहीं लेते हो। तुम्हारी अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका के निर्देशक के पत्र को पहले मैंने तुम्हारेे जैसे एक अंग्रेजी पढ़े लिखे दोस्त से समझा,, उसने बताया कि पत्र में ग्राहक बनाने के लिए लिये ही लिखा गया है, उनका सदस्यता शुल्क भेजने को थोड़े ही लिखा गया, सो मैंने अपने दस दोस्तों के नाम व पते प्रोफार्मा में भरवाकर भेज दिये। अब पत्रिका के प्रबन्ध निदेशक महोदय सभी दस लोगों को पत्र भेजेंगे कि -वह अकेले भाग्यशाली व्यक्ति है, जिनको इस पत्रिका का ग्राहक बनकर एक करोड़ रूपये के स्वीपवॉश प्रतियोगिता का प्रतिभागी बनने का अवसर मिला है और उन्हें भी दस ग्राहक बनाने और पत्रिका के प्रथम अंक की वी.पी.पी. साढ़े  चार सौ रूपये देकर छुड़ाने का आग्रह किया जावेगा। कुछ लोग रूपये देकर वी.पी.पी. छुड़ाएंगे और दस ग्राहक बनाने की समस्या पाल लेंगे तुम्हारी तरह और उसमें जी जान से जुट जायेंगेे। अब जरा अकल से सोचो मेरी भेजी गई लिस्ट के लोग वी.पी.पी. नहीं छुड़ायेगे तो तेरे मेरे स्वास्थ पर क्या असर पड़ेगा। बच्चू यह मार्केटिंग का फण्डा है। इसे हम जैसे इण्टरमीडियेट पास इण्टरक्लास के ब्रोकर ही समझ सकते है तुम जैसा इण्टेलीजेन्ट, जीनियस पढ़ाकू नहीं।

दो तीन महीने बीत गये। पत्रिका अब हर माह नियमित आ रही थी। अचानक एक दिन उसे एक पत्र मिला जिसके साथ में अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका के कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशनों की सूची थी और उसे इनमें से कम से कम एक का आदेश इसलिये देने का आग्रह किया गया था ताकि स्वीपवॉश कन्टेस्ट में उसकी प्रतिभागिता को कन्फर्म किया जा सके। साथ ही प्रबन्ध निदेशक का पत्र भी था जिसकी भाषा अंग्रेजी तो थी ही, बड़ी रूखी और लगभग बेहूदी ही थी। लिखा था ''मैं नहीं समझता कि कोई व्यक्ति दुनिया के इन दुर्लभ ग्रन्थों को इतने वाजिब दामों में पाने के अवसर को ''न'' कह कर एक करोड़ रूपये के स्वीपवॉश कान्टेस्ट में अपनी प्रतिभागिता को कन्फर्म नहीं होने देने की मूर्खता कैसे कर सकता है। कम से कम आप तो नहीं ही करेंगे।''

सूची पत्र में सबसे कम कीमत के दुर्लभ ग्रन्थ की कीमत चार सौ रूपये थी। उसने उस पर निशान लगाकर आर्डर दे दिया। एक सप्ताह में ही वह पुस्तक आ गई, जो सहारा के रेगिस्तान में पाये जाने वाले कुछ रेंगने वाले जन्तुओं के बारे में किसी आस्ट्रेलियन सैलानी का रंगीन चित्रमय विवरण था। पुस्तक अस्सी पृष्ठों की एक पत्रिका जैसी थी, जिसमें 8-10 पृष्ठ विभिन्न सौन्दर्य प्रसाधनों और महिलाओं के अंगवस्त्रों के विज्ञापनों से भरे हुए थे। पत्रिका को देखकर - एक बार तो इस के लिये चार सौ रूपये उसने कैसे जुटाये याद करके वह खिन्न हो गया और उसे अपने दोस्त की बात याद आई, मगर पच्चीस लाख के इनाम की बात याद आते ही वह सब कुछ भूल कर स्वप्नलोक में खो गया।

एक माह बाद ही दीपावली आने वाली थी। पत्रिका की ओर से फिर एक सूची पत्र प्राप्त हुआ जिसमें अपने परिवार और मित्रों को दीपावली पर दिये जाने योग्य आकर्षक उपहारों के चित्र थे। अबकी बार आदेश की बाध्यता तो नहीं थी मगर प्रबन्ध निदेशक का पत्र लगभग उसी बेहूदी भाषा में उपहारों की सूची पत्र के साथ पत्रिका द्वारा प्रस्तावित मूल्यों पर खरीदारी नहीं करने के बारे में संलग्न था। अभी तक उसने छोटी बहिन को कोई उपहार नहीं दिया था। इसलिये उसने सूची में सबसे कम मूल्य के आइटम प्लेटीनम ब्राइट चेन मय पेण्डुलम के कोड पर निशान लगाकर सूची पत्र वापिस भेज दिया।

सप्ताह बीतते-बीतते उसे एक पार्सल वी.पी.पी. द्वरा मिला। जिसे एक हजार सात सौ पचास रूपये देकर छुड़ाना था। करीब पन्द्रह सौ रूपये उसने जैसे-तैसे जोड़ रखे थे, जिनसे वह दीपावली पर कम से कम मां के लिये एक मध्यम दर्जे की नई साड़ी, पिता के लिये एक कमीज और बहिन को एक सलवार सूट दिलाना चाहता था मगर अब जब उल्टे ढाई सौ रूपये कम पडऩे लगे तो वह रूआंसा हो गया। फिर उसने सोचा बहिन भाई दूज पर वह तोहफा पाकर कितनी खुश होगी तो उसने अपने एक मित्र के माध्यम से रूपये कर्ज देने वाले से सूद पर दो हजार रूपये ले लिये। वह उसकी नौकरी के बाद पहली दीपावली पर मां पिता बहिन सबको उपहार देना चाहता था। अब उसने दो ट्यूशन भी पकड़ लिये थे। इसलिये वह अतिरिक्त उत्साह से भर गया था।

भाई दूज के दिन जब उसने वह पैकेट बहिन को दिया तो मां बाबूजी और बहिन तीनों ने उसे विस्फारित आंखों से देखा। पैकेट खोलने पर एक खूबसूरत नक्काशीदार छोटा प्लास्टिक का बक्सा निकला। उसे खोलने पर उसमें एक लाल रेशम की थैली निकली, जिसमें वह सफेद रंग की चेन थी जिसमें एक पेण्डेण्ट का था। मां एकदम भड़क गई, मगर जब बहिन ने चमकती आंखों से उसे बड़े ही स्नेह से देखते हुए मां से कहा- मां भइया को क्या पता था, भइया का दिल छोटा न करो।'' तो आज उसे बहिन की ममता का अहसास हुआ। उसका दिल खुशी से भर गया, उसने बहिन को गले से लगा लिया।

मगर भाई दूज के तीूसरे ही दिन उसकी खुशी पर गाज गिरी। रात को जब वह टयूशन देकर घर लौटा तो बहिन को बेहद खिन्न और उदास देखकर उससे कारण पूछा, तो बहिन ने बताया कि वह चेन जो उसे एक हजार छ सौ रूपये में बेची गई है, वह व्हाइट मेटल की है, जिसे पालिश करके चमकाया गया है और उसकी कीमत स्थानीय बाजार में व्हाइटमेटल के उत्पाद से विदेशी पर्यटकों को लुभाने वाले शोरुम पर छ:- सात सौ रूपये है। बहिन की बात सुनकर उसे अपने मित्र का कथन याद हो आया, मगर अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका का भारी भरकम नाम और पच्चीस लाख का इनाम याद आते ही उसे लगा कि बहिन को ऐसे ही किसी ने बरगला दिया है। बी.ए. में आ गई तो क्या, है तो अभी बच्ची ही, उमर भी क्या है उसकी ऐसी, जो समझ सके कि अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका चलाने वाली इतनी बड़ी संस्थाएं ऐसा धोखाधड़ी का काम नहीं कर सकती।

वर्ष के अन्त में उसे तीन गुणा तीन इंच का क्रिस्टल ग्लास का खूबसूरत सा पेपरवेट उपहार स्वरूप मिला। अगले वर्ष का ग्राहक शुल्क अग्रिम भेजने का अनुरोध पत्र भी इस उपहार के साथ संलग्न था। वह अगले वर्ष का वार्षिक शुल्क भेजने की ऊहापोह में था कि उसे प्रबन्ध निदेशक की ओर से शुभ समाचार मिला जिसमें उसके पच्चीस लाख के निश्चित इनाम का प्रथम चरण पूर्ण कर लेने वाले भाग्यशाली प्रतिभागियों में चुने जाने पर बधाई दी गई थी। अब उसने जैसे तैसे करके अगले साल की वार्षिक सदस्यता के शुल्क का डिमाण्ड ड्राफ्ट भिजवा ही दिया।

डिमाण्ड ड्राफ्ट भेजने के दो सप्ताह बाद उसे धन्यवाद ज्ञापन के साथ नये दस सदस्य बनाने के लिये प्राफार्मा प्राप्त हुआ तो अबकी बार उसने भी अपने मित्र की बताई तरकीब धड़कते दिल से व्यवहार में ली। और दो सप्ताह बाद वह प्राफार्मा उसने वापिस भेज दिया।

अगले साल की वार्षिक सदस्यता शुल्क भेजनेे के कुछ दिन बाद अबकी बार उसे लग्जरी कार के चित्रों की सूची प्राप्त हुई, जिनमें चार कारों के चित्र थे। पत्र के साथ दिये गये चिपकने वाले अक्षरों के टुकड़ों से इन कारों के माडल के नाम बनाकर भेजने थे। दो कारों के नाम तो उसने बना लिये शेष दो कारों के लिये उसे शहर में कारों के शो रूम के चक्कर लगाकर बनाने पड़े। मगर चारों नाम पूरे हो गये तो उसके मुंह से अचानक निकल गया- 'तेरा लाख लाख शुक्र है भगवान। उसे भगवान का शुक्रिया अदा करते देख उसकी मां घोर आश्चर्य में पड़ गई और उसके मुंह से भी अचानक निकल गया- आज भूत के मुंह से रामराम सुन रही हूं,, भगवान तेरा लाख लाख धन्यवाद ।

इस साधारण से क्विज टेस्ट के बाद उसे पुन: एक सूची पत्र प्राप्त हुआ जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत सहित, पश्चिमी संगीत के दुर्लभ वाद्य यंत्रों पर ख्यातनाम कलाकारों द्वारा बनाई गई धुनों तथा गानों की सीडी का विवरण था और साथ ही प्रबन्ध निदेशक का वही बेहूदी भाषा में अनुरोध पत्र संलग्न था। उसने पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया की वांसुरीवादन की सीडी पिता के लिये लेने की सोची, मगर फिर यह सोचकर कि जब घर में सीडी प्लेयर ही नहीं है तो सीडी का क्या होगा, दु:खी मन से इस विचार को स्थगित कर दिया, मगर आर्डर तो देना ही था इसलिये काफी सोचने के बाद उसे ध्यान आया कि प्रिंसिपल साहिबा के बारे में सहयोगी टीचर ने बताया था कि वह सुव्बा लक्ष्मी के शास्त्रीय गायन की बड़ी प्रशंसक है इसलिये उसने सुव्बा लक्ष्मी की सीडी का आर्डर दे दिया और एक तीर से दो निशाने सधते देख वह प्रसन्न हो गया। जब पांच सौ रूपये भुगतान के बाद वीपीपी  छुडाई तो उसका उत्साह उदासी में बदल गया। अगले महीने उसे पच्चीस लाख के चैक की डमी भेजकर उसका चयन का प्रथम चरण पूर्ण होने की सूचना दी गई तो वह दुगने उत्साह से भर गया और अब छोटे छोटे आर्डर देकर पत्रिका से सम्बद्धता बनाये रखने के लिये उसने एक टयूशन और पकड ली थी।

दूसरा वर्ष बीतते बीतते उसे हर दो माह कुछ न कुछ आर्डर करते हुए कम से कम तीन चार हजार रूपये की विभिन्न वस्तुयें क्रय करनी पड़ी थी, जिनका उसके निम्न मध्यमवर्गीय पविार में कोई प्रयोग नहीं हो सकता था, मगर दूसरे साल के अन्त में जब उसे दो डमी चेक भेजकर अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका ने पच्चीस लाख के इनाम के लाभार्थी के चयन का दूसरा चरण पूरा होने का समाचार भेजा तो वह पत्रिका के प्रति कृतज्ञता से भर गया। तीसरे वर्ष का ग्राहक शुल्क उसने स्वेच्छा से ही भेज दिया। अब जब भी पत्रिका का कोई सूची पत्र प्राप्त होता वह छोटा मोटा आर्डर दे ही देता था।

तीसरा वर्ष समाप्त होने पर उसे तीन डमी चैक प्राप्त हुए जिनमें उसके सफल प्रतिभागियों के चयन का तीसरा चरण पूरा कर लेने का संदेश था। साथ ही एक लग्जरी कार का चित्र था जिस पर पत्र में चिपकाई गई कार की चाबी को कार के चित्र में यथा स्थान चिपकाना था। लग्जरी कार को पुरस्कार के साथ जोड़ा गया था। कम से कम दस लाख की लग्जरी कार का मालिक बनना तो तय था, ऐसा आश्वासन पत्रिका की ओर से दिया गया था, मगर आज तक इस स्वीपवॉश कान्टेस्ट की कोई तारीख घोषित नहीं की गई थी। अब उसे अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका की साख पर पूरा भरोसा हो गया था। इसलिये जब इस बार पत्रिका का सूची पत्र प्राप्त हुआ तो उसने बेहद खुले दिल से डेढ़ हजार रूपये के अंग्रेजी विश्वकोष का आदेश दे दिया। हालांकि आर्डर करते समय उसे याद आया कि कुछ समय पहले एम.बी.ए. के कुछ छात्र मार्केटिंग ट्रेनिंग के नाम पर ऐसा ही विश्वकोष आठ सौ रूपये में घर घर घूम कर बेच रहे थे और बिकने की संभावना होने पर आठ सौ रूपये में भी पांच छ:प्रतिशत तक कम करने को तैयार हो जाते थे। मगर इस समय आर्डर देते हुये उसे लगा कि वह अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका द्वारा प्रकाशित विश्वकोष का आर्डर दे रहा है तो उसे अजीब सी गर्व की अनुभूति हुई। अजब संयोग था कि उसे वीपीपी प्राप्त होने की सूचना अबकी बार 7 जनवरी को ही मिली थी। वह अब तक संयोग भाग्य वगैरह में भी पूरी तरह विश्वास करने लगा था। अबकी बार मां के यह कहने पर कि पोस्टमेन वीपीपी लेकर आया था मगर घर में एक हजार सात सौ पचास रूपये नहीं होने से नहीं छुड़ा पाई, वह एकदम उखड गया। न जाने कैसे उसके मुंह से निकल गया-''क्या मां हर समय घर में पैसे नहीं होने का रोना रोती रहती हो,'' मगर उसके इस तरह भड़क उठने पर जब मां ने उसे तरल आंखों से देखा तो वह काफी शर्मिन्दा हुआ और घर से निकल गया।

दो दिन बाद वह किसी तरह पैसे का इन्तजाम करके वह ठीक दस बजे डाकखाने पहुंच गया और संबंधित क्लर्क को सूचना पत्र दिखाकर वीपीपी देने को कहा। क्लर्क उसे लेकर डाकखाने के तहखाने में उतर आया और उसने एक बड़े से सन्दूक खोला। क्लर्क के बक्सा खोलने पर उसने देखा कि एक ही आकार प्रकार के कई पैकेट बक्से में भरे हुए थे, जिसमें से उसके कोड का पेकेट निकालने के लिये वह अन्य पैकेटों को जमीन पर पटकता जा रहा था। आखिर में जब उसका पैकेट मिल गया तो उसने एक बार फिर उससे रसीद लेकर उसका कोड नम्बर मिलाया। अब उसे इसका इन्द्राज करने के लिये एक रजिस्टर की जरूरत पड़ी जो उसकी विपरीत दिशा की टेबिल पर उससे थोड़ी दूर रखा था। क्लर्क ने एक हाथ से बक्से का ढक्कन और एक हाथ से उसका पैकेट पकड़े होने के कारण उसे वह रजिस्टर उठा देने का अनुरोध किया। रजिस्टर उठाने के लिये जैसे ही वह पेकेट्स के ढेर को पार करने लगा, उसे उनके ऊपर उसी अन्तरराष्ट्रीय अंग्रेजी पत्रिका का नाम बड़े-बड़े अक्षरों में मुद्रित दिखाई पड़ा। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। शंका समाधान के लिये वह क्लर्क से बड़ी ही बेवकूफी का सवाल कर बैठा कि क्या यह सब वीपीपी इसी शहर के लिये आई है? प्रश्न सुनकर क्लर्क एकदम भन्ना गया। वह तिक्त स्वर में बोला-बाबूजी आप पढ़ेजलिखे हो। इस डाकखाने में पूरे शहर की नहीं इस महानगर के सिर्फ नॉर्थ जोन की ही डाक आती है। सुना है इस पत्रिका ने कोई एक करोड़ रूपये की इनाम वाली कम्पटीसन (कम्पटीशन) चला रखी है। सो हर दो माह में सैकड़ों वीपीपी आती है। कुछ छुड़ाली जाती ह,ै बाकी को तीन दिन के बाद आवश्यक रूप से वापिस भेजने का अतिरिक्त काम मुझे ही करना पड़ता है, जिसके बदले में कभी-कभी कुछ पढ़े लिखे लोगों की धमकियां और भाषण ही मिलते हैं।

अब उसने गौर से देखा। वास्तव में सभी पैकेट उसके नाम के अंकित पैकेट जैसे थे जिनमें प्रिण्टेड बुक के लेबल के नीचे ही अन्तरराष्ट्रीय अंग्रेजी पत्रिका का नाम बड़े-बड़े अक्षरों में उसके डाक के पते के साथ प्राप्त कत्र्ता के उपलब्ध नहीं होने की दशा में पत्रिका को वापिस भेजने के निर्देश के साथ छपा हुआ। यह सब देखकर वह लगभग दिग्भ्रमित होगया- तो  अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका के प्रबन्ध निदेशक ने उसे पहले पत्र में जो लिखा था कि वह उस महानगर में इस स्वीपवॉश कन्टेस्ट के लिये चुना जाने वाला एक मात्र भाग्यशाली व्यक्ति है, यही पत्र इस एक बड़े शहर के एक भाग में रहने वाले इतने लोगों को मिला है। तो क्या इतनी बड़ी अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका के प्रबन्ध निदेशक का वह पत्र - उसके इण्टरमीडियेट पास दोस्त के कहे मुताबिक सिर्फ मार्केटिंग का फण्डा है। उसके मित्र ने उस दिन जो कहा था कि तुम ज्यादा पढ़े लिखे लोग इस मार्केटिंग के फण्डे को नहीं समझोगे, वह बात एकदम सच थी?

ैपैकेट्स पर नजर गड़ाये हुये सोचते सोचते उसे लगा जैसे तहखाने में भूकम्प आ रहा है। उसकी दीवारें हिल रही हंै फर्श पर प्रिण्टेड बुक्स के पैकेट नहीं भूकम्प में टूटी इमारत का मलबा पड़ा है। उसके पैर कांपने लगे। कानों में तेज तूफनी हवा की सांय सांय गंूजने लगी। उसे लगा कि तहखाने की दीवारें गिर जाने से तेज हवा का झोंका आया और उसके हाथ में पकड़ा पच्चीस लाख का बियरर चैक उसके हाथ से छूट कर हवा में उड़ गया। वह चैक को पकडऩे के लिये लपका तो कांपते पैरों की वजह से लहराता हुआ किताबों के पैकेट पर ही गिर गया। गिरते समय उसका माथा वजन करने की मशीन के लोहे के प्लेटफार्म से बड़े जोर से टकरा गया। उसका माथा फट गया, खून की धार बह निकली।

अर्ध चेतन अवस्था में वह सपना देख रहा था उसकी बहिन की शादी हो रही है वह सफेद जोधपुरी सूट और गुलाबी साफा पहने शादी की रस्में निर्वाह करवा रहा है। लाल साड़ी में लिपटी उनकी बहिन बड़ी ही सुन्दर लग रही है। अचानक उसकी बहिन रोती हुई उससे लिपट गई।

बहिन की सिसकियों से उसकी आंख खुल गई। बहिन वास्तव में सिसक रही थी। मगर उसकी सिसकियां फेरों के बाद विदा होने वाली बहिन की नहीं थी। वह उसके माथे पर बंधी पट्टी के ऊपर उभरते खून के निशान को देखकर उसके माथे पर हाथ रखकर रो रही थी। सर्दी से बचने के लिये उसने पुरानी लाल ऊन का हाथ से बनाया हुआ शाल लपेट रखा था। सपने के बारे में सोचते हुए उसने बहिन की ओर देखा। बहिन को रोते देख उसकी आंखों में आंसू आ गये। उसके सिर में दर्द की एक लहर उठी और अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका  द्वारा दिखाये गये  25 लाख के सुनहरे सपनों के एक झटके में टूट जाने की निर्मम चोट से उसकी चेतना फिर से लुप्त हो गई।